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मोदी का स्मार्ट सपना

मोदी का स्मार्ट सपना

स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित किए जाने वाले पहले 20 शहरों की घोषणा केंद्र सरकार कर चुकी है। इस लिस्ट में मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र गुजरात, ओडिशा, केरल और राजस्थान जैसे राज्यों के कुछ शहरों को पहले चरण के लिये चुना गया है। पांच सालों में इन शहरों को विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छा वातावरण देने के लिये 3 लाख करोड़ खर्च किए जाएंगे। केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वैंकेया नायडू ने कहा, इन शहरों में पानी और बिजली आपूर्ति, सफाई और ठोस कचरा प्रबंधन, मुकम्मल शहरी आवागमन और सार्वजनिक परिवहन, आईटी संपर्क, ई-गवर्नेंस के जरिये बुनियादी सुविधाएं और नागरिक भागीदारी विकसित की जाएगी। नायडू ने कहा कि यह ऐलान आने वाले दिनों में देश के सामने एक नया उदाहरण पेश करने वाला है। लेकिन, स्मार्ट सिटीज के सामने जो चुनौतियां सबसे अहम हैं उनमें है एकीकृत प्लान, प्रस्ताव एवं और ज्यादा से ज्यादा उसका विश्लेषण करना। बहरहाल ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर देश का पहला शहर बना है। जिसे लिस्ट में पहला स्थान हासिल हुआ है। लिस्ट में चार राजधानियों को प्रमुखता से जगह मिली है। जिन शहरों को पहले 20 शहरों की लिस्ट में शामिल किया गया है उनकी जनसंख्या 3.54 करोड़ के आसपास बैठती है। इन 20 चुने हुए शहरों के विकास में सरकार की ओर से अगले पांच वर्षों में 50,802 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। नायडू ने बताया कि आश्चर्यजनक तौर पर सरकार को इसके लिए करीब 2.50 मिलियन लोगों की ओर से सुझाव मिले थे। नायडू का कहना था कि स्मार्ट सिटीज के लिए आने वाले नतीजे देश की तस्वीर भी बयां करते हैं।

पिछले वर्ष केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्मार्ट सपने-‘100 स्मार्ट सिटी’ के निर्माण पर मुहर लगाई थी। स्मार्ट सिटी के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को देखते हुए तो 50,802 करोड़ रुपए की यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है। लेकिन, यह तो शुरूआत है। असल में इस योजना का मकसद तो देशी-विदेशी कंपनियों को इस परियोजना में भागीदार बनाकर पैसा लगाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इसके बाद से हर जगह स्मार्ट सिटी की चर्चा होने लगी है। लोग जानने की कोशिश में लगे हैं कि यह स्मार्ट सिटी आखिर क्या बला है? उन्हें लगता है कि स्मार्ट रोबोट, स्मार्ट फोन का जमाना है तो हर चीज स्मार्ट होनी चाहिए। फिर सिटी के स्मार्ट होने में बुरा क्या है। लेकिन, सवाल यह है कि स्मार्ट सिटी हमारे-आपके शहरों से किस मायने में अलग होगी? उससे हमारी जिंदगी किस मायने में बेहतर हो पाएगी? पहली बार स्मार्ट सिटी की चर्चा तब सुनाई दी थी, जब मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान अच्छे दिन लाने के लिए जो कई वायदे किए थे, उनमें से एक वायदा था 100 स्मार्ट सिटी के निर्माण का। तब लोगों ने इस वादे पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था। बहुत सारे लोग सोचते थे, कि स्मार्ट सिटी में स्मार्ट भला क्या होगा? हमारे देश में पहले से ही इतने सारे शहर हैं, उन्हें ही मरम्मत करके, झाड़-पोंछकर, रंग-रोगन करके स्मार्ट बना दिया जाएगा। लेकिन, स्मार्ट सिटी के समर्थक इसका पुरजोर खंडन करते हुए कहते हैं, ऐसा कतई नहीं होगा। यह तो फटे कपड़े पर पैबंद लगाना होगा। जबकि, स्मार्ट सिटी की सोच एकदम अलग है।

आखिर ये स्मार्ट-स्मार्ट है क्या?

वैसे बता दें स्मार्ट सिटी आधुनिक तकनीक के रचनात्मक उपयोग से बना आपके सपनों के शहर जैसा होगा। विश्व स्तर की सुरक्षा के साथ-साथ सारी सुख-सुविधाओं से सुसज्जित शहर। स्कूल, कॉलेज, बड़े अस्पताल, शॉपिंग मॉल, मल्टीप्लेक्स, कम्यूनिटी हॉल केवल कुछ कदमों पर। एलिवेटेड रोड, मल्टीलेवल पार्किंग, शहर में रहने वाले 10 लाख लोगों को रोजगार। पार्किंग हर बड़ी आवासीय और व्यावसायिक भवन से जुड़ी होगी। 60 प्रतिशत जगह हरियाली से भरी होगी। पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करने वालों के लिए बस और टैक्सी स्टैंड पर कंप्यूटराइज्ड रोडमैप मौजूद रहेगा। हर चीज चकाचक होगी। स्मार्ट सिटी की सबसे बड़ी विशेषता ये होगी कि यहां कभी पाइप लाइन या केबल डालने के लिए खुदाई नहीं करनी पड़ेगी। इसके लिए पूरे शहर में यूटिलिटी टनल बनाया जाएगा। सभी पाइप लाइंस और केबल इसी टनल से होकर गुजरेंगे। इस टनल से गुजरने वाली किसी पाइप या केबल में खराबी आने पर सूचना कंट्रोल रूम में लगे कंप्यूटर पर आ जाएगी और अलार्म बजने लगेगा। मरम्मत कार्य के लिए छोटी गाडिय़ां भी टनल में आसानी से जा सकेंगी। स्मार्ट सिटी में यातायात व्यवस्था सैटेलाइट मैपिंग से संचालित होगी। जिसमें मॉडर्न बस सिस्टम, ट्राम, मेट्रो रेल और साइकिल ट्रैक बनाये जाएंगे। एलिवेटेड वॉक-वे के जरिये मेट्रो स्टेशनों को शहर की बड़ी इमारतों से जोड़ा जाएगा। यह शहर केवल मॉडर्न ही नहीं होगा, बल्कि यहां आपकी सुरक्षा के लिए कई इंतजाम होंगे। सारे शहर की सीसीटीवी के द्वारा निगरानी की जाएगी।

कहीं आपको कूड़ा-कचरा, गंदगी नजर नहीं आएगी। स्मार्ट सिटी में कचरे तक के इस्तेमाल का स्मार्ट इंतजाम होगा। हर फ्लैट के आगे वेस्ट डिस्पोजल सिस्टम लगा होगा, जिससे कचरा फेंकने के लिए फ्लैट के बाहर लगी एक खिड़की को खोलना होगा और कचरे को डाल देना है। घर से निकला हुआ कचरा पाइप फिर टनल के रास्ते सीधे गार्बेज हाउस में पहुंच जाएगा। जहां प्लाजमा तकनीक के जरिये उस कचरे से बिजली पैदा की जाएगी। इसे कहते हैं आम-के-आम गुठलियों के दाम। इस तरह से यह एक ऐसा शहर होगा जो अपने को चलाने के लिए तकनीक का प्रयोग करेगा। मसलन स्मार्ट ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम रास्तों से ट्रैफिक की सघनता के बारे में डाटा इकट्टा करेगा। सेंट्रल कमांड मॉनिटरिंग डाटा इस भीड़भाड़ को कम करने और इमरजेंसी सेवाओं को जारी रखने में मदद करेगा। स्मार्ट पावर ग्रिड या वाटर ग्रिड सारे शहर में सप्लाई को मॉनिटर करने के लिए सेंसर का इस्तेमाल कर सकता है। उसकी सूचनाओं का उपयोग कर सिस्टम पीक आवर और ऑफ पीक आवर में बिजली-पानी वितरित करेगा। इसके अलावा लीकेज भी खोजेगा। स्मार्ट गवर्नेंस वाला शहर पारदर्शी तरीके से सेवाएं देने के लिए भी तकनीक का इस्तेमाल करेगा। तब यदि आप रास्ते चलते कहीं कचरे का ढेर देखें और उसके फोटो को ई-मेल से भेजें या उसे सोशल मीडिया पर डालें को उपयुक्त अधिकरण उसके आधार पर काम करेंगे।

इस तरह की स्मार्ट सिटी के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह है, कि क्या हम चमचमाती इमारतें, सड़कें, मॉल्स इत्यादि बनाना चाहते हैं? लेकिन, स्मार्ट सिटी की सोच इतनी ही नहीं है। स्मार्ट सिटी के समर्थक बताते हैं इसका तात्पर्य है कि नवीनतम डिजिटल तकनीक को शहरी मास्टर प्लान में एक-दूसरे के साथ समायोजित करना। इसमे सेंसर से लेकर बड़े डाटा और सोलर पैनल तक सब शामिल हैं। जहां नवीनतम प्रौद्योगिकी को डिजाइन में ही शामिल कर लिया जाना चाहिए। इस तरह 21वीं सदी के स्मार्ट शहर सूचना व संचार तकनीक के नए अवतार के साथ बुनियादी सुविधाओं के स्मार्ट संयोजन से निर्मित होंगे। स्मार्ट सिटी में तकनीक का इस्तेमाल गुणवत्ता बढ़ाने नागरिकों की बेहतरी और सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। ये सिटी प्रशासकों को शहर के संसाधनों की खपत और उसकी लागत घटाने में सहायक बनाता है।

14-02-2016

भारत में जो परंपरागत शहर हैं, वे बिना किसी नियोजन के बेतरतीब ढंग से बसते रहे हैं। उन्हें बसने में भी सदियां लगी हैं, लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद भी कुछ शहर बनाए गए। खडग़पुर एक ऐसा ही शहर था। स्वतंत्र भारत में चंडीगढ़ एक ऐसा ही शहर था, जो सुनियोजित था और उसमें आधुनिक तकनीकों का समन्वय था। इसके अलावा भी कई नये शहर बसे। जैसे- पंजाब का नांगल और तमिलनाडु का नायवेली। देशभर में इस तरह के सौ के आसपास शहर बसे होंगे। ये सब सफल हुए ऐसा नहीं कहा जा सकता। कुछ पास के बड़े शहरों के साथ विलीन हो गए या फिर वहां इतनी आबादी नहीं हुई कि शहर के रूप में जिंदा रह सके। लेकिन, ये सब नई स्मार्ट सिटीज के पूर्वज कहे जा सकते हैं।

भारत ही नहीं पूरी दुनिया में स्मार्ट सिटी बसाने के लिए काम काफी तेजी से हो रहा है। इन दिनों चीन, यूएई और दक्षिण कोरिया में स्मार्ट सिटी डेवेलप करने के प्रोजेक्ट्स में तेजी आई है। चीन में तिनच्यांग नॉलेज सिटी समेत सुहो, गोंजो, सिहॉन स्मार्ट सिटी बनाने पर काम काफी तेजी से चल रहा है। स्पेन के बार्सिलोना और फ्रांस के मॉन्तपेलियर को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिया जा सकता है। दुनिया में स्मार्ट शहरों के कई उदाहरण हैं – मसलन, सिलिकॉन सिटी के रूप में सैन फ्रांसिस्को व बेंगलुरू, नॉलेज सिटी के रूप में दुबई, इंटरनेशनल ट्रेड हब के रूप में सिंगापुर, ऑटोमोबाइल सिटी के रूप में डेट्रॉयट।

हमारे देश में स्मार्ट सिटी बसाने की खास वजह यह है कि शहरीकरण बहुत तेजी से हो रहा है। क्योंकि, वर्ष 2008 में जहां 34 करोड़ भारतीय शहरों में थे, वहीं 2030 तक इनकी तादाद बढ़कर 59 करोड़ होने का अनुमान है। देश की इतनी बड़ी आबादी को बसाने और उनके लिए रोजगार मुहैया कराने के लिये ज्यादा-से-ज्यादा स्मार्ट शहर बसाने होंगे। इतनी स्मार्ट सिटी बसाने का काम कैसे किया जाएगा? स्मार्ट सिटी दो तरह से बसाई जाएंगी। पहला, कुछ पुराने शहरों को ही स्मार्ट सिटी में तब्दील किया जाएगा और दूसरा, पूरी तरह नये शहर बसाकर। लेकिन, दोनों ही तरीकों से शहरों को विकसित करने में 20 से 30 साल लग जाएंगे।

प्रधानमंत्री मोदी के दिमाग में तो स्मार्ट सिटी की योजना पहले से है। गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने गुजरात के धोलेरा को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद शुरू की थी। गुजरात के गांधीनगर के पास 21वीं सदी का चमत्कारी शहरी प्रयोग है धोलेरा। अहमदाबाद एयरपोर्ट से 18 किलोमीटर दूर स्थित शहर को ‘गिफ्ट’, यानी गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस-टेक सिटी का नाम दिया गया है। इस शहर का पहला चरण पूरा हो चुका है। तीन चरणों में यह शहर आकार लेगा। ‘गिफ्ट’ में बीस हजार रिहायशी फ्लैटों के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए 110 ऊंचे टॉवर बनाए जा रहे हैं। इनमें एक की ऊंचाई करीब 420 मीटर होगी। इसके साथ ही शहर में कई रिहायशी बहुमंजिली इमारतें भी होंगी। गिफ्ट शहर में मल्टीलेवल कार पार्किंग बन रही है। जिसमें एक साथ 60 हजार गाडिय़ां पार्क होंगी।

अक्सर कहा जाता है, कि नए स्मार्ट सिटी बनाने के बजाय हम अपने पुराने शहरों को ही स्मार्ट सिटी क्यों नहीं बनाते है। लेकिन, यह काम कई वजहों से नामुमकिन है। सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे ज्यादातर पुराने शहर अनियोजित हैं। उनकी सही मैपिंग तक उपलब्ध नहीं है। इन शहरों की 70 से 80 फीसदी आबादी अनियोजित इलाकों में रहती हंै। इन इलाकों में लगातार आवाजाही होती रही है। ऐसे में आप काम की शुरूआत भी कैसे कर पाएंगे। इससे आसान तो होगा कि नए शहरों को ही बसाया जाये। जहां हर चीज की प्लानिंग पहले से की गई हो। स्मार्ट सिटी बसाने का लाभ यह होगा कि गांवों से होने वाले आबादी के पलायन का बोझ महानगरों पर नहीं पड़ेगा। यूं भी बेतरतीब और अनियोजित तरीके से बसे शहरों से अच्छा है कि शहर पूर्व नियोजित तरीके से भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाये जायें। लेकिन, सबसे बड़ा सवाल यह है कि 100 स्मार्ट सिटीज पर अरबों रूपये खर्च होंगे वो आंएगे कहां से? कहना न होगा कि नये शहरों पर खर्च होने वाले पैसे का एक हिस्सा राज्य सरकारें देंगी। सरकार को उम्मीद है कि प्राइवेट सेक्टर भी इसमें खुलकर निवेश करेगा। अमेरिका, फ्रांस, जापान और सिंगापुर पहले ही स्मार्ट सिटी के कार्यक्रम में मदद और निवेश करने का आश्वासन दे चुके हैं।

विशेषज्ञ कहते हंै कि स्मार्ट सिटी तभी सफल हो सकती हैं, जब केवल तकनीक लागू करने के अलावा उनके आर्थिक विकास की योजना भी हो। हर सिटी के पास रोजगार सृजन, उत्पादकता, आर्थिक समावेशीकरण, टिकाऊपन आदि के बारे मे स्पष्ट लक्ष्य होने चाहिए। दरअसल स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में भी तेज रफ्तार से अर्थव्यवस्था चलाने की क्षमता है। यदि स्मार्ट सिटी की योजना सफल होती है तो स्टील, सीमेंट, निर्माण, बिजली और इंफोटेक आदि क्षेत्रों की कंपनियां तेजी से फैलेंगी और फूलेंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि 500 एकड़ जमीन पर स्मार्ट सिटी बसाई जाएगी तो दो लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। इस तरह के 10 शहर नौ लाख करोड़ का निवेश लाएंगे।

यह परियोजना विदेशी कंपनियों में भारी दिलचस्पी पैदा करेगी। वे इसमें भागीदार बनना चाहेंगी। शहरी विकास के क्षेत्र में तो इसका असर तुरंत दिखाई देने लगेगा। अभी स्थिति यह है, कि रोजगार और बेहतर जिंदगी की तलाश में लोग गांव से शहर जाते हैं। लेकिन अभी स्थिति ऐसी है कि मौजूदा शहर इन लोगों को रोजगार और पनाह देने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में ये स्मार्ट सिटी उनका विकल्प बन सकती हैं। अगर वहां रोजगार के अवसर बड़े पैमाने पर पैदा हों।

इस तरह हालात बदलने से अप्रत्याशित आर्थिक समृद्धि आएगी। जिसका सपना मोदी देख रहे हैं। शहरी विकास का सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा। जब 100 स्मार्ट सिटी बनेंगी तो सारी अर्थव्यवस्था फलेगी-फूलेगी, उद्योग लहलहाएंगे, करोड़ों लोगों को रोजगार मिलेगा। इस परियोजना को पूरा होने में 20 साल तो लगेंगे ही। इस तरह स्मार्ट सिटी योजना देश की अर्थव्यवस्था की गहराती समस्याओं का स्मार्ट समाधान साबित होंगी।

सतीश पेडणेकर

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