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सम-विषम की विषमता के जाम में उलझा नया वर्ष

सम-विषम की विषमता के जाम में उलझा नया वर्ष

बेटा: पिताजी।

पिता: हां बेटा।

बेटा: दिल्ली में तो नये वर्ष का उदय ही शस्रस्र (विषम) रहा।

पिता: कैसे?

बेटा: पिताजी, आपको तो पता है कि 2016 का स्वागत तो दिल्ली में बड़ी धूमधाम, बड़े ढोल-धमाके से हुआ। रात को जब घड़ी की सुई ने रात के 12 बजाये तो दिल्ली पटाखों के धमाकों से गूंज उठा था।

पिता: हां बेटा, बड़ा शोर-गुल भी हुआ। मेरी भी नींद खुल गई थी।

बेटा: पिताजी, होटलों में तो खूब जाम छलके। लोग एक-दूसरे के गले लगे। शुभकामनायें भी दीं।

पिता: बेटा, हमने तो अब बहुत सारे मामलों में पाश्चात्य संस्कृति की नकल करनी शुरू कर दी है। वरन हमारे देश में ऐसा कब होता था?

बेटा: पर पिताजी, वैसे तो दस बजे के बाद इतनी रात बीत जाने पर जब आम जनता सो चुकी होती है तो पटाखे फोडऩे पर प्रतिबंध नहीं है?

पिता: बेटा, प्रतिबंध तो है पर जब बड़े लोग ही इसे तोडऩे पर उतर आएं तो बेचारी पुलिस भी क्या करे?

बेटा: पिताजी, फिर दीपावली के शुभ अवसर पर क्यों ऐसा प्रतिबंध लगा दिया जाता है और आदेशों का उल्लंघन करने वालों के विरूद्ध कार्रवाई की जाती है?

पिता: वह बेटा इसलिए कि दीपावली तो सभी मनाते हैं और अंग्रेजी नया वर्ष तो कुछ गिने-चुने धनी लोग ही। जिन्हें अपने पास आये अधिक धन का इस बहाने उपयोग करने का अवसर मिल जाता है और वह आनंदित हो उठते हैं। उन्हें अपने धन-वैभव का प्रदर्शन भी करना होता है। अब तो यह पर्व कम, व्यवसाय अधिक बन चुका है। इस बहाने बड़े-बड़े लोगों से मिलने का बहाना भी हो जाता है।

बेटा: पर पिताजी, वर्ष का उदय तो सम अंक से हुआ पर जनता के लिये विषम से।

पिता: मैं समझा नहीं बेटा।

बेटा: पिताजी, नया साल तो सम अंक का था पर पहली तारीख विषम थी। उस दिन केवल विषम अंक की गाडिय़ां ही चल सकती थीं। जिनकी गाडिय़ों के नंबर सम थे, वह नव वर्ष के दिन पर अपना माथा ठोक कर रह गये। अपने पास गाड़ी होते हुये भी वह बिना गाड़ी के हो गये। बेचारे अपने काम पर गये या तो मेट्रो से या टैक्सी या फिर ऑटो से।

पिता: बेटा, इसका कुछ लाभ तो हुआ।

बेटा: हां पिताजी, केजरीवाल सरकार कहती है कि इसका बहुत लाभ हुआ। प्रदूषण की मात्रा में कमी आई है।

पिता: बेटा, इसमें सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं। दिल्ली सरकार कह रही है कि प्रदूषण कम हुआ है, जबकि अन्य एजेंसियां इसे नकारती हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार इस ऑड-ईवन के ड्रामे से केवल 6-7 प्रतिशत गाडिय़ों पर ही प्रतिबंध का असर पड़ा है।

बेटा: हां, यह तो मैंने भी सुना कि सरकार के बड़े-बड़े अधिकारियों व मंत्रिमंडल के सदस्यों की गाडिय़ों पर कोई प्रतिबंध नहीं है, स्वयं इसके प्रणेता अरविन्द केजरीवाल पर भी नहीं।

पिता: बेटा, यही तो जनतंत्र की खूबी है। पुराने समय में तो राजा भी अपने ही द्वारा लगाये ऐेसे प्रतिबंध का स्वयं भी उतनी ही कड़ाई से पालन करते थे, जितनी उम्मीद वह अपनी जनता से रखते थे।

बेटा: सचमुच ऐसा था पिताजी?

पिता: बिल्कुल, पर स्वतंत्रता के बाद से स्थिति पलट गई है। इंदिरा जी के जमाने तक देश में समाजवाद के नाम पर बहुत शोर मचाया गया। पर अंत में हुआ क्या? अमीर और अमीर होते गये और गरीब और गरीब। यही तो कारण था कि एक व्यंग्य के जरिये कवि ने चुटकी ली थी और कहा कि, ‘समाजवाद’ में ”हम पहले, समाज बाद में’’।

बेटा: इसका मतलब तो यह हुआ कि त्याग तो किया जनता ने, असुविधा व कठिनाई झेली आम आदमी ने और वाहवाही लूटी केजरीवाल जी ने।

पिता: यही तो केजरीवाल जी की खूबी है। चुनाव से पूर्व व बाद में जब वह मुख्यमंत्री बन गये तो बड़ी डींग हांक दी कि वह न गाड़ी लेंगे और न बंगला। बाद में सब कुछ लिया। जब सरकार ने सुरक्षा दी तो उसे भी ठुकरा दिया। पर जब भीड़ में किसी ने उन को चांटा जड़ दिया या उनसे अभद्रता की तो उसके लिये उन्हें केन्द्र सरकार को कोसने का सुअवसर मिल गया। यही हुआ पिछले दिनों जब उनकी ही पार्टी की एक महिला नेत्री ने उन पर काली स्याही फेंकने की हिमाकत कर दी।

बेटा: मतलब केजरी जी को तो राजनीतिक लाभ बटोरना है जैसे भी बटोरा जा सके।

पिता: ऐसे ही राजनेता तो बेटा आजकल के जनतंत्र में सफल रहते हैं।

बेटा: पिताजी, एक ओर तो हम कहते फिरते हैं कि महिला व पुरूष में पूरी समानता है। दोनों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिये। लेकिन, केजरीवाल सरकार ने महिलाओं द्वारा चलाई जा रही गाडिय़ों को छूट दे रखी थी।

पिता: नहीं बेटा, केजरीवाल जी ने कोई भेदभाव नहीं किया, अपितु समानता का व्यवहार किया।

बेटा: कैसे?

पिता: बेटा, वह ऐसा न करते तो महिलाओं के साथ भेदभाव होता।

बेटा: मुझे तो आपकी बात ही समझ नहीं आ रही है।

पिता: बेटा, यदि वह ऐसा न करते तो केजरीवाल जी की, उनके सहयोगी मंत्रियों व उन सरकारी ऑफिसरों की धर्मपत्नियों के साथ अन्याय हो जाता, क्योंकि अपनी गाडिय़ां होने के बावजूद वह ऑड-ईवन के चक्रव्यूह से बाहर न निकल पातीं और गाडिय़ों के बिना बहुत परेशान होतीं, जबकि उनके पतियों की गाडिय़ों पर ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं था।

बेटा: अब समझ आया पिता जी। केजरीवाल जी बहुत नर्म दिल व समझदार व्यक्ति निकले। उन्होंने केवल अपनी धर्मपत्नी का ही नहीं, सब की धर्मपत्नियों का भी ध्यान रखा। यही कारण है कि महिलाओं का भी उनके प्रति बड़े सौहार्द का भाव है। इसे ही तो केजरीवाल जी सहिष्णुता कहते हैं और उन्होंने अपने कर्म से साबित कर दिया कि वह असहिष्णुता के जानी दुश्मन हैं।

पिता: इस प्रकार उन्होंने यह भी बता दिया कि वह कहते ही नहीं बल्कि कर के भी दिखाते हैं।

बेटा: इस नियम का फायदा तो मेरे एक दोस्त ने भी उठा लिया।

पिता: वह कौन है तुम्हारी महिला दोस्त?

बेटा: पिता जी, आप परेशान न हों। मेरी कोई महिला दोस्त नहीं है।

पिता: तो फिर महिलाओं के लिये दी गई छूट का लाभ तेरे दोस्त ने कैसे उठा लिया?

बेटा: पिताजी, आप मेरे दोस्त मोहन से तो कई बार मिल चुके हैं। वह कितना सुन्दर है। आप भी कई बार कहते हैं कि वह तो लड़कियों की तरह सुन्दर है।

पिता: हां, वह तो है पर हुआ क्या?

बेटा: पिताजी उसे इस ऑड-ईवन के चक्कर से निकल पाने की एक तरकीब सूझी। आपको पता है कि लड़कियां आजकल लड़कों की तरह बाल रखती हैं और यह तो आम बात है। वस्तुत: लड़के और लड़कियों के पहनावे में भी अंतर कम हो गया है। जिस दिन उसकी गाड़ी नहीं चल सकती थी उस दिन वह आंखों में काजल डाल लेता, बालों को भी वह लड़कियों जैसे लुक दे देता, थोड़ी लिपिस्टक लगा लेता, गालों पर थोड़ा पाउडर भी थोप लेता। वैसे तो आजकल लड़कियां चुन्नी नहीं लेती पर अपने आपको लड़की दिखाने के लिये वह या तो अपने सीने पर चुन्नी लपेट लेता या शाल ले लेता। इस प्रकार वह सभी दिन धड़ल्ले से गाड़ी चलाता रहा। बस एक मुश्किल आ रही थी कि वह अपने साथ किसी पुरूष दोस्त को नहीं बिठा सकता था। पर वह अपनी महिला मित्रों के साथ बेधड़क घूमता रहा।

पिता: उसे किसी सिपाही ने पकड़ा नहीं?

बेटा: वह बताता था कि सिपाही उसकी तरफ देखते तो अवश्य थे पर अपनी आंखें नहीं गड़ा पाते थे। उन्हें डर लगता कि यह युवती कहीं शिकायत न कर दे कि सिपाही उसे घूर कर देख रहा था।

पिता: तेरा दोस्त तो बड़ा बदमाश निकला।

बेटा: पिताजी, इसी प्रकार एक और घटना घटी। एक सिपाही ने देखा कि एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति ऑड नंबर की गाड़ी चला रहा था, जबकि उस दिन ऐसे नंबर की गाडिय़ों पर प्रतिबंध था। सिपाही ने सीटी मारी एक बार, दो बार, तीन बार पर वह नहीं रूका। सिपाही को गुस्सा आ गया। उसने अपनी बाइक उठाई और उसके पीछे हो लिया। थोड़ी दूर जाकर उसने अपनी बाइक उसकी गाड़ी के आगे लगा दी और उसे अपनी गाड़ी खड़ा करने पर मजबूर कर दिया। आग-बबूला होकर ड्राइवर की खिड़की के पास जाकर उसने कहा — मैं कितनी दूर व देर से सीटियां बजाता जा रहा हूं पर न आप सुन रहे हैं और न ही रूक रहे हैं। अपना लाईसेंस निकालो। आज आप कैसे इस नम्बर की गाड़ी चला रहे हैं? ड्राइवर ने खिड़की खोलकर अपने हाथ से सिपाही के गाल पर प्यार से चपत लगाते हुये कहा — सीटियां सुनने की क्या यह उम्र है मेरी, बेटा? सिपाही ने पाया कि यह तो एक महिला का हाथ है जिसने पुरूषों की भांति बाल कटवा रखे थे और उन जैसी ही जैकेट पहन रखी थी। खिसियाना होकर सिपाही हंसा और ‘सॉरी’ बोल कर उसने महिला को जाने दिया।

पिता: बेटा, आजकल के हालात में ऐसी घटनायें कोई अनहोनी नहीं हैं।

बेटा: पिताजी, मेरा एक दोस्त अभी अविवाहित है। वह तो कहता है कि यदि यह ऑड-ईवन पॉलिसी चलती रही तो वह किसी भी लड़की से अपना विवाह रचा लेगा जिसके पास ईवन नंबर की गाड़ी होगी। उसकी उम्र, जाति कुछ भी हो या फिर वह तलाकशुदा या विधवा ही क्यों न हो। उसकी अपनी गाड़ी ऑड नम्बर की है।

पिता: बेटा, इस पॉलिसी को चलने दे। ऐसे किस्से कई निकलेंगे।

बेटा: पिताजी, टीवी या अखबारों में तो मैंने देखा कि केजरीवाल जी व उनके सहयोगी साईकिलों पर भी सफर कर रहे थे।

पिता: बेटा, यह तो पब्लिसिटी के चोंचले हैं। यदि वह सब रोज साईकिल से दफ्तर जायें तो उनके नीचे के ऑफिसरों, विधायकों, अन्य कर्मचारियों व हमें अपने आप ही शर्म आ जायेगी और हम भी अपने वाहन छोड़कर पैदल या साईकिलों पर सफर करना शुरू कर देंगे।

बेटा: पिताजी, बात तो आपकी ठीक है।

पिता: बेटा, मुझे याद आया कि 1965 की पाकिस्तान के साथ लड़ाई के समय जब अमेरिकी सरकार ने धमकी दी कि भारत युद्ध विराम कर दे वरन वह हमारे देश को अन्न की अपूर्ति बंद कर देगा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने अमेरिका को दो-टूक जवाब दिया था कि जब तक पाकिस्तान का अतिक्रमण दूर नहीं हो जाता लड़ाई जारी रहेगी और हमें आपके अन्न की जरूरत नहीं है। शास्त्री जी ने देशवासियों से अपील की थी कि देश में अन्न की कमी को दूर करने के लिये वह हर सोमवार शाम को अन्न का सेवन न करें। उनकी अपील का इतना असर हुआ था कि अपने आप ही देश के हर कोने, हर गांव व शहर तथा घर में व्रत रखा जाने लगा। होटलों में भी अन्न से बना भोजन नहीं परोसा जाता था।

बेटा: तब पिता जी सचमुच ऐसा होता था?

पिता: हां बेटा।

बेटा: पिता जी, अपनी ओर से तो सरकार बहुत कुछ कर रही है, अब केजरीवाल सरकार ने हर मास की 22 तारीख को कारमुक्त दिन मनाने का निर्णय लिया है और जनता से अपील की है कि वह महीने में एक दिन सार्वजनिक वाहन से यात्रा करें।

पिता: बेटा, इन चोचलों से कुछ नहीं होगा। प्रदूषण मात्र वाहनों से नहीं होता। वाहनों से प्रदूषण तो एक चौथाई भी नहीं होता। कंक्रीट से बन रहे भवन और निरंतर बढ़ती जनसंख्या भी इसका बड़ा कारण हैं। जनसंख्या के विस्फोट को रोक पाने की हिम्मत किसी राजनेता में नहीं है क्योंकि सब को वोट बटोरने हैं।

बेटा: तो पिता जी, इसका हल?

पिता: राजनीतिज्ञों के बस की तो बात लगती नहीं। यदि कुछ करें तो बस ईश्वर ही वरना कुछ नहीं हो सकता।

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