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मीडिया में बौद्धिक माफिया

मीडिया में बौद्धिक माफिया

एक वक्त वह था जब मीडिया पर इतना भरोसा हुआ करता था कि उसके नजरिये से जनमत तैयार होता था और सरकारें उसे छेडऩे से घबराया करती थीं। संपादकों की निपट ईमानदारी और निष्पक्षता के लिए बड़ी कद्र की जाती थी। याद करें एम. चेलापति राव, एस. मुलगांवकर, दुर्गादास, बी.जी. वर्गीज, विनोद मेहता, अरुण शौरी और ऐसे ही कई दूसरे संपादकों को, जो सत्ताधारकों को खुश करने के लिये कभी खबरों का रुख नहीं मोड़ा करते थे।

कहते हैं, एक दिन दोपहर चेलापति राव का सचिव एक स्टोरी लेकर आया जिसमें संजय गांधी की तारीफ थी और उनके जीवन का मकसद गरीबों की मदद करना बताया गया था। तस्वीरों के साथ स्टोरी पूरे पन्ने की होती। राव ने कहा, ”क्या उन लोगों ने विज्ञापन का पैसा भेजा है।’’ सेक्रेटरी का जवाब था, ”नहीं सर, इंदिरा जी ने खुद आपके पास भेजा है।’’ राव बोले, ”उनके दफ्तर में फोन लगाओ और कहो कि 25,000 रुपये भेज दें, हम स्टोरी छाप देंगे।’’ पैसा आ गया। एक बार पंडित नेहरू बिना पूर्व सूचना के ‘नेशनल हेराल्ड’ के दफ्तर पहुंच गए और राव के चैंबर में गए। उस समय वे संपादकीय लिख रहे थे, इसलिए पंडित नेहरू से इंतजार करने को कहा। पंडित नेहरू ने इंतजार किया। अरुण शौरी ने तीन मुख्यमंत्रियों का कच्चा- चिट्ठा छापा। तीनों इंदिरा गांधी के प्रिय थे। वर्गीज को अपना पद छोडऩा पड़ा, क्योंकि उन्होंने इमरजेंसी में सेंसरशिप का खुलकर विरोध किया था।

इन मिसालों की अब जरा इस किस्से से तुलना कीजिए। किसी एक जैन ने दशक भर पहले तब के संपादक से पूछा, ”आपका अगर प्रधानमंत्री से समय तय हो और उसी वक्त मैं आपको बुलाऊं तो क्या करोगे?’’ संपादक की नौकरी बच गई, क्योंकि उसने कहा कि आपके पास आऊंगा।

वक्त बदल गया है। संपादक की हैसियत बगुलाभगत की हो गई है। वे दिन लद गए जब संपादक मीडिया की नैतिकता से समझौता करने के बजाय पद छोड़ देने का जोखिम उठाने को तैयार रहते थे। मीडिया की साख लुटा देने वाले बाकी के तमाम पत्रकार उस बिरादरी के हैं जो उदार और वामपंथी झुकाव वालों की सुनियोजित घुसपैठ के कारण काबिज हो गए हैं।

मीडिया की ताकत और पहुंच को भांपकर सरकार या सत्ताधारी पार्टी से अधिक-से- अधिक लाभ हासिल करने के लिये बौद्धिकों और उदारवादियों ने न्यूजरूम, संपादकीय पदों और टीवी चैनलों में अपना दबदबा कायम किया। यहां तक कि अपनी पसंद के लोगों को स्थापित करने के लिए एंकरों को भी बदला गया। ये लोग सरकार की ख्वाहिश से ज्यादा ही झुकने को तैयार थे। ये पत्रकार थे ही नहीं। उनका यकीन लेने और देने में था। यह सब इमरजेंसी के दौरान शुरू हुआ जब इंदिरा गांधी को पत्रकारों की मदद की दरकार थी। इन बौद्धिकों को नैतिकता या देशहित की कोई परवाह नहीं। उन्हें तो बस अपने विशेषाधिकारों और मुफ्त की कमाई से मतलब था। और, उन्होंने वही किया जो उनसे कहा जाता था। वे सही खबरों को दबाने लगे और कुछ ‘सनसनीखेज’ खबरों को ‘गढऩे’ लगे। इसे बुरी खबरों को तरजीह न देना बताया गया। अंग्रेजी वाले तो इसके आदी हो गए।

अगर आप किसी शाम न्यूजरूम में काफी गहमागहमी देखें तो मतलब यह है कि किसी असली और तथ्यपरक खबर को सनसनीखेज बनाने की कोशिश होती है, ताकि उसे ब्रेकिंग न्यूज की तरह पेश किया जा सके। मसलन, इन दिनों सरकार की अच्छी खबरों को भी दफना दिया जाता है और कई बार किसी अपुष्ट नकारात्मक खबर को सनसनीखेज बनाकर पेश कर दिया जाता है।

इन बौद्धिकों को गुमान है कि सारी बुद्धिमत्ता इन्हीं के पास है और उनकी बिरादरी के बाहर के लोगों को गढ़ी हुई खबरें परोसकर काबू में रखने की जरूरत है। ये लोग ही पत्रकारिता के ज्ञान के बिना भी संपादक-निदेशक के पदों पर बैठ जाते हैं। अपने अहंकार में ये बौद्धिक सोचते हैं कि वे सबसे अलग हैं और उनकी समीक्षा करने का अधिकार खासकर कम बौद्धिक लोगों को नहीं है। ये लोग अपना कानून खुद ही बनाते हैं। जो भी उनकी यथास्थिति को तोडऩे या उनके दबदबे को कम करने की कोशिश करता है, उसकी ये तौहीन करने से नहीं चूकते।

2014 के आम चुनावों के वक्त मीडिया में भारी मोदी विरोध के कारण तथ्यों से छेड़छाड़ की कई मिसालें देखने को मिलीं। मोदी के बारे में नकारात्मक और अपमानजनक खबरों को तरजीह दी गई। इस तरह गंभीर संपादकों की वर्षों की मेहनत से बनाई गई मीडिया की साख खो गई, जिनमें डेस्मंड यंग जैसे संपादक हैं, जिन्होंने फील्ड मार्शल रोमेल के बारे में ‘डेजर्ट फॉक्स’ जैसी किताब लिखी। ये सभी अनोखे संपादक थे और उनके भारतीय उत्तराधिकारियों ने भी वही परंपरा बनाए रखी।

मीडिया में ”दरबारी’’ बौद्धिकों की घुसपैठ के कारण मीडिया की साख लुट गई। मसलन, राहुल गांधी की जनसभाओं की भीड़ कभी नहीं दिखाई जाती, क्योंकि लोग बहुत कम होते हैं। दूसरी ओर, बेहद सफल जन-धन योजना के बारे में कोई संपादकीय या पैनल में कभी बहस नहीं होती। आखिर क्यों?

14-02-2016बेशक, मोदी ने तो हावर्ड, ऑक्सफोर्ड या सेंट स्टीफंस के पोर्टल भी नहीं देखे हैं। उनकी विरासत भी कुछ खास नहीं है। मगर ये बौद्धिक उनके वजूद को ही मंजूर करने को तैयार नहीं हैं। इसके उलट राहुल गांधी हावर्ड गए, डिग्री हासिल नहीं कर पाए, लेकिन उनकी तीन पीढिय़ां प्रधानमंत्री रही हैं। इसलिए उनकी रक्षा करनी है। मोदी को सत्ता से हटाना है। आखिर मोदी जैसा आदमी भला राज कैसे कर सकता है! कोई चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन जाये, इससे बड़ी शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने तो 24 अकबर रोड के सामने चाय बेचने की दुकान खोल देने की पेशकश तक कर दी थी। लेकिन उस शख्स की हिमाकत तो देखिये जो सब अपमान भूलकर प्रधानमंत्री बन बैठा।

इस तरह ये बौद्धिक लगातार संघर्ष कर रहे हैं। जब मोदी की रेटिंग ऊंची हो जाती है, तो उन्हें छुप जाने को मजबूर होना पड़ता है। पर उससे फर्क नहीं पड़ता, मीडिया में घुसपैठ जारी रहनी चाहिये। अपने पेशे में दक्ष पत्रकारों को न्यूजरूम से बाहर किया जा रहा है और जो लोग इन बौद्धिकों के कहने पर खबरों को तोडऩे-मरोडऩे को राजी हो जाते हैं, वे बने हुए हैं।

अहंकार और आत्म-निरीक्षण का अभाव मीडिया के उदार अभिजनों और बौद्धिकों में एक समान पाया जाता है। ये अब अखबारों और टीवी चैनलों में नियमित टिप्पणीकार भी बन गए हैं। इससे उन्हें लगता है कि उनसे सवाल करने या उनका विरोध करने की जुर्रत भला कौन जुटा सकता है। ‘तहलका’ के एक संपादक को याद कीजिए जो लिफ्ट में अपनी ही सहयोगी से छेड़छाड़ करने के दोषी पाए गए। उन जैसे तमाम अपने को सबसे ऊपर समझते हैं। किसी लोकतंत्र में सत्ता के किसी तरह के दुरुपयोग पर कड़ी नजर रखने के कारण चौथा स्तंभ कहा जाने वाला मीडिया खुद उनका पैरोकार बन बैठा है, जिन्होंने लोकतंत्र और बुनियादी अधिकारों को छीन लिया था।

कभी गौर से टीवी चैनलों की बहस को देखिये। उसमें बौद्धिकों का अहंकार और ‘मैंने तो ऐसा पहले कह दिया था’ वाला रवैया कितना हास्यास्पद लगता है। अय्यर गुस्से में एक साथी टिप्पणीकार को मूर्ख तक कह गए। एक दूसरे साहबान कह रहे थे, भारतीय राजनीति का मेरा 40 साल का अनुभव है। यानि कोई उनके मुंह लगने की जुर्रत कैसे कर सकता है!

वे ऐसे पेश आते हैं मानों सरकार को ईमानदार बनाये रखने की सारी जिम्मेदारी उन्हीं पर है। यह सही है, लेकिन क्या उन्हें यह एहसास है कि वे भी भ्रष्ट हो सकते हैं और सत्ता के छलावे में फंस सकते हैं। उनके नेक इरादों पर सवाल उठाने से वे बौरा जाते हैं। मानों वे कह रहे हों, ”खबरों की दुनिया के हम देवता हैं हमें और ज्ञान की दरकार नहीं है।’’

14-02-2016भारतीय मीडिया के इतिहास में पतन की इंतहा का अंदाजा राडिया टेप के खुलासे से लगा था। उस समय बरखा दत्त, वीर सांघवी और नीरा राडिया की बातचीत से देश भर में तूफान मच गया था। मंत्रियों के घोटालों से पहले से ही सन्न देश इस टेप का मामला सुनकर दंग रह गया था। टेप में एनडीटीवी की स्टार रिपोर्टर बरखा दत्त को नीरा राडिया के साथ यूपीए सरकार के मंत्रिमंडल गठन में, खासकर द्रमुक के कोटे के मंत्रियों के लिये जोड़तोड़ करते सुना जाता है।

एक-दो नहीं ऐसे पांच टेप सार्वजनिक हुए। एक में, हिंदुस्तान टाइम्स के बेहद नैतिकतावादी स्तंभकार वीर सांघवी को नीरा राडिया से मंत्रिमंडल में किसी को खास मंत्री बनाने के लिए जोड़तोड़ करते सुना जा सकता है।

फिर ‘मिस्टर क्लीन’ रतन टाटा भी अपने कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों के बारे में बातचीत करते सुने जाते हैं। यानी दिल्ली की सत्ता पांच सितारा होटलों में बैठकर साजिश रचने वालों की भेंट चढ़ गई थी।

इससे कारोबारियों-राजनीतिकों-बौद्धिकों और पत्रकारों की मिलीभगत की हमेशा से चली आ रही कहानियां पुष्ट हो जाती हैं। बरखा दत्त कहती सुनी जाती हैं ”ठीक है, कोई प्राब्लम नहीं है, मैं आजाद से बात करूंगी- मैं आरसीआर से निकलते ही आजाद से बात करूंगी।’’

हिंदुस्तान टाइम्स के तत्कालीन एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर वीर सांघवी कहते सुने जाते हैं, ”600 करोड़!! ऐसे दबाव के आगे तो बात करना ही मुश्किल है। दरअसल वे कुछ और लचीलापन चाहते हैं। मेरी समझ में एक और कैबिनेट (मंत्री)।’’

आखिर इनका हुआ क्या? बरखा दत्त के मामले में तो बस इतना हुआ कि उनके चेहरे की रंगत कुछ फीकी पड़ गई। वीर सांघवी का संपादकीय पन्ने पर साप्ताहिक स्तंभ साल भर तक गायब रहा। बौद्धिकों की बिरादरी में काफी एकजुटता है और वे गलती से भी जान लें कि कोई मुश्किल में है तो फौरन बचाव में उतर आते हैं। ‘तहलका’ के संपादक की गिरफ्तारी के बाद आये बयानों और ट्वीट को याद कीजिये।

14-02-2016

यह तो मानना ही पड़ेगा कि ये बड़ी मोटी चमड़ी के और लचीले होते हैं। शायद इसी वजह से वे बौद्धिक कहलाना चाहते हैं। लेकिन उनका प्रचंड अहंकार, पूर्वाग्रह और भ्रष्टाचार उन्हें राजनैतिक फिजा बदलने के साथ लुप्तप्राय: प्रजाति बनने को मजबूर कर देता है। वे खत्म हो जाएंगे या दोबारा उठ खड़े होंगे, यह इस पर निर्भर है कि वे कितनी देर तक मुंह छुपाए रहने को मजबूर रहते हैं। इसी वजह से उनमें से कोई न कोई समय-समय पर कुछ बेतुकी हरकतें करने के लिये बाहर निकल आता है। मकसद यह है कि लोगों को याद दिलाये रखा जाये, वरना कहीं वे भूल न जाएं। लेकिन उन्हें यह एहसास नहीं है कि 65 प्रतिशत युवाओं वाली मौजूदा पीढ़ी भाषणबाजी और अक्खड़पन से नफरत करती है। बौद्धिकों को यह एहसास हो जाना चाहिए कि उनका स्वर्णिम दौर अब बीत गया है। वक्त बदल गया है।

जैसा कि विवेक अग्निहोत्री कहते हैं, ”उन लोगों ने भारत के लोगों में डर और नफरत भर दिया है। वे सभी देसी, जमीनी चिंतकों से घृणा करते हैं। वे सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, चंद्रशेखर, पी.वी. नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी से घृणा करते रहे हैं और अब मोदी से नफरत करते हैं। वे राष्ट्रीय नैतिकता और धर्मनिरपेक्षता के अपहरणकर्ता हैं। वे भारतीय खजाने के लुटेरे हैं। वे सत्ता के दलाल हैं। वे धर्मनिरपेक्षता के भड़वे हैं। वे बौद्धिक माफिया हैं।’’

उन्हें हराने के लिये तब के सत्ताधीशों की बनाई दीवाल ढ़हानी पड़ेगी। यह काम अब शुरू हो चुका है। अब मामला अभिजन बनाम जनता का हो गया है। हालांकि मीडिया में अगर बौद्धिकों की जकड़बंदी टूट जाती है तो खबरों का निष्पक्ष प्रवाह शुरू हो जाएगा। पुरानी कहावत भी है कि खबर वही है जिसे कहीं कोई दबाने की कोशिश कर रहा हो।

विजय दत्त

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