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पारंपरिक वस्त्र कला की राजसी शान

राजस्थान व गुजरात की सीमाएं जुड़ी हुई होने व जलवायु में भी समानता होने के कारण यहां के जनजीवन में बहुत समानता है। प्रतिवर्ष असंख्य विदेशी पर्यटक यहां के नैसर्गिक सौंदर्य का आनन्द लेने व यहां की परम्परागत कला को दुनिया भर में संजोकर ले जाने के लिए आते हैं।

यहां की पारम्परिक वस्त्र कला का बेहद आकर्षण है। बांधनी, जैसा कि इसके नाम से ही प्रतीत होता है बांधकर, रंगों से सजाकर कुछ आकर्षक वस्त्र तैयार करना। इसके लिए दोनों ही राज्य बहुत प्रसिद्व हैं। बांधनी बनाने के लिए कपड़े में दाल के महीन दानों को रखकर उसे धागों की सहायता से कसकर बांधकर विभिन्न ज्यामितीय आकार में रंगों से रंगकर वस्त्र तैयार किए जाते हैं। वस्त्र के सूखने के बाद धागे खोल दिए जाते हैं। बीच वाला स्थान जो कि धागे से बांधा जाता है वह सफेद रह जाता है बाकी अन्य रंग में रंग जाता है, जो कि देखने में बहुत सुंदर लगता है। बांधनी में काम आने वाले रंग मूलत: वनस्पतियों से प्राप्त किए जाते हैं।

जितनी बारीक बांधनी होगी उसका उतना ही अधिक मूल्य होता है, क्योंकि उसमें उतना ही अधिक श्रम, समय व लागत आती है। घरों में महिलाएं ये कार्य इतनी तत्परता से करती हैं कि इसे देखकर आश्चर्य होता है। निगाहें कहीं भी हों, किंतु उनके हाथ जरा भी इधर से उधर नहीं फिसलते हैं।

आजकल यह कार्य आमदनी का बहुत बडा स्रोत बन गया है। इसकी बढ़ती हुई मांग को देखकर फैशन विधाताओं ने इस क्षेत्र में विविध नवीन प्रयोगों के द्वारा क्रांति ला दी है। यह कला राजस्थान के जयपुर, सांगनेर, बगरू व जोधपुर में बहुत प्रचलित है, जबकि गुजरात में जामनगर व सौराष्ट्र में बांधनी के अलावा लहरिया भी बहुत प्रसिद्व है। लहरिया यानि की लहरों जैसा। इसमें डिजाइन एक कोण से दूसरे कोण तक रेखाओं व लहरों के रूप में एक ही रंग या मिले-जुले रंगों में तैयार किया जाता है।

राजस्थान में श्रावण मास की तीज पर लहरिया पहनना सधवा स्त्रियों के लिए सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। कोटा डोरिया की बांधनी की साडिय़ां भी बहुत सुंदर लगती हैं।

बांधनी के अलावा ब्लॉक प्रिटिंग भी अपनी शैली का एक अनूठा उदाहरण है। इल कलाओं के जीवित रहने में दोनों राज्यों की सामाजिक व भौगोलिक संरचना का अहम हिस्सा है। कशीदाकारी भी अनूठी कला है, जिसमें कपडों पर रंग-बिरंगें धागों, कांच के टुकड़ों, मोतियों, शंख व सीप का प्रयोग होता है। कपडों पर फूल-पत्ते, बेल-बूटे, जानवरों व मनुष्यों की आकृतियों को उभारा जाता है। पश्चिमी राजस्थान व गुजरात के कच्छ में इसका ज्यादा प्रचलन है। जितनी ज्यादा कशीदाकारी होगी उतना ज्यादा दाम होगा। कशीदाकारी के तोरण, बांदनवार, चनिया-चोली आदि बहुत प्रचलित हैं। गुजरात के पाटन की पटौला सिल्क की जरी की हस्तनिर्मित साडिय़ां, शाल भी बहुत प्रसिद्व हैं।

राजस्थानी छपाई की चादरें, सिले-सिलाए वस्त्रों से सजे-धजे बाजार बड़े मनमोहक लगते हैं। इनका बहुत बड़ी मात्रा में निर्यात किया जाता है। इसके अतिरिक्त राजस्थान के प्रसिद्व दरी, नमदों, गलीचों का उल्लेख करना भी आवश्यक है। जयपुर के आमेर के राजा मानसिंह हैरात से गलीचे बुनने वाले कारीगर लाए थे, जिन्होंने करघे स्थापित किए तथा स्थानीय लोगों को गलीचे बुनने का प्रशिक्षण दिया। यद्यपि बाजारों में मशीनों से बुने गलीचे काफी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं, किंतु जयपुर के हाथ से गांठों के संयोजन से बनाए गलीचों की देश में ही नहीं विदेशों में भी बहुत मांग है। गांवों में करघों पर दरियां बुनी जाती हैं। विभिन्न रंगों की बहुत सुंदर डिजाइन की दरियां घरों में स्त्रियां बुनती हैं। जेल में बंदी भी गलीचे व दरी बुनने का काम करते हैं।

टौंक के ऊन के बने नमदे एक उन्नत किस्म की दरी जैसे ही होते हैं। जैसलमेर व बाड़मेर में ऊंट बहुतायत में पाए जाते हैं, अत: इन जिलों में ऊंट के बालों से नमदे बनाए जाते हैं। टौंक में ऊन के बने नमदों पर पैबन्द बनाकर फलपत्रों के डिजायन बनाए जाते हैं। इनकी कीमत गलीचों की अपेक्षा काफी कम होती है।

जयपुरी पतली रजाईयां जिनका वजन बहुत हल्का होता है तथा ये पर्याप्त गर्म होती हैं। आजकल खुशबू वाली पतली रजाईयों का निर्माण काफी मात्रा में होता है, जिनका भी निर्यात होता है।

राजस्थान व गुजरात के निवासियों का कला प्रेम, सौंदर्य प्रेम, कठोर परिश्रम, लगन व धैर्य ही इन राज्यों की वस्त्र कला को उन्नति की ओर ले जाने में सहायक रहा है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों में भी कड़ी मेहनत से सुंदर-सुंदर वस्त्र बनाकर देश में ही नहीं, विदेशों में भी इनसे आय अर्जित की जाती है।

आवश्यकता है तो सिर्फ सरकारी प्रोत्साहन तथा आर्थिक सहायता की, ताकि ये कलाएं दिन-प्रतिदिन उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हों तथा उनकी लोकप्रियता में निरंतर वृद्वि हो।

डॉ कृष्णा शुक्ला

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