ब्रेकिंग न्यूज़ 

‘पठानकोट’ का ड्रग कनेक्शन नशे के साये में पल रहे पंजाब में रुक पाएंगे आतंकी हमले?

‘पठानकोट’ का ड्रग कनेक्शन  नशे के साये में पल रहे पंजाब में रुक पाएंगे आतंकी हमले?

एस.पी. सलविंदर सिंह पहली जनवरी की रात को मजार पर माथा टेकने जा रहे थे, तो उन्हें शायद पता नहीं होगा कि उनके द्वारा अपनाया गया मजार तक जाने वाला रास्ता दिगी स्थित एन.आई.ए. के ‘ग्रिलिंग रुम’ तक जाता है। फिलहाल एन.आई.ए. उनका पॉलीग्राफिक टेस्ट करवाने की बात कर रही है, क्योंकि एस.पी. सलविंदर सिंह के मजार पर माथा टेकने की कहानी पर न तो एन.आई.ए. को भरोसा है न ही उनके वरिष्ठ अधिकारियों को ही उन पर ऐतबार था। यही कारण रहा कि भारत-पाक सीमा को पार करते हुए आसानी से पाकिस्तानी आतंकी अपने गंतव्य, पठानकोट एयरबेस तक पहुंच गए।

सिंह के मजार पर जाने की कहानी पर पुलिस अधिकारियों का भरोसा नहीं करने के पीछे कारण उनकी सेवाकालीन कारगुजारी है। वह गुरदासपुर में बतौर एस.पी. तैनात थे। लेकिन हाल ही में उनका वहां से तबादला इसलिए कर दिया गया कि उनके अंदर काम करने वाली पांच महिला कॉस्टेबलों ने उन पर यौन शोषण करने का आरोप लगाते हुए राज्य के डी.जी.पी. के यहां अपनी शिकायत दर्ज करवा दी। चंडीगढ़ में पदस्थ तत्कालीन आई.जी. गुरप्रीत दियोल ने मामले की जांच की और तत्काल उनके तबादले की अनुशंसा कर दी।

उनकी इस कारगुजारी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पठानकोट हमले के बाद उठे सियासी व प्रशासनिक तूफान के बीच होशियारपुर की एक महिला करनजीत कौर ने वहां के एस.एस.पी. के समक्ष आकर यह आरोप लगाया कि वह एस.पी.सलविंदर की दूसरी पत्नी हैं। एस.एस.पी. तरनप्रीत कौर ने इस संवाददाता से कहा कि वह इस मामले की जांच कर रही हैं।

यहां कहना जरूरी है कि सलविंदर की ‘कारगुजारी कथा’ को पठानकोट आतंकी हमले से जोडऩा शायद किसी को पसंद न आए, लेकिन जब इस त्रासदी पर गौर किया जाये तो लगता है कि अगर सलविंदर सिंह के बारे में उक्त कारगुजारी कथा प्रचलित नहीं होती तो आज यह हमला संभव ही नहीं होता, क्योंकि समय रहते आतंकी को काबू कर लिया जाता। कहना गैरजरूरी है कि इसी कथा के कारण पुलिस अधिकारियों को सलविंदर सिंह की कहानी कि, आतंकियों ने उनका अपहरण कर लिया, पर भरोसा नहीं हुआ। इस बीच कई घंटे बीत गए और आतंकी अपने नापाक मकसद में कामयाब हो गए।

अब एस.पी. सलविंदर के बदलते बयान व मजार तक जाने के लिए उनके द्वारा अपनाये गए रास्ते के बीच एन.आई.ए. को खाई नजर आ रही है और इसलिए एन.आई.ए. उनका पॉलीग्राफ टेस्ट करवाने का सोच रही है। हालांकि यह रास्ता उनकी किंवदंति और एन.आई.ए. की पठानकोट हमले की जांच के बीच ही नहीं सिमट जाता, बल्कि यह तो पंजाब में ड्रग की तस्करी, पाकिस्तानी आर्मी और आतंक के बीच रिश्ते व पंजाब पुलिस तथा राजनेताओं के जटिल मिलीभगत के जाल से भी गुजरता है, जिसमें कभी-कभी पाकिस्तान से ड्रग की खेप की जगह आतंकियों की खेप आ जाती है जो भारतीय संप्रभुता पर चोट पहुंचाने को आमादा है।

यह कहना गैरजरूरी है कि ड्रग तस्करी के हमाम में सभी राजनीतिक पार्टियों के नेता नंगे हैं। इसके चलते कभी अकाली दल के नेताओं पर अंगुली उठती है तो कभी कांग्रेस व भाजपा पर। जालंधर लोकसभा के कांग्रेसी एम.पी. चौधरी संतोख सिंह हों या अकाली नेता व पूर्व जेल मंत्री शर्बन सिंह फिगौर के बेटे दमणवीर सिंह या फिर भाजपा के अध्यक्ष कमल शर्मा, सब पर ड्रग तस्करी में अंगुयिां उठ चुकी हैं। इस मामले में चौधरी संतोख सिंह का नाम तब आया जब तस्करी में कथित रूप से शामिल चुन्नी लाल गाबा के गोराया स्थित कोल्ड स्टोरेज से बरामद डायरी में सांसद का नाम उस सूची में शामिल था, जिसमें गाबा से पैसे लेने वाले लोगों के नाम लिखे थे। इसके चलते संतोख सिंह को ई.डी. की ग्रिलिंग से भी गुजरना पड़ा।

इतना ही नहीं, पंजाब पुलिस ने हिरोइन तस्करी के एक मामले को सुलझाने का दावा किया जिसमें एक कांग्रेसी नेता गुरदेव सिंह कथित रूप से शामिल था। पुलिस ने यह भी दावा किया था कि गुरदेव सिंह पूर्व कांग्रेस एम.एल.ए. सुखपाल सिंह खैरा के बीच गहरा रिश्ता है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कमल शर्मा के पी.ए. जसपाल सिंह पर ड्रग तस्करी में शामिल अमृतपाल सिंह से 10 लाख रुपये रिश्वत लेने के आरोप लगे। हालांकि मामला उजागर होने पर जसपाल सिंह को उसके पद से हटा दिया गया, लेकिन भाजपा के ही कुछ नेताओं ने शर्मा पर पद के दुरुपयोग के आरोप लगाये।

पंजाब में पुलिस व्यवस्था का राजनीतिकरण भी ड्रग तस्करी के उसी रास्ते से गुजरता है, जिस रास्ते ने सलविंदर सिंह को मजार पर माथा टेकने की कहानी गढऩे के लिये मजबूर किया। पंजाब के कुल 27 जिलों में से 24 जिलों में पुलिस कप्तान या तो पंजाब पुलिस सेवा से हैं या भारतीय पुलिस सेवा के प्रोन्नत अधिकारी हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि सूबे में भारतीय पुलिस सेवा से आये अधिकारियों की कमी है।

सूबे के पास आई.पी.एस. अधिकारियों के 172 स्वीकृत पद हैं। इसमें 142 अधिकारी अभी मौजूद हैं। इनमें 52 अधिकारी सीधे भारतीय पुलिस सेवा से हैं और 90 राज्य पुलिस सेवा से प्रोन्नत भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी हैं। हालांकि सीधे भारतीय पुलिस सेवा से आये अधिकारियों की सेवा चंडीगढ़ स्थित पुलिस हेडक्वार्टर में ली जा रही है। इस मामले में अगर बंगाल की स्थिति पर गौर किया जाये, तो लगता है कि राज्य के दो तिहाई जिलों में बतौर पुलिस कप्तान सीधे भारतीय पुलिस सेवा से आये अधिकारी हैं, जबकि सुरक्षा संवेदनशीलता की दृष्टि से पंजाब सूबा बंगाल से ज्यादा संवेदनशील है। क्योंकि यह राज्य आतंकवाद को झेल चुका है और इसके पड़ोस में पाकिस्तान जैसा देश है जहां नॉन स्टेट एक्टर के रूप में आतंकियों की फौज मौजूद है और वहां की आर्मी इस फौज को एक ताकत के रूप में आंकती है।

हालांकि पंजाब में पुलिस व्यवस्था पर राज्य के डिप्टी सी.एम. व गृहमंत्री सुखबीर सिंह बादल सिर्फ इतना कहते हैं कि सीधे भारतीय पुलिस सेवा से आये अधिकारियों की क्षेत्रीय समझ कम है, इसलिए राज्य पुलिस सेवा के अधिकारियों को जिलों में लगाया जाता है।

दूसरी तरफ इसके चलते लोग कहने लगे हैं कि पंजाब पुलिस में कई सलविंदर मौजूद हैं। कुछ दिन पूर्व यह भी खबर आई कि तत्कालीन बठिंडा आई.जी. परमराज सिंह उमरांगल से ड्रग तस्करी के सिलसिले में ई.डी. ने जवाब इसलिए मांगा कि उनके एक ड्रग तस्कर रंजीत सिंह उर्फ राजा कंडोला से घनिष्ठ संबंध की चर्चा थी। हालांकि उमरांगल ने इस बात से इनकार किया था। उमरांगल वर्तमान में लुधियाना के पुलिस कमिश्नर हैं।

सुखबीर सिंह बादल जो भी कहें लेकिन उनका यह तर्कहीन तर्क किसी के गले नहीं उतरता, क्योंकि 6000 करोड़ के सिंथेटिक ड्रग घोटाले में उनके साले व राज्य के राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया का नाम आना और ई.डी. द्वारा इस मामले में उनसे पूछताछ करना तो यह जरूर दर्शाता है कि यहां राजनेता, पुलिस व ड्रग तस्करों में काफी घालमेल है। अब सवाल है कि जब स्थिति इतनी विकट है तो क्या पठानकोट जैसे आतंकी हमले रुक पाएंगे?

पठानकोट से एम. के. प्रमोद

стоматологпосле гигиены зубов нельзя

Leave a Reply

Your email address will not be published.