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‘आदर्श’ पुलिस स्टेशन

‘आदर्श’ पुलिस स्टेशन

राज्य सरकारों को अपने विधायकों के माध्यम से उन्हें अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक-एक पुलिस स्टेशन को ‘आदर्श पुलिस स्टेशन’ बनाने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। जहां स्वच्छता और व्यवहार में पुलिस स्टेशन के अधिकारी एक आदर्श स्थापित करते हुए नजर आयें।

पंजाब मानवाधिकार आयोग का सदस्य होने के नाते मैं अक्सर पुलिस स्टेशनों में दौरा करता था। भारत के पुलिस स्टेशनों की एक सामान्य प्रणाली है, जो देश के लगभग सभी पुलिस स्टेशनों में एक समान रूप से देखने को मिल सकती है। पुलिस स्टेशनों में प्रवेश करने पर आपका स्वागत रंग-बिरंगे फूलों से सुसज्जित वातावरण से नहीं अपितु पूरे अव्यवस्थित ढंग से खड़े उन वाहनों तथा अन्य कई प्रकार के सामान से होगा जो भिन्न-भिन्न मुकदमों में जब्त किये गये हैं और जिन्हें उनके मालिकों को वापस लौटाया नहीं गया। इस संबंध में मैंने कई बार संसद में भी चर्चा की और सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर उनका ध्यान सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की ओर आकृष्ट किया कि मालखाने के इस सामान को जिसमें मुख्यत: वाहन तथा कई प्रकार के घरेलू सामान भी होते हैं, उसके मालिकों को सौंप दिया जाये और यदि कोई व्यक्ति इस पर अपना दावा प्रस्तुत नहीं करता तो उसे नीलाम करके पैसा जमा कर लिया जाये। नीलाम करने से पूर्व उस सामान की फोटो तथा पूरा रिकॉर्ड पुलिस स्टेशन के साथ-साथ कोर्ट में भी सुरक्षित रखी जाये। यह एक कानूनी प्रक्रिया है। इस कार्य को करने से पुलिस स्टेशनों में स्वच्छता का वातावरण बनाने में काफी मदद मिलेगी। इसके अतिरिक्त पुलिस विभाग को इन लावारिस वाहनों की नीलामी करने से अपार धन भी प्राप्त हो सकता है। तमिलनाडु के गृह विभाग ने मुझे अपने पत्र संख्या-46066/ पोल-11/2015/2 दिनांक 23 सितंबर, 2015 के द्वारा बताया है कि, विगत तीन वर्षों में तमिलनाडु ने पुलिस स्टेशनों में पड़े लावारिस वाहनों की नीलामी से लगभग 10 करोड़ रुपये वसूले गये हैं।

एक पुलिस स्टेशन में जितने भी अधिकारी तैनात होते हैं, वे सब पुलिस स्टेशन में नहीं मिलते हैं। यदि कुछ अधिकारियों को क्षेत्र में दौरे के लिए भेजा गया हो तो उनकी विधिवत एंट्री पुलिस स्टेशन की दैनिक डायरी में मिलनी चाहिये। परन्तु अक्सर दैनिक डायरियां कई-कई घण्टे के बाद मनमाने तरीके से भरी जाती हैं। पुलिस स्टेशन के प्रवेश द्वार पर ड्यूटी ऑफिसर के रूप में एक पुरुष अधिकारी तथा एक महिला अधिकारी की उपस्थिति आवश्यक है, परन्तु सामान्यत: यह व्यवस्था देखने को नहीं मिलती। ड्यूटी ऑफिसर के स्थान पर यदि हम इस पुलिस अधिकारी को स्वागत कक्ष अधिकारी कहें तो जनता के मन में एक विशेष आशा जागृत होगी कि पुलिस स्टेशन में प्रवेश पर नियुक्त यह अधिकारी उनका सम्मानपूर्वक स्वागत करेगा और उनकी पीड़ा को उचित तरीके से और सद्भावनापूर्वक सुनने का प्रयास करेगा। परन्तु वास्तविकता इस आशा के विपरीत है। पुलिस स्टेशन में प्रवेश करते ही सामान्य पुलिस कर्मियों का व्यवहार हर व्यक्ति को अपराधी के समान समझकर किया गया देखा जा सकता है।

मैंने अपने दौरों में अक्सर पुलिस स्टेशनों में लंबित शिकायतों का ब्यौरा मांगा तो मुझे हर पुलिस स्टेशन के रिकॉर्ड को देखकर यह हैरानी हुई कि एक सप्ताह से अधिक समय तक शिकायतों को लंबित रखा जाना भारत के पुलिस स्टेशनों में एक सामान्य सी परंपरा है। आपराधिक न्याय प्रणाली जब पीडि़त से यह आशा करती है कि वह अपने प्रति घटित हुए अपराध की शिकायत तुरंत पुलिस तक पहुंचाये तो पुलिस अधिकारियों से भी यह आशा की जाती है कि अपराध की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई की जाये।

इसी प्रकार मैंने लगभग सभी पुलिस स्टेशनों के अन्दर भवन की स्वच्छता को भी लचर अवस्था में ही देखा। पुलिस स्टेशनों के लॉकअप जहां तत्काल रूप से अपराधियों को गिरफ्तार करके रखा जाता है, उनकी अवस्था गंदगी तथा बदबू से भरी ही नजर आई। पुलिस लॉकअप में किसी भी समय अचानक दौरा करने से ऐसे भी कई लोग उनमें बन्द मिले जिनको औपचारिक रूप से गिरफ्तार करने का कोई रिकॉर्ड भी नहीं था। पुलिस स्टेशनों के शौचालय आदि भी पूरी सफाई के साथ बनाकर नहीं रखे जाते। पुलिस स्टेशनों के भवनों के अन्य कमरों में भी उत्तम स्वच्छता का स्तर बनाकर नहीं रखा जाता। हालांकि इन कमरों में पुलिस के अधिकारियों को स्वयं बैठकर कार्य करना होता है। छानबीन अधिकारियों को जो कमरे आवंटित किये गये हैं अक्सर उनमें उनके कपड़े भी फैले पड़े नजर आते हैं। इसका कारण यह है कि कई पुलिस अधिकारियों को पुलिस स्टेशन के निकट कहीं रहने की सरकारी व्यवस्था नहीं दी गई। उनका अपना घर बहुत दूर होने के कारण उन्हें ड्यूटी के अतिरिक्त अपना निजी समय भी इन्हीं कमरों में आराम करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि ऐसे पुलिस अधिकारी 24 घण्टे ड्यूटी के वातावरण में ही जीवन जीने के लिए मजबूर किये जा रहे हैं। ऐसे वातावरण में इन अधिकारियों से विनम्रता और यहां तक कि अपने सरकारी कार्यों में दक्षता और निपुणता की आशा कैसे की जा सकती है?

पुलिस स्टेशनों के दौरे करने के दौरान मैंने हर स्तर के पुलिस अधिकारियों से विस्तारपूर्वक कई विषयों पर चर्चा की। हमारे देश में पुलिस व्यवस्था का मूल आधार भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 जो ब्रिटिश राज के दौरान बड़े योजनाबद्ध तरीके से लागू की गई थी। ब्रिटिश शासकों का मुख्य उद्देश्य भारतीय जनता को अपने नियम और अनुशासन में चलाने का था जिससे उनकी गुलामी का राज लम्बा चल सके। इसके लिये उन्हें ऐसे पुलिस बल की आवश्यकता थी जो अनुशासन को सख्ती के साथ लागू कर पाता। इसके लिए पुलिस बल में अत्याचारी व्यक्तियों को शामिल करना आवश्यक था। सामान्यत: व्यक्ति स्वभाव से अत्याचारी नहीं होता। परन्तु उसे यदि स्वयं को ही अमानवीय परिस्थितियों में कार्य करने के लिए मजबूर कर दिया जाये तो स्वाभाविक रूप से वह लोगों के लिए अत्याचारी बनता चला जायेगा। कम वेतन और ड्यूटी के असीमित घंटे ही पुलिस वालों पर ब्रिटिश अमानवीयता के सूत्र सिद्ध हुए। इसका परिणाम निकला कि पूरी पुलिस व्यवस्था अमानवीय, अत्याचारी और भ्रष्टाचारी बनती गई। ब्रिटिश शासक तो चाहते ही यही थे। विगत लगभग 150 वर्ष के दौरान भारत के राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में अनेकों प्रकार के परिवर्तन आने के बावजूद और भारत के विश्व शक्ति के रूप में उदय होने की संभावनाओं के बावजूद भारतीय पुलिस आज भी उसी मानसिकता के साथ कार्य करती नजर आ रही है, जिस मानसिकता के साथ वह ब्रिटिश शासन के समय में करती थी। बेशक भारत की अदालतें, कानूनी समाज सेवकों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के प्रयासों से बहुत से बदलाव आये हैं, परन्तु किसी ने आज तक पुलिस अधिकारियों के ऊपर लागू उन अमानवीय अवस्थाओं की तरफ ध्यान नहीं दिया, जिनके चलते ये पुलिस अधिकारी जनता के लिए अमानवीय बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

पुलिस अधिकारियों के सीमित ड्यूटी के घंटे, वेतन वृद्धि की मांगे, पुलिस स्टेशन के निकट स्वच्छ और स्वास्थ्यवद्र्धक आवास व्यवस्था आदि की तरफ भारत की सरकारों ने कभी कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। इसके अतिरिक्त पुलिस के कार्यों में प्रतिदिन का राजनीतिक हस्तक्षेप उन्हें भ्रष्ट आचरण के लिये मजबूर कर देता है। पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति तथा तबादलों के सम्बन्ध में आज तक कोई नियम और कानून नहीं बनाये जा सके।

पुलिस सुधारों के सम्बन्ध में राष्ट्रीय पुलिस आयोग की सिफारिशें पिछले लगभग 35 वर्षों से लंबित पड़ी हैं। इसके अतिरिक्त मानवाधिकार आयोग, विधि आयोग तथा भारत सरकार की अनेक विशेष समितियों ने समय-समय पर भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 में व्यापक संशोधन के सुझाव दिये हैं। मैंने एक बार फिर गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी को हाल ही में पुलिस सुधारों में कुछ वास्तविक सकारात्मक कदम उठाने के लिये निवेदन किया है जिससे भारत के पुलिस अधिकारी अपने पदों पर कार्य करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर सकें और परिणामत: वे भारत की जनता को पूर्ण सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित कराते हुए एक सुन्दर समाज की रचना में प्रमुख सहयोगी बने हुए दिखाई दे सकें। मेरे इस पत्र का आधार है सर्वोच्च न्यायालय का प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार नामक निर्णय जो रिट् याचिका संख्या-310/1996 में 22 सितंबर, 2006 को सुनाया गया था। इसमें पुलिस सुधारों के संबंध में भारत सरकार तथा देश की सभी राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिये गये थे, परन्तु इस निर्णय के 11 वर्ष बाद भी कोई ठोस कदम ही नहीं उठाये गये।

भारतीय पुलिस के निचले स्तर पर पुलिस अधिकारियों को पूरे तनाव के साथ जीवन जीना पड़ रहा है। कई बार बातचीत के दौरान इन पुलिस अधिकारियों की पीड़ा देखने-सुनने को मिलती हैं। लम्बे समय तक पदोन्नति का न मिलना और तबादलों की तलवार हमेशा उनके सिर पर लटकी रहती है। पुलिस स्टेशनों का गंदगी से भरा वातावरण और उस वातावरण में लंबी ड्यूटी के घंटे बिताना किसी प्रकार से भी व्यक्ति को तनाव मुक्त नहीं रख सकता और जब पुलिस बल के जवान ही तनाव मुक्त नहीं रहेंगे तो अपने असंतुलित मन से वे अपराध पीडि़तों के सहायक कैसे बन सकेंगे? जब तक पुलिस अधिनियम की नई रचना हो तब तक राजनेताओं तथा गैरसरकारी समाजेवी संस्थाओं को मिलकर अपने स्थानीय पुलिस स्टेशनों को एक ‘आदर्श पुलिस स्टेशन’ बनाने का प्रयास करना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने जिस प्रकार ‘आदर्श ग्राम योजना’ के माध्यम से सांसदों को आदर्श गांव विकसित करने के लिये प्रेरित किया है।

अविनाश राय खन्ना

(लेखक राज्य सभा सदस्य व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, भाजपा हैं)

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