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सिसकता बचपन

सिसकता बचपन

यह पुस्तक बीजों, चिनगारियों, नींव के पत्थरों और विचारों का संकलन है। अस्सी के दशक से विगत कुछ वर्षों में लिखे गए मेरे इन्हीं लेखों ने बाल मजदूरी, बाल दुव्र्यवहार, दासता, यौन उत्पीडऩ, अशिक्षा आदि विषयें को सैद्वांतिक और व्यावहारिक आधार दिया। जहां तक मेरी जानकारी है, इसमें बच्चों के अधिकारों से संबंधित विषयों पर लिखे गए मेरे सबसे शुरूआती लेख भी शामिल हैं। मेरे ख्याल से यह साधारण पाठक ही नहीं, शोधकत्र्ताओं के लिए काफी उपयोगी होंगे। हाल ही में मेरे सहयोगियों ने कुछ लेखों को इकट्ठा कर लिया। न मैंने और न ही मेरे संगठन ने कभी मेरे लिखे हुए लेखों आदि का विधिवत संकलन किया। इसलिए ज्यादातर मेरी रचनाएं गुम होकर रह गईं। जो मिल पाया, उसमें से कुछ चुनिंदा लेख इस पुस्तक में संकलित किये गये हैं मैं आपको विनम्रतापूर्वक यह बताना चाहूंगा कि ये ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज है जिन्होंने भारत में ही नहीं, दुनिया भर में बालश्रम के खिलाफ आंदोलन को जन्म दिया। साधारण लोगों से लेकर बुद्धिजीवियों, कानून निर्माताओं तथा संयुक्त राष्ट्र संघ तक में हलचल पैदा की। मैंने 35 सालों में इन्हीं विचारों की ताकत को संगठनों व संस्थाओं के निर्माण, सरकारी महकमों के गठन, शोध प्रबंधों, कॉरपोरेट जगत की नीतियों, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय कानूनों व सरकारी बजटों में परिवर्तित होते देखा है।

इनमें से कुछ लेख तब लिखे गए थे, जब मैं बच्चों से गुलामी कराने वालों मालिकों के हमलों के शिकार होकर घायल पड़ा था। कुछ ऐसे समय भी लिखे गए है, जब मेरे पास बेटे को पिलाने के लिए दूध तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। अखबारों में लेखन से मिले पारिश्रमिक के पैसे से मेरी पत्नी और आंदोलन के सहयात्री सुमेधा जी घर चलाने का इंतजाम करती थीं। मैंने एक छोटी पुस्तक उन दिनों लिखी थी जब बाल शोषण कराने वाले माफियाओं ने मेरे घर पर हमला किया था और इसके बाद मेरी नन्ही बेटी को जान से मारने या गायब कर दिए जाने की धमकियां मुझे मिल रही थीं। लेकिन कुछ अन्य लेखों में मुक्ति आश्रम, बाल आश्रम और बाल मित्र गांव में मेरे हजारों बच्चों के खिलखिलाते चेहरे की मुस्कुराहट भी शामिल है।

यह बात सन् 1959 की है। वह मेरे स्कूल का पहला दिन था। किसी आम बच्चे की तरह मैं भी नये कपड़े, जूते, बस्ता और किताबों के साथ उत्साह और सपने लिये स्कूल में प्रवेश कर रहा था। वह मेरे गृहनगर विदिशा का सरकारी प्राथमिक स्कूल, दुर्ग पाठशाला थी। अचानक मेरी नजर मेरी ही उम्र के एक ऐसे बच्चे पर पड़ी, जो गेट के ठीक बाहर बाईं तरफ जमीन पर बैठकर जूता पालिश करने का काम करता था। उसके पिताजी भी वहीं बैठकर जूते-चप्पलों की मरम्मत करते थे। मैं पलभर के लिए ठिठककर रूक गया। मैंने शायद पहले भी बच्चों को इस तरह काम करते हुए देखा होगा, किंतु कभी ध्यान नहीं गया था। यह पहला मौका था, जब मुझे दो एकदम विपरीत प्रकार के नजारे दिखे। मैं और मेरे दोस्त तो पढ़ाई की शुरूआत करने जा रहे थे, जबकि वह बच्चा हमारे जूतों की तरफ देखे जा रहा था। वे नए थे, इसलिए पॉलिश कराने की जरूरत नहीं थी।

अपनी कक्षा में छात्रों के परिचय के बाद मैंने हिम्मत करके अपने शिक्षक से पूछा, ”मास्साब, एक बच्चा बाहर बैठकर जूता पॉलिश क्यों कर रहा है? वह हमारे साथ कक्षा में क्यों नहीं है?’’ अध्यापक महोदय ने मुझे समझाया कि यह कोई नई बात नहीं है। गरीब के बच्चे तो मजदूरी करते ही हैं। बाद में मैंने अपने हेडमास्टर जी और परिवार के लोगों से भी बातचीत की। सभी ने अलग-अलग तरीके से मुझे यही बात समझाने की कोशिश की। शायद मैं समझ भी जाता, किन्तु मैं हर रोज सवेरे स्कूल जाते और लौटते वक्त उस बच्चे को देखकर विचलित हो उठता था। हफ्ते-दस दिन तक यही चलता रहा। मैं भी धीरे-धीरे अपने भीतर साहस जुटाता रहा। एक दिन स्कूल से लौटते हुए मैं उन मोची पिता-पुत्र के पास खड़ा हो गया। मैंने उस पिता से पूछा कि वे अपने बेटे को स्कूल क्यों नहीं भेजते? पहले तो वे चौंके। फिर संभलकर बोले, ”बाबू जी, मैंने इस बारे में कभी नहीं सोचा। न कभी किसी ने मुझसे पूछा। हमारे तो बाप-दादा यही काम करते आ रहे है। मैं भी बचपन से जूते गांठता हूं।’’ फिर बड़ी कातर निगाहों से उन्होंने मेरे सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ” बाबू जी,! आप नहीं जानते, हम लोग तो मजदूरी करने के लिए ही पैदा होते हैं।’’ यह उनका जवाब था, लेकिन मेरे लिए यह एक नया सवाल और जीवन भर के लिए चुनौती थी। जात-पात, ऊंच-नीच, गैर-बराबरी आदि के बादे में मुझ जैसे पांच-छह साल के बच्चे को तब भला क्या समझ होगी? लेकिन मैं इतना जरूर समझ गया कि कहीं कुछ गड़बड़ है। इस घटना ने मुझे समाज और जिन्दगी को देखने का एक नया नजरिया दे दिया। एक बच्चे की आंखों से मैंने सही और गलत के बीच फर्क करना सीखा। मैं आज तक उन आंखों को अपने भीतर संजोकर रखे हुए हूं।

31-01-2016

पचपन साल पहले मैंने अपने गुरूजनों और माता-पिता की समझाइश को नामंजूर कर दिया था। मैं आज भी पुरजोर तरीके से उन धारणाओं और मान्यताओं को अस्वीकार करता हूं। जो बच्चों के बारे में दोहरे मापदंड सिखाती हैं। मैंने भावनाओं और कर्मों से छोटे से समूह में खेत-खलिहानों, ईंट- भट्ठों, पत्थर-खादानों, कल-कारखानों, रेस्त्राओं और घरों से गुलाम बच्चों को आजाद कराना शुरू किया, तब हमारे दोस्त तक हमारा मजाक उड़ाते थे, क्योंकि तब देश और दुनिया में बाल मजदूरी कोई मुद्दा नहीं था। बाल अधिकारों की अवधारणा तक नहीं बनी थी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में बाल अधिकार घोषणा-पत्र पारित किया था, यानी हमारे व्यावहारिक संघर्ष के भी लगभग एक दशक बाद। बाल मजदूरी पर स्वतंत्र भारत में अपना कोई कानून नहीं था। राजनैतिक तौर पर कभी किसी दल ने इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं की थी। इस विषय पर पुस्तक या शोध प्रबंध तो दूर, अखबारों तक में कोई लेख या समाचार देखने को नहीं मिलता था।

इसी तरह शिक्षा को भी महज एक सरकारी कार्यक्रम या धर्मांदा गतिविधि समझा जाता था। हम जैसे चंद लोगों ने जब भारत और दुनिया में इसे मानव अधिकार का मुद्दा बनाने की कोशिश शुरू की, तब हमारी बात विरले लोग ही सुनने और समझने को तैयार होते थे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई और चंद वर्षों के अध्यापन कार्य में मैंने वैज्ञानिक तर्कों और किसी भी मुद्दे के सैद्वांतिक विश्लेषण का महत्व अच्छी तरह से जान लिया था। दूसरा, छात्र जीवन में सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रहने से आंदोलनों के वैचारिक आधार का भी थोड़ा-बहुत अध्ययन कर लिया था। मेरी लिखने-पढऩे में हमेशा से बहुत रूचि रही। बचपन बचाने का आंदोलन शुरू करने से पहले भी मैं सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विषयों पर देश की जानी-मानी पत्रिकाओं एवं समाचार-पत्रों में लेख लिखा करता था। इसी पृष्ठभूमि में मैंने बचपन बचाने के अभियान को एक आंदोलन बनाने के लिए तथ्यों, तर्कों और विश्लेषणों का सहारा लिया। पत्र-पत्रिकाओं में ढ़ेरों लेख लिखे। कई प्रकार के परचे, पैंपलेट आदि लिखकर छपवाए। बच्चों पर होनेवाले अत्याचारों एवं उनके समाधान के व्यावहारिक उपायों पर प्रकाशित होने वाला यह पहला साहित्य था। ज्यों-ज्यों यह मुद्दा आगे बढ़ता गया, मैं उसके अलग-अलग आयामों पर अपनी लेखनी के माध्यम से अपने विचारों को आगे बढ़ाता रहा।

मेरी विचार-यात्रा एक ओर तो बचपन और आजादी के प्रति गहरी करूणा एवं विश्वास से प्रेरित रही है तो दूसरी ओर उसकी जमीन व्यावहारिक कर्म और संघर्षों की रही है। मैं लेखन, भाषण, यहां तक कि व्यावहारिक जीवन में भी किसी के प्रति दयादृष्टि नहीं रखता। न ही किसी तरह के उपकार में भरोसा रखता हूं। बच्चों के साथ मेरा रिश्ता संवेदना, समानता, सम्मान और दोस्ती का रहा हैं। किसी भी बच्चे को आजाद कराते वक्त मेरे मन में यह भाव कभी भी नहीं आया कि मैं उन पर उपकार कर रहा हूं। ऐसे बच्चों के चेहरों पर मुक्ति की पहली मुस्कान में मुझे ईश्वर के दर्शन होते हैं। इसलिए वे बच्चे ही मुझ पर एहसान करते हैं। मैं समस्याओं पर नहीं बल्कि समाधान पर भरोसा करता हूं। मेरा शुरू से यह मानना रहा है कि प्रत्येक समस्या का समाधान उसके गर्भ में ही निहित है। इसलिए इस पुस्तक के ज्यादातर लेखों में अनुभवों पर आधारित हल और सुझाव शामिल हैं। रात भर बैठकर अंधेरे का रोना रोने वाले अक्सर पौ फटने तक थककर सो चुके होते हैं। जो लोग अपने आत्मविश्वास और रचनात्मकता की चिनगारियों से एक छोटा सा दीया जलाने का उपाय खोज लेते हैं, उन्हें अंधेरा कभी हताश नहीं कर सकता। छोटे दीये की रोशनी बड़े से सूरज के उगने की आशा जगाती हैं। इसलिए बचपन की आजादी की जीत होकर ही रहेगी।

अभी भी दुनिया भर में सत्रह करोड़ बच्चे बाल मजूदरी करते हैं। छह करोड़ बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा और बारह करोड़ बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूरी करने से पहले ही पढ़ाई छोडऩे को मजबूर हो जाते हैं। साढ़े आठ लाख बच्चे ऐसे हैं, जो गुलामी, वेश्यावृत्ति, बाल व्यापार, जबरिया भिखमंगी, खतरनाक उद्योगों में बाल मजदूरी आदि के शिकार हैं। हमारे सामने ये बड़ी चुनौतियां हैं, किन्तु दूसरी ओर अच्छी बात यह है कि अब बच्चों पर हो रहे जुल्मों को सरकार, समाज या कॉरपोरेट जगत नजरअंदाज नहीं कर सकते। जागरूकता, मजबूत कानून तथा उनका समुचित पालन, सामाजिक प्रयास, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और संरक्षण में पर्याप्त सरकारी खर्चों के प्रावधान आदि ऐसे उपाय हैं, जिनसे हम बच्चों के प्रति हो रही हर प्रकार की हिंसा का अंत कर सकते हैं।

भीतर की पंचमुखी ताकत की पहचान

31-01-2016मैं कार्य प्रंबधन के एक तरीके का प्रयोग करना चाहता हूं। इसके माध्यम से बाल मित्र गांव के अनुभवों का विश्लेषण किया जाए। क्योंकि इस तकनीक के माध्यम से आगे बढऩे का मौका मिलता है। इसे ‘स्वाट कहते हैं। अंग्रेजी के शब्द स्वाट का अर्थ है-एस-स्ट्रेंथ, डब्लयू-वीकनेस, ओ-अपॉरच्यूनिटी और टी-यानी थ्रेट्स। इसका मतलब है अपनी शक्तियों, कमजोरियों, अवसरों और खतरों की पहचान एवं मूल्यांकन करते हुए आगे बढऩा।

हमारी पहली ताकत बच्चों की स्वाभाविक ईमानदारी, बाल मजदूरी, शिक्षा तथा बाल अधिकार जैसे मुद्दों पर उनकी समझ की स्पष्टता, उत्साह, आदर्शवादिता और नैतिकता से भरी दृढता है। ये ऐसी ताकतें हैं, जो सामान्य तौर पर वयस्कों में कम देखी जाती हैं। एक बार जब वे मिल-जुलकर काम करना सीखकर सामूहिक नेतृत्व विकासित कर लेते हैं तो बहुत से मुश्किल काम आसान हो जाते हैं। बाल मित्र गांव से जुड़े हर कार्यकर्ता को यह हमेशा अपने जेहन में रखना चाहिए कि इस शक्ति का सही नियोजन हो। इन बच्चों में गलत महत्वकांक्षाएं न पनपें। ऐसी रचनात्मक गतिविधियों और अभिनव प्रयोगों को बढ़ावा दिया जाए, जो उनके लिए रूचिकर भी हों तथा आगे बढ़कर कुछ कर डालने की ललक पैदा करें।

हमारी दूसरी शक्ति संविधान की मंशा और कानूनों का हमारे हक में होना। बच्चों का शोषण असंवैधानिक तथा गैरकानूनी है। बाल अधिकार हनन रोकने के लिए भारत सरकार ने कई अंतरराष्ट्रीय संधियों पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। सभी बच्चों को 2015 तक शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीय संकल्प पर भारत भी हस्ताक्षरकर्ता है। अगर इस ताकत का ठीक-ठीक इस्तेमाल करना है तो कार्यकर्ता बाल श्रम, शिक्षा, बाल अधिकार, बाल कल्याण संबंधी कानूनों और तमाम सरकारी योजनाओं की अधिकतम जानकारी रखें तथा उसका इस्तेमाल करें। तीसरी ताकत है, बाल मित्र गांव का बचपन बचाओ आंदोलन जैसे स्थापित, प्रसिद्ध व प्रभावशाली राष्ट्रीय संगठन का हिस्सा होना। कार्यकर्ताओं को आंदोलन के इतिहास, उद्देश्यों और कार्यक्रमों का ठीक-ठीक ज्ञान होना चाहिए। इससे वे प्रेरणा और आत्मविश्वास हासिल कर सकेंगे तथा अधिकारियों आदि को भी प्रभावित कर उन पर संगठन का दबाव बना सकेंगे। हमारी चौथी ताकत वे बच्चे हैं, जिन्हें आंदोलन ने पहले कभी बंधुआ मजदूरी या बाल मजदूरी से मुक्त कराकर उनका शिक्षण एवं प्रशिक्षण मुक्ति आश्रम और बाल आश्रम में किया है। बाल मित्र, गांव की निर्माण प्रक्रिया में ये बच्चे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं और कर रहे हैं। बाल मित्र गांव का वैचारिक आधार इतना समग्र और क्रियाशीलता से भरा है कि वह अपने आपमें हमारी पांचवीं ताकत है। हमारी और भी कई ताकतें हैं, जिन पर हम अभी चर्चा नहीं कर रहे। आप स्वयं उन्हें चिन्हित कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर राजस्थान में बाल आश्रम का होना अपने आपमें एक ताकत है। कर्नाटक में वन व पर्यावरण का हमारा अभियान वहां के बाल मित्र गांव को अतिरिक्त ताकत दे सकता है।

31-01-2016शिक्षा का व्यवसायीकरण

शिक्षा के बढ़ते व्यवसायीकरण का खतरा भी हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है। केन्द्र और राज्य सरकारों की नीतियों तथा शिक्षा अधिकार के वर्तमान कानून की खामियों के चलते शिक्षा की निजी दुकानों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। बाल मित्र गांव में सरकारी स्कूलों के अध्यापकों की बड़ी भूमिका है। यदि वे नियमित उपस्थित रहकर गुणवत्तापूर्ण व रूचिकर पढ़ाई नहीं करा पाएंगे तो बच्चे स्कूल छोडऩे के लिए मजबूर होंगे। थोड़े से भी खाते-पीते घरों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों में दाखिला ले लेंगे। हमें यहां यह ध्यान रखना होगा कि जहं शिक्षा पद्धति ही विषमता की जननी बन जाए, वहां आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी को रोक पाना नामुमकिन है। आज पूरे देश में यही चल रहा है। सबके लिए अच्छी और समान शिक्षा की मांग हमारी प्राथमिकताओं से ओझल नहीं होनी चाहिए।

इस विश्लेषण का उद्देश्य यही है कि संगठन और कार्यकर्ता लगातार कोशिश करें कि वे भीतरी कमजोरियों को ताकतों और बाहरी खतरों को अवसरों में कैसे बदल सकते हैं। पिछले लगभग दस सालों में सफलताओं और असफलताओं, दोनों से जो भी सीखा है, उसके आधार पर नए तरीके खोजे जा सकते हैं। उदाहरण के तौर पर पंचायतों एवं सरकारी महकमों को इस बात के लिए तैयार करना कि वे विभिन्न विकास योजानाओं को एक साथ जोड़कर देखें। मनरेगा से लाभान्वित परिवारों को प्रेरित किया जाए कि हर स्थिति में वे अपने बच्चों को मजदूरी के बजाय स्कूलों में भेजेंगे। इसी तरह ग्रामीण आमदनी बढ़ोतरी कार्यक्रम, स्वयं सहायता समूह आदि को शिक्षा के सात जोडऩे के ज्यादा जोरदार प्रयास किए जाएं। जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के क्षेत्र में जागरूकता फैलाने हेतु और भी नए कार्यक्रम सोचे तथा चलाए जा सकते हैं।

आखिर में मैं पुन: जोर देकर कहना चाहूंगा कि बाल मजदूरी की समाप्ति, सबके लिए मुफ्त और अच्छी शिक्षा के साथ-साथ बाल अधिकारों की प्राप्ति का हमारा लक्ष्य किसी एकांगी प्रक्रिया द्वारा पूरा नहीं हो सकता। मैं यह भी नहीं मानता कि ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ने पिछले पैंतीस सालों में जो कुछ भी सीखा है या जितने प्रयोग किए हैं, वे ही अंतिम हैं। जिस दिन हमारे कार्यकर्ता और नेता यह मान लेंगे कि वे ही सब कुछ जानते हैं या इन मुद्दों पर सबसे ज्यादा उन्हीं की समझ है, समझिए उसी दिन से आंदोलन के अंत की शुरूआत हो जाएगी। सीखने और नए-नए प्रयोगों की इच्छाशक्ति ही किसी समस्या के स्थायी समाधान की प्रेरक शक्ति होती है। हम सबसे ज्यादा उन्हीं से सीख सकते हैं, जो हमें अपना प्रतिद्वंद्वी या प्रतिस्पर्धी मानते हैं।

जानवरों से भी सस्ते बिकते बच्चे

भारत में बच्चों की गुमशुदगी की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आज स्थिति यह है कि देश में हर 6 मिनट में कहीं-न-कहीं से एक बच्चे को गायब कर दिया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2009 में 68227, वर्ष 2010 में 77133 तथा 2011 में 90654 बच्चे गायब हुए। इनमें से लगभग 40 फीसदी बच्चों का कोई अता-पता नहीं चल पाया। विडंबना देखिए कि इतने जघन्य अपराध की रोकथाम के लिए देश में न ही कोई कानून बना है और न ही देश की संसद में एक बार भी इस गंभीर मुद्दे पर चिंता दिखाते हुए कोई चर्चा कराई गई। गाहे-बगाहे, इक्के-दुक्के सांसदों ने कोई लिखित सवाल पूछ भी लिया तो उसी अंदाज में सरकारी महकमों के मुंशियों द्वारा तैयार किया गया घिसा-पिटा जबाव पढ़कर सुना दिया जाता है।

आपको याद होगा कि बच्चों के गायब होने के संबंध में कुछ साल पहले ही देश में एक गंभीर कांड का खुलासा हुआ था, जिसने पूरी मानव सभ्यता के सिर को शर्म से झुका यिा था। दिल्ली से सटे निठारी गांव, जो अब नोएडा उपनगर का एक भाग बन चुका है, में जब एक दिन सफाई कर्मचारियों को गटर में बच्चों के जिस्मों के टुकड़े मिले तो पूरा मुल्क सन्नाटे मे आ गा था, लेकिन इससे पहले जब-जब भी गुमशुदा बच्चों के माता-पिता अपनी गुहार लेकर स्थानीय पुलिस थाने पहुंचे तो उनको निराश और अपमानित होकर ही लौटना पड़ा। बाद में पता चला कि इनसानी शक्ल के नरभक्षी दरिंदे उन मासूम बच्चों का खून निकालकर पीते थे और टुकड़े-टुकड़े करके मांस खा जाते थे। इससे ज्यादा शर्मनाक बात और क्या होगी कि इतने नृशंस व हृदय विदारक घटना के बाद भी न तो हमारी सरकार चेती और न उमड़ी समाज की संवेदना ज्यादा दिनों तक टिकी रह सकी।

बच्चों की गुमशुदगी, बच्चों और उनके माता-पिताओं व परिजनों के साथ ऐसा घिनौना और यातनामय अपराध है, जिसे किसी भी सभ्य समाज में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। गुमशुदा हुए बच्चों में अधिकांशत: झुग्गी-बस्तियों, विस्थापितों, रोजगार की तलाश में दूर-दराज के गांवों से शहरों में आ बसे परिवारों, छोटे कस्बों और गरीब व कमजोर तबकों के बच्चे होते हैं। चूंकि ऐसे लोगों की कोई ऊंची पहुंच, जान-पहचान या आवाज नहीं होती, इसलिए पुलिस, मीडिया, यहां तक कि पड़ोसी भी उनको कोई तवज्जो नहीं देते हैं। माता-पिता भी ज्यादातर अशिक्षित तथा डरे-सहमे होते हैं। जानकारी के अभाव में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने के बजाय वे लोग अपने बच्चे के गुमशुदा होने के कई घंटों अथवा एक-दो दिन बाद तक स्वयं ही खोज-बीज में लगे रहते हैं। अगर समाज और पुलिस की मुस्तैदी से बच्चों का चुराया जाना रोका जा सके तो ऐसे अनेक अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है।

लेकिन हम सब यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि देश के कानूनों के साथ सरकारी अनुपालक एजेंसियों द्वारा ही किस तरह का भद्दा मजाक किया जाता है और किस-किस प्रकार से न्यायालयों के निर्णयों की फजीहत की जाती है। जो पुलिस वाले बाल तस्करों और बच्चा चुराने वाले गिरोहों की काली कमाई पर मौज कर रहे हों, वे इस फैसले पर अपने आप अमल करने लगेंगे, यह सोचना बड़ी भूल होगी। अदालत की ये नजीरें तभी इस्तेमाल हो सकती हैं, जब कोई आगे बढ़कर इन पर अमल कराना चाहेगा। बच्चों की गुमशुदगी रोकने के लिए जहां सामाजिक जागरूकता जरूरी है, वहीं सरकारी तंत्र को जवाबदेह ठहराने के लिए सजग और सक्रिय सिविल सोसाइटी की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। गुमशुदगी, बाल व्यापार, बंधुआ मजदूरी, जबरिया भिखमंगी आदि के दुष्चक्र को तोडऩे के लिए इन सभी अपराधों के खिलाफ एक साथ मुहिम छेडऩी होगी।

बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराधों की रोक-थाम के लिए प्रत्येक बच्चे की सही-सही पहचान जरूरी है। परिवारों के अलावा हर एक पंचायत, नगर पालिका एवं निगमों आदि संस्थाओं के लिए यह अनिवार्यता होनी चाहिए कि प्रत्येक बच्चे का जन्म पंजीकरण हो। वयस्कों के लिए दिए जाने वाले आधार कार्ड की तरह ही देश के प्रत्येक बच्चे को प्रमाणित पहचान कार्ड जारी किया जाए। जो फैक्टरी, कार्यशाला, उद्योग, घर, स्कूल, बालगृह आदि बिना पहचान-पक्ष के किसी बच्चे को रखते पाए जाएं, उन पर अलग कानून के अंतर्गत आपराधिक कार्रवाई की जाये। जब तक हम ठीक प्रकार से यह नहीं जानते कि देश में कितने बच्चे हैं, वे कौन हैं, कहां हैं और किस पृष्ठभूमि के हैं, आदि तब तक उनकी हिफाजत और सुरक्षा भला कैसे की जा सकती है? इसी जानकारी के आधार पर सुनिश्चित हो पाएगा कि कौन से बच्चे चुराए गए हैं, बाल मजदूरी के शिकार हैं, कुपोषणग्रस्त हैं अथवा शिक्षा से वंचित हैं, उन्हें किसी प्रकार की बीमारियां हैं और आखिर उनकी समस्याओं का समाधान कैसे किया जाए। इससे यह भी सुनिश्चित हो सकेगा कि बच्चों के मद में कितनी बजट राशि सुनिश्चित की जाए।

चौराहे की लाल बत्ती पर भीख मांगने वाले जिस बच्चे को आप भूखा और नंगा समझकर भीख देते हैं, बहुत संभव है कि देश के किसी और हिस्से में उसकी मां सालों से उसकी राह निहार रही हो। अपने किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर में जिस बालिका या किशोरी घरेलू नौकरानी के हाथ के खाने का आप स्वाद ले -लेकर खा रहे हों, बहुत संभव है कि उड़ीसा, झारखंड या असम में उसके माता-पिता बेटी को ढूंढने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हों। इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि सभी लोग अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए बाल मजदूरों की सेवाओं व उनके द्वारा बनाई गई वस्तुओं का भी बहिष्कार करें, ताकि सस्ता श्रम कराने के लिए बच्चों की खरीद-फरोख्त और उन्हें जानवरों से भी कम कीमत पर खरीदे व बेचे जाने के लिए बच्चों का चुराया जाना रोका जा सके।

31-01-2016

बच्चों को मत दो सांप्रदायिक पहचान

धर्म और बच्चों का रिश्ता भी बड़ा अजीब है। दुनिया का कोई भी बच्चा सिर्फ एक इंसानी बच्चे की तरह ही जन्म लेता है। वह तो वयस्क समाज है, जो उन्हें वेप्टाइजड करके, कलमा और खतना की रस्में पूरी करके, मुंडन और जनेऊ कराके अथवा कड़ा, केश और कृपाण (पंचककर) आदि कर्मकांडों के जरिए एक सांप्रदायिक पहचान देता है। जिस दिन उन पर हिंदू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख आदि का ठप्पा लगता है, मेरे विचार से उसी दिन मानवता को एक बार फिर विखंडित किया जाता है तथा ईश्वर के प्रति एक और अपराध किया जाता है।

दुनिया भर में एक अरब से ज्यादा बच्चे घोर गरीबी के शिकार हैं। 21 करोड़ से ज्यादा बच्चे अपने नाजुक बदन से दूसरों की मजदूरी करते हैं। दुनिया में प्रत्येक मिनट में कुपोषण के शिकार 10 बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। 7 करोड़ बच्चों ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा और अन्य 15 करोड़ बच्चे 5वीं कक्षा पूरी करने से पहले ही स्कूल छोड़ चुके हैं। लाखों बच्चे तस्करी के शिकार हैं, खुलेआम उनके जिस्म की मंडियां लगती हैं। कइयों को अगवा करके उनकी किडनियां, खाल और नाजुक अंग निकालकर बेचे जाते हां। मां-बाप से हजारों किलोमीटर दूर तस्करी कर ले जाए गए बच्चे खेत-खलिहानों, कारखानों, भट्ठों और वेश्यालयों में गुलाम बना दिए जाते हैं। 5 लाख से ज्यादा बच्चों को आतंकवादी, निजी व अवैध सेनाओं में जबरदस्ती बाल सैनिक बनाकर रखा गया है। जिनके हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिएं, उनमें आज एके-47 व एके-56 जैसे खतरनाक हथियार हैं। गिरिजाघरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों व अन्य धर्मस्थलों के प्रभाव, संपन्नता और भरमार के बावजूद विश्व के बच्चों की यह दुर्गति हो रही है। बाल कल्याण के लिए कभी-कभार ये धार्मिक संस्थान महत्वपूर्ण व प्रशंसनीय कार्य करते हैं, परंतु वह नक्कारखाने में तूती की आवाज मात्र होता है।

कुरान-ए-मजीद व हदीसों में बच्चों की ढंग से परवरिश का हुक्म है। पैगंबर हजरत मोहम्मद की एक ही संतान थी, वह भी बेटी। उन्होंने बेटियों को खुदा की सबसे बड़ी रहमत कहा तथा बिना बेटी के परिवार को अभागा माना।

कुछ साल पहले फिरोजाबाद में कांच की चूडिय़ां बनाने के कारखाने से हमने 7-8 साल के एक बच्चे को मुक्त कराया। वह बच्चा भट्ठियों में कांच पिघलाने का काम करता था। यह करते हुए बच्चे का पूरा शरीर काला पड़ गया था। मां-बाप से दूर फैक्टरी मालिक ने इसे अपने यहां बंधुआ बानकर रखा हुआ था। मां को याद करने पर मालिक बुरी तरह पीटता था। अचानक मेरी नजर बच्चे की हथेली पर पड़ी, जिसमें एक बड़ा सा छेद था। पूछताछ पर मालूम हुआ कि गलती से पिघलता हुआ शीशा हाथ पर गिर गया था, जो गोली की तरह हथेली में छेद करता हुआ निकल गया था। मालिक ने इलाज कराने की बजाय बच्चे को उसकी गलती के लिए बुरी तरह से पीटा। मेरा सिर उस वक्त शर्म से झुक गया, जब पता चला कि उस मासूम का नाम हजरत मोहम्मद साहब के ही नाम पर मोहम्मद था, जबकि कारखाना मालिक बाबरी मस्जिद कमेटी का एक स्थानीय सम्मानित नेता था।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में ही रिजापुर की एक अन्य घटना का जिक्र करना चाहूंगा। जब हमने मध्य प्रदेश के रीवा जिले से अगवा करके बंधुआ बनाई गई कुछ बच्चियों को रिहा कराने के लिए कालीन कारखाने में छापा मारा तो 11 बच्चियां हमारे धावा दल के साथ बड़ी खुशी-खुशी बाहर निकल आईं, किंतु मैंने देखा कि 14-15 साल की एक बच्ची उस दड़बेनुमा कोठरी में दीवार से मुंह सटाए सुबक रही थी। मैं एक स्थानीय महिला मजिस्ट्रेट को साथ लेकर फिर से अंदर घुसा और बच्ची को बताया कि अब वह आजाद हैं। अब हम उसे उसके माता-पिता के पास पहुंचा देंगे। इस पर वह और भी जोर-जोर से चीख -चीख कर रो पड़ी। बोली कि वह वापस नहीं जाना चाहती। बाद में हमें पता चला कि लगातार बलात्कार की शिकार हुई उस मासूम बच्ची के पेट में भी एक बच्चा था। मजिस्ट्रेट सहित हम सभी शर्म से डूब गए, जब पता चला कि उसका नाम सीता (बदला हुआ नाम) है। आप हमारी जगह होते तो क्या महसूस करते, जब उस मालिक के दरवाजे पर एक बड़ा सा झंडा लगा हुआ था, जिस पर लिखा था कि ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।

31-01-2016

यों तो यह तय है कि इस तरह के अपराधों और धर्म में कहीं कोई रिश्ता नहीं है, किंतु सांप्रदायिक और धार्मिक उन्माद के जरिए अपनी दुकानदारी और नेतागिरी चलाने वाले लोगों के निजी और सार्वजनिक चरित्र को भला कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? सेवा और परोपकार के नाम पर चलाए जा रहे मठों, मदरसों, मिशन-स्कूलों या धर्म शिक्षा केंद्रों की जांच-पड़ताल की जाए तो स्पष्ट हो जाएगा कि चरित्र और सदाचार की आड़ में बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क में जह घोलने का काम ज्यादा होता है। ऐसे संस्थानों को चलाने वाले ज्यादातर लोग बाल अधिकारों और बचपन की स्वतंत्रता का सम्मान करने के बजाय अनुशासन के नाम पर मानसिक गुलामी कराने में ही ज्यादा सिद्धहस्त हैं। इन स्थानों में समलैंगिकता या बच्चियों से छेडख़ानी व बलात्कार जैसी घटनाएं कोई अजूबा नहीं हैं। धर्म की आड़ में ही तो बाल-विवाह, लड़कियों के प्रति भेदभाव व स्कूलों तक में छुआछूत तथा कई देशों में छोटी बच्चियों और बच्चों के कोमल अंगों में नश्तर लगाने व संयम तथा ब्रह्मचर्य के नाम पर अप्राकृतिक जोर जबरदस्ती जैसी विकृतियां धड़ल्ले से चलती हैं।

धर्म मान्यताएं तथा परंपराएं अलग-अलग चीजें हैं, किंतु जिन परंपराओं पर धर्म का ठप्पा लगा हो, उनका विरोध कितने धर्माचार्य करते हैं? ये धर्मगुरू टेलीविजन चैनलों पर चौबीसों घंटे अपने मत-मजहब के प्रचार-प्रसार, बड़बोलेपन, आत्म-प्रशंसा, दवाइयां व गंडे-ताबीज जैसा सामान बेचने, चंदा जमा करने, कुरीतियां और पाखंड फैलाने, राशिफल, भविष्य, ग्रहदशा आदि का हौवा खड़ा करके अंधविश्वास, भ्रांतियों और झूठे चमत्कारों को बढ़ावा देने आदि का ही काम करते हैं। उनमें से कितने हैं, जो धर्म और अध्यात्म के मूलतत्व, मानवीय करुणा और संवेदना को अपने जीवन और व्यवहार में उतारते हुए एक नैतिक साहस के साथ अन्याय और विषमता के खिलाफ आवाज उठाते हों?

दुनिया भर में सभी मत, मजहबों तथा न्याय व समता के लिए होने वाली क्रांतियों में एक बुनियादी समानता रही है। सभी धर्मों और क्रांतियों की जड़ें, एक गहरी मानवीय संवेदना से ही फूटती हैं। जुल्म और बुराई के खिलाफ इसी संवेदना से एक रास्ता, व्यक्तियों और समूहों में ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई’ के गहरे मानवीय सरोकारों और सक्रियता से होकर गुजरता है। उसे अध्यात्म का रास्ता भी कह सकते हैं। दूसरा रास्ता जुल्म और बुराई पैदा करने वाले व इसे चलाए रखने वाले सामाजिक, आर्थिक या व्यवस्थागत कारणों को बदलने की जद्दोजहद का रास्ता है। यह दुनिया की सभी छोटी-बड़ी क्रांतियों का रास्ता है। इन दोनों रास्तों में से कई अन्य रास्ते भी निकलते हैं। अध्यात्म के मुख्य मार्ग का रूपांतरण, जो संगठित धर्म या मजहब है, कालांतर में कर्मकांड, पाखंड, संप्रदायिकता और आतंकवाद तक पनपा सकता है। दूसरी ओर धर्म का मूल रूप दूसरों की भलाई, शांति, समता और भाईचारे की स्थापना, समाज के उत्पीडि़त और दबे-कुचले वर्गों को सम्मान दिलाने जैसे कार्यों में परिलक्षित होता है। इसी तरह से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, क्रांतियों का एक रास्ता तो मानवीय गरिमा, न्याय और समता के सतत संघर्ष को बरकरार रखता है, किंतु दूसरा राजनीतिक ढोंग, शाब्दिक लफ्फाजी, पाखंड और सत्ताजनिक भ्रष्टाचार की तरफ जाता है। कुल मिलाकर धर्मों और क्रांतियों दोनों का जबरदस्त पतन हुआ है। शायद इन्हीं कारणों के चलते दुनिया में बचपन की इतनी बरबादी हो रही है।

भारत में लगभग 6 लाख गांव हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग साढ़े 6 लाख संख्या कथित साधु, संन्यासी, मौलवी, फकीर, भिक्षु, मिशनरी, बाबा तथा महंतों आदि की है। यदि सारे मंदिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों, गिरजाघरों आदि के पुजारियों की संख्या इसमें जोड़ दी जाए तो यह और भी ज्यादा हो जाएगी। जरा कल्पना कीजिए कि ईश्वर के नाम पर रोटी और इज्जत कमाने वाला इनमें से हर व्यक्ति यदि ईश्वर की सबसे खूबसूरत संतानें, यानी बच्चों पर हो रहे अत्याचारों जैसे बाल मजदूरी, दासता, बाल तस्करी, उत्पीडऩ, भू्रणहत्या आदि के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने लगें तो समाज में कितना जागरण होगा। काश कि सभी धर्मों के गुरू तथा अनुयायी अपने उद्भव के कारणों को फिर से खंगालें। तब अवश्य ही वे पाएंगे कि बच्चों के प्रति संवेदना, सरोकार व सक्रियता के अभाव में वे धर्म का पालन न करके कुछ और ही कर रहे हैं।

साभार: ”आजाद बचपन की ओर’’,

प्रभात पेपरबैक्स, नई दिल्ली

कैलाश सत्यार्थी

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