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भारतीय उच्च् शिक्षा एक कदम आगे

भारतीय उच्च् शिक्षा एक कदम आगे

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायीकरण के लिये अग्रणी निजीकरण देश में पूरी शिक्षा प्रणाली के लिये खतरा है। निजी क्षेत्रों की मदद से भारत केवल परिणात्मक विकास का ही आनन्द उठा सकता है। गुणवत्ता के बड़े मुद्दों की अनदेखी केवल अपमानजनक नहीं है, बल्कि शिक्षित बेरोजगारी का तेजी से बढऩा भी इसमें शामिल है।

भारत ने स्वतंत्रता के पिछले छह दशकों में एक लंबा सफर तय किया है। स्वतंत्रता के बाद का युग इस बाद का गवाह है कि देश के सभी विकास क्षेत्रों सहित शिक्षा के क्षेत्र में खास तौर पर सामान्य और विशेष रूप से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। समय के अनुसार भारतीय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पिछले छह दशकों में तीन अलग-अलग चरणों की पहचान की जा चुकी है। आजादी के दो दशक के पहले चरण नेहरूवादी अवधि के औद्योगिक विकास और भारतीय उच्च शिक्षा क्षेत्र की औपचारिक स्थापना के लिए अग्रणी देखे गये। उच्च शिक्षा के साथ-साथ विभिन्न सांविधिक निकायों की औपचारिक संरचना और बड़े पैमाने पर इस क्षेत्र के लिए दार्शनिक आधार प्रदान करने के लिए कई आयोजक जाने जाते हैं। जबकि आजादी के बाद के दो दशक परिवर्तन काल और जटिलता के दशकों के रूप में और खास तौर पर आधुनिक दुनिया के लिए मंच तैयार करने के रूप में माने जाते हैं। यहां पर यह ध्यान देने योग्य है कि इस अवधि के दौरान राजनीतिक अस्थिरता शिक्षा सहित सभी विकास क्षेत्रों के लिए कई खतरों का कारण बनी है। समकालीन दो दशक (1990-91, 2010-11) शिक्षा के क्षेत्र के सबसे अस्थिर, प्रगतिशील और शोषित चरण के रूप में मानो जा सकते हैं। इसके आधार पर भारतीय उच्च शिक्षा के लिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण अग्रणी माने जाते है।

यह स्कूल शिक्षा के क्षेत्र की बड़ी सफलता है और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन में हो रही वृद्धि और समकालीन जनसांख्यिकीय लाभांश और उसके प्रबंधन के स्तर को दूसरे राज्यों की तुलना में भारत में पेशेवर और उच्च शिक्षा को प्राप्त करने का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। अब, देश में हुए नये राजनीतिक परिवर्तन के कारण इसके प्रबंधन और प्रशासन में बदलाव की आवश्यकता है।

उच्च शिक्षा में उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण

वक्त के अंतराल के साथ ही नियमित रूप से समाज में बदलाव अनिवार्य है। इस तरह के परिवर्तन कई तरह के कारकों से प्रभावित होते हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण कारक है युद्ध के बाद की अवधि जो कि राजनीतिक-आर्थिक वृद्धि का कारक है। 1991 को उस समय के भारतीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऐसे ही बदलाव के रूप में जाना जाता है। भारतीय उच्च शिक्षा में सर्वोत्तम वृद्धि और विकास का अनुभव विशेष रूप से पिछले दो दशकों में व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्र में हुआ। 1991 के बाद कई पुनरूद्धार सामने आये जैसे कि एआईसीटीई का पुनरूत्थान, शिक्षक शिक्षा के लिए एक वैधानिक निकाय के रूप में एनसीटीई की स्थापना, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता आश्वासन के लिए एनएएसी की स्थापना और इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निजी संस्थानों की भागीदारी।

बहरहाल, पिछले दो दशकों में काफी हद तक उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के साथ परिमाणात्मक वृद्धि और विकास सहित उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों की अधिकता के कारण शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ और दुनिया के अन्य विकसित और विकासशील देशों के साथ-साथ इस क्षेत्र में आये विकास की एक बेहतर तस्वीर नजर आई है। इसके दूसरी तरफ निजी संस्थान मात्र अपने निजी हितों और लाभों के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए संस्थान तो खोल लेते हैं पर उनका इस क्षेत्र में बेहतरी को लेकर कोई खास नजरिया नहीं होता है। जिसके परिणामस्वरूप शिक्षा का स्तर दिन-ब-दिन निचले स्तर पर आता जा रहा है। ऐसे संस्थान आज देश में बहुत अधिक हो गये हैं जो मिलकर शिक्षा के क्षेत्र में खतरा पैदा कर रहे हैं। आज इस तरह के संस्थानों से निपटना विशेष रूप से राज्य सरकार और उनके संबंधित निकायों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यहां ध्यान देने योग्य बात ये है कि सरकार निजी क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने में असमंजस की स्थिति में है, क्योंकि इस तरह के संस्थान उच्च शिक्षा में आंकड़ों के नामांकन में मात्रात्मक वृद्धि को बढ़ाने और मजबूत बनाने की दिशा में योगदान दे रहे हैं। आधुनिक दुनिया की शुरूआत के क्रम में उदारीकरण और वैश्वीकरण के लिए निजीकरण एक मजबूत नीति के रूप में प्रकट हुआ। जिसके कारण सबसे पहली बात तो यह कि आर्थिक विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों का अधिकतम दोहन किया गया, दूसरी बात, बिखरी हुई दुनिया को एक वैश्विक गांव के रूप में एकजुट करने के लिए भी ये एक बेहतर साधन के रूप में सामने आया। इसके विपरीत देश के किसी भी अन्य क्षेत्र में, सामान्य शिक्षा और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, निजीकरण और निजी प्रयासों ने ही बेहतर रूप से प्रभावित किया है।

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान और 12वीं पंचवर्षीय योजना

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (आरयूएसए) ने देश के उच्च शिक्षा के पूरे क्षेत्र को फिर से जीवंत करने के लिए एक बहुप्रतीक्षित योजना बनाई थी। संवैधानिक तौर पर इसका बड़े पैमाने पर विस्तार करते हुए पहली और 12वीं पंचवर्षीय योजना 2007-12 और 2012-17 में उच्च शिक्षा और आरयूएसए के लिए बड़े पैमाने पर पैसा दिया गया था। उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग के साथ-साथ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़े वित्तीय खर्च के लिए भी आरयूएसए ने कार्यक्रम शुरू किया है। आरयूएसए का लक्ष्य 2020 के अंत तक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 30 प्रतिशत जीईआर को प्राप्त करने का है, जबकि 2014 तक 22 प्रतिशत जीईआर प्राप्त किया जा चुका है। निजी क्षेत्र इसलिए भी आगे बढ़कर भागीदारी कर रहे हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि भारत का लक्ष्य 30 प्रतिशत जीईआर प्राप्त करने का है जिसमें 22 प्रतिशत हासिल किया भी जा चुका है। वहीं दूसरी तरफ आरयूएसए भी इस तरह के एनएएसी और राज्य विशिष्ट एनएएसी के रूप में निकायों के माध्यम से गुणवत्ता के साथ-साथ उच्च शिक्षा में निजी भागीदारी के कई पहलुओं पर केंद्रित है।

हालांकि, भारतीय उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नामांकन में वृद्धि विशेष रूप से 11वीं पंचवर्षीय योजना के बाद से प्रति वर्ष औसतन 1 प्रतिशत की तेजी से निरंतर बढ़ी है, लेकिन 2020 तक 30 फीसदी प्राप्त करने का लक्ष्य अभी तक एक मुश्किल लक्ष्य है। भारतीय उच्च शिक्षा दो अलग-अलग दिशाओं में जाती दिखाई देती है। पहली व्यवसायिक और तकनीकी शिक्षा क्षेत्र चरम सीमा की ओर बढ़ता दिखता है। दूसरा प्राथमिक शिक्षा की सफलता से राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के द्वारा सर्वव्यापी माध्यमिक शिक्षा के अंतर्गत उद्देश्य की प्राप्ति हो सके। हाल में आई सरकार का फोकस शिक्षा का रूख इस तरह मोडऩे पर है, कि वो उत्पादन क्षेत्र में अपना सहयोग दे सके ना कि सिर्फ उच्च शिक्षा के द्वारा पढ़े-लिखे बेरोजगारों की फौज खड़़ी हो।

हाल में शिक्षा के क्षेत्र में आये बदलावों के चलते उच्च शिक्षा का व्यवसायीकरण की ओर रूख नजर आ रहा है, हकीकत में दुनिया में पिछले कुछ दशकों में वित्तीय अर्थव्यवस्था ने ज्ञान अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया है। पूर्व में वित्तीय अर्थव्यवस्था को बड़े पैमाने पर देश के ज्ञान रूपी धन को बढ़ावा देने के लिए लगाया गया है। ज्ञानी अर्थव्यवस्था में यह ताकत है कि वह वित्तीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सके और इसे समकालीन विश्व स्वीकार कर चुका है। जब उच्च स्तर का ज्ञान या शिक्षा दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर देता है तो इससे भी ज्ञान और उसके प्रभाव की विभिन्न परतें बनती हैं। व्यावसायिक ज्ञान उच्च स्तर की उपलब्धियां प्रदान करता है और व्यावसायिक या कौशल आधारित ज्ञान, औद्योगिक उत्पादकता के स्तर पर समय की मांग है। कई शोधों, रिपोर्टों और सरकारी दस्तावेजों के माध्यम से पता चला है कि भारतीय व्यावसायिक शिक्षा स्नातकों में से 75 फीसदी पर्याप्त ज्ञान से लैस नहीं है, जबकि रोजगार के लिए संबंधित क्षेत्र में योग्यता की जरूरत होती है। हाल ही में शिक्षा का व्यवसायीकरण सीधे तौर पर भारतीय जनसांख्यिकी की क्षमता का नेतृत्व कर सकता है, उत्पादक आबादी का योगदान प्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रीय विकास के लिए होगा। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों की आई बाढ़ के कारण जो शिक्षा प्रदान की जा रही है उसमें तुरंत बदलाव की आवश्यकता है। केवल आईटी और इंजीनियरिंग संबंधी शिक्षा से काम नहीं चलेगा बल्कि, रोजगारोन्मुखी और कौशल आधारित शिक्षा की जरूरत है।


किट’ के साथ– सबका विकास


14-02-2016

किट यूनिवर्सिटी भुवनेश्वर, ओडिशा, में उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा का शानदार माहौल है। इसी मुद्दे पर उदय इंडिया ने बात की किट यूनिवर्सिटी के संस्थापक डॉ. अच्युत सामंता से। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

 

उदारीकरण के बाद से भारत में उच्च शिक्षा के सामने क्या-क्या चुनौतियां आईं हैं?

देश में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणों से भरे लोगों का अभाव है। इसका सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) चीन के 20 प्रतिशत की तुलना में महज 11 प्रतिशत है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका का 83 फीसदी और दक्षिण कोरिया का 91 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है भारत की तुलना में, चीन में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या दोगुनी है। सकल नामांकन अनुपात में उच्च शिक्षा बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिये संस्थानों की संख्या, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त रुप से बढ़ानी होगी और इसके परिणामस्वरूप शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षकों की भी पर्याप्त संख्या में आवश्यकता होगी।

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के शासन में बहुत परिवर्तन किया जाना जरुरी है। हमारे 90 प्रतिशत कॉलेजों में बुनियादी सुविधाएं और गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक पद्धतियां सहित विभिन्न गुणवत्ता के मानक औसत से भी नीचे हैं। कुलपतियों की नियुक्ति सहित विश्वविद्यालय में हो रही अन्य नियुक्तियों का तेजी से राजनीतिकरण किया जा रहा है।

भारतीय छात्र पढ़ाई के लिये विदेश जाना क्यों पसंद करते हैं?

भारत देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे होनहार अर्थव्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। हायर एजुकेशन की वजह से भारत विश्व अर्थव्यवस्था में लाभ की स्थिति में है जो कि कुशल मानव संसाधन, विदेश में काम करने वाले शोधकर्ता के रुप में स्पष्ट है, लेकिन हम इसका पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि बेरोजगारी, अशिक्षा और गरीबी की वजह से देश के मानव संसाधनों की क्षमता का उचित इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं।

उच्चतर शिक्षा आम तौर पर उत्पादकता बढ़ाने के साथ ही व्यक्तियों और समाज को समृद्ध बनाने में काफी हद तक योगदान देती है, इसके अलावा इन्हें अधिक वेतन पाने की आशा होती है। बहरहाल, यह सुविधा भारत के विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से पास-आउट हमारे प्रतिभाशाली छात्रों के काम नहीं आती है और वे बेहतर आजीविका और जिंदगी के लिए विदेश जाना पसंद करते हैं।

आपका विश्वविद्यालय इस प्रवृत्ति को दूर करने के लिए क्या कर रहा है?

केआईआईटी विश्वविद्यालय ने शुरू से ही सही व सावधानीपूर्वक योजना बनाकर और प्रशासन के माध्यम से इन मुद्दों को व्यवस्थित किया है। विश्वविद्यालय में उत्कृष्ट शैक्षणिक माहौल है जो छात्रों को कठोरता से सीखने की प्रेरणा देता है। हम निरंतर देश के भीतर और बाहर उद्योग और व्यापार जगत में चल रही गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगातार कोशिश, संशोधित करने के साथ ही दोनों पाठ्यक्रमों और शिक्षा शास्त्रों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुकूल बनाते रहते हैं। केआईआईटी विश्वविद्यालय अपने छात्रों और 160 से अधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के साथ छात्र और संकाय के माध्यम से ज्ञान का आदान-प्रदान करने के साथ ही वैश्विक सांस्कृतिक संवेदनशीलता के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देता है।

हम बहुतायत में प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों, सेमिनारों, कार्यशालाओं, गोष्ठियां का आयोजन करते हैं। नोबेल पुरस्कार विजेताओं के व्याख्यान, और अन्य विद्वानों के व्याख्यान का आयोजन करते हैं। यह हमारे छात्रों को बड़ा वैश्विक जोखिम उठाने और ज्ञान हस्तांतरण करने का अवसर देता है। हमारे संकाय कुलाधिपति और कुुलपति उच्चतर शैक्षिक गुणवत्ता को हासिल किये हुए हैं, और अन्य महत्वपूर्ण शैक्षणिक पदों पर अत्याधिक योग्य शिक्षाविदों की नियुक्ती की गई है। हमारे छात्र अनुकूल नीति से प्रेरित है और यह अच्छी तरह से परिसर में उन्हें अनुशासित रहने में मदद करता है। स्थापना के बाद से ही केआईआईटी विश्वविद्यालय अपने सभी पास आउट छात्रों के लिए सौ फीसदी कैंपस प्लेसमेंट सुरक्षित करने में सक्षम हो गया है।

सामान्य उच्च शिक्षा की बजाय पेशेवर और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालय क्यों ज्यादा हैं?

उच्च शिक्षा की डिग्री हासिल करने के बाद का पहला लक्ष्य गुणवत्तापूर्ण रोजगार होता है। तो, व्यावसायिक शिक्षा किसी भी उच्च विद्यालय पासिंग आउट छात्रों की पहली पसंद बनी हुई है। अच्छी खबर यह है कि वैश्वीकरण के उद्भव के साथ ही भारतीय सेवा क्षेत्र में तेजी से विस्तार हो रहा है और आज यह उच्च शिक्षा पाने वालों को सबसे ज्यादा रोजगार देता है। इससे पहले, बहुसंख्यक छात्र इंजीनियरिंग और मेडिकल में जाने के लिए तड़पते रहते थे। आज के छात्र कई नए व्यवसायों की तरफ देख रहे हैं। निजी शिक्षण संस्थान स्ववित्त पोषित हैं और इसलिए आत्मनिर्भर हैं। व्यावसायिक शिक्षा ने छात्रों को अच्छी नौकरी का आश्वासन दिया है, इसलिए वे पेशेवर क्षेत्र की उच्च शिक्षा में निवेश करने से परहेज नहीं करते।



योग हमारे शिक्षा तंत्र का हिस्सा होना चाहिए’’


14-02-2016

एच. आर. नागेन्द्र, स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान विश्वविद्यालय, बेंगलुरू, कर्नाटक, के निदेशक हैं। ये दुनिया का एक प्रमुख योग अनुसंधान विश्वविद्यालय है। एच. आर. नागेन्द्र जी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के योग गुरु हैं। उदय इंडिया के समाचार संपादक अशोक कुमार से हुई बातचीत के प्रमुख अंश:

योग को कैसे लोगों तक पहुंचा सकते हैं और मानव समाज के लिए क्या लाभदायक है?

दुनिया की संस्कृति और विचारों को भारत का जो सबसे बड़ा योगदान मिला है वह योग का है, और यह हमारी संास्कृतिक विरासत है। इससे पहले बहुत ही धीमी गति से दुनिया योग के विभिन्न तरीकों को अपनाते हुए आगे बढ़ रही थी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संगठन में योग पर मोदी के अद्भुत भाषण के बाद से दुनिया भर के लोगों के बीच में योग के प्रति धारणा बदल गई है। नरेन्द्र मोदी के उस भाषण के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में 177 देशों ने योग को अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मंजूरी दी, जो यूएनओ के रिकॉर्ड में एक ऐतिहासिक दिन था। प्रधानमंत्री मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के जरिये पूरी दुनिया में योग को पहुंचाने के लिए काफी उत्साहित हैं। इसके जरिये भारतीय संस्कृति के महत्व को दुनिया के बड़े-बड़े देशों तक पहुंचाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने स्वास्थ्य मंत्रालय को विभाजित करके, एक नये आयुष मंत्रालय का निर्माण किया है, यह नया मंत्रालय योग और आयुर्वेद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

मोदी जी ने मंत्रालय की स्थापना के बाद एक बार मुझे फोन किया और कहा कि योग दिवस कार्यक्रम न केवल एक सरकारी कार्यक्रम है, बल्कि यह प्रत्येक भारतीय नागरिक का भी कार्यक्रम है। ये हमारा सौभाग्य रहा कि योग के एक ही मंच पर विभिन्न देशों के योग गुरूओं को लाने में सभी ने हमारी मदद की। योग का सार केवल आसनों तक ही सीमित नहीं है, अपितु ये प्रार्थना, संकल्प, प्रणायम का समावेश है। योग- भक्ति योग, कर्म योग और ज्ञान योग के लिए एक संपूर्ण दृष्टिकोण है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने मनुष्य की भलाई के लिए गढ़ा था। यूनेस्को के मुताबिक पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस अपने आप में इस तरह की सबसे बड़ी घटना थी। योग हमारी शिक्षा प्रणाली का एक हिस्सा होना चाहिए। ये सिर्फ सूचनात्मक नहीं होनी चाहिए, बल्कि ये व्यवहारिक होना चाहिए। जिससे बच्चों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव तो आयेगा ही, साथ ही नैतिक रूप से भी उन्हें बढ़ावा मिलेगा।

क्या भारत को विश्व गुरू बनने में योग का भी योगदान रहेगा?

भारत विश्व गुरू के रूप में उभर कर सामने आयेगा। हमारी मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी शैक्षिक नीति को ध्यान में रखते हुए भारत के प्रत्येक संस्थान और नागरिकों तक योग को पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। एनसीईआरटी पहले से ही योग पर तीन किताबों को प्रकाशित कर चुकी है, उनके इस कदम का स्वागत है। सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है योग को सबके सम्मुख लाने की। हमारे देश को बढ़ावा देने के लिए ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बड़ा प्रयास है, उनके इन प्रयासों के लिए हम उनका धन्यवाद करते हैं। शुरूआत में जब स्थिति उनके हिसाब से तेज गति से नहीं बढ़ पा रही थी, तो उन्होंने तैयारियों में तेजी लाने के लिए कैबिनेट सचिव को बुलाया और इसी तरह से उन्होंने दुनिया के स्तर पर लोगों को एकजुट करने के लिए विदेश मंत्री को भी बुलाया, ताकि कार्य को तेजी से शुरू किया जा सके। हम सभी के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी ‘सामान्य प्रोटोकॉल’ विकसित करने की, इसके लिए हमने विभिन्न योग गुरूओं से सलाह ली। उनके सुझाव के बाद हमने योग के सामान्य अभ्यास शुरू किये, ताकि विदेशी जो योग कि सही पद्धतियों को नहीं जानते हैं वे भी इसे आसानी से कर सकें। योग को आसान बनाने के लिए इसमें विस्तृत रूप से अलग-अलग आसनों, प्रणायमों, ध्यान, इत्यादि को शामिल किया। हमने अपने पारंपरिक ग्रंथों की भी सहायता ली। सभी के विचार-विमर्श के आधार पर हमने विभिन्न घटकों से जुड़े 35 मिनट के कार्यक्रम का एक सामान्य प्रोटोकॉल विकसित किया। हाल ही में करीब 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालय हमारा समर्थन करने के लिए आगे आये हैं, जिससे लाखों छात्रों की हमें मदद मिलेगी, और साथ ही हमारी युवा पीढ़ी में स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता भी आयेगी। भारत में बहुत से अच्छे योग प्रशिक्षक मौजूद हैं, वह योग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने में मदद कर रहे है। सरकार को योग को बढ़ावा देने के लिए लोगों को बुनियादी शिक्षण देने की जरूरत है। विश्व के किसी भी कोने में बसने वाले योग का लाभ उठा सकते हैं, अगर वे भारतीय संस्कृति का पालन करें।

योग का अभ्यास आपको ईश्वर की ओर ले जाने में मदद करता है, योग आपको अपनी शुद्ध चेतना के लिए करना चाहिये। लोग इसे मोक्ष वेदांत, मोक्ष भी कहते हैं जिसका अर्थ होता है अनंत स्वतंत्रता, सभी तरह के तनावों से मुक्ति, बीमारियों से मुक्ति, मन के बंधनों सहित भावनाओं के बंधनों से मुक्ति। एक उदाहरणस्वरूप- जब आप प्रात: काल उठते हैं तब से लेकर जब तक रात को बिस्तर पर सोने जाते हैं तब तक कुछ न कुछ सोचते ही रहते हैं। यही बंधन है, यही गुलामी है, क्या आप अपने दिमाग को कुछ समय शांत रहने के लिए कह सकते हैं? दिमाग कभी शांत नहीं रह सकता। यही तो गुलामी है जिसमें हम सभी जकड़े हुए हैं। योग आपको और आपके दिमाग को शांत रहना सिखाता है। क्या कभी आपने ऐसा करके देखा है? 10 मिनट, 15 मिनट, एक घंटे, दो घंटे या फिर आप जितना वक्त चाहें उतनी देर योग करें। आप देखेंगे कि एक योगी जैसी चेतना आप में भी जागृत हो रही है।

आपको ऐसा क्यों लगता है कि योग को उच्च शिक्षा में शामिल करना चाहिये? आजादी के 69 सालों के बाद भी 40 फीसदी भारतीय बच्चे बुनियादी शिक्षा की कमी की वजह से अनपढ़ है। ऐसे वक्त में योग कैसे लोगों की मदद करेगा? क्या ऐसे वक्त में भी योग आपको एक पा्रसंगिक मुद्दा लगता है? सरकार का इस पर क्या नजरिया है?

सबसे पहले तो हमें गुरूकुल और ब्रिटिश शिक्षा के बीच का जो अंतर है उसे समझने की आवश्यकता है। समग्र दृष्टिकोण से देखें तो वर्तमान शिक्षा पद्धति में बौद्धिक शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। बावजूद इसके हम गणित, विज्ञान और दूसरे विषयों को पढ़ते हैं, लेकिन एक अच्छा व्यक्तित्व तैयार करने की क्षमता हमारी शिक्षा प्रणाली से लुप्त हो चुका है। योग के माध्यम से हम अपनी इन क्षमताओं को पुन:जीवित करें यही हमारा उद्देश्य है।

आज के विद्यार्थी कला, वाणिज्य और विज्ञान जैसे विषयों में रूचि रखते हैं, ऐसे में क्या आप वास्तव में योग जैसा पाठयक्रम शुरू करना चाहते हैं?

अगर हम भारत की उच्च शिक्षा के परिदृश्य की वैश्विक मानक शिक्षा के साथ तुलना करें तो यह 100वें स्थान पर भी नहीं आती है। पश्चिमी देशों के साथ बुनियादी सुविधाओं और संसाधनों का हमारी शैक्षिक संस्थानों के बीच कोई तुलना नहीं है। हम जानते हैं कि भारत अपने संसाधनों को अमेरिका और चीन की तरह शिक्षा पर खर्च नहीं कर सकता। यही कुछ कमियां हैं हमारी शिक्षा पद्धति में। उनकी शैक्षिक नीतियां वैज्ञानिक विकास के नजरिये से बनाई गई हैं, लेकिन ये भी सत्य है कि इस तरह की शिक्षा पद्धति के कुछ बुरे परिणाम भी सामने आते हैं जैसे- तनाव, स्वास्थ्य विकार आदि। इसके अलावा मनुष्य जीवन के मूल्य ही खत्म होते जा रहे हैं। योग एक उपयुक्त ब्रह्मांड के निर्माण में मदद करेगा।

जैसा कि आप जानते हैं कि, भारत आज ज्यादातर भ्रष्टाचार, घोटालों और दूसरी तरह की कई अन्य कमजोरियों से पीडि़त है, यह सब कुछ नैतिकता और अच्छे चरित्र की कमी से ही हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि भारत इस तरह की समस्याओं से तभी छुटकारा पा सकता है, जब योग की सही शिक्षा लोगों को दी जाये, इसमें कोई शक नहीं है। भारत देश को बचाने के लिये समर्पित देशभक्त युवाओं को तैयार करने की जरूरत है। हमें पश्चिमी देशों और देश की जो सबसे मूल्यवान शिक्षा नीतियां हैं उनका संयोजन भारत के लिये करना होगा। अब सवाल ये उठता है कि पश्चिमी देशों से क्या अच्छा मिल सकता है? वे हमें आधुनिक विज्ञान का ज्ञान देंगे और हम अध्ययन में चेतना की अवधारणा को प्रदान करेंगे। हम सिद्धातों की बजाय व्यवहारिक ज्ञान पर अधिक ध्यान देंगे, जिससे विद्यार्थियों की स्मृति शक्ति में भी वृद्धि होगी। मेक इन इंडिया की सफलता बिना किसी शक के सुरक्षित है। हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को ही देखिये, उन्होंने कैसे इतनी सारी मिसाइलें विकसित कीं? उन्होंने कभी प्रमाण-पत्र तक की परवाह नहीं की, उन्होंने हमेशा ज्ञान अर्जित करने की कोशिश की, रचनात्मक ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की। लेकिन, मेरे मामले में ही ले लीजिये मैं एक मैकेनिकल इंजीनियर हूं, लेकिन एक मोटरसाइकिल की समस्या को हल करने में भी सक्षम नहीं हूं। भारत में रचनात्मक विचारों को कभी भी बढ़ावा नहीं दिया गया। हमें अपना दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है, उसके बाद ही दुनिया का नेतृत्व कर सकते हैं।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय हर साल, विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में शोधकर्ताओं के लिये एक बड़े बजट का आवंटन करता है, बावजूद इसके परिणाम कुछ नजर नहीं आते। योग को बढ़ावा देने के लिये सरकार का बजट क्या है? योग को और अधिक अनुसंधान और काम की जरूरत है, सरकार योग के साथ इसे कैसे साकार करेगी?

हमें अनुसंधान करने से पहले अनुसंधान का संचालन करना सीख लेना चाहिए। ये मैं हमेशा से कहता आ रहा हूं। योग इस मामले में मदद करेगा और अगर बात करें योग में अनुसंधान करने की, तो सरकार इस पर काम कर रही है। इस नेक काम के लिये कई विद्वानों को आगे आने की आवश्यकता है।

सरकार औपचारिक रूप से योग के पाठ्यक्रम की घोषणा कब करेगी?

पहला योग विश्वविद्यालय 1998 में शुरू किया गया था। हमारे विश्वविद्यालय पहले से ही पूरी तरह से योग समर्पित विश्वविद्यालय हैं। हमारे विश्वविद्यालयों में इस पाठ्यक्रम की मास्टर डिग्री, डॉक्टरेट डिग्री समेत सभी डिग्रियां उपलब्ध हैं। ऐसे में योग न सिर्फ भारत के लोगों तक, बल्कि संपूर्ण विश्व के लोगों तक पहुंचेगा।


उच्च शिक्षा के समकालीन राजनैतिक अर्थव्यवस्था

भारतीय राजनीति ने पिछले एक दशक में अपने मजबूत स्थायित्व का परिचय दिया, जब 2014 में यूपीए को हरा कर एनडीए को पूर्ण बहुमत मिला, इससे हमारी पिछली सरकारों की राजनीतिक स्थायित्व का पता चलता है। इस तरह की राजनीतिक स्थिरता एक पूरे दशक में पिछले तीन दशकों के लंबे अर्से के बाद देखी गई है, जो कि सामान्य और उच्च शिक्षा के क्षेत्र केकई मजबूत निर्णयों और नीतियों से संबंधित परिणाम है। कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत पहलों को शिक्षा के क्षेत्र में देखा भी जा सकता हैं। खासतौर पर 10वीं, 11वीं और 12 पंचवर्षीय योजना के माध्यम से सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए), राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान (2008-09),शिक्षा का अधिकार (2009), मिड-डे मील प्रोग्राम के सदर्भ में इस क्षेत्र में लगातार भारी वित्तीय आवंटन भी किया जा रहा है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजी डिम्ड विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (2005-06), राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान (2012-13) की पहल के साथ ही 11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत पिछले एक दश में भारत सरकार की तरफ से अलग से भारी वित्तीय आवंटन किया गया है। पिछले दशक में भारत सरकार द्वारा अब तक विकास और विकास के लिए बनाई गई नीतियों द्वारा प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में लगभग 100 प्रतिशत जीईआर के साथ ही 22 प्रतिशत उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जीईआर हासिल किया है।

जैसा की हम सभी जानते हैं कि देश में हर राजनीतिक पारी में होने वाले वांछनीय परिवर्तन विभिन्न सामाजिक-आर्थिक उन्मुखीकरण के साथ आते हैं। वर्तमान सरकार भी सामान्य रूप से अन्य क्षेत्रों के विकास के लिए और आर्थिक विकास की ओर उन्मुख दिखाई दे रही है।


हमारी कोशिश भारतीय शिक्षा के जगमगाते दिनों को वापस लाने की है


14-02-2016

लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा का बेहतर माहौल है। इसी मुद्दे पर उदय इंडिया ने बात की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के निदेशक अशोक मित्तल से। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

उदारीकरण के बाद से भारत में उच्च शिक्षा के सामने क्या-क्या चुनौतियां आईं हैं?

निस्संदेह, भारतीय शिक्षा प्रणाली एडमिशन के मामले में चीन और अमेरिका के बाद दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है। इन तीन सबसे महत्वपूर्ण उपायों उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण- को भारत सरकार द्वारा अपनाने के कारण भारत में उच्च शिक्षा को बढ़ावा मिला है। हालांकि, अभी भी भारत में उच्च शिक्षा को अपने स्तर तक पहुंचने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसका प्रभाव इन विभिन्न कारकों को अच्छी तरह से उच्च शिक्षा प्रणाली के लिये काम करने के संदर्भ के तौर पर देखा जा सकता है। पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार शिक्षा प्रणाली पर अपने कठोर नियंत्रण को ढीला नहीं करना चाहती है, जिसके कारण यह जटिल प्रणाली बनी हुई है। यह जटिलता (विशेष रुप से) केंद्र और राज्य दोनों के स्तरों पर मौजूद है। सरकार के कम योगदान और शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय के रुझान को कम करने के कारण, भारतीय शिक्षा प्रणाली का विकास बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। पहले, सरकार आज होने वाले खर्च से 3-4 गुना ज्यादा खर्च करने की सिफारिश करती थी। इसके अलावा, शिक्षा-उद्योग की दृढ़ता में चूक है और यह आवश्यक कुशल मानव संसाधन को उद्योग विहीन बना रही है। ढांचागत और अन्य सुविधाएं भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान कार्य को आगे ले जाने के लिए फायदेमंद नहीं हैं।

भारतीय छात्र पढ़ाई के लिये विदेश जाना क्यों पसंद करते हैं?

आज के भारतीय छात्रों में से अधिकांश, प्रगतिशील, रचनात्मक और उन्नति की हर बात से वाकिफ हैं। वे अपने भविष्य के अध्ययन के लिए निर्णय लेते हैं और योजनाएं बनाकर विदेश जाना पसंद करते हैं। मुमकिन है कि छात्रों को अपने करियर के विकास के लिए देश में अवसर न मिलने की चिंता सता रही हो। इसके अलावा, विदेशी शिक्षा संस्थानों के कार्यक्रमों और विभागों को अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है, और वहां पढ़ाई के लिये बेहतर सुविधाएं और अनुसंधान के लिये अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं हैं। जब मेधावी छात्र भारत में एक उच्च डिग्री के लिए अध्ययन करने के केंद्र तलाशते हैं तो वे कुछ ही शीर्ष गुणवत्ता वाले कार्यक्रमों और संस्थाओं को पाते हैं।

आपका विश्वविद्यालय इस प्रवृत्ति को दूर करने के लिए क्या कर रहा है?

20 वीं सदी के अंतिम चरण में, भारत के तक्षशिला, विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालय की तरह दुनिया में कहीं भी कोई विश्वविद्यालय नहीं था। इन सभी विश्वविद्यालयों ने सभी देशों के बीच उच्च शिक्षा की सुनहरी किरणें बखेरी। हमारे भीतर भी वही जोश है। हमारी कोशिश भारतीय शिक्षा के जगमगाते दिनों को वापस लाने की है, जिससे कि छात्रों को राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अनुसंधान की गुणवत्ता मिले। हम इसे नकारात्मक रुप से नहीं देखते कि भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिये विदेशी भूमि का रुख करते हैं, हालांकि फिर भी, हम ये बातें आपको बताना चाहते हैं कि भारत के छात्रों के अलाव 50 से ज्यादा देशों के छात्र वर्तमान में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) में अध्ययन कर रहे हैं। छात्रों को बड़ा परिसर और महानगरीय माहौल देने पर हमें गर्व है। महान विविधता के इस बेहतर अनुभव और दृष्टिकोण के साथ ही छात्रों को अलग-अलग तरीके के वैश्विक नागरिक बनने में मदद करता है। ये छात्र सांस्कृतिक मतभेदों के प्रति अधिक सहिष्णु हैं। साथ ही उनकी समझ और परिपक्ता का स्तर भी विकास कर रहा है, जिससे कि अलग-अलग पस्थितियों के मुताबिक वे खुद को ढाल सकें। हमारे यहां छात्रों के सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के लिये बेहतर मौके दिये जाते हैं, जिससे कि वे खुद को वैश्विक स्तर पर साबित कर सकें।

सामान्य उच्च शिक्षा की बजाय पेशेवर और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालय क्यों ज्यादा हैं ?

हम सभी जानते हैं कि सत्य नाडेला की तरह दुनिया भर में प्रसिद्ध महान भारतीय हस्तियों में से कई निजी संस्थानों के छात्र रहे हैं। वास्तव में, भारत में सरकार और सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश पाने के इच्छुक छात्रों के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या पर्याप्त मात्रा में नहीं हैं। व्यवसायिक एवं तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी कमी को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण के साथ खत्म किया जा सकता है। अन्यथा, सभी योग्य छात्र और योग्य उम्मीदवार व्यावसायिक शिक्षा से वंचित हो जाएंगे। इस प्रकार, व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में इस शून्यता को काफी हद समाज के निर्माण में लगे विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा विभिन्न जगहों पर स्थापित किये गये संस्थानों द्वारा भरा गया है।

एक निजी विश्वविद्यालय होने के नाते, एलपीयू स्पष्ट रूप से कहता है कि उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका पिछले एक दशक में तीव्र गति से बढ़ी है। इसका भी त्वरित रुप से विस्तार होना चाहिये, जिससे कि सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) का लक्ष्य हासिल किया जा सके।


शिक्षा क्षेत्र का निजीकरण

भारत में उच्च शिक्षा में निजीकरण को काफी हद तक व्यवसायिक/ तकनीकी शिक्षा के विस्तार के रूप में समझा जा सकता है बजाय सामान्य उच्च शिक्षा क्षेत्र के। यहां दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों का उल्लेख करना जरूरी है-इंजीनियरिंग क्षेत्र के साथ-साथ शिक्षक क्षेत्र भी अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुके हैं। इंजीनियरिंग और शिक्षा के कई संस्थान प्रवेश के बिना खाली पड़े हैं, कई संस्थानों को पिछले कुछ वर्षों में बंद करने के लिए नोटिस भी किया जा चुका है, तो वहीं अधिकारियों ने नए संस्थानों की स्थापना पर रोक लगा दी है।

तकनीकी / इंजीनियरिंग शिक्षा के साथ-साथ कई व्यवसायिक क्षेत्रों को पाठ्यक्रम के रूप में शिक्षक शिक्षा/ शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। इस तरह की शिक्षा को बाजार संचालित क्षेत्रों के साथ उभार कर लाया गया है। हाल ही में व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र में विकास के साथ-साथ शिक्षकों की शिक्षा को लेकर बड़े पैमाने पर बीसवीं सदी के अंतिम दशकों के दौरान एक अध्ययन किया गया है। कई प्रोफेशनल एजुकेशन में विकास होने के साथ ही टीचर्स एजुकेशन/ ट्रेनिंग की पढ़ाई एक पेशेवर विषय के रूप में की जाये यह भी व्यावसायिक क्षेत्रों और शिक्षा के लिए अग्रणी बाजार की मांग के रूप में उभर कर सामने आया है। इस प्रसंग में टीचर्स एजुकेशन के विषयों की जरुरतों को समझा जा सकता है। क्योंकि, शिक्षक शिक्षा के अध्ययन का कोई एकल कोर्स नहीं है, इसमें एसटीई, ईसीसीई, ईटीई, माध्यमिक शिक्षक शिक्षा और एमएड में विभिन्न स्तरों के लिए पाठ्यक्रम हैं। इसके विपरीत अध्ययनों के इस जटिल और विशाल क्षेत्र में अभी भी, शिक्षक शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर समुचित पाठ्यक्रम का अभाव है। और इसमें पर्याप्त अनुसंधान के साथ ही अनुशासन भी हो जिससे कि इसके व्यवसायीकरण को पूरी तरह सार्थक बनाया जा सके।

इसके अलावा शिक्षक शिक्षा में उपर्युक्त चिंताओं से स्कूली शिक्षा या उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहचान के अभाव में भी अन्य व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्रों के विषय के रूप में शिक्षक शिक्षा के अस्थिर स्थापना में बहुत योगदान दिया है। यद्पि पिछले एक दशक में निजी क्षेत्रों में शिक्षक शिक्षा की पहचान की है और पिछले एक दशक में माध्यमिक शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में निवेश किया जा रहा है। शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण अन्य व्यवसायिक शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण के रूप में सहज नहीं है। सर्व शिक्षा अभियान के मुताबिक (एसएसए, 2001) माध्यमिक शिक्षा क्षेत्र का मार्केट के साथ उचित अनुबंधन न होने के कारण इस पर काफी देर से ध्यान दिया गया। सर्व शिक्षा अभियान के शिक्षकों को भी राज्य भर में सर्व शिक्षा अभियान के मानदंडों को पूरा करना आवश्यक था, जिसके लिए प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन में वृद्धि को जन्म दिया गया। देश में सर्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के लिए सबसे बड़े मिशन के रूप में सर्व शिक्षा अभियान की मांग की गई, जिसके लिए देश में शिक्षक शिक्षा को बढ़ावा दिया गया। सरकारी क्षेत्र में इस तरह की मांग को पूरा करना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं था, इतनी अटकलों के बाद भी यहां तक पहुंचे, इसके अलावा सरकार ने शिक्षक शिक्षा संस्थानों की स्थापना के लिए मानदंडों और मानकों को सहज बनाने के लिए सहजता से निजी कंपनियों के लिए इस क्षेत्र को खोल दिया। इसलिए शिक्षक शिक्षा संस्थानों के मानकों और मानदंडों को कम कर दिया गया। प्रशिक्षत शिक्षकों की मांग बढऩे लगी, स्कूल शिक्षा रोजगार के साथ शिक्षक शिक्षा को सीधा जोड़ दिया गया। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की बड़ी घटना ने शिक्षक शिक्षा को इस दशक की बड़ी चिंता के रूप में देखा जा रहा है। शिक्षक शिक्षा में निजीकरण का वास्ता असल में स्कूली शिक्षा और शिक्षक शिक्षा के बीच में मांग और पूर्ति के सिद्धांतों पर चलता है। हाल तक शिक्षक शिक्षा को तो एक अलग क्षेत्र के तौर पर पहचानने की जगह उसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रारंभिक शिक्षा और स्कूली शिक्षा के तौर पर ही जाना जाता रहा है। पिछले डेढ दशक में मात्रात्मक वृद्धि से ही शिक्षक शिक्षा को समझा जा सकता है और जिसके परिणामस्वरूप कई रिपोर्ट परिलक्षित हुईं हैं जैसे-सुदीप बनर्जी समीति की रिपोर्ट (2007-08) और न्यायमूर्ति वर्मा आयोग की रिपोर्ट (2012) जिसमें अध्यापक शिक्षा के अपमानजनक गुणवत्ता के संबंध में इस क्षेत्र में व्यवसायीकरण के लिए निजीकरण की बाढ़ जैसी नजर आ रही है।


अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म हो–अतुल कोठारी


14-02-2016

फिनलैंड जैसा छोटा सा देश जहां 100 साल पहले सब कुछ विदेशी भाषाओं में चलता था, लेकिन आज वहां सभी क्षेत्रों में फिन्निश भाषा में काम होता है। सभी देशों में अपनी भाषा में काम होता है, तो हम सभी क्षेत्रों में अपनी भारतीय भाषाओं में काम क्यों नहीं कर सकते?’’ ये कहना है भारतीय भाषा मंच के संरक्षक ‘अतुल कोठारी’ का ‘उदय इंडिया’ की संवाददाता ‘प्रीति ठाकुर’ से। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश।

भारतीय भाषा मंच देश के शिक्षा संस्थानों में किस तरह के सुधार की ओर अग्रसर है?

भारतीय भाषा मंच से भारतीय भाषाओं को जोडऩे का काम हो रहा है। 21 फरवरी से हमने इस तरह के कार्यक्रम को पूरे देश में करने के बारे में सोचा है, लेकिन पूरे देश में एक साथ ये संभव नहीं हो सकता, इसलिए हमने 16-28 फरवरी का एक पखवाड़ा निश्चित किया है। ये कार्यक्रम जिन राज्यों में होंगे उन राज्यों के सभी भाषियों को हम एक मंच पर लेकर आयेंगे और वे अपनी भाषा में ही अपने विचार व्यक्त करें उनको इसकी सहूलियत दी जायेगी। हम सब एक मूल से जुड़े हुए हैं तो हम सब अलग कैसे हो सकते हैं, हमारी भाषाएं भले भिन्न हो सकती हैं। हम यह संदेश पूरे देश में फैलाना चाहते हैं। हम एक दूसरे की भाषाओं को साथ में लेकर आगे बढऩे का काम करेंगे। इस प्रकार का संकल्प हमने लिया है। आज सारी दुनिया स्वीकार करती है कि हमारी भाषाएं वैज्ञानिक हैं। संस्कृत एक वैज्ञानिक भाषा है। भले ही हम आज व्यवहारिक तौर पर संस्कृत भाषा में काम नहीं कर पा रहे हैं, लेकिन हमारी संस्कृति से निकली भाषाओं में तो काम कर रहे हैं।

दूसरी बात ये कि भाषाओं के लिए काम करने वाली बहुत सी संस्थाएं हैं, उन्हें एक मंच पर लाना हमारा उद्देश्य है।

आईआईटी क्षेत्र में अंग्रेजी की अनिवार्यता है, जिसकी वजह से हिन्दीभाषी छात्रों को मुश्किलें पेश आती हैं। इसके लिए आप क्या रहे हैं?

हमारी प्राथमिकता ये है कि अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म हो। जिन हिंदी के क्षेत्रों में अंग्रेजी अनिवार्य कर दी गई है उसकी अनिवार्यता खत्म की जाये। आज स्वतंत्र भारत में जो अंग्रेजी का माहौल बढ़ता दिखाई दे रहा है उसका कारण यही है कि हमने ऊपरी स्तर पर अंग्रेजी को रखा और नीचे हमारी भाषाएं रहीं। जिला न्यायालय तक तो आप अपनी भाषा में बात कर सकते हैं, लेकिन उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायलयों में हम अपनी भाषा में बात नहीं कर सकते। आप कॉमर्स, आर्ट विषयों को तो अपनी भाषा में पढ़ सकते हैं, लेकिन इंजीनियरिंग, मेडिकल, आईआईटी, मैनेजमेंट ये सब अपनी भाषा में नहीं पढ़ सकते। स्वतंत्रता के बाद हमने जो स्थिति निर्माण कर ली है, ये सब टॉप लेवल की बात है। हमारी भाषाएं लोअर लेवल पर हैं, तो कोई लोअर लेवल पर जाना ही क्यों चाहेगा? नीचे कोई नहीं आना चाहता सभी ऊपर जाना चाहते हैं, ऊपर जाने के लिए अंग्रेजी का सहारा लेना पड़ता है। तो ये एक बहुत ही विचित्र स्थिति बन गई है, जिसे बदलने की जरूरत है। जब तक ये बदलाव नहीं होगा अपनी भाषाएं पुर्नस्थापित नहीं हो सकेंगी। इसके लिए हमने भारतीय भाषा अभियान भी चालू किया है। जो विधिक और न्यायिक क्षेत्र में काम करेगा। इसका 27-28 फरवरी को राष्ट्रीय स्तर का बड़ा सम्मेलन हम प्रयाग- इलाहबाद में करने जा रहे हैं। आज केरल के उच्च न्यायालय मे मलयालम भाषा नहीं चलती केवल अंग्रेजी चलती है। हमने कहा कि अंग्रेजी के साथ मलयालम को भी प्रवेश दीजिये। आगे हम ये मांग करने वाले हैं कि प्रत्येक राज्य में एक ऐसा विश्वविद्यालय खुले जिसमें इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट, आदि की शिक्षा राज्य की अपनी भाषाओं में दी जाये। भोपाल में अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय खोला गया है जिसमें सभी पाठ्यक्रम हिंदी में तैयार किये जा रहे हैं। हम हर राज्य में ऐसा विश्वविद्यालय खोलने की तैयारी में हैं।

इस कार्य के लिये आपको सरकार की तरफ से क्या सहायता मिल रही है?

अभी देश भर में हम लोग जागरूकता का काम कर रहे हैं। क्योंकि लोगों में ये भ्रम है कि बिना अंग्रेजी के कुछ हो नहीं सकता। भाषाओं के लिए जो झगड़े हैं उसे निपटाना जरूरी है, नहीं तो राजनीति करके लोग अपनी भाषाओं के लिए झगड़े शुरू कर देंगे। ऐसे माहौल मे अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाना दूर की बात हो जायेगी। अत: हमें पहले मूलभूत चीजों को सुधारने की जरूरत है, उसके बाद ही हम सरकार की ओर कदम बढ़ायेंगे।

आज अंग्रेजी का दबदबा हर जगह है ऐसे में क्या आपको लगता है कि मेडिकल, आईआईटी या न्यायालय क्षेत्र में हिंदी या राज्य भाषाओं को उचित स्थान मिल पायेगा?

हां बिल्कुल, आज फिनलैंड जैसा छोटा सा देश वहां 100 साल पहले सब कुछ विदेशी भाषाओं में चलता था फ्रांसीसी, स्पेनिश भाषा में। लेकिन, आज वहां मेडिकल हो या अन्य क्षेत्र सभी में फिन्निश भाषा में काम होता है। किसी भी देश में देखिये चाहे वह जापान, स्पेन, जर्मन, इजराइल, फ्रांस, रूस कोई भी देश हो हर देश में अपनी भाषा में काम होता है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। हम भी कर सकते हैं हमने इस ओर शुरूआत कर दी है। परिणाम भी जरूर आयेंगे।

हमारा देश हिंदीभाषी है लेकिन, हमारे युवाओं को अंग्रेजी के आगे झुकना पढ़ रहा है, क्या ये भी एक कारण है कि भारत युवा शक्ति के रूप में जाना जाने के बाद भी पिछड़ा नजर आ रहा है?

बिल्कुल सही, जब तक हमारे देश में सारी शिक्षा-दीक्षा, सभी कार्य अपनी भाषाओं में नहीं होंगे, तब तक हमारे देश का वास्तविक विकास नहीं होगा। कुछ चंद लोग तो आगे बढ़ जायेंगे, लेकिन देश आगे नहीं बढ़ पायेगा। हमने एक पुस्तक छापी है जिसका नाम है ‘अंग्रेजी का भ्रम जाल’ इसमें जो आंकडे दिये गये हैं कि दुनिया के जीडीपी(सकल घरेलू उत्पाद) में जो 20 देश सबसे आगे है वे सभी देश अपनी भाषा में ही शिक्षा देते हैं और सारे काम करते हैं और जीडीपी के हिसाब से जो 20 देश सबसे पिछड़े हैं उनमें से 18 देश ऐसे हैं जिनकी शिक्षा या तो विदेशी भाषाओं में हो रहा है या मिक्स भाषाओं में, तो इसका सीधा सा मतलब है कि जब तक सब कुछ अपनी भाषा में नहीं होगा तब तक देश का विकास नहीं हो सकता।

देश के विकास के लिए सिर्फ भाषाओं पर ही आपका जोर है या युवाओं के नैतिक और चरित्र निर्माण के लिये भी आप कुछ कर रहे हैं?

हमारा मूल काम यही है कि शिक्षा में बच्चों का चरित्र और नैतिक विकास कैसे हो, समग्र विकास कैसे हो। इसके लिए हमने पूरे पाठ्यक्रम तैयार किये हैं। इसके प्रयोग भी हमने प्रारंभ कर दिये हैं। हमने शुरू में जिन 7-8 विद्यालयों में जो प्रयोग किये हैं उसके अद्भुत परिणाम सामने आये हैं। इसकी कक्षाओं में बिना शिक्षकों के परीक्षाएं ली जाती हैं, प्रधानाचार्य का कहना है सभी बच्चों के परिणाम बहुत अच्छे आएं हैं और किसी भी बच्चे ने दूसरे को कॉपी नहीं की। इसकी वजह ये रही कि एक तो उन्हें अपनी भाषा में अध्ययन करने का मौका दिया गया, दूसरा बच्चों का चरित्र निर्माण और नैतिक विकास भी हुआ। यह समग्र विकास कैसे हो सकता है इसके पूर्ण अवसर हमें वहां देखने को मिला।

अगर बच्चों को हिंदी या राज्य भाषाओं में शिक्षा के मौके दिये जायेंगे तो क्या हमारा युवा, भारत तक ही सिमट कर नहीं रह जायेगा? क्योंकि विदेशों में अंग्रेजी की अनिवार्यता है?

हम अपने देश की बजाय बाहर की चिंता ज्यादा करते हैं। भारत में अभी उच्च शिक्षा लेने वाले बच्चों की संख्या तीन करोड़ के आसपास है। हर साल डेढ़ लाख से ज्यादा बच्चे विदेश नहीं जाते। ऐसे बच्चों के लिये हम बाकी के बच्चों पर अनिवार्य रूप से अंग्रेजी को थोप रहे हैं यह कहां का न्याय है? जिनको विदेश जाना है उनको सिखाईये अंग्रेजी। दूसरा हमारा ये भी भ्रम है कि विदेश जाना है तो अंग्रेजी सिखनी है। अगर कोई रूस जायेगा तो अंग्रेजी सीख कर क्या करेगा ठोकरे खाता घूमेगा। दुनिया में साढ़े चार देश इंगलिश स्पीकिंग हैं। अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा में अंग्रेजी बोली जाती है और इन्हें साढ़े चार देश इसलिए कह रहा हूं कि कनाडा में अंग्रेजी, स्पेनिश, और आजकल तो पंजाबी भी उनकी राजभाषा हो गई है। बाकी के देशों में अंग्रेजी का क्या मतलब सब बेकार है। चीन, जापान, रूस में अंग्रेजी का क्या महत्व? अंग्रेजी का जो भूत सवार है हमारे ऊपर उसे तोडऩा है। मैं अंग्रेजी का विरोध नहीं करता। बच्चे को जिस दिशा में जाना है उस हिसाब से उसे पढ़ाएं। हम ये क्यों नहीं सोचते कि हम अपनी भाषा को दुनिया की भाषा बनाएंगे। आज क्यों हिंदी को तोडऩे का षडयंत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। इसमें भारत के कई लोग भी हिस्सेदार बन रहे हैं। सबसे ज्यादा बोले जाने वाली चीन की मंडारिन भाषा है। उसके बाद हिंदी है। अंग्रेजी के सामने मंडारिन की कोई चुनौती नहीं है, क्योंकि मंडारिन इतनी कठिन भाषा है कि कोई जल्दी से सीख नहीं सकता। लेकिन हिंदी चुनौती बन सकती है, बल्कि बन रही है। इसलिए ये षडयंत्र चलाया जा रहा है।

भारतीयों की ऐसी मानसिकता बन गई है कि बच्चा अंग्रेजी में पढ़ेगा तो ही आगे बढ़ेगा। इसे कैसे बदलेंगे आप?

हमारे कार्यक्रमों से काफी जागरूकता आ रही है। मूल बात ये है कि जब तक उच्च स्तर पर अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त नहीं होती, तब तक हमारी भाषाओं को महत्व नहीं मिलेगा। माता-पिता भी सोचते हैं कि बच्चे को आईआईटी करवानी है तो कोर्स अंग्रेजी में होगा इसलिए बच्चे को पहले से ही इस भाषा के लिए तैयार किया जाये। जैसा कि मैने कहा कि आज अंग्रेजी सुपीरियर है और हमारी भाषाएं उससे कम, तो लोग सोचते हैं कि सुपीरियर की तरफ जाया जाये ताकि उन्हें मौके भी ज्यादा मिलें। जब तक ऊपर के हालात नहीं बदलेंगे तब तक नीचे की सोच बदल पाना मुश्किल है। आज अंग्रेजी लोगों की मजबूरी बन गई है। और, जब बात आती है रोटी की तो लोगों को मजबूरी में विदेशी भाषा को अपनाना पड़ रहा है। धीरे-धीरे जब अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त होगी तो अपने आप ही हमारी भाषाओं को स्थान मिलेगा, और लोगों का भ्रम टूटेगा।

भविष्य की क्या योजनाएं हैं?

एक तो विधि और न्याय के क्षेत्र में हम 27-28 फरवरी को राष्ट्रीय सम्मेलन इलाहाबाद में कर रहे हैं। उसके बाद हर राज्य में मूवमेंट बनेगा कि वहां के उच्च न्यायलयों में राज्य की भाषाओं में काम हो।


पिछले एक दशक में माध्यमिक शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण भी मात्रात्मक वृद्धि से जाना जा सकता है। जिसके परिणामस्वरूप शिक्षक शिक्षा संस्थानों की संख्या 2002-03 से 2010-11 तक 600 प्रतिशत तक बढ़ गई है। शिक्षक शिक्षा संस्थानों में 2000-01 में 1050 और 2010-11 में लगभग 8000 की वृद्धि दर्ज की गई। इसके साथ ही 2011-12 में 92 फीसदी तक निजी संस्थानों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। निजी शिक्षक शिक्षा संस्थानों की हिस्सेदारी 2000-01 के दौरान 40-45 फीसदी के आसपास थी, जो कि 10 साल से कम वक्त में 90 फीसदी से अधिक तक पहुंच गया है। जबकि दूसरी तरफ उच्च शिक्षा संस्थान 2000-01 के दौरान 5000 और 2010-11 के बीच 21000 के आसपास बढ़े हैं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह के विकास को भारत में अकेले निजी क्षेत्र से 80 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ 400 प्रतिशत की हिस्सेदारी दर्शाता है। भारत में उच्च/व्यवसायिक शिक्षा वा अन्य क्षेत्र की तुलना में इस तरह के तुलनात्मक आंकड़े जो देखे जा रहे हैं वह शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण के कारण ज्यादा तीव्र नजर आ रहे हैं।

14-02-2016

सम्पूर्ण समान्य शिक्षा में शिक्षा में गुणवत्ता एक चिंता का विषय है, निजीकरण के कारण व्यवसायीकरण में वृद्घि हुई है जो नकारात्मक रूप से स्ववित्त पोषित शिक्षक शिक्षा संस्थानों के बहुमत पर असर डाल रहा है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कई उदाहरण मौजूद हैं जिससे पता चलता है कि निजीकरण से केवल व्यवसायीकरण को ही बढ़ावा मिला है, जबकि शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट दर्ज की गई है। संस्थागत प्रबंधन की स्ववित्त पोषित मॉडल शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण सबसे लोकप्रिय विधा बन गया है। यद्पि सभी निजी संस्थानों को सोसायटी अधिनियम 1860 के तहत स्थापित किया गया है, जिसका सीधा मतलब है कि ये संस्थान/ संगठन गैर लाभ धर्मार्थ प्रकृति के हैं, लेकिन यहां पर ये ध्यान देने योग्य बात है कि इस तरह के संस्थान का बहुमत वास्तविक रूप से लाभ कमाने के लिए कार्य कर रहा है। क्या निजीकरण अन्य शिक्षा क्षेत्र की तुलना में शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में निजी सेवा प्रदाताओं के लिए अधिक आकर्षक निवेश बन गया है? और क्या डिग्री का सीधा संबंध स्कूल में अध्यापन की नौकरियों से संबंधित है? यहां ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि अकेले कुछ स्ववित्त पोषित शिक्षक शिक्षा संस्थान देश में गुणवत्ता की शिक्षा उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं।


हर छात्र बने देशभक्त


14-02-2016

उदय इंडिया से हुई बातचीत में मेवाड़ यूनिवर्सिटी के चेयरमैन अशोक कुमार गडिया ने कहा,”हंम पाठ्यक्रम के दौरान प्रशिक्षण पर बल देते हैं ताकि कोर्स के खत्म होने के बाद छात्रों को रोजगार प्राप्त हो सकेÓÓ। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

भारत में उदारीकरण के बाद से उच्च शिक्षा किन चुनौतियों का सामना कर रही है ?

आपके सवालों के जवाब देने से पहले, मैं आपको भारत में उच्च शिक्षा से अवगत कराना चाहूंगा। विशेष रूप से तकनीकी और प्रबंधन लगभग निजी क्षेत्र के हाथों में है। 75-80 प्रतिशत इस तरह की शिक्षा निजी संस्थानों द्वारा दी जा रही है।

अब मैं आपके सवालों का जवाब देता हूं।

  1. निजी क्षेत्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि उसे सरकार की असंगत और अलाभकारी नियामक तंत्र की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  2. पिछले पांच वर्षों से अर्थव्यवस्था मंदी का सामना कर रही है, इसलिए छात्रों के लिए सही प्लेसमेंट मिल पाना बड़ी चुनौती है।

उच्च शिक्षा के लिए छात्र विदेशों का रूख कर रहे हैं, इसके क्या कारण हैं ?

पहला- हमारे देश में अधिकतर आकर्षक नौकरियां की पेशकश बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा की जाती है और ये कंपनियां उन्हीं छात्रों को कंपनी में लेना पसंद करती हैं जो विदेशों से शिक्षा लेकर आये हैं इसलिए छात्र विदेश की ओर रूख करना पसंद करते हैं।

दूसरा-हमारे समाज में उच्च आय वर्ग के लिए छात्रों को विदेश भेजना एक फैशन बन गया है। इसलिए भी छात्र विदेश जाते हैं ।

अपने विश्वविद्यालय में इस प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

हमारा विश्वविद्यालय उन छात्रों को शिक्षा देता है जो देश की सेवा करना चाहते हैं, क्योंकि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी जड़ें गावों और कस्बों से जुड़ी हैं। हम पाठ्यक्रम के दौरान प्रशिक्षण पर बल देते हैं, ताकि कोर्स के खत्म होने के बाद उन्हें रोजगार प्राप्त हो सके। इसके लिए हम अपने छात्रों को अच्छे शिक्षण और अच्छे प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

उच्च शिक्षा के निजी संस्थानों में तकनीकी शिक्षा पर अधिक जोर दिया जा रहा है बजाय साधारण उच्च शिक्षा के, ऐसा क्यों हो रहा है?

निजी क्षेत्र रोजगार उन्मुख शिक्षा प्रदान करने और छात्रों को पेशेवर बनाने में लगे हैं, ताकि छात्र उद्योगों और व्यापार की जरूरत के हिसाब से खरे उतर सकें। इसलिए निजी क्षेत्र व्यवसायिक और तकनीकी शिक्षा के लिए छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं।

आपको ऐसा क्यों लगता है कि उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षक शिक्षा आवश्यक है?

शिक्षक शिक्षा पूरे शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ है। अगर हमारे शिक्षकों की शिक्षा सामयिक होगी तो वे व्यवसायिक शिक्षकों को उत्पन्न करेंगे और साथ ही वे छात्रों के दिल और दिमाग में व्यवसायिकता विशेषता और राष्ट्रवाद को जागृत करेंगे।

 


उच्च शिक्षा में गुणवत्ता चिंताजनक

पोस्ट-मॉडर्न सोसायटी में उच्च शिक्षा मे गुणवत्ता विशेष रूप से उभर कर सामने नजर आ रही है। कुछ दशकों पहले, गुुणवत्ता किसी भी घटना/गतिविधियों का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था, इसके बिना कुछ भी पूरा नहीं समझा जाता था। इस व्यापक दुनिया में सभी जीवित और निर्जीव वस्तुओं के मूल्य में गिरावट आना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। आज हम अलग से गुणवत्ता के मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं। उदाहरण के लिए- गुणवत्ता की शिक्षा और परवरिश में गुणवत्ता अपने आप में इसका उदाहरण हैं। जब हम शिक्षा या परवरिश के विषय में सोचते हैं तो ये अच्छी शिक्षा और अच्छी परवरिश की बात होती है। इसमें ‘अच्छा’ और ‘गुणवत्ता’ जैसे शब्दों का अलग से कोई मुद्दा नहीं होता है। इन दिनों इस तरह के शब्द का इस्तेमाल प्रतिस्पर्धा के लिए किया जा रहा है। शिक्षा और उच्च शिक्षा भी विशेष रूप से 1991 के बाद इस समकालीन दुनिया के बाजार में मूल्यवान और अच्छी हो गई है।

14-02-2016

यूजीसी और एनएएसी जैसी निकायों के आलावा 20 से अधिक संविधिक निकाय है जो कि व्यावसायिक शिक्षा के क्षेत्र को विनियमित कर रहे हैं, जिनका मकसद राज्यों और संस्थानों में गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित करने का रहा है। इसके बावजूद शिक्षा का स्तर भारत के 70 प्रतिशत विश्वविद्यालयों और लगभग 90 प्रतिशत कॉलेजों में खराब ही है जैसा की एनएएसी की रिपोर्ट दर्शाती है। भारत के प्रधानमंत्री (2007) ने अपनी टिप्पणी में भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता में आ रही गिरावट को लेकर अपनी चिंता ही व्यक्त नहीं कि बल्कि, ये भी कहा कि कुलपतियों की नियुक्तियों को लेकर भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हैं।

4-5 फरवरी 2015 को विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के एक सम्मेलन में भारत के राष्ट्रपति ने उच्च शिक्षा में गुणवत्ता के साथ-साथ विश्वविद्यालयों में रिक्त पड़े पदों पर भी अपनी चिंता जाहिर की। भारत में कुछ मुट्ठी भर विश्वविद्यालय ही हैं जो कि शिक्षा के स्तर को बनाये हुए हैं बाकी के संस्थान छात्रों के विकास की चिंता किये बिना इस क्षेत्र में शिक्षा को आगे बढ़ा रहे हैं।


अनुसंधान हमारी पहली प्राथमिकता है


14-02-2016

देश में उच्च शिक्षा के हालत को जानने के लिए उदय इंडिया ने शिक्षा-ओ-अनुसंधान विश्वविद्यालय, भुवनेश्वर, ओडीशा, के संस्थापक, प्रो. मनोजरंजन नायक से बात की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

 

भारत में उदारीकरण के बाद से उच्च शिक्षा किन चुनौतियों का सामना कर रही है?

भारत में उच्च शिक्षा तेजी से बढ़ रही है। चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया में तीसरे सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली के रूप में उभर कर सामने आ रहा है साल 2014 तक 677 यूनिवर्सिटी, 37,204 कॉलेज और 11,443 संस्थान भारत में ही अकेले मौजूद थे। अब तक भारतीय विश्वविद्यालयों में शोधकर्ता पश्चिम के संस्थानों में उनसे अधिक अनुभवी और विकसित समकक्षों के लक्ष्य को हासिल करने और उनका पालन करने की कोशिश ही कर रहे थे। अब वे बराबरी की कोशिश करते हैं न कि अतीत की तरफ देखते हैं। उच्च शिक्षा के भारतीय संस्थानों के छात्रों में इसकी तीव्र इच्छा जाग चुकी है। भारतीय शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक बड़ी चुनौती है और वे सुनिश्चित करें कि छात्र उनका अनुकरण करेगा। शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए और सर्वश्रेष्ठ छात्रों को आकर्षित करने के लिए उच्च शिक्षा के संस्थानों में सबसे अच्छे अकादमिक स्टाफ को नियुक्त करना चाहिये। यहां एक बाधा है कि जब भारतीय अर्थव्यवस्था को उदार बनाया गया है तो शिक्षा व्यवस्था को अभी तक उदार क्यों नहीं बनाया गया? विश्वविद्यालय और संस्थान सरकार के नियंत्रण में हैं और बिना सरकारी अधिकारियों के अनुमोदन के कुछ भी प्रयास नहीं कर सकते। प्रतियोगिता का सामना करने की अनिच्छा हमारी शिक्षा प्रणाली के विकास में बाधा खड़ी कर रही है।

उच्च शिक्षा के लिए छात्र विदेशों का रूख कर रहे हैं इसका क्या कारण हैं?

स्वाभाविक रूप से विदेशी विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थान छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं, क्योंकि वहां की प्रणाली में व्यावसायिकता निहित है, साथ ही ये संस्थान महत्ता प्राप्त डिग्री भी प्रदान करते हैं। इसके अलावा अनुसंधान पर अधिक महत्व दिया जाता है इस तरह की सुविधाओं से संचालित संस्थान अक्सर विद्यार्थियों को लुभाते हैं।

आपके विश्वविद्यालय में इस प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

हमारा विश्वविद्यालय वैश्विक स्तर पर शिक्षा और अनुसंधान को लाने के लिए कई तरह की कोशिशें कर रहा है, ताकि छात्रों को ऐसे पाठ्यक्रम मिल सकें, जिनके माध्यम से उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य किया जा सके। हमारे विश्वविद्यालय का कई क्षेत्रों के अनुसंधान पर ध्यान केन्द्रित है, जिसकी वजह से हमारी यूनिवर्सिटी देश की बेहतर यूनिवर्सिटी में से एक है।

उच्च शिक्षा की निजी संस्थानों में तकनीकि शिक्षा पर अधिक जोर दिया जा रहा है बजाय साधारण उच्च शिक्षा के, ऐसा क्यों हो रहा है?

ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यावसायिक/तकनीकी शिक्षा छात्रों में रोजगार की क्षमता को बढ़ाती है, जबकि सामान्य उच्च शिक्षा में छात्रों में ऐसी क्षमता बढ़ाने के अवसर प्राप्त नहीं हो पाते हैं।

ऐसा क्यों लगता है कि उच्च शिक्षा प्रदान करने में शिक्षक शिक्षण आवश्यक है?

आधुनिक उच्च शिक्षा के लिए संकाय विकास कार्यक्रम अंतर्निहित है। शिक्षकों को गतिशील दुनिया में हो रहे बदलावों के विषय में जानकारी देने की आवश्यकता है, जहां प्रौद्योगिकी एक अविश्वसनीय गति से विकसित हो चुकी है। इस वजह से शिक्षकों को नियमित रूप से प्रशिक्षित करना जरूरी है नहीं तो वह अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से पूरा कर पाने में सक्षम नहीं हो पायेंगे।

 


निष्कर्ष- अगला कदम

भारत में उच्च शिक्षा पिछले दो दशकों से विशेष रूप से 1991 के बाद से बहुआयामी चुनौतियों का सामना कर रही है। एक ओर जनसंाख्यिकीय रूपरेखा में वृद्धि हो रही है और इस तरह की जनसंाख्यिकीय का राष्ट्रीय विकास के लिए प्रबंधन करना चुनौतिपूर्ण है। जबकि दूसरी तरफ उच्च शिक्षा में नामांकन में वृद्घि करने के लिए अग्रणी स्कूल शिक्षा के सार्वभौमिकरण इस क्षेत्र की मुख्य चिंता में से हैं। सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के लिए डीपीईपी (1994) के माध्यम से शौक्षिक उपलब्धि में क्रमिक वृद्धि, सर्व शिक्षा अभियान(2001) और सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा के लिए शिक्षा के अधिकार (2009), आरएमएसए (2008-09) माध्यमिक शिक्षा के नामांकन में वृद्धि की वजह से ही राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (आरयूएसए) 2013 जैसी नीतियों की स्थापना शैक्षिक प्रबंधन की चिंताओं के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं।

14-02-2016

भारत 35 साल से कम उम्र की आबादी के 60 प्रतिशत से अधिक होने को जनसांख्यिकीय लाभ के रूप में देखा जाता है। इस तरह की युवा जनसंख्या का देश में होना अपने आप में राष्ट्रीय परिसंपत्ति है। जो राष्ट्रीय विकास में अपना सर्वोत्तम क्षमता का योगदान देकर, भारत को विकसित देशों की सूची में शामिल कर सकता है। इस तरह की सशक्त आबादी को दिशा दिखाने की जरूरत है, जिसे सामान्य शिक्षा और विशेष रूप से व्यवसायिक शिक्षा में हस्ताक्षेप के माध्यम से किया जा सकता है। बहरहाल पिछले दो दशकों में भारत ने डीपीईपी, सर्व शिक्षा अभियान और शिक्षा के अधिकार जैसे कार्यक्रमों को शुरू करके सफलतापूर्वक सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा को प्राप्त किया है।


हमारा ध्यान गुणवत्ता की शिक्षा पर केन्द्रित है


14-02-2016

उच्च शिक्षा के विषय पर उदय इंडिया ने बात की के.आर. मंगलम विश्वविद्यालय के चांसलर के.के. अग्रवाल से। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश:

भारत में उदारीकरण के बाद से उच्च शिक्षा किन चुनौतियों का सामना कर रही है?

उदारीकरण के बाद उच्च शिक्षा में एक महत्वपूर्ण विस्तार किया गया है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और छात्रों की संख्या में वृद्घि ने हमें बहुत ही प्रभावशाली आंकड़े प्रस्तुत किये हैं। यह राष्ट्र की आवश्यकता थी और हमने एक अच्छी शुरूआत की है। हालांकि, इस संख्यात्मक विस्तार में – अनजाने में ही सही पर उच्च शिक्षा के कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण आयामों को पीछे ढकेल दिया गया है। कुछ संस्थानों की बात छोड़ कर बाकी के सभी संस्थान जिस प्रकार की गुणवत्ता की शिक्षा मिलनी चाहिए उससे कम ही छात्रों को दे पा रहे हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रस्तुत अधिकांश कार्यक्रमों की प्रासंगिकता पूरी तरह से छात्रों के हितों में नहीं रही है। हमारे संस्थान अगर छात्रों के हितों के विषयों को उपलब्ध नहीं करा सकते, तो इनका कोई उपयोग नहीं है। अगर कॉलेज और संस्थान छात्रों को गुणवत्तायुक्त शिक्षा नहीं प्रदान कर पा रहे हैं तो इसका सीधा मतलब है कि उन्हें कुछ भी नहीं मिल रहा है, तो ये राष्ट्र हित में भी नहीं है। इसके अलावा यदि हमारी शिक्षा प्रणाली में स्नातकों के लिये सामाजिक घटनाओं को सम्मिलित नहीं किया जाता है, तो मैं ये कह सकता हूं कि ये शिक्षा प्रणाली के साथ भेदभाव होगा।

उच्च शिक्षा के लिए छात्र विदेशों का रूख कर रहे हैं इसके क्या कारण हैं ?

उच्च शिक्षा के लिए छात्रों का विदेश की ओर रूख करने के बहुत से अलग-अलग कारण हंै। कुछ मेधावी छात्र विदेश सिर्फ इसलिए जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें अनुसंधान के लिए बेहतर रचनात्मक सुविधाओं और बेहतर पारिस्थितिकीय तंत्र की जरूरत होती है। कुछ छात्र विदेशों में सिर्फ इसलिए जाना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें भारत के अच्छे संस्थानों में सीटें कम होने की वजह से स्थान नहीं मिल पाता है। जबकि कुछ अन्य छात्र विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक प्रयोगों के लिए विदेश चले जाते हैं। कुछ छात्र ऐसे भी हैं जो मिश्रित विषयों को पढऩा चाहते हैं जो हमारे देश में असंभव है। उदाहरणस्वरूप- कंप्यूटर साईंस और संगीत) कुछ को पूरी तरह से अलग सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का अनुभव करने की इच्छा होती है, इसलिए वह विदेश चले जाते हैं। सब के अपने अलग-अलग कारण हैं।

अपने विश्वविद्यालय में इस प्रवृत्ति पर काबू पाने के लिए आप क्या कर रहे हैं?

के.आर. मंगलम विश्वविद्यालय, जहां का मैं चांसलर हूं, उसे खुले हुए अभी 2 साल से कुछ समय ही ज्यादा हुआ है। हमारे विश्वविद्यालय में ये स्नातक का पहला ही बैच है, इस वजह से अभी इसका आकलन करना बहुत जल्दबाजी होगी। हालांकि, मैंने विश्वविद्यालय में गुणवत्ता की शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया है और विषयों के पाठ्यक्रम के एक वास्तविक विकल्प की पेशकश भी की है। हर संभव तरीके से हम अपने पाठ्यक्रमों को सीधे तौर पर उद्योगों से जोडऩे की कोशिश कर रहे हैं। हमारी ये कोशिश मील का पत्थर साबित होगी।

उच्च शिक्षा के निजी संस्थानों में तकनीकी शिक्षा पर अधिक जोर दिया जा रहा है बजाय साधारण उच्च शिक्षा के, ऐसा क्यों हो रहा है?

व्यवसायिक/ तकनीकी शिक्षा (पीटीई) में निजीकरण से भारतीय युवा बहुत ज्यादा प्रभावित हैं। क्योंकि यहां सरकारी संस्थानों की तुलना में अधिक सुविधायें मौजूद होती हैं। हालांकि इन संस्थानों में फीस अधिक होने के बावजूद विद्यार्थी निजी संस्थानों में आते हैं और ये संस्थान शिक्षा में गुणवत्ता प्रदान करने के लिए प्रयास भी करते हैं। निश्चित रूप से इसमें एक और स्पष्ट कारण है- विद्यार्थिी और उनके परिजन पूरी तरह से उन उच्च शिक्षा विषयों के वित्तपोषण के लिए सहमत होंगे जहां रोजगार (जहां एक हद तक अच्छे वेतन के स्तर मौजूद हों)अधिक होने की संभावना होगी। वर्तमान समय में देश में जो निजी सामान्य उच्च शिक्षा में प्रयोग आयोजित किये जा रहे हैं उसके लिए मुझे भी खुशी है।

  


14-02-2016

आरएमएसए कार्यक्रम के माध्यम से माध्यमिक शिक्षा के दायरों को और अधिक विस्तारित कर दिया है। आखिर 2013 में आरयूएसए को शुरू किया गया, ताकि 2020 तक 30 प्रतिशत तक अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकें। इन घटनाओं को दिमाग में रखते हुए मात्रात्मक उपलब्धियों के मुद्दे पर काफी हद तक भारत सरकार से मुलाकत भी की गई है, लेकिन गुणवत्ता के क्षेत्र में समस्या जस की तस बनी हुई है, जो कि राष्ट्रीय मांग के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव के कारण खतरनाक साबित हो सकती है। इसके अलावा, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में व्यवसायीकरण के लिए अग्रणी निजीकरण देश में पूरी शिक्षा प्रणाली के लिए खतरा पैदा कर रहा है। भारत गुणवत्ता जैसे बड़े मुद्दों की अनदेखी करके निजी क्षेत्र की मदद से महज मात्रात्मक विकास का आनंद तो ले सकता है, पर देश में तेजी से शिक्षित बेरोजगारी भी एक जटिल समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रही है। आरयूएसए ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी 30 फीसदी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका के लिए प्रस्ताव रखा है। शिक्षा की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए सरकार को निजी संस्थानों को दिये जाने वाले सहबद्ध नीतियों को फिर से अमूलचूल परिवर्तन करना होगा। साथ ही ऐसे विषयों को भी लाना होगा जिसमें उसके सुपर विजन का भी प्रावधान हो।

निजी संस्थानों में झूठे बुनियादी ढांचे और मानव शक्ति की सरकार एजेंसियों द्वारा सख्ती से जांच की जा रही है। सरकार केवल इस तरह की समस्याओं की ही जांच नहीं कर रही है, बल्कि देश में पूरी शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए संबंधित शेयर धारकों से भी बातचीत की जा रही है। इस तरह के शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए केवल सरकार की ही नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी होनी चाहिए। हमें उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को बहाल करने के लिए साझा जिम्मेदारी के माध्यम से भारतीय लोकतंत्र के लोकाचार का प्रतिनिधित्व करना है।

(‘इंडियन हायर एजुकेशन एट ए क्रॉसरोड्स’ पुस्तक, ज्ञान बुक्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रकाशित से साभार)

 प्रोफेसर(डॉ) ख्वाजा एम शाहिद,

 भानु प्रताप प्रीतम

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