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लोगों का काम है कहना…

लोगों का काम है कहना…

बहू को दो लड़कियां हो गईं और बेटा एक न हुआ तो सास का बहू को कटाक्ष- ”मुंह झौंसी ठप्पा लगवाकर लाई है लड़कियों का। दो लड़कियां मूसल सी लाकर धर दी हैं हमारी छाती पर’’ लेकिन वही सास अपनी बेटी की चार लड़कियों पर अपना तर्क यों पलटती है, ”औलाद तो बाप से होती है, मेरी बेटी क्या करें?’’ ये पंक्तियां है लेखिका स्वर्ण अनिल की पुस्तक ‘एक जोड़ी आंखें’ की जिसमें लेखिका ने जीवन के कटु सच को कहानियों का रूप देकर समाज के सामने रखा है। हमारे समाज में कुछ रूढिय़ां आज भी पैर जमाए बैठी हैं, लेखिका ने इन विसंगतियों के विरोध में न केवल अपनी आवाज बुलंद की है, बल्कि सक्रिय होकर उन्होंने कहानियों के रूप में इन्हें पेश भी किया है।

PAGE 48-49लेखिका ने अपनी इस पुस्तक में कुल 19 कहानियां पेश की हैं, जो समाज में जड़ जमाए बैठी बुराईयों को बताती हैं। प्रस्तुत कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी आडंबरहीन सीधी-सादी रोजमर्रा की भाषा। इस संग्रह की छोटी-छोटी कहानियां अपने कथ्य को सीधे लक्ष्य करती हुई बढ़ती हैं और बिना विस्तार में दिग्भ्रमित हुए एक सीधी लकीर बनाती खत्म हो जाती हैं। इसलिए इन कहानियों का प्रभाव मन पर गहरे उतरता है। ये छोटे-छोटे आकार की कहानियां मन को छू लेती हैं।

एक जोड़ी आंखें

लेखिका    : स्वर्ण अनिल

प्रकाशक       : प्रतिभा प्रतिष्ठान

मूल्य      : 200 रु.

पृष्ठ    : 160

‘एक जोड़ी आंखें’ पुस्तक की एक कहानी ‘लोग’ युवती मृदुला ‘सर्वगुण संपन्न’ के जीवन की ऐसी त्रासदी सामने रखती है जो सोमेश के बनिया होने और मृदुला के पिता के ब्राह्मण होने से ताल्लुक रखती है, दोनों की चाहत इसलिए धराशायी कर दी जाती है कि ‘लोग क्या कहेंगे’? यानी जात-पात के भंवर में दोनों को अपनी खुशियों का बलिदान करना पड़ता है। लोग इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं हमारे जीवन में कि हम अपनी सहज इच्छाओं को भी इनके डर से जबरदस्ती दबा देते हैं। न खुलकर हंसते हैं और न ही खुलकर रोते हैं। समाज की इस तरह की वृत्तियों का प्रतिरोध साहस और विवेक के साथ ही किया जा सकता है। यही साहस और विवेक पैदा किया मृदुला ने अपनी बेटी में जिसने ‘लोग क्या कहेंगे’ कि, धज्जियां उड़ाकर रख दीं। वह अपनी छोटी बहन से कहती है कि ”लोग तो तब भी मजाक उड़ा रहे थे, जब हम दोनों को बचाने के लिए मां अकेले सबसे जूझने निकली थी, क्या मां ने तब लोगों की सारी बातें सुनी थीं। मां भी तब लोगों के डर से चुपचाप बैठ जाती तो तुम और मैं शराबी बाप और नफरत करने वाले दादा-दादी-बुआओं के बीच पिसकर जिंदा भी रहते या नहीं, इसकी क्या गारंटी है?’’ अपनी बहन को फटकाने वाली ‘मानसी’ का यह कथन लेखिका ‘स्वर्ण अनिल’ के सामाजिक सरोकारों की एक ऐसी तहरीर है, जो भविष्य के समाज की संरचना की बुनियाद रखती है। ये कहानी कई स्तरों पर सामाजिक बदलाव की आधारशिला रखती है।

वहीं दूसरी कहानी ‘सूरज’ नामक बच्चे की। जिसके मन में प्यार के बल पर एक शिक्षिका उम्मीद का पूरा ब्रह्मांड आलोकित कर देती है। किताबों में लिखी बातों को झूठा समझने वाला सूरज प्यार से अपने सिर पर फेरे गए शिक्षिका के हाथ के जरिये जीवन के उस गूढ़ तत्व को आत्मसात कर लेता है, जिसे किताबों में लिखे सच समझा पाने में असमर्थ थे। लेखिका की प्रत्येक कहानी में समाज की कुरीतियों से त्रस्त लोगों का दर्द है। जिससे पढऩे के बाद किसी को भी ये महसूस होगा, जैसे ये सभी घटनाएं हमने कभी न कभी अपने आसपास घटित होते जरुर देखी हैं।

भले ही समाज में आज भी तरह-तरह की कुरीतियां जन्म लेकर पोषित हो रही हैं, लेकिन लेखिका ने इन्हें उखाड़ फेंकने की जो कोशिश की है वह बेहद रचनात्मक है।

 प्रीति ठाकुर

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