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अमेरिका की पलकों पर भारत

अमेरिका की पलकों पर भारत

By रंजना

अपने दिमाग पर जोर डालिए और उस दौर को याद कीजिए जब यूपीए-प्रथमसरकार के समय में तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज वॉकर बुश भारत आए थे। पुराना किला में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था और बुश ने परमाणु करार पर अपनी सहमति का संकेत देते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पीठ थपथपाई (शाबाशी) थी। अब आइए 25 जनवरी 2015 की सुबह पालम एयरपोर्ट पर चलते हैं, जहां प्रोटोकॉल तोड़कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा का स्वागत करने पहुंचे थे और उन्होंने ओबामा को गले लगाया था। हैदराबाद हाऊस में संयुक्त वक्तव्य का भी क्षण याद होगा, जिसमें मोदी ओबामा को बराक…. बराक कह रहे थे और ओबामा कभी मोदीजी कह रहे थे। ठहाकों में एक गर्मजोशी तब भी दिख रही थी, जब बराक ने वाशिंगटन में मोदी का स्वागत बॉलीवुड के स्टार की तरह करने की कह दी। वह यह भी बता गए कि मोदी उनसे एक घंटा कम सो पाते हैं। पूरे तीन दिवसीय दौरे में हर पल, हर मोड़ पर यह बराबरी, तालमेल और सामंजस्य का रिश्ता दिखता रहा।

शायद तभी वह सबकुछ मुमकिन हो पाया जिसकी कल्पना भी इतनी आसान नहीं थी। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत के साथ परमाणु करार का गतिरोध दूर करने में खुद पहल की। उन्होंने अमेरिका के ‘ट्रैकिंग ऑफ न्यूक्लियर मैटेरियल’ की शर्त से खुद को पीछे खींच लिया। भारत नहीं चाहता था कि अमेरिका के साथ इस शर्त पर करार आगे बढ़े कि उसके विशेषज्ञ एक अंतराल पर भारत आएं और अपनी कंपनियों द्वारा लगाए गए परमाणु संयंत्रों की जांच के बहाने उन पदार्थों की भी जांच करें जो किसी और देश से आए हों। भारत का कहना है कि इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं है, क्योंकि परमाणु अप्रसार के संदर्भ में भारत आईएईए सेफगार्ड का प्रतिबद्धता के साथ पालन करता है और अंतर्राष्ट्रीय जांच एजेंसी खुद इसकी निगरानी करेगी। इसी तरह से भारत ने ‘न्यूक्लियर लॉयबिलिटी’ के क्रम में ‘इंश्योरेंस पूल’ का प्रावधान कर दिया। इसके तहत लॉयबिलिटी के तौर पर एडवांस में जमा की जाने वाली 1500 करोड़ रूपए की राशि में 750 करोड़ रूपए परमाणु उर्जा के क्षेत्र की चार सार्वजनिक कंपनियों से तथा 750 करोड़ भारत सरकार के योगदान का प्रावधान कर दिया। कूटनीति की भाषा में भारत ने स्थिति को समझकर सकारात्मक सोच दिखाई और इससे उत्साहित दोनों देशों ने 1,2,3 परमाणु करार का सभी गतिरोध दूर कर लिया। विदेश सचिव सुजाता सिंह कह पाई कि छह-सात साल से चला आ रहा गतिरोध दूर हुआ (डील इज डन)। यानी अब भारत-अमेरिका के बीच में 2008 में हुआ परमाणु समझौता सिरे चढ़ सकेगा। हिताची, वाशिंगटन हाऊस समेत अन्य परमाणु तकनीकी क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भारत में परमाणु संयंत्र की स्थापना कर सकेंगी और असैन्य क्षेत्र में परमाणु सहयोग को बढ़ावा देते हुए अमेरिकी संयंत्रों से भारत को बिजली मिल सकेगी। इन कंपनियों के लिए भारत ने पहले गुजरात और आंध्र प्रदेश में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए स्थान का चयन किया है। इन्हें यह स्थान आवंटित किए गए हैं, लेकिन न्यूक्लियर लॉयबिलिटी की शर्त के चलते ये कोई रुचि नहीं दिखा रही थी।

सुब्रह्मण्यम जयशंकर को ईनाम

14-02-2015

ओबामा को मेहमान बनाने की प्रधानमंत्री की इच्छा का पता चलते ही अमेरिका में भारत के राजदूत एस. जयशंकर ने तत्काल पहल शुरू कर दी। उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों को भारतीय गणतंत्र दिवस का महत्व, इसमें शरीक होने के पीछे की रणनीति समेत सब कुछ समझाया। बताते हैं कि जयशंकर के प्रयासों से राष्ट्रपति के सचिवालय ने भी इसे सहजता से स्वीकार कर लिया। लिहाजा राष्ट्रपति ओबामा का दौरा समाप्त होने के 36 घंटे के भीतर ही प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें देश का नया विदेश सचिव नियुक्त कर दिया।

कुशल रणनीतिकार अजीत डोभाल

14-02-2015

प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कुशल रणनीतिकार के रूप में उभरे हैं। डोभाल की सलाह पर ही प्रधानमंत्री मोदी ने अपने शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षिण एशियाई सहयोग संगठन (दक्षेस) देशों को आमंत्रित किया था। नेपाल, भूटान समेत अन्य पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को आगे बढ़ाया। यहां तक कि अमेरिका के साथ संबंध में भी डोभाल की बड़ी भूमिका रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक डोभाल की सलाह पर मोदी वाशिंगटन से रिश्तों की इबारत लिखने निकले और कामयाब रहे। बताते हैं कि गणतंत्र दिवस पर जब ओबामा को मेहमान बनाने के बारे में मोदी के मन में विचार आया तो डोभाल ने इसे आगे बढ़ाने की सलाह देने में जरा भी देर नहीं लगाई। प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों का भी मानना है कि पीएम डोभाल की बातों को गौर से सुनते हैं। वह सुरक्षा मामलों से विदेश नीति तक काफी प्रभावी हैं।

अमेरिका ने चार खरब डॉलर के निवेश का संकेत दिया। जलवायु परिवर्तन पर अमेरिका और चीन के समझौते के बाद भी भारत को दबावमुक्त रखने की बात कही और ओबामा ने खुद ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता की जोरदार वकालत की। आशय यह है कि पहली बार ऐसा लगा कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू नहीं है। यूपीए सरकार के समय में लगातार इस तरह का आभास होता रहता था, क्योंकि सरकार में राजनीतिक इच्छा-शक्ति की कमी थी। इसका असर दुनिया के देशों के साथ द्विपक्षीय रिश्ते पर भी पड़ रहा था। छोटी-छोटी अड़चन भी सालों तक नहीं दूर नहीं हो पाती थी, लेकिन परमाणु करार पर दोनों देशों के आगे बढ़े कदम ने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने न केवल दृढ़ इच्छा-शक्ति दिखाई, बल्कि बराबरी के स्तर पर आने में सफल भी रहे। राष्ट्रपति ओबामा ने भी इसे महसूस किया। एनएसजी (न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप) में उन्होंने भारत के दावे का समर्थन करने का वादा किया और भारत के साथ ‘ग्लोबल पार्टनरशिप’ पर बल दिया। ‘प्रधानमंत्री के साथ मन की बात’ की। शायद ही इस तरह की गर्मजोशी पहले कभी देखने को मिली हो।

परमाणु करार का टूटा गतिरोध : उदय भाष्कर

14-02-2015

भारत और अमेरिका के बीच असैन्य क्षेत्र में परमाणु करार पर बनी सहमति का स्वागत किया जाना चाहिए। पिछले कई सालों से यह गतिरोध बना हुआ था। अमेरिका ने न्यूक्लियर मैटेरियल ट्रैकिंग से खुद को पीछे खींचा और भारत ने इ्ंश्योरेंस पूल बनाकर न्यूक्लियर लॉयबिलिटी का हल निकाला। वास्तव में यह दोनों नेताओं के दृष्टिकोण को दर्शाता है। इससे यह भी पता चलता है कि दोनों देश एक दूसरे को लेकर कितने गंभीर हैं।

रक्षा क्षेत्र
भारत और अमेरिका ने रक्षा क्षेत्र में अहम समझौता किया है। डिफेंस फ्रेमवर्क एग्रीमेंट को अगले दस सालों के लिए आगे बढ़ाने पर सहमति बनने के साथ-साथ दोनों देशों ने संयुक्त उद्यम के जरिए साजो-सामान विकसित करने पर भी सहमति जताई है। डिफेंस ट्रेड टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव (डीटीटीआई) पर दोनों देश सहमत हुए हैं। जेट इंजन के विकास की संभावना तलाशेंगे और दोनों देश मिलकर इस क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे। भारत को विमानवाहक पोत की जरूरत है। अमेरिका भारत को इसकी तकनीक दे सकता है और दोनों देश मिलकर अत्याधुनिक पोत का निर्माण कर सकते हैं। इसके अलावा बराक ओबामा ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष में भारत की आवाज और मताधिकार बढ़ाने में सहयोग देने का वादा किया है। वैकल्पिक उर्जा के क्षेत्र में अमेरिका ने खास दिलचस्पी दिखाई है। सुजाता सिंह के स्थान पर विदेश सचिव बने एस. जयशंकर को भी उम्मीद है कि जल्द ही अमेरिका की सौर उर्जा कंपनियों से भारत को रोशनी मिलेगी। इस क्षेत्र में करीब 100 अरब डॉलर का निवेश हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा के बीच में इलाहाबाद, विशाखापत्तनम और अजमेर को स्मार्ट सिटी बनाने पर भी सहमति बनी है।

इससे अच्छा क्या : सलमान हैदर

14-02-2015

भारत और अमेरिका के रिश्तों का नया अध्याय जुड़ गया है। दोनों देशों के शिखर नेताओं के बीच आपसी तालमेल देखने और महसूस करने के काबिल रहा। कूटनीति में इसका काफी महत्व होता है। खास बात यह है कि मोदी और ओबामा जो दिखाना चाहते थे वह दिखा पाए और जो छिपाना चाहते थे उसमें सफल रहे। प्रधानमंत्री में राजनीति इच्छा-शक्ति दिखाई दी और राष्ट्रपति ओबामा ने इसे सकारात्मक तरीके से आगे बढ़ाया। अब दोनों देश रक्षा क्षेत्र में भी विश्वसनीयता की तरफ बढ़ रहे हैं। ओबामा ने भारत को सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता दिए जाने की खुलकर वकालत की है। यह बड़ी बात है।

14-02-2015

दुनिया को संदेश
राष्ट्रपति ओबामा ने दुनिया को संदेश दिया है। अपनी ढ़ाई दिन की यात्रा के दौरान वह लगातार प्रधानमंत्री मोदी के साथ घनिष्ठता दिखाते रहे। इससे पड़ोसी देश पाकिस्तान और चीन की सांसे फूलने लगी हैं। दोनों देशों ने आतंकवाद के विरूद्ध दृढ़ प्रतिबद्धता दिखाई है। ओबामा ने इसके बाबत पाकिस्तान को ताकीद किया है और 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाबत पाकिस्तान को सख्त चेतावनी दी है। राष्ट्रपति ने पड़ोसी देश को इसके गुनहगारों को कानूनी कार्रवाई के तहत लाने के लिए भी चेताया है। इसे ओबामा और मोदी के बीच बन रहे आपसी सामंजस्य का ही नतीजा बताया जा रहा है।

किसने क्या कहा…

14-02-2015

  • मोदी ने कहा कि आर्थिक वृद्धि के लिए नीतियों में स्थायित्व और निरंतरता जरूरी है और वह खुद बड़े प्रोजेक्ट्स की निगरानी करेंगे।
  • मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका में कई समानताएं हैं और कारोबार को आसान करने के लिए भारत ने पिछले कुछ समय में कई कदम उठाए हैं।
  • मोदी ने कहा कि उनकी सरकार का लक्ष्य भारत को कारोबार की सबसे मुफीद जगहों वाले शीर्ष 50 देशों में शामिल करना है।
  • उन्होंने कहा कि पिछले साल सितंबर में उनके अमेरिकी दौरे का असर दिखने लगा है और पिछले छह महीने में भारत में अमेरिकी निवेश 50 प्रतिशत बढ़ा है।
  • भारतीय प्रधानमंत्री ने कहा कि महंगाई पांच साल के निचले स्तर पर है और कारोबार का माहौल लगातार सुधर रहा है।
  • ओबामा ने कहा, ‘हम सही दिशा में बढ़ रहे हैं। अभी कई ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें आगे बढऩे की गुंजाइश है।’
  • उन्होंने कहा कि भारत में व्यापार बढ़ाने की कितनी गुंजाइश है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन में अमेरिकी निवेश भारत के मुकाबले पांच गुना अधिक है।
  • ओबामा ने कहा कि उनके इस दौरे में परमाणु और रक्षा क्षेत्र में कई अहम समझौते हुए हैं, जिससे भारत के आम नागरिकों को लाभ होगा।
  • उन्होंने कहा कि अमेरिकी विकास और निवेश एजेंसी भारत को अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग के लिए 200 करोड़ डॉलर मुहैया कराएगी।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि भारत को व्यापार के लिए नौकरशाही की बाधाओं, टैक्स से जुड़े नियमों को आसान करना होगा।

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