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आंखों में आंसू देकर हो गये अमर…

आंखों में आंसू देकर हो गये अमर…

पठानकोट में एयरबेस कैंप में हमला करने वाले जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के खिलाफ ज्वाइंट ऑपरेशन के दौरान देश ने अपने 7 जवान खो दिए। इनमें एनएसजी के एक लेफ्टिनेंट कर्नल, एक गरुड़ कमांडो व पांच डिफेंस सिक्योरिटी कोर (डीएससी) के जवान शामिल हैं। नायक गुरसेवक सिंह, लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन, कैप्टन फतेह सिंह, हवलदार कुलवंत सिंह, हवलदार जगदीश चन्द्र, संजीवन सिंह राणा और हवलदार मोहित चंद्र इस हमले में शहीद हो गये। इन शहीदों ने देश की खातिर अपने प्राण न्यौछावर कर दिये, ये सोचे बिना कि इनके पीछे से इनके परिवार का क्या हाल होगा। भारत माता के ये जाबांज सपूत तो मां का कर्ज चुका कर चले गये, लेकिन इनके पीछे आंखों मे आंसू और सीने में अपनों से बिछडऩे का दर्द लिये रह गये इनके परिवार के लोग, जिन्हें अब कभी न तो इनकी सूरत दिखाई देगी और न ही इनकी आवाज कभी कानों में गूंजेगी। बस रह जायेंगीं इनकी वे यादें जो अपनों के जीने का सहारा होंगी, लेकिन एक इंसान की कमी से पूरा परिवार टूट कर बिखर जाता है। आईये जानते हैं दुख की घड़ी में इन जाबांज शहीदों के स्वजनों का हाल।

लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन, एनएसजी

एनएसजी के लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन एक आतंकी के शरीर में लगे आईईडी बम को डिफ्यूज करने की कोशिश कर रहे थे, कि अचानक बम फट गया। जिसमें निरंजन कुमार बुरी तरह जख्मी हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। कर्नल निरंजन अपने पीछे रोते-बिलखते माता-पिता, अपनी पत्नी राधिका के अलावा दो साल की बेटी विस्मय को छोड़ गये। जो अब अपने पिता की शहादत की कहानियां तो सुनेगी पर पिता के लाड़-प्यार और दुलार को कभी भी महसूस नहीं कर सकेगी। लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन के पिता ने आंखों में आंसू भरे बताया कि ”निरंजन को आर्मी में जाने की बहुत इच्छा थी, क्योंकि उसे आर्मी की वर्दी बेहद पसंद थी।’’

निरंजन को आर्मी में भर्ती होने की इजाजत देते वक्त पिता को क्या पता था कि उनका बेटा एक दिन इसी वर्दी की खातिर अपनों को हमेशा के लिए छोड़ कर चला जायेगा।

नायक गुरसेवक सिंह, गरुड़ कमांडो

शहीद हुए नायक गुरसेवक सिंह की शादी को अभी महज डेढ़ महीना ही गुजरा था। बीते 18 नवंबर को ही गुरसेवक और उनकी पत्नी जसप्रीत शादी के अटूट बंधन में बंधे थे। पर जसप्रीत को क्या पता था, कि उसके हाथ की मेंहदी उतरने से पहले ही गुरसेवक सात जन्मों के इस अटूट बंधन को तोड़ कर उसे इस दुनिया में अकेला छोड़ कर चले जायेंगे। गुरसेवक अपनी पत्नी जसप्रीत को महज कुछ दिन पहले ही मायके में छोड़कर आये थे। रविवार सुबह जब गुरसेवक की पत्नी जसप्रीत कौर ने फेसबुक खोला तो गुरसेवक के एक दोस्त का पोस्ट देखकर वह सन्न रह गईं, उनके पैरों तले से जमीन ही खिसक गई, क्योंकि उसमें गुरसेवक को शहीद दिखाया गया था। दूसरी तरफ बेटे की मौत की खबर सुनकर गुरसेवक की मां के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे, वहीं पिता ने बेटे के शहीद होने के बाद अपने दिल पर पत्थर रखते हुए कहा कि वह दुखी जरूर हैं, लेकिन उन्हें अपने बेटे पर गर्व है। पत्नी जसप्रीत बताती हैं कि ”शुक्रवार रात को गुरसेवक को फोन किया था, लेकिन उन्होंने काट दिया और मैसज किया कि बाद में कॉल करूंगा लेकिन, कॉल नहीं आये तो तुम सो जाना और उनका फोन नहीं आया’’ ये कहते हुए जसप्रीत की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। गुरसेवक के परिवार को पठानकोट पर हुए हमले में बेटे के वहां होने की सूचना तक नहीं थी, क्योंकि गुरसेवक आदमपुर में तैनात थे और अचानक उन्हें पठानकोट भेज दिया गया था, जहां दुश्मनों से लोहा लेते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए। गुरसेवक के शहीद होने की खबर उनके गांव पहुंची तो गुरसेवक के परिवार के साथ-साथ पूरे गांव में वीर सपूत की शहादत पर शोक की लहर दौड़ गई।

कैप्टन फतेह सिंह, डीएससी

कैप्टन फतेह सिंह ने देश सेवा में तैनात रहते हुए मौत को गले लगा लिया। कैप्टन की मौत के बादउनके परिवार के सदस्य गम के आंसूओं में डूबे हुए हैं। कैप्टन भी हर पिता की तरह ही अपनी बेटी की शादी के लिए अच्छे घर-वर की तलाश में थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि बेटी को दुल्हन के जोड़े में देखने की उनकी ये तमन्ना उनके मन में ही रह जायेगी और वह बेटी को विदा करने की बजाय खुद ही सबको अलविदा कर देंगे। फतेह सिंह की मौत की खबर सुनकर उनकी पत्नी और बहन बिलख-बिलख कर रो पड़ीं। फतेह सिंह की 25 साल की बेटी मधु ने परंपराओं को तोड़ते हुए अपने पिता के पर्थिव शरीर को कंधा दिया। अपने पिता की तरह ही देश सेवा में तैनात उनका बेटा गुरदीप सिंह भी वर्तमान में 15 डोगरा रेजिमेंट में ड्यूटी पर तैनात है।

हवलदार कुलवंत सिंह, डीएससी

पठानकोट में आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए जवानों के शहीद होने की खबर जब उनके गांव पहुंची तो हर तरफ मातम फैल गया। एयरबेस के गेट पर आतंकी हमले में शहीद हुए हवलदार कुलवंत सिंह के शहीद होने के बाद उनके गुरदासपुर स्थित घर पहुंचकर लोगों ने उनके परिवार को संत्वना दी। शहीद के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे हैं। बड़ा बेटा सुरेंद्र 12 वीं का छात्र है और छोटा बेटा कक्षा 6 का छात्र है। पिता के शहीद होने पर जब छोटे बेटे ने अपनी मां को रोते-बिलखते देखा तो मां के आंसू पोछते हुए बोला- ”मां रो मत मैं पापा जैसा बनूंगा।’’ सेना से रिटायर कुलवंत सिंह ने 4 साल पहले डी.एस.सी. ज्वाइन किया था। वह 2 माह पहले ही पठानकोट में तैनात हुए थे। इससे पहले वह ओडिशा में तैनात थे।

हवलदार जगदीश चन्द्र, इंडियन एयर फोर्स

हवलदार जगदीश चंद्र की मौत के बाद उनके परिवार और गांव के लोगों में मातम पसर गया है। परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है। आतंकियों से वीर जगदीश चंद्र निहत्थे ही भिड़ गये। इस मुठभेड़ के दौरान ही वे वीर गति को प्राप्त हो गये। गौरतलब है कि आतंकियों की एक टुकड़ी डीएससी मेस की ओर गई। उन्होंने वहां नाश्ता बनाते जवानों पर फायरिंग की। जिसमें तीन जवान शहीद हो गए। इस बीच मेस में खाना बना रहे हवलदार जगदीश चंद्र निहत्थे ही आतंकियों के पीछे दौड़े। उन्होंने आतंकियों को ललकारा और एक को पकड़ लिया। थोड़ी देर गुत्थमगुत्थी होने के बाद, आतंकवादी से उसकी राइफल छीन उसे ही गोली मार दी। पर इस बीच तीन आतंकी पलटकर जगदीश के पास पहुंचे और उन्हें छलनी कर दिया।

हवलदार संजीवन सिंह राणा, डीएससी

हवलदार संजीवन सिंह राणा की मौत की खबर पाकर उनका परिवार गमगीन है। उनकी पत्नी पिंकी देवी तो अपने पति की मौत की खबर सुनकर ही बेसुध हो गईं। परिवार में उनकी पत्नी पिंकी देवी, दो बेटियां, एक बेटा और पांच बहनें हैं। हवलदार जगदीश सिंह अपने परिवार का भरण-पोषण करने वाले इकलौते ही शख्स थे। बेटी कोमल कक्षा 12 वीं की छात्रा है और दूसरी बेटी शिवानी बीसीए की छात्रा है। बेटा शुभम अभी बी. फार्मा का कोर्स कर रहा है। ऐसे में संजीवन सिंह राणा के परिवार और बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया है। अपने पिता की मौत की खबर से तीनों बच्चे भी सदमें में हैं।

प्रीति ठाकुर

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