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मोदी ने निकाला साम्राज्यवादियों की ग्रेट गेम का तोड़

मोदी ने निकाला साम्राज्यवादियों की ग्रेट गेम का तोड़

रुडयार्ड किपलिंग ने रुस के साम्राज्यवाद को ब्रिटिश भारत में रोकने के लिये जिस शब्द का प्रयोग किया था, उसे ‘ग्रेट गेम’ कहा जाता है। कुछ लोगों ने इसे काल्पनिक गेम भी कहा। 19वीं शताब्दी के अंत में ब्रिटेन को भय था कि सोवियत रुस, ब्रिटिश भारत में विस्तार करना चाहता है। इसे रोकने के लिये ब्रिटेन अफगानिस्तान को बफर स्टेट के लिये इस्तेमाल करता था। लेकिन 1947 में जब ब्रिटेन ने अनेक कारणों से चले जाने का निर्णय कर लिया तब उसे लगा कि अफगानिस्तान शायद सोवियत रुस के साम्राज्यवादी मंसूबों का मुकाबला नहीं कर सकेगा। पाकिस्तान का निर्माण और जम्मू-कश्मीर के विभाजन हेतु 1949 को किया गया सीज फायर, दरअसल ब्रिटेन की उसी ‘ग्रेट गेम’ नीति का हिस्सा था, जो रुस के संभावित विस्तार की कल्पना से पैदा हुई थी। रुस के उस संभावित काल्पनिक विस्तार को भारत की तरफ रोकने के लिये 1947 से पहले जम्मू-कश्मीर का गिलगित चाहिये था, जिसे ब्रिटिश सरकार ने बलपूर्वक रियासत के महाराजा से पट्टे पर ले लिया था। लेकिन 1947 में उसे भारत और उस समय के सोवियत रुस के बीच एक बफर स्टेट चाहिये था, जिसके माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्यवादी हितों की रक्षा की जा सके। इसलिए पाकिस्तान का निर्माण किया गया और जम्मू कश्मीर के गिलगित को एक गोरे मेजर ने चुपचाप पाकिस्तान में मिला दिया और नेहरु ने एक बार भी उसका विरोध नहीं किया और न ही बाद में कभी गिलगित की चर्चा होने दी।

ब्रिटेन-अमेरिका धुरी को विश्वास था कि पाकिस्तान उनके साम्राज्यवादी हितों के साथ रहेगा और सोवियत रुस के साम्राज्यवादी विस्तार को रोकने में मददगार होगा। ब्रिटेन को यह विश्वास था कि पाकिस्तान और भारत स्थायी रुप से एक-दूसरे के दुश्मन रहेंगे और यदि भारत, सोवियत रुस के खेमे में चला भी गया तो पाकिस्तान, गोरे साम्राज्यवादियों की सहायता से भारत को अपनी मजबूत पकड़ में रखेगा। पाकिस्तान ने भी अमेरिका-ब्रिटेन धुरी के इस विश्वास की सदा रक्षा की। अफगानिस्तान के भारत के खेमे में चले जाने का डर रहा होगा, इसलिए भारत और अफगानिस्तान को पाकिस्तान के निर्माण स्थल मार्ग से काट दिया। जिस ‘ग्रेट गेम’ की चर्चा किपलिंग ने की थी शायद वह किसी न किसी रुप में अब भी जारी है। सोवियत रुस ने सचमुच अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और रुस को परास्त करने के लिये साम्राज्यवादी शक्तियों ने सचमुच पाकिस्तान का ही प्रयोग किया। लेकिन ‘ग्रेट गेम’ की इस प्रतियोगिता में भारत के रिश्ते पाकिस्तान से और दरक गये। इन दरक रहे रिश्तों में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था, क्योंकि पाकिस्तान का निर्माण ही इस काम के लिये किया गया था। भारत के सामने मुख्य प्रश्न यही है कि गोरे साम्राज्यवादियों की इस ‘ग्रेट गेम’ को जिसका शिकार भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान भी हो रहा है, उसे कैसे परास्त किया जाये। यह ठीक है कि पाकिस्तान ने इस ग्रेट गेम में साम्राज्यवादी शक्तियों का साथ दिया। लेकिन, इस गेम में वह स्वयं भी घायल हो गया। कुछ ज्यादा ही घायल।

साम्राज्यवादियों की इस ‘ग्रेट गेम’ को परास्त करने का सपना पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी देखा था। उन्होंने एक बार कहा था, क्या अच्छा हो कि सुबह का नाश्ता हिन्दुस्तान में किया जाये, दोपहर का भोजन पाकिस्तान में और रात्रि का भोजन काबुल में किया जाये। यह साम्राज्यवादियों के ‘ग्रेट गेम’ को हराने की बहुत सही इच्छा थी। यद्यपि उनके इस सपने में भी ‘ग्रेट गेम’ का एक सिरा गायब था, जो उसका मूल सिरा था। वह रुस था। लेकिन मनमोहन सिंह अपने इस अधूरे सपने को भी पूरा नहीं कर सके। वे इस देश के दस साल तक प्रधानमंत्री थे। लेकिन फिर भी वे अपने सपने को पूरा नहीं कर सके। उनका सपना सही था। वह इस देश के हित का सपना था। आखिर भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान इन सभी देशों में एक ही विरासत के लोग रहते हैं। काल प्रवाह में अनेक राजनैतिक कारणों से ये देश अलग ही नहीं एक दूसरे के विरोधी तक हो गये। मध्य एशिया से लेकर भारत तक ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने हितों की रक्षा के लिये इस पूरे क्षेत्र को एक-दूसरे के विरोध में ही खड़ा नहीं कर दिया बल्कि पूरे भूखंड की भौगोलिक सीमाएं भी निर्धारित कर दीं।

23-01-2016

लेकिन दुर्भाग्य से यहां से साम्राज्यवादियों के चले जाने के बाद भी भारत के सत्ताधीश उसी आधार पर विदेश नीति हांकते रहे, जिसे ‘ग्रेट गेम’ के खिलाडिय़ों ने निर्धारित कर दिया था। पंडित नेहरु ने नये सिरे से विदेश नीति निर्धारित करने की कोशिश की थी और वे विश्व की राजनीति में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते थे, लेकिन वे विश्व शान्ति के कल्पना लोक में विचरते हुए, जमीनी हकीकत से कट कर चल रहे थे। वे शांति चाहते थे लेकिन उसके लिये शक्ति साधना नहीं चाहते थे। यही कारण था कि 1962 में चीन ने उन्हें एक झटके में ज़मीन पर उतार दिया और उसके बाद भारत को भी विदेश नीति के मामले में विश्व शक्तियों का पिछलग्गू बना दिया। ऐसी स्थिति में मनमोहन सिंह से आशा करना कि वे ‘ग्रेट गेम’ के जाल से भारत की विदेश नीति को मुक्त कर पाते, बेमानी ही होता। दरअसल आज तक हमारी विदेश नीति का आधार यही रहा कि चीन नाराज न हो जाये या फिर अमेरिका नाराज न हो जाये। इस से निकलने की कोशिश वाजपेयी ने की थी। लेकिन दूसरी बार भाजपा सरकार बन नहीं सकी, इसलिए वह प्रयोग अधूरा ही रह गया।

यह पहली बार हुआ है कि, देश की विदेश नीति किसी के नाराज या प्रसन्न होने पर नहीं टिकी हुई है बल्कि यह भारत के हितों को ध्यान में रख कर संचालित हो रही है। यदि केवल पाकिस्तान की बात ही की जाये तो पाकिस्तान ने अमेरिका के हितों की पूर्ति के लिये, अफगानिस्तान में जिस तालिबान को पाला-पोसा था और जिसके माध्यम से वह जम्मू-कश्मीर में कई दशकों से अस्थिरता पैदा करने में लगा हुआ है, अब वह स्वयं भी किसी सीमा तक उसका शिकार हो रहा है। पहले अमेरिका, पाकिस्तान का प्रयोग करता रहा ताकि भारत को घेरे में रखा जा सके और अब चीन उसका यही प्रयोग तोडऩा चाह रहा है। इस घेराबंदी को तोडऩे के लिये भारत अब पाकिस्तान से सीधे बात क्यों नहीं कर सकता? कमजोर देश बात करने से डरते हैं। भारत को बात करने से क्यों डरना चाहिये? यदि भारत और पाकिस्तान आपस में लड़ते ही रहे, फिर तो गोरे साम्राज्यवादियों की योजना सफल ही मानी जाएगी, जिन्होंने पाकिस्तान बनाया ही इसलिए था ताकि भारत कमजोर बना रहे। उस समय भारत अंग्रेजों के इस षड्यंत्र को विफल नहीं कर सका, क्योंकि वह कमज़ोर और पस्त था। लेकिन क्या आज 2015 में दोनों देश आपस में बातचीत करके एक नई शुरुआत नहीं कर सकते? यदि नहीं कर सकते तो कहना होगा कि जो शक्तियां 1947 में कामयाब हो गईं थीं वे आज 2015 में भी उसी मजबूती से कामयाब हैं। उस समय तो भारत पस्त था, लेकिन आज तो वह पस्त नहीं है। आज तो वह एक बड़ी ताकत है। पहली बार हुआ है कि भारत के प्रधानमंत्री जापान, चीन, रुस और अमेरिका से एक स्तर पर बातें करते हैं। इतना ही नहीं पाकिस्तान के आतंकवाद की चर्चा दुबई में जाकर करते हैं। अमेरिका को वहीं जाकर बता रहे हैं कि पाकिस्तान के माध्यम से जो ‘ग्रेट गेम’ खेला जा रहा है उसकी आंच सात समुद्र पार भी पड़ सकती है। जिस ब्रिटेन ने ‘ग्रेट गेम’ को शुरु किया था, उसी की राजधानी लंदन में जाकर मोदी पाकिस्तान को शह देना बंद करने के लिये कहते हैं। मोदी ने भारत की विदेश नीति को पिछलग्गू विदेश नीति से निकाल कर नीति निर्धारक विदेश नीति के दौर में पहुंचा दिया है। लेकिन कांग्रेस अभी भी पाकिस्तान के प्रिज्म से बाहर नहीं निकलना चाहती। मोदी देश को उसी मायाजाल से बाहर निकालना चाहते हैं। रुस से काबुल और काबुल से लाहौर तक की मोदी की यात्रा उसी दिशा में उठाया गया साहसिक कदम है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि मोदी पाकिस्तान को सच बताने में कोताही कर रहे हैं। मोदी ने तो लाहौर पहुंचने से चन्द घंटे पहले, काबुल में स्पष्ट कहा कि अफगानिस्तान में पड़ोस से जो आतंकवाद का निर्यात किया जा रहा है, उसे बंद किया जाना चाहिये। इससे स्पष्ट और बेलाग क्या कोई कह सकता है? काबुल से लाहौर की यात्रा के लिये जिस साहस की आवश्यकता होती है वह देश की जनता द्वारा दिये गये आत्मबल से पैदा होती है। तीस साल बाद लोगों ने किसी सरकार को नीति निर्धारण के लिये स्पष्ट बहुमत दिया है। यही कारण है की मोदी ने लीक से हट कर पाकिस्तान के साथ पहल की है। कांग्रेस के मित्र पूछते हैं कि मोदी का 56 इंच का सीना कहां गया? शायद उन्हें नहीं पता कि पाकिस्तान के साथ पुराने ढर्रे पर बातचीत करने के लिये 56 इंच का सीना नहीं चाहिये बल्कि लीक से हट कर नया रास्ता बनाने के लिये ही छप्पन इंच के सीने की दरकार होती है। मोदी ने वही रास्ता बनाने की कोशिश की है। ब्रिटेन द्वारा शुरु की गई ‘ग्रेट गेम’ में अभी तक भी जो टूर्नामेंट ऑफ शैडोज चल रहा था, मोदी उसी का तोड़ ढूंढ रहे हैं।

लेकिन मोदी की इस पहल से पहले सुषमा स्वराज इस्लामाबाद हो आईं थीं और पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला चल निकला था। पिछले दिनों 9 दिसम्बर को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अफगानिस्तान को लेकर सम्बंधित देशों का मंत्री स्तर का पांचवां सम्मेलन, जिसे हार्ट ऑफ एशिया, कहा गया सम्पन्न हुआ था। इसमें भाग लेने के लिये भारत को भी निमंत्रित किया गया था। उसी में हिस्सा लेने के लिये भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी पाकिस्तान गईं थीं। स्वाभाविक है जब भारत का कोई मंत्री, खासकर विदेश मंत्री किसी भी कार्य के लिये पाकिस्तान जायेगा तो वहां की सरकार के साथ दोनों देशों के अनेक सांझे मसलों पर बातचीत होगी ही। इस बार भी ऐसा ही हुआ। भारत पाकिस्तान में कहीं भी, किसी भी विषय को लेकर बातचीत होती है तो वह प्रिंट मीडिया की सुर्खियां बनती हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिये चौबीस घंटों की बहस का विषय। यह अलग बात है कि राजनीति के चाणक्य, मराठा क्षत्रप शरद पवार इस बहस को सर्कस कहते हैं और इसे कभी नहीं देखते।

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सुषमा स्वराज पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से बातचीत करें, यह भारत में भी बहुत से राजनीतिक दलों को रास नहीं आया। सोनिया कांग्रेस ने तो अपनी प्रकृति के अनुसार हो हल्ला भी मचाना शुरु कर दिया। दरअसल भारत के कुछ राजनैतिक दलों ने अपने राजनैतिक लाभ के लिये भारतीय जनता पार्टी की एक गलत छवि बनाई हुई है या बनाने की कोशिश करते रहते हैं। उनके अनुसार भाजपा मुस्लिम विरोधी है। इसे तर्क के आधार पर भाजपा पाकिस्तान विरोधी है। भाजपा को मुस्लिम विरोधी बताने के लिये विरोधियों के पास लच्छेदार शब्दावली के अलावा और कोई प्रमाण नहीं हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्हें जनसंघ (जो बाद में भाजपा के रुप में अवतरित हुआ) का संस्थापक माना जाता है, पर कम से कम कोई मुस्लिम विरोधी होने का आरोप नहीं लगा सकता। दुर्भाग्यपूर्ण भारत विभाजन से पहले और उसके बाद देश में विभिन्न समुदायों के बीच समरसता बनाए रखने के विभिन्न प्रयोगों को लेकर मतभेद हो सकता है और राजनीति में होना भी चाहिये, लेकिन इसमें मुस्लिम विरोध की बात जोडऩे राजनैतिक शैतानी ही कही जाएगी। भारत में प्रयास यह रहता है कि जब एक बार भाजपा को मुस्लिम विरोधी घोषित कर दिया जाये तो अपने आप ही उसे पाकिस्तान विरोधी तो मान ही लिया जायेगा। भारत में कांग्रेस इस थीसिस की सबसे बड़ी पैरोकार है। कांग्रेस का यह थीसिस ही अपने आप में देश विरोधी है। इसका अर्थ तो यह हुआ कि देश में मुस्लिम संगठनों के राजनैतिक विरोध में जो व्यक्ति या संस्था खड़ी होती है, वह अपने आप ही पाकिस्तान विरोधी है। प्रकारान्तर में कांग्रेस यह मान कर चलती है कि पाकिस्तान उन सभी मुसलमानों का देश है जो 1947 में यहां से उधर चले गये थे या फिर किन्हीं कारणों से यहां रह गये थे। कांग्रेस का यह थीसिस इस देश को तोडऩे वाला है। मुसलमानों को लेकर कांग्रेस अपने जन्म काल से ही दिग्भ्रमित है और इसी के कारण देश का विभाजन हुआ। मुसलमानों को लेकर कांग्रेस कितनी दिग्भ्रमित थी, इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने इस मामले में महात्मा गांधी की सलाह को भी ठुकरा दिया।

आज तक कांग्रेस को मुसलमानों के वोट एकमुश्त चाहिए थे। यह तभी संभव था यदि कांग्रेस उनको विश्वास दिला दे कि हिन्दुस्तान में तुम्हें हिन्दुओं से खतरा है। लेकिन यदि एकजुट होकर हमारे साथ रहोगे तो हमारी सरकार तुम्हारी रक्षा करेगी। कांग्रेस की इस नीति ने पहले मुसलमानों को हिन्दुओं के विरोध में खड़ा किया और फिर उनकी सुरक्षा के एवज़ में उनसे वोटों की फीस वसूली। जो नीति कांग्रेस की भारत के मुसलमानों के प्रति थी मोटे तौर पर वही नीति पाकिस्तान को लेकर रही। भारत के मुसलमानों के प्रति और पाकिस्तान के प्रति जो नीति ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने निर्धारित कर दी थी, छह दशकों तक कांग्रेस उसी नीति का अनुसरण करती रही और किसी रुप में अब भी कर रही है। लेकिन यकीनन यह नीति यूरोपीय साम्राज्यवादियों के हित में तो हो सकती है, भारत के हित में नहीं।

पाकिस्तान का निर्माण जिस उद्देश्य के लिये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने किया था, कांग्रेस पूरे मनोयोग से उसे ही पकड़े रही। रही बात पाकिस्तान की, उसे तो वही नीति अपनानी थी, जिसका निर्धारण उसके लिये साम्राज्यवादियों ने किया था। लेकिन दुर्भाग्य से कांग्रेस भी और गोरी साम्राज्यवादी शक्तियों भी, भाजपा को मुस्लिम विरोधी और पाकिस्तान विरोधी बताती रहीं। जबकि वास्तव में भाजपा का मत ऐसा कभी नहीं रहा। भाजपा तो शुरु से ही यह मानती रही है कि साम्राज्यवादी शक्तियों के इस मानवता विरोधी एजेंडे को भारत और पाकिस्तान मिल कर ही परास्त कर सकते हैं।

भाजपा के किसी व्यक्ति को जब पहली बार देश के प्रधानमंत्री का पद मिला, तो अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की जो ईमानदार कोशिश की उसे आज भी सभी याद करते हैं। नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान के मामले में उसी नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन मोदी की विदेश नीति ने कहीं भी तुष्टीकरण की नीति का पालन नहीं किया। जम्मू-कश्मीर के मामले में मोदी की सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान से बातचीत करने के लिये हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से बातचीत करना या उसे बातचीत में शामिल करना जरुरी नहीं है। अभी तक दिल्ली सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेताओं से बातचीत करना अपनी पाकिस्तान नीति का हिस्सा ही मान कर चलती थी। दिल्ली की नई सरकार ने पाकिस्तान को स्पष्ट कर दिया कि दोनों देशों की बातचीत में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की कोई भूमिका नहीं है। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को तो यह उसी दिन स्पष्ट हो गया था, जब मोदी प्रधानमंत्री बन गये थे। पाकिस्तान भी इतना तो समझ ही गया है कि दिल्ली स्थित उसका दूतावास हुर्रियत के दावेदारों को अपने भवन में बुलाकर कबाब तो खिला सकता है लेकिन उनके माध्यम से भारत सरकार पर कोई दबाव नहीं बना सकता। अपने आप को पाकिस्तान के मामलों का जानकार घोषित करने वाले कुछ विशेषज्ञ इसी बात को समझने में सारी योग्यता खर्च कर रहे हैं कि जब भारत सरकार ने एक बार शर्त लगा दी थी कि यदि पाकिस्तान के अधिकारी दिल्ली आकर भारत सरकार से बात करने से पहले श्रीनगर से हुर्रियत के लोगों को भी बुलाते हैं तो भारत पाकिस्तान से बात नहीं करेगा, तो बाद में सचिव स्तर की बातचीत कैसे शुरु हो गई है? लेकिन इस बात को स्वीकार करना ही होगा कि भारत ने पिछले कुछ अरसे से इतना तो स्पष्ट कर ही दिया है कि भारत, पाकिस्तान से किसी भी दबाव में बातचीत नहीं करेगा? लेकिन इस का दूसरा पहलू भी है। सीमा पर बार-बार युद्ध विराम का उल्लंघन करके भी पाकिस्तान एक प्रकार से भारत पर दबाव बनाने की ही कोशिश कर रहा है। लेकिन सीमा पर इस प्रहार का उत्तर उसे उसकी भाषा में ही दिया जा रहा है।

पाकिस्तान का भारत पर दबाव बनाने का तीसरा तरीका आतंकवाद है, जिसका प्रयोग वह कई सालों से कर रहा है। इसको जानते बूझते हुये भी कुछ दूसरे देश अपनी कूटनीति के अनुरुप पाकिस्तान का समर्थन ही नहीं करते बल्कि उसे शह भी देते हैं। भारत को कोई रास्ता निकालना था कि बाहर की ताकतें पाकिस्तान का दुरुपयोग भारत के खिलाफ न कर सकें। भारत और पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में हुई और उसके बाद ही नौ दिसम्बर को सुषमा स्वराज की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज से बातचीत इस्लामाबाद में हुई, यह इसी दिशा में उठाया गया कदम था। लेकिन प्रमुख बात है कि बातचीत का एजेंडा क्या था? सुषमा स्वराज ने इसका खुलासा संसद में किया। स्वराज ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान से कम्पोजिट संवाद की प्रक्रिया आरम्भ की जायेगी। पाकिस्तान का यह स्टैंड रहता है कि भारत के साथ बातचीत जम्मू-कश्मीर के बिना नहीं हो सकती। सुषमा स्वराज ने इसे समग्र बातचीत कह कर स्पष्ट कर दिया कि भारत पाकिस्तान के साथ सभी लम्बित मामलों पर बातचीत करने का इच्छुक है। ताकि दोनों पड़ोसी देश अपने आपसी विवाद आपस में ही बैठकर निपटा सकें। भारत-पाक संवाद रचना में किसी तीसरे पक्ष की भागीदारी को सुषमा स्वराज ने सिरे से खारिज कर दिया। वैसे भी अब तक पाकिस्तान दुनिया के अनेक देशों से गुहार लगा चुका है कि कश्मीर को लेकर भारत और पाक के बीच कोई तीसरी शक्ति मध्यस्थता करे। लेकिन भारत की बदली हुई स्थिति में दुनिया के दूसरे देशों ने भी धीरे-धीरे कश्मीर से हाथ खींचना शुरु कर दिया है कि दोनों देशों को आपसी संवाद से ही सभी आपसी समस्याओं का निपटारा करना चाहिये। ध्यान रहे कि इस्लामाबाद में सुषमा स्वराज और नवाज शरीफ की बातचीत से कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी की नवाज शरीफ से भेंट हो चुकी थी। इसमें कोई शक ही नहीं की सार्थक बातचीत की भूमिका बनाने में प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।


पठानकोट आतंकी

हमला कुछ चकरा देने वाले सवाल


23-01-2016

पठानकोट आतंकी हमले से जुड़े कई सवालों पर सरकार और मीडिया दोनों ही मौन हैं। कथित तौर पर गुरदासपुर के एसपी को वाहन सहित अगवा करने वाले आतंकवादियों ने पठानकोट हवाई ठिकाने पर हमला किया। इससे कई तरह के सवाल पैदा होते हैं। ये सवाल मीडिया के विभिन्न हिस्सों में आए तथ्यों से ही जाहिर होते हैं। मसलन,

  • गुरदासपुर में अभी छह महीने पहले ही आतंकवादी एक पुलिस थाने में घुस आए थे। फिर इस संवेदनशील सीमावर्ती जिले के एसपी आखिर बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के रात के आखिरी पहर में दूसरे जिले में कैसे जा रहे थे?
  • जिस कार महिंद्रा एक्सयूवी 500 का आतंकवादियों ने कथित तौर पर अगवा किया, वह कोई सामान्य निजी वाहन नहीं था। उस पर वीआईपी या पुलिस का संकेत देने वाली नीली बत्ती जल रही थी। अधिक संभावना यही है कि आतंकवादियों को नीली बत्ती वाली कार के बेहतर इस्तेमाल का अंदाजा होगा?
  • यह अभी भी साफ नहीं है कि आतंकवादियों ने कैसे कार को रोका और एसपी सलविंदर सिंह, उनके जौहरी दोस्त राजेश वर्मा तथा उनके रसोईए को अगवा कर लिया?
  • इस दावे से तो किसी मूर्ख को ही झांसा दिया जा सकता है कि आतंकवादियों ने एसपी सलविंदर सिंह और उनके रसोईए को इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि वे नहीं जान पाए कि वे एसपी हैं। इससे तो यही पता चलता है कि आतंकवादी किसी को खबर देने के लिए छोड़ सकते हैं और अपने मिशन को खतरे में डाल सकते हैं। अगर उन्हें उनसे पीछा छुड़ाना ही होता तो मार डालते। फिदायिन मिशन के आतंकवादियों को भला किसी को मारने से क्यों परहेज होगा? यानी एसपी का यह दावा संदिग्ध है कि उन्हें आम आदमी जानकर छोड़ दिया। फिर, उन्होंने उनके दोस्त वर्मा को क्यों नहीं छोड़ा?
  • कथित तौर पर बाद में आतंकियों को वर्मा से पता चला कि उन्होंने एसपी को छोड़ दिया तो उन लोगों ने वर्मा की हत्या करने का फैसला किया। वर्मा ने दम साधकर मरने का बहाना बनाया और छूट गए। इस कहानी पर भला कौन यकीन कर सकता है? उन्हीं आतंकवादियों ने पहले जिस इनोवा कार को अगवा किया था, उसके ड्राइवर की हत्या कर दी थी, ताकि वह शोर न मचा सके। लेकिन वे आतंकवादी ही बाद में ऐसे नाकाबिल बन गए कि भुलावे में एसपी और रसोईए को छोड़ दिया और वर्मा पर ऐसे छुरा चलाया कि वे बिना किसी गहरे जख्म के बच गए? कैसी मासूम-सी कहानी है?
  • पहले मीडिया में खबरें आईं कि खुफिया एजेंसियों ने आतंकवादियों की पाकिस्तान में उनके आकाओं की बातचीत को टैप किया जिससे पता चला कि एक ने अपनी मां को बताया कि वह फिदायिन मिशन पर है। बाद में यह पता चला कि वर्मा ने यह कहानी पुलिस को बताई है, क्योंकि आतंकवादियों ने वर्मा के मोबाइल फोन से बात की। यानी आतंकवादियों के पास अपने आकाओं या रिश्तेदारों से बात करने का कोई साधन नहीं था और पाकिस्तान में बैठे लोग भारत से किसी अनजान नंबर से आए कॉल को मूर्खों की तरह उठा लेते हैं। पता नहीं, यह कैसे संभव है?
  • फिर, गुरदासपुर के एसपी की नीली बत्ती लगी गाड़ी पठानकोट हवाई ठिकाने के महज 500 मीटर बाहर खड़ी पाई जाती है, जहां आतंकवादियों ने हमला किया। कथित तौर पर आतंकवादी कई चेकपोस्ट को नीली बत्ती की वजह से आसानी से पार कर गए। मुझे पक्का संदेह है कि पठानकोट हमले की साजिश और गहरी है, जिसका खुलासा होना अभी बाकी है।
  • सभी आतंकवादियों के मार गिराए जाने के सरकारी दावे के काफी बाद सुबह करीब 30 बजे लेफ्टिनेंट कर्नल निरंजन कुमार और एनएसजी के 3 जवान आइईडी विस्फोट में मारे जाते हैं, जो आतंकवादी छोड़ गए थे (शायद बारूदी सुरंग बिछाकर)। अब सवाल उठता है कि अगर पहले सुरक्षा घेरे में ही आतंकवादी घेर लिए गए थे, तो उन्हें यह सब करने का वक्त कैसे मिल गया?

                कर्नल आर.पी. चतुर्वेदी

                (साभार: फेसबुक)


मोदी ने पाकिस्तान के साथ संबंधों की जो नई शुरुआत की है, वह दोनों देशों के बीच समाप्त हो चुके आपसी विश्वास को पुन: स्थापित करने में है। आज तक यह विश्वास पनप नहीं पाया। उसका मुख्य कारण यह है कि पाकिस्तान और उसकी सेना को भी आज तक यही सिखाया गया है कि भारत आपका दुश्मन नम्बर एक है। इसलिए पाकिस्तान की सारी रीति-नीति, सुरक्षा तैयारी हिन्दुस्तान के खिलाफ ही रहती थी। भारत के खिलाफ सुरक्षा तैयारियों में उसे किसी न किसी देश की सहायता भी चाहिये थी। वह उसे सदा उपलब्ध रहती थी। कभी अमेरिका से और कभी चीन से। यदि भय का यह वातावरण समाप्त हो जाये तो दोनों देशों में ही सुख समृद्धि आएगी। लेकिन आखिर इसकी शुरुआत कौन करता? नेहरु ने कोशिश की थी। लेकिन तब पाकिस्तान के हुक्मरान इसे समझ नहीं सकते थे, क्योंकि उस समय जन्म भी ताजा था और उसके ट्यूशन मास्टर भी ब्रिटेन और अमेरिका थे। लेकिन अब सतलुज और झेलम में काफी पानी बह चुका है। सांझा फ्रंट सरकारों से विदेश नीति के मामले में किसी नई नीति की पहल नहीं की जा सकती। क्योंकि उस समय विदेश नीति का संचालन सरकार नहीं विदेश मंत्रालय के बाबू करते हैं। उधर पाकिस्तान में भी निहित स्वार्थ की शक्तियां लोकतंत्र के पैर नहीं लगने देतीं और सत्ता सेना के हवाले ही करने में अपना हित देखती हैं। पाकिस्तान में दोनों तरह के लोग हो सकते हैं। वे, जो हिन्दुस्तान के साथ अच्छे संबंध बनाये रखना चाहते हैं और वे, जो भारत के प्रति शत्रु भाव को ही बनाये रखना चाहते हैं। भारत की विदेश नीति की सफलता इसी में है कि पाकिस्तान में उन लोगों को हौसला दिया जाये जो विभाजन के बाद पैदा हो गई कटुता को समाप्त करने में विश्वास रखते हैं।

इसकी पहल नरेन्द्र मोदी ने शुरु कर दी है। वे एक नहीं दो कदम आगे चल कर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिले हैं। विदेश विभाग के सभी कर्मकांडों से उपर उठ कर। भारत और पाकिस्तान के बीच आम लोगों की संवाद रचना जितनी बढ़ेगी उतना ही परस्पर विश्वास भी बढ़ेगा। 1947 की दीवार ने वह परस्पर संवाद समाप्त किया था। संवादहीनता से संदेह उत्पन्न होते हैं और तीसरे स्रोतों से ली गई सूचनाएं उन संदेहों को दुश्मनी में बदलती हैं। भारत और पाकिस्तान में पिछले सात दशकों से यही हो रहा है। मोदी ने उसी प्रक्रिया को बदलने के लिये काबुल से लाहौर तक की यात्रा की है। आशा की जानी चाहिये कि पाकिस्तान में भी मोदी की इस पहल को सही समझने वाले बहुत बड़ी संख्या में होंगे। लेकिन आशा की जानी चाहिए से क्या आगे भी बढ़ा जा सकता है? यह प्रश्न इसलिए पैदा होता है क्योंकि मोदी की काबुल और अप्रत्याशित लाहौर यात्रा के महज कुछ दिन बाद ही आतंकवादियों ने अफगानिस्तान के मजार-ए-शरीफ में भारतीय कांसूलेट पर हमला कर दिया और पंजाब में पठानकोट के एयर बेस में पाकिस्तान से आये हुए आतंकवादियों ने धावा बोल दिया, जिसमें ये पंक्तियां लिखे जाने तक सेना के सात जवान शहादत प्राप्त कर चुके थे।

23-01-2016

इसलिए एक बार फिर ‘ग्रेट गेम’ की अवधारणा की ओर मुडऩा होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद और भारत विभाजन की योजना में सफल हो जाने के बाद भी ब्रिटेन-अमेरिका धुरी के दिमाग से सोवियत रुस का भूत उतरा नहीं था। अलबत्ता इतना जरुर हुआ कि अब अमेरिका ने रूस के साथ ही कुछ देर बाद भारत को भी नत्थी कर दिया। रुस को हराने व उसका विस्तार रोकने के लिये और भारत को उसकी औकात बताते रहने के लिये अमेरिका, पाकिस्तान को खिला-पिला कर पालता और पोसता रहा। जब रूस ने अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेज दीं तब असली लड़ाई लडऩे का वक्त भी आ गया। किपलिंग ने जिस ‘ग्रेट गेम’ की कल्पना ही की थी, वह सचमुच अपने साकार रुप में प्रकट हो गई थी। इस ‘ग्रेट गेम’ में रुस को परास्त करने के लिये अमेरिका ने अकूत पैसा खर्च करके तालिबानी फौज तैयार की। यह फौज पाकिस्तान में, पाकिस्तान की सहायता से ही तैयार की गई थी। अफगानिस्तान में इस तालिबानी फौज ने रुस को परास्त किया या फिर अनेक कारणों से रुस स्वयं ही काबुल से निकल गया, यह विवाद तो सदा चलता रहेगा। लेकिन सोवियत रुस के पतन और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद कम से कम अमेरिका के लिये तालिबानी फौज की उपयोगिता समाप्त हो गई थी। इसलिए अमेरिका ने फौज को डिसमेंटल करना चाहा जो अब संभव नहीं था। लेकिन पाकिस्तान के लिये इस फौज की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई थी। उसमें इस फौज को भारत के खिलाफ मोर्चे पर डटा दिया। आतंकवादियों की इस प्रकार की कट्टर मजहबी फौज खड़ी करने का एक नुकसान जरुर होता है। ऐसी फौजें देर-सवेर अपने आका से भी बगावत कर देती हैं और अपने बनाने वाले को भी शिकार बनाने लगती हैं। तालिबानी फौज की इस बगावत का नजारा अमेरिका ने विश्व व्यापार केन्द्र के ध्वस्त होने में देखा और पाकिस्तान अब रोज इसको भुगत रहा है। वैसे भी जिस प्रकार पिछले कुछ अरसे से आतंकवाद को लेकर अमेरिकी नीति विफल हुई है और इस्लामी आतंक का प्रसार हुआ है, उससे अमेरिका में तो पूरी नीति पर दुबारा मंथन हो ही रहा है। पाकिस्तान में भी इसको लेकर बहस छिड़ गई है।

उसी बहस के युग में नरेन्द्र मोदी काबुल और लाहौर होकर आये हैं। लेकिन क्या केवल पाकिस्तान की सिविल सरकार की इच्छा के अनुसार ही हिन्दुस्तान से सम्बंधों का निर्धारण संभव है? पाकिस्तान और काबुल, दोनों में ही वह आतंकवादी शक्तियां जो ये अच्छे संबंध नहीं चाहतीं, वे क्या इस सारे परिदृश्य में चुप बैठी रह सकती हैं? अफगानिस्तान के बारे में तो किसी को बहुत ज्यादा भ्रम नहीं है।

अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक सरकार जब से आई है, तब से तालिबान के वे समूह जो पहले काबुल पर काबिज थे, पुन: सत्ता हथियाने के लिये सक्रिय हो गये हैं। जो शक्तियां काबुल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को म़बूत करने में सहायक हैं, उन पर तालिबान समूह हमला करेंगे ही। इसलिए इस हमले से भारत-अफगानिस्तान रिश्तों में दरार आयेगी, यह प्रश्न अप्रासंगिक है। लेकिन इसमें भी एक छोटा प्रश्न पैदा होता है। क्या मजार-ए-शरीफ में हमले के पीछे भी पाकिस्तान की शह हो सकती है? और पठानकोट के एयर बेस पर हुए हमले के पीछे सरहद पार से आये आतंकवादियों के आका कौन हैं?

कहा जाता है कि पाकिस्तान में सत्ता के दो समानान्तर केन्द्र हैं। एक केन्द्र वहां की सिविल सरकार है और दूसरा केन्द्र वहां की सेना है जो सिविल सरकार को तब तक ही संसद में रहने देती है जब तक वह सेना की नीति का अनुसरण करती रहती है। सेना के अलावे तीसरा केन्द्र वहां की खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. है, लेकिन उसका प्रत्यक्ष परोक्ष नियंत्रण सेना के हाथ में ही रहता है। सेना द्वारा निर्धारित पंथ से विचलन का परिणाम वर्दीधारी द्वारा संसद बन्द करवा देना होता है और अनेक बार सरकार के मुखिया का जेल में चले जाना होता है। हम मान कर चलते हैं कि इस्लामाबाद की सिविल सरकार हिन्दुस्तान से सम्बंध सुधारना चाहती है। मोदी और नवाज शरीफ की पहल उसी का संकेत है। लेकिन इन सुधरे सम्बंधों से किस को खतरा हो सकता है? पाक की सेना को ही, क्योंकि सेना का वर्चस्व और उसकी अव्वल भूमिका भारत विरोध पर ही टिकी हुई है। जिया के समय में वैसे भी सेना का वैचारिक मजहबीकरण हो चुका है। पाक की सेना पेशेवर तो है लेकिन साथ ही इस्लामी कट्टरता से भी जुड़ चुकी है। यह कुछ-कुछ चीन की सेना की तर्ज पर ही है। चीन की सेना भी प्रोफेशनल होने के साथ-साथ वैचारिक दृष्टि से वामपंथ से जुड़ी हुई है। लेकिन चीन में सेना पर वहां की सिविल सरकार का पूरा नियंत्रण है। पाकिस्तान में ऐसा नहीं है। पाकिस्तान में सेना स्थायी है और वही सिविल सरकार के आने जाने का वक्त तय करती है। पाकिस्तान की सेना और आई.एस.आई. भारत के साथ अच्छे रिश्तों की पक्षधर नहीं है। इसी प्रकार पाकिस्तान में ऑपरेट कर रहे और कुछ सीमा तक स्वायत्त हो चुके आतंकवादी समूह भी भारत- पाक रिश्तों के पक्ष में नहीं हैं। इसलिये जब भी वहां की सिविल सरकार भारत से अच्छे रिश्तों की शुरुआत करती है तभी पाकिस्तान के आतंकवादी हमला करके भारत में उस प्रक्रिया के खिलाफ भावनात्मक विरोध पैदा करने की कोशिश करते हैं। आम तौर पर वे इसमें कामयाब भी हो जाते हैं। पठानकोट पर हुए हमले को इन तीन प्रश्नों की प्रष्ठभूमि में देखना होगा।

  • क्या इस हमले के पीछे पाक सेना और सिविल सरकार की मिलीभगत है?
  • क्या इस हमले के पीछे केवल सेना या आई.एस.आई. की मिलीभगत ही है?
  • क्या इस हमले के पीछे सेना (आई.एस.आई. समेत) और सिविल सरकार की कोई मिलीभगत नहीं है बल्कि यह हमले वहां काम कर रहे आतंकवादी समूहों ने स्वयं अपनी स्वतंत्र योजना से किया है?

यदि दूसरे और तीसरे प्रश्नों का उत्तर हां में है तो भारत सरकार को पाकिस्तान की सिविल सरकार के साथ बातचीत की प्रक्रिया रोकनी नहीं चाहिये। क्योंकि इसे रोकने का अर्थ होगा, जिस उद्देश्य के लिये आतंकवादियों ने हमला किया है, उसमें उन्हें सफलता मिलना। भारत को आतंकवादियों को किसी भी हालत में सफल नहीं होने देना है। लेकिन इस हमले में यदि वहां की सिविल सरकार की मिलीभगत नहीं है, तो एक बात अपने आप ही स्पष्ट हो जाती है कि संबंधों को सामान्य बनाने में दिल्ली को किसी ने किसी तरीके से पाकिस्तान की सेना को भी इस बातचीत में शामिल करना पड़ेगा।

 कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

 

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