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‘पापीस्तान’ का बढ़ता पाप

‘पापीस्तान’ का बढ़ता पाप

पठानकोट में सीमा पार से घुसपैठ कर फौजी वर्दी में आतंकी आये, एक पुलिस वाले की कार छीन ली, वायुसेना के ठिकाने की ओर बढ़े और हमारे सात जवानों को मौत के घाट उतार गए। हर गणतंत्र दिवस पर हम अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करते हैं लेकिन, आतंकवादी हमले की आशंका की खुफिया सूचना के बावजूद हम अगर ऐसे हमलों को रोक नही पाते तो हमारी सैन्य क्षमता किस काम की है? भारतीय प्रधानमंत्री के साथ पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की हर मुलाकात के बाद पाकिस्तान की ओर से आतंकी हमला जैसे कोई आम बात हो गई है। दरअसल पाकिस्तानी फौजी हुक्मरानों की यह पुरानी रणनीति है कि द्विपक्षीय बातचीत की हर नई पहल के आगे या पीछे आतंकी हमले करा दिये जाएं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचानक पाकिस्तान यात्रा के कुछ ही दिनों बाद पठानकोट हमला भी उसी रणनीति का हिस्सा लगता है। यहां यह जिक्र करना वाजिब है कि हमारे सुरक्षाकर्मियों ने पूरी बहादुरी के साथ आतंकवादियों को पठानकोट हवाई ठिकाने को तबाह करने से रोक लिया। पठानकोट पश्चिमी सीमा पर हमारा सबसे अहम सैन्य ठिकाना है। लेकिन, विडंबना देखिये कि हमारे जवानों ने देश की खातिर अपनी जान की बाजी लगा दी जबकि हमारे राजनैतिक नेता उनकी शहादत को लंबे समय से खास महत्व नहीं दे रहे हैं। ऐसी कई मिसालें हैं कि शहीदों के परिजन भारी तंगहाली में जीवन काट रहे हैं। हालांकि सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ पाकिस्तानी फौज की मदद के बिना नामुमकिन है और हमारे प्रधानमंत्री की नवाज शरीफ के प्रति गर्मजोशी भरे रवैये के बाद पाकिस्तान सरकार की ओर से ऐसी साजिश की उक्वमीद नहीं के बराबर है। इसलिये असलियत यही है कि पाकिस्तानी फौज पर सरकार का कोई काबू नहीं है और वह अपनी हरकतों के लिये स्वतंत्र है। इसलिये शांति बहाली के लिये यह जरूरी है कि पाकिस्तानी सरकार और फौज एक स्वर में बात करें और उनकी हरकतों में विरोधाभास न हो। हमारे नीति निर्माता और सुरक्षा विशेषज्ञ यह मानेंगे कि पाकिस्तानी फौज ऐसा नहीं होने देगी इसलिए हमें भी क्यों नहीं सक्रिय अभियान और आतंकवादी शिविरों पर प्रतिरोधात्मक हमले की रणनीति अपनानी चाहिये। ”पहले उन वहशी ताकतों को हमला करने दो, फिर हम अपनी रक्षा करेंगे’’ की नीति हमारे बहादुर जवानों की जानें ले रही है और उनकी विधवाओं तथा मासूम बच्चों का जीवन दुखदायी बना रही है।

इस माहौल को ध्यान में रखे बगैर बातचीत शून्य से आगे नहीं बढ़ सकती। अगर बिना कुछ सोचे-विचारे बेरोकटोक बातचीत जारी रही और आतंकवादियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हमें आगे और भारी हमले झेलने होंगे। इससे आतंकवादी मान बैठेंगे कि बातचीत के बहाने भारत की जवाबी कार्रवाई टाली जा सकती है। इसलिये पाकिस्तान जब तक जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैय्यबा के खिलाफ कड़ी और संतोषजनक कार्रवाई नहीं करता तब तक बातचीत लंबित रहनी चाहिए। पाकिस्तान की ओर से इस बार ठोस कार्रवाई होनी चाहिए न कि जनवरी 2002 में जनरल मुशर्रफ की तरह की गई जुबानी हवाबाजी। दुर्भाग्य से पाकिस्तान में आतंकवादी उस कट्टर राजसत्ता के औजार हैं जिसके खिलाफ कोई सियासी नेता मुंह खोलने की जुर्रत नहीं कर सकता। यह कट्टर राजसत्ता निर्वाचित सरकारों को मिनटों में बर्खास्त कर सकती हैं और अमेरिका जैसे देश महज कुछ हिदायतें भर जारी कर रह जाते हैं। यानी कई तरह की दिक्कतें हैं।

लेकिन, पाकिस्तान से बातचीत तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक पाकिस्तानी फौज निर्वाचित सरकार के तहत काम करना मंजूर नहीं कर लेती। पिछले 10 साल से पाकिस्तानी फौज की सरपरस्ती में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैय्यबा की वहशियाना हरकतें झेल रहे हैं। भारत के विपरीत पाकिस्तान में न तो राष्टपति और न ही प्रधानमंत्री के पास कोई कार्यकारी अधिकार हैं। हमें सीरिया में आईएसआईएस से निपटने के फ्रांस और रूस के तरीकों से सीख लेनी चाहिये। दुनिया में सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते भारत, पाकिस्तानी फौज को सबक क्यों नहीं सिखा सकता? असल में जब तक जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे आतंकवादी समूहों को शह देना बंद करके निर्वाचित सरकार को अधिकार हासिल नहीं होते, दोनों देशों के बीच कभी भी सार्थक बातचीत हो ही नहीं सकती। लेकिन, पाकिस्तान के सियासी नेताओं में फौज पर अंकुश लगाने के कोई संकेत नहीं दिखते। अगर नवाज बातचीत की कोशिशें जारी रखते हैं तो पिछली बार की तरह फौजी तख्तापलट से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिये मोदी को नवाज से दो-टूक बात करने की दरकार है। उन्हें आतंकवादियों के ठिकानों और प्रशिक्षिण शिविरों पर हमले का विकल्प भी खुला रखना चाहिये। असल में हम कुछ फिदायिनों के हाथों अपने जांबाज जवानों को गंवा रहे हैं।

इसलिये हमारी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिये कि उम्मीदें बनाए रखना तो सही है लेकिन ऐसी हरकतें जारी रहीं तो जवाबी कार्रवाई भी झेलनी पड़ सकती है। अब पाकिस्तान को भारत से सौंपे सबूतों पर कार्रवाई का नतीजा दिखाना चाहिए। हमारी सरकार को पहले की लड़ाइयों, बम धमाकों और ताजा पठानकोट हमले से भविष्य के प्रति गंभीर सबक लेना चाहिए। देश यह भी जानना चाहता है कि पठानकोट में कहां, क्या चूक हुई? हमारे जवान जान गंवा रहे हैं लेकिन, यह हमारी व्यवस्था में कमियों की वजह से नहीं होना चाहिये और अंत में शहीदों के परिवारों को उनके हाल पर तंगहाली में नहीं छोड़ देना चाहिए क्योंकि कई शिकायतें सुनने को मिली हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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