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नापाक इनकार

नापाक इनकार

अनुपम खेर को कराची साहित्योत्सव (केएलएफ) के न्यौते पर जाने के लिए पाकिस्तान ने वीजा देने से इनकार कर दिया। हालांकि, दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायुक्त ने कहा कि जाने-माने फिल्म कलाकार ने वीजा के लिये कभी अर्जी ही नहीं दी, लेकिन के. एल. एफ. की निदेशक अमीना सैयद ने कराची में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि नई दिल्ली के पाकिस्तानी उच्चायोग से उन्हें सलाह दी गई थी कि अनुपम खेर से वीजा की अर्जी न डालने को कहें, क्योंकि उन्हें वीजा जारी नहीं किया जाएगा। हालांकि 17 कलाकारों-साहित्यकारों को वीजा दे दिए गए और अनुपम खेर को इनकार कर दिया गया। यहां यह जिक्र भी किया जाना चाहिए कि उन्हें तीसरी बार वीजा देने से मना किया गया है, जो दोनों के रिश्तों के लिए अच्छा नहीं कहा जाएगा। इसके विपरीत, पाकिस्तान के कलाकारों, गायकों, अभिनेताओं, क्रिकेट खिलाडिय़ों और लेखकों को भारत नियमित रूप से वीजा देता रहा है। अनुपम खेर को वीजा देने से इनकार करने की वजह एकदम साफ है। आखिर वे कश्मीरी पंडितों के कश्मीर घाटी में वापसी का आंदोलन चलाते रहे हैं। कश्मीरी पंडितों की त्रासदी भुलाई नहीं जानी चाहिये। सवाल है कि पाकिस्तान कश्मीरी पंडितों से इतना डरा हुआ क्यों है? क्या वह पंडितों के कत्लेआम को शह देने के बाद उनके वजूद से ही इनकार करता है? या फिर वजह यह है कि खेर ने असहिष्णुता के मामले में खुलकर अपने दिल की बात की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना कर चुके हैं। इसके अलावा तो कोई वजह नहीं दिखती कि उन्हें वीजा क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।

कश्मीरी पंडितों के खिलाफ पाकिस्तानी सरकार के रवैया की पुष्टि वहां हिंदुओं के लगातार उत्पीडऩ से भी होती है, जो अब भारत के लिये भारी चिंता का विषय बनता जा रहा है। हुक्मरानों की शह से इस्लामी कट्टरवादियों ने वहां के असहाय हिंदुओं के लिये भारत में शरण लेने के अलावा कोई चारा ही नहीं छोड़ा है। हाल में 600 से ज्यादा हिंदू भारत भाग आये और वहां उत्पीडऩ से बचने के लिये दिल्ली के बिजवासन में शरण लिये हुए हैं। यह तो असहिष्णुता की इंतहा है। कहां हैं आमिर खान, शाहरुख खान और पुरस्कार वापसी बिरादरी?

सेक्युलर ब्रिगेड और पुरस्कार वापसी जमात की चुप्पी कोई आश्चर्यजनक नहीं है। आखिर, ये वही लोग हैं जिन्होंने हमेशा पाकिस्तान की वकालत की है। ये वही लोग हैं जो भारत-पाक रिश्तों की बात छिडऩे पर फौरन सिक्का उछाल देते हैं और सिक्का चाहे जिस ओर गिरे, कूटनीति में जीत पाकिस्तान की ही होती है। कितना दयनीय है भारतीय उदारवादियों का पाकिस्तान का पक्ष लेना, जो झूठ पर झूठ बोलता रहा है। उनके लिए तो शायद अनुपम खेर ही झूठे है, क्योंकि वे भाजपा का समर्थन करते हैं, जबकि पाकिस्तान तो ‘सच्चाई और ईमानदारी’ का ‘देवदूत’ है। जरा सोचिये, यही पाकिस्तान इनकार करता रहा है कि कसाब पाकिस्तानी था और दुनिया से यह भी कहता रहा कि उसे बिन लादेन के ठिकाने को कोई पता नहीं है। लेकिन अमेरिका ने पता लगा लिया कि लादेन पाकिस्तान में छुपा है और पाकिस्तान के फौजी अकादमी के पास बड़े बंगले में रह रहा है। पाकिस्तान उन सभी आतंकी वारदातों से भी इनकार करता रहा है जो उसने भारत की धरती पर अंजाम दिये हैं। हालांकि भारत ने उसे लगातार पुख्ता सबूत सौंपें हैं। 26/11 हमले पर न जाने कितने किलो कागजात सौंपें गये होंगे और अब पठानकोट हमले के ढेरों सबूत भी दिये गये हैं। लेकिन, पाकिस्तान हमेशा और सबूतों की मांग करता रहा है।

अब पाकिस्तान अनुपम खेर से भी जवाबी सबूत पेश करने की मांग कर रहा है। लगता है उसे कागजों की बहुत दरकार है और वहां कबाड़ी का कारोबार बड़े पैमाने पर होता है। भारत से चुटकी लेना पाकिस्तान की आदत में शुमार हो गया है। हर छोटे-मोटे मामले में उसे भारत को चिढ़ाने में मजा आता है। फिर भी हम सुलह की उम्मीद पाले हुए हैं और लगातार सक्रिय रहते हैं! हमारी कोशिशें कभी नहीं रुकतीं। अनुपम खेर को वीजा देने से इसलिए इनकार किया गया, क्योंकि वे कश्मीर के हिंदू पंडित हैं और उन्होंने भारत की छद्म-सेक्युलर बिरादरी को तथाकथित असहिष्णुता के मामले में आईना भी दिखाया है। इसलिए यह कहा जा सकता कि पाकिस्तान ने अनुपम खेर को साहित्योत्सव में जाने के लिये वीजा देने से इनकार करके मूर्खता की है, क्योंकि साहित्य के आयोजन में तो विचारों पर सेंसरशिप का मामला कभी नहीं उठता। क्या पुरस्कार वापसी ब्रिगेड आगे आएगी और इसकी निंदा करेगी या फिर यही कहेगी कि वे पाबंदी के ही काबिल हैं?

बहरहाल, उस देश में न जाने से कुछ खो नहीं गया जहां खासकर भारत और अफगानिस्तान के लिये सिर्फ आतंकवाद ही जन्म लेता है। शायद पुरस्कार वापसी जैसी भारतीय बिरादरी ही हमेशा पाकिस्तान की रट लगाये रहती है। लेकिन वह वैसे ही बेमानी है, जैसे यहां वह बिरादरी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

апостол мунтянлобановский харьков

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