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धर्म का असली मर्म

धर्म का असली मर्म

महान व्यक्तियों की जीवनी पढऩे से स्वयं के अंदर एक महान व्यक्तित्व विकसित होना शुरु हो जाता है। ग्रंथों के पाठन के माध्यम से अनेक महान आत्माओं के बारे में ज्ञान मिलता है। वह महान आत्मा किसी भी धर्म से हो या समुदाय से उनके जीवन से अगर हमें कुछ शिक्षा मिलती है, तो जरूर हमें उनके बारे में जानना चाहिये। सिक्खों के धर्मगुरू गोविंद सिंह की जीवनी उल्लेखनीय है। वह महान गुरू तेगबहादुर के पुत्र थे। गुरू तेगबहादुर भी उज्जवलमय व्यक्तित्व के धनी थेे। अपने धर्म की रक्षा के लिये उन्होंने अपनी जान तक निसार कर दी। तब मुगलों का साम्राज्य था और मुगल शासक औरंगजेब ने हिंदुओं, सिक्खों और अन्य सभी पर मुस्लिम धर्म अपनाने के लिये खूब अत्याचार किये। गुरू तेगबहादुर ने बादशाह औरंगजेब के खिलाफ आवाज उठाई तो उन्हें मृत्युदंड का सामना करना पड़ा। गुरू गोविन्द सिंह भी बचपन से एक धार्मिक आत्मा थे। उन्होंने भी अपनी पूरी जिंदगी धर्म की रक्षा के लिये दांव पर लगा दी। उनके चार पुत्रों ने भी अपने जीवन को खुशी-खुशी न्यौछावर कर दिया था। दोनों बड़े पुत्रों ने मुसलमान बादशाह के खिलाफ युद्ध करके प्राण त्याग दिए थे। सबसे चौकाने वाली बात यह है कि बाकी के दोनों नन्हे बालक फतेह सिंह और जोरावर सिंह जो कि 5 और 7 साल के थे, उनके अंदर भी अपने धर्म के प्रति गहरी निष्ठा थी। मुसलमान सम्राटों के डराने तथा धमकाने पर भी वह अटल रहे और अंत में उन्हें दीवार में चिनवा दिया गया। इनकी धर्म के प्रति इतनी निष्ठा से हमें इतना तो एहसास होता है कि हर व्यक्ति को अपने धर्म के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होना चाहिए।

धर्म के विभिन्न विचारों पर चलकर हम धीरे-धीरे बड़े होते हैं। वहीं विचार हमारे मन में बस जाते हैं। लेकिन आजकल लगातार कई बार इसमें ह्रास देखा जा रहा है। हर व्यक्ति अपने धर्म को छोड़ कर दूसरे धर्म के प्रति अधिक आकर्षित होता है। पहले हमारे पूर्वजों ने जिन चीजों को दृष्टि में रखकर धर्म को महत्व दिया था, हम उससे बिल्कुल हटकर सोचते हैं। जैसा कि एक किसान का धर्म खेती करना है अगर उसी कार्य को वह निपुणता के साथ करे तो उसे उस कार्य में सफलता भी मिलेगी। हर व्यक्ति को अपने धर्म को समझना जरूरी होता है। अपने-अपनेे धर्म को समझकर उसी में रूचि के साथ कार्य करने से हमें सफलता जरूर मिल सकती है।

साधारण तौर पर यह देखा गया है कि कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जिन्हें अपने धर्म और कर्म से अधिक दूसरों के धर्म और उनके कार्य लुभाते हैं। हम उनसे प्रेरित होकर वही करने बैठ जाते हैं। जबकि हमारी अपने धर्म के प्रति निष्ठा धीरे-धीरे कम होने लगती है और जिस कार्य को हम मन लगाकर करने बैठते हैं वही कार्य सुचारू रूप से कर भी पाते हैं। दूसरों के धर्म को अपमानित करना हमारा इरादा नहीं होना चाहिए। अपने धर्मपथ पर दृढ़ रहते हुए दूसरों के धर्म के प्रति समान सम्मान का भाव रखना चाहिये। देखा जाये तो जो व्यक्ति अपने धर्म का मर्म सही रूप से समझता है वही व्यक्ति दूसरों के धर्म के प्रति अपने दिल में समान सम्मान का भाव रख सकता है। कुछ अहंकारी व्यक्ति जिन्हें धर्मों, मर्यादाओं और संस्कारों के मोल का एहसास नहीं होता उनकी वजह से ही समाज में धर्म के नाम पर व्यभिचार व्याप्त होता है।

उपाली अपराजिता रथ

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