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जिंदगी एक सीरियल: शशांक बाली

जिंदगी एक सीरियल: शशांक बाली

इन दिनों ‘एंड टीवी’ पर टेलीकास्ट होने वाले सीरियल ‘भाभीजी घर पर हैं’ लोगों के बीच काफी चर्चा में है। आखिर इस सीरियल की परिकल्पना कैसे की गई और इस सीरियल की कामयाबी के पीछे का राज क्या है? इसे जानने के लिए हमारे संवाददाता लतिकेश शर्मा इस सीरियल के सेट पर गए और इस सीरियल के डायरेक्टर शशांक बाली से खास बातचीत की।

शशांक जी, सबसे पहले आप बताएं कि मूल रूप से आप कहां के रहने वाले हैं और किस तरह से आप ने मुंबई तक का सफर तय किया?

मैं मूल रूप से दिल्ली का रहने वाला हूं। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा डॉन बॉस्को स्कूल से ली है। बाद में पढ़ाई पूरी करने के बाद मेरे पिता ने पूछा कि आप जिंदगी में क्या करना चाहते हैं? उस वक्त हमारा फेमिली बिजनेस हुआ करता था। लेकिन मेरा बिजनेस में कोई इंट्रेस्ट नहीं था। ऐसे में मैंने कहा की मैं बिजनेस नहीं करूंगा और मुंबई में जाकर सीरियल और फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाऊंगा। मेरे इस फैसले के बाद मेरे पिता ने फैमली बिजनेस को बंद करने का फैसला किया और मेरे पिता वीरेन्द्रनाथ बाली जो खुद भी बहुत अच्छे लेखक हैं, वे मुझ से पहले स्ट्रगल करने के लिये मुंबई आ गये। उन्होंने मुंबई आकर निर्देशक राजन वागधरे के लिये कई सीरियल लिखे।

तो, आप के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा कि आमतौर पर देखा जाता है कि मुंबई आने के बाद लोग अपने स्ट्रगल को याद करते हुए बताते हैं कि उन्हें फुटपाथ पर सोना पड़ा या फिर भूखे पेट रात गुजारनी पड़ी।

नहीं, इस मामले में मैं थोड़ा भाग्यशाली रहा और मेरे साथ ऐसा कुछ नही हुआ। मुझ से पहले मेरे पिता यहां आकर लेखन में अपनी पहचान बना चुके थे। ऐसे में मुंबई आने के बाद मुझे कोई खास स्ट्रगल नहीं करना पड़ा। मेरे पिता ने अपने जान-पहचान के डायरेक्टर राजन वाघधरे के पास मुझे असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में रखवा दिया। जहां मैंने करीब 8 साल उन्हें असिस्ट किया। वहां मैंने खूब मेहनत की और सीरियल की हर बारीकी को काफी करीब से देखा और सीखा।

आप को पहला ब्रेक कैसे मिला?

उन दिनों ‘सब टीवी’ पर पुलिस की बेकड्रॉप में ‘एफआईआर’ नाम से एक कॉमेडी सीरियल को लांच करने की तैयारी चल रही थी और मुझे इस सीरियल को डायरेक्ट करने का प्रस्ताव आया और मैंने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। ‘एफआईआर’ सीरियल ‘सब टीवी’ पर करीब 8 साल तक चला। लोगों ने इस सीरियल को काफी पसंद किया और इस सीरियल की कामयाबी से मुझे एक नई पहचान मिली।

आपको सीरियल ‘भाभीजी घर पर हैं’ को डायरेक्ट करने का मौका कैसे मिला?

करीब एक साल पहले ‘सब टीवी’ पर चलने वाला धरावाहिक ‘एफआईआर’ अचानक बंद हो गया। उसके दूसरे ही दिन लेखक मनोज संतोषी का मुझे फोन आया कि ‘एंड टीवी’ नाम से एक नया चैनल लांच हो रहा है और उसके लिए मैं ‘भाभीजी घर पर हैं’ नाम से सीरियल लिख रहा हूं। चैनल वाले चाहते हैं कि तुम उस सीरियल को डायरेक्ट करो। मैं उस वक्त ‘एंड टीवी’ की क्रियेटिव हेड से मिला जो एक महिला थीं। उन्होंने मुझे पूरी आजादी दी और कहा की मैं खुलकर काम करूं। लेकिन उन्होंने सिर्फ एक शर्त रखी कि मैं दर्शकों को कुछ नया दूं। जिसके बाद मैंने इस सीरियल के लेखक मनोज संतोषी के साथ मिलकर काम करना शुरू किया।

31-01-2016

इस सीरियल में पड़ोसी एक दूसरे की पत्नी को पसंद करते हैं। भारतीय सभ्यता और संस्कृति को ध्यान में रखते हुए इस सीरियल को पारिवारिक सीरियल बनाने की कितनी बड़ी चुनौती आपके सामने थी?

देखिये, यदि मैं इस सीरियल में यह दिखाता कि कोई मर्द अपनी पत्नी को छोड़ कर पड़ोसन को प्यार करता है, तो भारतीय महिलायें इसे कभी पसंद नहीं करतीं। आपने देखा होगा कि इस सीरियल के दोनों किरदार तिवारी जी और विभूति जी एक दूसरे की पत्नी को पसंद तो करते हैं, लेकिन अपनी पत्नी से भी बेहद प्यार करते हैं। यही इस सीरियल की सबसे बड़ी खूबसूरती है। इस सीरियल में तिवारी जी और विभूति जी एक दूसरे की पत्नी को पसंद तो करते हैं लेकिन उसमे वासना वाली कोई बात नहीं है। मुझे लग रहा था कि इस सीरियल को पसंद करने वालों में मर्द लोग ज्यादा होंगे। लेकिन जब सीरियल ऑन एयर हुआ तो इस सीरियल को महिलाओं और बच्चों ने भी काफी पसंद किया, जो इस सीरियल को एक पारिवारिक सीरियल भी बनाता है।

आप ने इस सीरियल में हर किरदार को अपनी एक अलग पहचान दी है। तिवारी जी के रोल में रोहिताश गौड़ या फिर विभूति मिश्रा के रोल में आसिफ शेख को। यह सब क्या सोच कर किया?

मैं इस सीरियल के बारे में आप को एक ऐसी बात बताऊंगा जिसे जानकर आप को हैरानी होगी। इस सीरियल को जब प्लान किया जा रहा था, उससे पहले यह फाइनल हो गया था कि किस किरदार को कौन अभिनेता अदा करेगा। इस सीरियल के लेखक मनोज संतोषी जो मेरे काफी करीबी मित्र भी हैं उन्होंने पहले से ही इस सीरियल को लेकर अभिनेता आसिफ शेख और बाकी कलाकारों की सहमति ले रखी थी। हालांकि उस वक्त ‘एंड टीवी’ को लॉच करने की तैयारी चल रही थी। लेकिन, कलाकारों ने यह वादा किया था कि आप सीरियल लिखें हम उस किरदार को जरुर निभायेंगे। इस वजह से सीरियल की कास्टिंग को फाइनल करने के बाद इस सीरियल का ताना-बाना बुना गया। जिसकी वजह से इस सीरियल के किरदार में सारे कलाकार पूरी तरह से फिट बैठ गए।

इस सीरियल के तमाम किरदार काफी लोकप्रिय हैं। चाहे वो खुद को थप्पड़ मरवाने में आनंद महसूस करने वाले सक्सेना जी हों या फिर न्यौछावर के नाम पर रिश्वत मांगने वाले दरोगा हप्पू सिंह की बात हो। लेकिन इन   तमाम किरदारों के बीच रिक्शा चलाने वाला पेलू का किरदार बेहद अनोखा है, जो कागज की पर्ची में लिख कर अपनी बात करता है। इस चरित्र की परिकल्पना कैसे की गई?

पेलू का किरदार पहले से प्लान नहीं था। दरअसल पेलू रिक्शे वाले का किरदार मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर निभा रहे हैं। एक दिन शूटिंग के दौरान एक सीन में तिवारी जी और विभूति जी आपस में बातें करते हैं और मुझे इन दोनों के बीच एक ऐसे शख्स को बिठाना था जो कुछ बोल नहीं सकता है। मेरे पास कोई कलाकार नही था और ऐसे में मैंने अपने सहायक अक्षय पाटिल को बोला कि वो तैयार होकर इन दोनों के बीच बैठ जाएं। इसके बाद से पेलू के किरदार को हमने संवाद नहीं दिया, बल्कि वो कागज की पर्ची देकर अपनी बात करता है और सिर्फ मुस्कुरा देता है। पेलू की मुस्कुराहट को देख कर मुझे भी उस वक्त काफी हंसी आई, जिसे अब दर्शक भी काफी पसंद कर रहे हैं।

जिस तरह आप के सीरियल ‘एफआईआर’ में मैडम चौटाला सब को थप्पड़ मारती थीं, उस ट्रेंड को आप ने ‘भाभीजी घर पर हैं’ में भी जारी रखा है। इस ट्रेंड को जारी रखने की कोई खास वजह है?

जी हां ये थप्पड़ मारने का सिलसिला ‘एफआईआर’ सीरियल में शुरू हुआ था और इस सीरियल में भी जारी है। मैं कहूं तो थप्पड़ मारने के चलन ने ‘एफआईआर’ सीरियल को काफी लोकप्रिय बनाया था और यही वजह है कि मैंने इस सीरियल में भी इस चलन को जारी रखा है। यूं कहें कि थप्पड़ मारने का ट्रेंड मेरे लिये लकी रहा है तो गलत नहीं होगा।

आप अपने कॉमेडी सीरियल के जरिये लोगों को हंसाते हैं, क्या निजी जिंदगी में आप उतने ही फनी हैं?

इसका जवाब तो लोग ही दे सकते हैं। हां, ये जरुर है कि मैं घर हो या सेट हर मौके पर कुछ अलग अंदाज में बोलता हूं और वो लोगों को पसंद आता है। मैं जिंदगी की हर सिचुएशन में कहीं-ना-कहीं कॉमेडी की तलाश करता हूं और उसे अपने अंदाज से पेश करने की कोशिश भी करता हूं। यही वजह है कि ‘भाभीजी घर पर हैं’ के सेट पर भी काफी कॉमेडी होती है और हम हर मौके पर हंसी के बहाने तलाश कर ही लेते हैं।

आप अपनी सफलता का श्रेय किसे देते हैं?

देखिये, मैं अपनी जिंदगी में गुरुमाता आनंदमयी जी से काफी प्रभावित रहा हूं। हालांकि, वे अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन मैं अपनी जिंदगी में हमेशा उनके आदर्शों का पालन करता हूं। मेरा मानना है कि हम सब की जिंदगी भी एक सीरियल की तरह है। यहां भी सब कुछ पहले से निर्धारित है और हम सब उस किरदार को अपनी जिंदगी में निभा रहे हैं। सब ऊपर वाले की मर्जी से हो रहा है। उनकी बरकत से हो रहा है। हम सब सिर्फ एक माध्यम हैं। ऐसे में मैं अपनी सफलता का श्रेय अपनी गुरुमाता को देता हूं। जिनके आशीर्वाद से आज मुझे लोगों का इतना प्यार मिल रहा है।

आगे के लिए आप की क्या योजना है? क्या आप अपनी किस्मत फिल्मों में भी आजमाना चाहते हैं?

देखिये, मैंने आप से पहले ही कहा कि हम सब की जिंदगी में कब क्या होना है, यह सब पहले से तय है। इसी फलसफे को मानकर मैं अपनी जिंदगी में कुछ भी प्लान करके नहीं करता हूं। फिलहाल तो मैं ‘भाभीजी घर पर हैं’ सीरियल को और भी लोकप्रिय बनाने में व्यस्त हूं। यदि मेरी जिंदगी में यह तय होगा कि मुझे कोई कॉमेडी फिल्म भी डायरेक्ट करनी है तो मैं जरुर करूंगा। लेकिन यह कब होगा कैसे होगा? मुझे नहीं पता।

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