ब्रेकिंग न्यूज़ 

मिट्टी में रौंदा जाता बचपन

मिट्टी में रौंदा जाता बचपन

देश में बच्चों के विकास के नाम पर हर वर्ष बनने वाली लम्बी-चौड़ी कार्यनीतियों एवं बाल कल्याण के कार्यक्रम के बावजूद बच्चों की बदहाली दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अरबों रुपयों वाली योजनाएं बच्चों को उनका बचपन अभी तक नहीं दिला पाईं, इसके विपरीत बाल अपराध, बाल श्रम, बाल यौन शोषण, कुपोषण, भिक्षावृत्ति, भूख से उत्पन्न रोगों के कारण बाल मृत्यु दर में निरंतर वृद्धि होती जा रही है। आज भी कूड़ों के ढेरों में कूड़ा खोजते हुए, रेलवे स्टेशनों पर जूता पॉलिश करते हुए, फुटपाथों पर भीख मांगते हुए, ढाबों में झूठे बर्तन साफ करते हुए बच्चे अपना बचपन तलाश करते हुए मिल जाएंगे। पंडित नेहरू जी ने एक बार कहा था कि बच्चों का बचपन कलियों की उस क्यारियों की तरह है, जिसे कल फूल बनकर महकना है और हमें देखना है कि कहीं उनकी मुस्कान छिन न जाए। परन्तु क्या हमें इसमें सफलता प्राप्त हुई, क्या हम बच्चों की मुस्कान उन्हें दिला सकें? यदि घोषणाओं की वास्तविकता देखें तो हमें निराशा ही हाथ लगेगी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में आबादी का 10 प्रतिशत भाग बाल मजदूर है। उसे दो जून की रोटी जुटाने के लिए सुबह से रात तक कमरतोड़ मजदूरी का सहारा लेना पड़ता है, तरह-तरह की शारीरिक तथा मानसिक यातनाएं सहनी पड़ती हैं, तब भी उसे खाने के लिए भोजन तथा सोने के लिए जमीन का छोटा सा टुकड़ा नसीब हो पाता है, जब इन कलियों को ताजा हवा ही नहीं मिलेगी तो वे मुस्कुराएंगी कैसे?

अगस्त 1985 में केन्द्रीय श्रम मंत्रालय के सहयोग से बड़ोदरा की एक संस्थान ने पूरे देश में एक सर्वेक्षण करवाया था। उस रिपोर्ट में बताया गया कि देश में चार करोड़ चालीस लाख बाल श्रमिक हैं और इसमें भी लाखों बच्चे पांच वर्ष से कम आयु के हैं। विवशता को इस आंकड़े से ही देख सकते हैं कि देश में मासूमों की क्या हालत है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हर तीसरे घर में काम करने वाला एक बच्चा है जो 5-15 आयु वर्ग का है, ये बच्चे 10 घंटे से ज्यादा काम करते हैं और इस प्रकार उनका बाल शोषण किया जा रहा है। इन कामकाजी बच्चों में 10-12 आयु वर्ग के 62 प्रतिशत, मध्य आयु वर्ग के 22 प्रतिशत तथा शेष 5-6 आयु वर्ग के हैं। इनमें 83 प्रतिशत बच्चे शहरी घुटन भरे वातावरण के कारण रोगों से ग्रस्त हैं।

31-01-2016

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) द्वारा जारी चाइल्ड लेबर फैक्ट्स एंड किर्गस इन एनालाइसिस ऑफ सेंसज 2001 में इस बात का खुलासा किया गया कि, भारत में 5-14 आयु वर्ग के कुल एक करोड़ छब्बीस लाख बच्चे बाल श्रमिक हैं। जिनमें 46.20 प्रतिशत बच्चे पूरी तरह श्रम पर आधारित हैं जबकि 53.80 प्रतिशत बच्चे छोटे-मोटे काम करने वाले हैं। सन 1991 की जनगणना की तुलना करते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके बाद से 2001 तक इस आयु वर्ग के बाल श्रमिकों में 10.68 प्रतिशत बच्चे बढ़े हैं। इस दौरान पूरी तरह से श्रम पर आधारित बच्चों की संख्या में एक तिहाई की कमी आई जबकि छोटे-मोटे काम करने वाले बच्चे बाल श्रमिकों की संख्या में 3.15 प्रतिशत का अनुमान लगाया गया। यह एक गंभीर चिंता का विषय है कि कृषि क्षेत्र में व्यवसायिकरण के दौर में बाल श्रम लाइलाज बीमारी का रूप ले रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह एक भयावह स्थिति है। भारत 2001 की जनगणना के अनुसार एक करोड़ छब्बीस लाख से ज्यादा बाल श्रमिक थे। यह आंकड़ा 2011 की जनगणना में बढ़ा ही है। पूरी दुनिया में 14 साल से कम आयु के बाल श्रमिकों की संख्या अपने देश में सबसे ज्यादा है, जिनमें लगभग सवा करोड़ बच्चे खतरनाक उद्योगों में काम कर रहे हैं। हालांकि संविधान में बाल श्रम पर रोक है और 6-14 आयु वर्ग के बच्चों के लिए अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की श्रम विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2012 में बताया गया है कि 5-17 वर्ष की आयु वर्ग के 570000 बच्चे भारत, पाकिस्तान, नेपाल आदि देशों में गलीचा उद्योगों में कार्यरत हैं और भारत में 21 उद्योगों में बीड़ी उद्योग, पीतल उद्योग, ईंट-भट्टों पर, गलीचा उद्योग, हाईब्रीड सूती उद्योग, टेक्सटाइल उद्योग, फायर वक्र्स, फुट वीयर, जैम, कांच की चूडिय़ां, अगरबती, चमड़े का सामान, ताला, माचिस उद्योग, चावल रेशम उद्योग, फैब्रिक्स, स्टोन निर्माण उद्योगों में बाल श्रमिक कार्यरत हैं। सरकार यह बात समझने को तैयार ही नहीं है कि असंगठित क्षेत्रों में बच्चों को बहुत कम पैसा देकर अधिक-से-अधिक काम कराया जाता है, उसके काम के घंटे निर्धारित ही नहीं है। इससे गरीबी घटती नहीं है, बल्कि बढ़ती है। कोई नियम कानून न होने के कारण दलित, पिछड़े अल्पसंख्यक वर्गों से आने वाले गरीब बच्चों शोषण के ज्यादा शिकार होते हैं। दिन प्रतिदिन छोटे-छोटे बच्चों को ढाबों, वर्कशॉपों, खेतों कारखानों आदि में काम करते देखा जा सकता है। उनके शोषण की कहानियां मीडिया, समाचार पत्रों में आती रहती है। अभी सितंबर, 2012 में समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था कि दिल्ली में सुभाष प्लेस में एक रिटायर्ड जज के घर में एक 13 वर्ष की नौकरानी मृत पाई गई थी। नौकरानी पूनम उनके घर में झाड़ू-चौके का काम करती थी। अफसोस इस बात की है कि कानून के रक्षक ही कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं (नेशनल दुनिया 19/9/2012)। हमारा समाज और हमारी सरकारें आजादी के इतने वर्षों बाद भी मासूम बच्चों के शोषण को रोकने में नाकामयाब रही हैं। यह क्यों भुलाया जा रहा है कि राष्ट्रीय/ अंतर्राष्ट्री स्तर पर घोषित अनेक चमचमाती योजनाओं के बावजूद भी आज हमारे देश में बेहद गरीबी और अभाव के साये में बच्चे जन्म ले रहे हैं। बच्चे अनेक रोगों से ग्रस्त होने के अतिरिक्त अपने बचपन में ही बाल मजदूरी करने को विवश हैं।

31-01-2016

संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय बाल कल्याण संगठन (यूनिसेफ ) ने सन् 1989 में विश्व भर में विशेष कर तीसरी दुनिया के देशों में बच्चों की स्थिति के बारे में एक सर्वेक्षण करवाया था, जिसकी रिपोर्ट में जो बातें कही गई हैं वे बाल कल्याण कार्यक्रम के बारे में चौंकाने वाली हैं। उस रिपोर्ट को भारत में जारी करते हुए स्वीकार किया गया था कि विकासशील देशों के ज्यादातर क्षेत्र आर्थिक दबावों के कारण बेहद गरीबी की ओर अग्रसर हैं और इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ा है। इसी कारण बच्चे कुपोषण, भूखमरी और संक्रामक रोगों से ग्रस्त हैं। प्रति वर्ष लगभग पांच लाख बच्चे पौष्टिक आहार न मिलने के कारण अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। नवजात शिशुओं की मृत्यु दर तो इससे भी अधिक चौकाने वाली है। इस बारे में यूनिसेफ के निदेशक जेम्स ग्रांट ने जो तथ्य दिए हैं वे बेहद चौकाने वाले तथा चिन्ताजनक हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि विश्व भर में विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों में बच्चों की स्थिति के बारे में बाल कल्याण कार्यक्रम असंतोषजनक हैं। भारत में जारी की गई इस रिपोर्ट में बच्चों को उनके बाल्यकाल में ही आ रही मारक कठिनाइयों का उल्लेख किया गया है। विश्व के मुकाबले एक तिहाई बाल मृत्यु भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में होती हैं। भारत में बच्चों की कुल आबादी विश्व में सबसे ज्यादा करीब 31 करोड़ बताई जाती है। इस प्रकार भारत में विभिन्न रोगों से मरने वाले या अपंग होने वाले बच्चों की संख्या भी अन्य देशों की अपेक्षा अधिक है। जन्म के साथ ही अनेक चिंताओं का जन्म ले लेना, तन पर कपड़ा न होना, खाने को संतुलित आहार का न मिलना, इलाज के लिए पैसा न होना, आखिर क्या भविष्य होगा ऐसे बच्चों का? रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रति वर्ष चालीस लाख बच्चे अतिसार के कारण शरीर में अचानक होने वाली पानी की कमी से मरते हैं। बीमारी के कारण शरीर में पानी की कमी से जल्दी ही बच्चे का वजन दस प्रतिशत घट जाता है, ऐसी स्थिति में कुछ ही घंटों में बच्चे की मौत हो जाती है। अब तक शरीर में पानी की कमी को दूर करने के लिए ग्लूकोज चढ़ाना ही एकमात्र उपाय था, जो दूर-दराज के गांवों और छोटे कस्बों में उपलब्ध नहीं है। सरकार को अतिसार और पानी की कमी से होने वाली मौतों को कारगर उपायों द्वारा रोकना चाहिए। राष्ट्रों या परिवार स्वीकार्य और सर्वेक्षण 2009 की रिपोर्ट के अनुसार देश में 5 साल से कम आयु के 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और 43 प्रतिशत बच्चों का वजन सामान्य से काफी कम है। भारत में छोटे बच्चों में कुपोषण की दर कई अफ्रीकी देशों से भी अधिक है। कुपोषण के कारण बच्चे अधिक बीमार होते हैं, वे शारीरिक एवं मानसिक विकास की कमी से जूझते रहते हैं। बच्चों में भूख से उत्पन्न कुपोषण खून की कमी हैजा, वायरल, निमोनिया, डायरिया और लीवर को कमजोर बना देने वाले रोग उत्पन्न कर देते हैं। देश में तीन वर्ष तक की आयु का हर बच्चा कुपोषित है, यह आंकड़ा चीन से 10 गुना अधिक है। सर्वेक्षण के अनुसार 56 प्रतिशत महिलाओं में किसी-न-किसी प्रकार की, खून की कमी है। यूपीए सरकार में महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री रह चुकीं कृष्णा तीरथ ने राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि 15-49 आयु वर्ग की हिन्दू और मुस्लिम महिला ऊर्जा की दीर्घकालीन कमी से पीडि़त हैं, खून की कमी से पीडि़त इन महिलाओं में 55.9 प्रतिशत हिन्दू महिलाएं तथा 54.7 प्रतिशत मुस्लिम महिलाएं हैं। गौरतलब है कि खून की कमी से एनीमिया नामक बीमारी होती है। जिसके परिणामस्वरूप गर्भावस्था में 20 प्रतिशत समय पूर्व शिशुओं के जन्म दर में तीन गुना तथा प्रसव पूर्व मृत्यु में 9 गुना वृद्धि हो जाती है। स्पष्ट है कि बच्चों में कुपोषण दूर करने के लिये सबसे पहले माताओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा।

बच्चों में लड़कियों की संख्या अधिक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ) के एक अध्ययन के अनुसार 15 करोड़ लड़कियां तथा सात करोड़ लड़के यौन शोषण का शिकार होते हैं। दिल्ली देश की राजधानी होने के बावजूद बच्चों को यौन शोषण से नहीं बचा पाई। एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली, आंध्र प्रदेश, असम तथा बिहार में बच्चों को अन्य प्रकार के शोषणों का भी शिकार होना पड़ रहा है। यौन उत्पीडऩ से पीडि़त बच्चे या तो सड़कों पर रहते हैं या फिर कामकाज कर रहे होते हैं या फिर किसी अनाथालय में पल रहे होते हैं। यह जानकारियां हाल के ही एक सर्वेक्षण में सामने आईं हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों के शोषण की गंभीरता को देखते हुए इसे राष्ट्रीय ऐजेंडे में शामिल किया जाना चाहिये। अध्ययन में कहा गया है कि बच्चों को शोषण से बचाने के लिए सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिएं। यूनिसेफ के सहयोग से हुए इस सर्वेक्षण में चौकाने वाले तथ्य सामने आएं हैं। बताया गया है कि सबसे ज्यादा शोषण के शिकार 5-12 आयु वर्ग के बच्चे हैं। लड़कियों तथा लड़कों के यौन शोषण का खतरा समान रूप से है। लगभग 70 प्रतिशत बच्चों ने अपने साथ हुए यौन शोषण की बात किसी को नहीं बताई। अध्ययन में कहा गया है कि ज्यादातर यौन-शोषण स्कूल के खेल के मैदान में या पार्कों में होते हैं। घर और समाज में होने वाले शोषण को स्वीकारने में सामाजिक लज्जा आड़े आती है। उन्होंने माना कि घरों में लोगों ने उनके साथ बेहद अश्लील संवाद बोलने के साथ ही उनके संवेदनशील अंगों के साथ छेड़छाड़ की है तथा अपने गुप्तागों का भी प्रदर्शन किया और डराने धमकाने के लिये उनकी नंगी तस्वीरें तक खींच लीं। पीडि़त बच्चों का कहना था कि शोषण करने वाला व्यक्ति न केवल जबरन उनका चुम्बन लेता था, बच्चों के संवेदनशील अंगों को सहलाता भी था बल्कि उन्हें अपने अंगों को सहलाने के लिये भी कहता था, इनमें हर 3 में से 2 बच्चों की पिटाई होती थी। 13 राज्यों में शारीरिक रूप से उत्पीडि़त 69 प्रतिशत बच्चों में 54.68 प्रतिशत लड़के तथा शेष लडि़कयां थीं। भारत में सबसे ज्यादा यौन-शोषण के शिकार असम के बच्चे हैं, जहां यह दर 57 प्रतिशत है। उसके बाद राजधानी दिल्ली है जहां यह दर 41 प्रतिशत है।

अभी भी हमारे देश में 10-12 करोड़ बच्चे गरीबी में पनपते हैं। शिक्षा तो दूर उन्हें संतुलित आहार तक नसीब नहीं होता, लगभग 10 करोड़ बच्चें ऐसे हैं, जिन्होंने स्कूल में प्रवेश तक नहीं किया। गरीबी के कारण दशा इतनी बिगड़ चुकी है कि 5वीं कक्षा तक पहुंचने से पहले ही लगभग 50 प्रतिशत बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं, गरीबी के कारण आर्थिक सहायता लेने के लिये इन बच्चों के माता-पिता उन्हें स्कूल में भेजने की बजाय काम-धंधों में लगाना बेहतर समझते हैं। 21वीं सदी में भी इन पर सरकार के प्रयासों के कारण इसमें सफलता भी प्राप्त हुई है और देश में वर्ष 2011 के दौरान शिशु मृत्यु दर में कमी आई है। यह दर प्रति हजार बच्चों पर 47 से घट कर 44 हो गई है। भारत में महापंजीयक द्वारा जारी एस.आर.एस नमूना पंजीकरण प्रणाली के अक्टूबर 2012 के बुलेटिन में ग्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर में तीन बिंदुओं की कमी दिखाई है और यह प्रति 1000 पर 51 से 48 हो गई है। शहरों में यह दर 29 है, जबकि पूर्व में यह दर 31 थी। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा विज्ञप्ति के अनुसार राज्यों की बात करें तो गोवा और मणिपुर में शिशु मृत्यु दर सबसे कम है जो 11 मौतें प्रति हजार हैं। उसके बाद केरल है जहां 12 मौतें प्रति हजार हैं। उसके बाद उत्तर प्रदेश तथा ओडिशा में शिशु मृत्यु दर 57 मौतें प्रति हजार हैं। असम, छतीसगढ़, राजस्थान और मेघालय में शिशु मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत 44 मौतें प्रति हजार से अधिक हैं।

31-01-2016

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार यदि कुपोषण को मिटाने, स्तनपान कराने, टीकाकरण कराने, पूरक आहार दिये जाने पर जोर दिया जाये तो करोड़ों बच्चों को मौत के मुंह से बचाया जा सकता है। अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई ने गरीबों को चिकित्सा सुविधा, साफ पानी और पौष्टिक आहारों से वंचित कर दिया है। सरकारी अस्पतालों में प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण गरीब आदमी स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाता है क्योंकि 5 सितारा अस्पताल या प्राइवेट अस्पताल में गरीबी मजदूर अपना इलाज कराने में असमर्थ हैं। यही कारण है कि देश में कुपोषण तथा महिलाओं और बच्चों में एनीमिया की स्थिति गंभीर है। सन 2011 में ‘सेव द चिल्ड्रन’ नामक संगठन ने कुपोषण एवं भूखमरी के संदर्भ में चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की थी। इससे पूर्व राष्ट्रीय स्वास्थ्य संगठन 2005-06 में जारी रिपोर्ट में यह बताया गया था कि देश में आधे से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सितंबर, 2010 में जारी एक रिपोर्ट- ‘ए फेयर चांस ऑफ लाइफ’ के अनुसार हर साल पैदा होने वाले 2.6 करोड़ बच्चों में से करीब 18 लाख बच्चे पांचवें जन्म दिवस से पहले ही मर जाते हैं और उनमें अधिकतर संख्या उन बच्चों की है जो जन्म के केवल एक माह के बाद मर जाते हैं। यह मां और बच्चों के स्वास्थ्य और कुपोषण के स्पष्ट संकेत हैं।

मानवाधिकार की दुहाई देते विश्व में आज भी करोड़ों की संख्या में मासूमों का बचपन मानसिक रूप से विकृत लोगों द्वारा रौंदा जा रहा है। मुख्यरूप से यौन शोषण का शिकार होने वाले सोलहवीं सदी का साया मंडरा रहा है। कई बार यह देखा गया है कि अपराधियों की गिरफ्त में आकर ये बच्चे खूंखार अपराधों से नाता जोड़ लेते हैं। बच्चों के माता-पिता को छोटी-मोटी रकम देकर नियोजक उन्हें खरीद लेते हैं या फिर बच्चों का अपहरण कर लेते हैं फिर उनको आपराधिक कार्यों में लगा देते हैं, उनके अंग-भंग करके उन्हें भिक्षावृत्ति में लगा देते हैं। इन करोड़ों बच्चों की मुक्ति के लिये न तो भारत का कानून कुछ कर पा रहा है, न समाज की तथाकथित सिविल सोसायटी उनके लिये कुछ कर पा रही है। यह अलग बात है कि देश में बाल श्रम पर प्रतिबंध है और 5-14 वर्ष की आयु वर्ग के लिये अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा का प्रावधान है परन्तु परिणाम शून्य है। दरअसल सरकार ने जब 1986 में कानून बनाया तो उसमें 14 साल तक के बच्चों को उन उद्योगों में काम करने की छूट दे दी गई जो खतरनाक नहीं है। उसका लाभ उठाते हुए ये बच्चे कृषि कार्यों में, बीड़ी या माचिस उद्योग, हौजरी, कालीन उद्योग, मछली पालन चाय बागान, चाय की दुकान, घरेलू कार्यों, संगठित एवं असंगठित कार्यों में बेरोकटोक बाल श्रम करते हैं। सरकार ने 2002 में संविधान में 86वां संशोधन करके शिक्षा को बुनियादी दर्जा दे दिया। 2009 में इन बच्चों को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देने के लिये शिक्षा का अधिकार कानून बनाया। परन्तु तब भी यह नहीं सोचा कि जब बच्चों को उद्योगों में काम करने का अधिकार प्राप्त है तो वे पढ़ेंगे कैसे? तब कुछ संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की जिसमें 6-14 आयु वर्ग के बच्चों को उद्योगों में काम करने के अधिकार की विसंगति को समाप्त करने को कहा गया तथा शिक्षा का अधिकार क्रियान्वित करने के लिये सरकार को निर्देश देने को कहा गया, तब केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने अगस्त 2012 में 14 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे को उद्योगों में, खेतों-खलिहानों, घरेलू काम में किसी भी रूप में नौकरी पर रखने संबंधी एक प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और अब इसके तहत बाल श्रम अधिनियम (निषेध एवं नियम) 1986 में एक संशोधन लाएगी जो कि एक ऐतिहासिक घटना होगी।

श्रीकृष्ण मुदगिल

михаил безлепкин органыfx rating

Leave a Reply

Your email address will not be published.