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आचार्य गिरिराज किशोर: एक महान राष्ट्रऋषि

हिन्दू हितों की बात करने के कारण उन्हें उन राजनीतिक दलों द्वारा दक्षिणपंथी कहा जाता था, जो स्वयं तुष्टीकरण की राजनीति में आकंठ डूबे हुए हैं। लेकिन भारत का अधिसंख्य वर्ग आज भी एक ऐसे पुरूष के रूप में देखता है, जो एक देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए हमेशा ही अपनी आवाज बुलंद रखते थे।

निष्ठा कर्म को उत्प्रेरित करती है और कर्म धर्म को। धर्म से मानवता और प्रकृति के साथ अस्तित्व की भावना का विकास होता है। धर्म से अभिप्राय आत्मसंयम से विकसित उस आचरण से है जो सत्य पर आधारित होकर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय को भलीभूत करते हुए सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे भवन्तु निरामया: के अप्रीतम भाव तक पहुंचा सके। अपने कर्म से धर्म की इस स्थापित मान्यता को जन-जन तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत एक महान व्यक्ति का 13 जुलाई की रात को देहावसान हो गया। इस व्यक्ति का नाम है आचार्य गिरिराज किशोर।

4 फरवरी 1920 को उत्तर प्रदेश के एटा के मसौली ग्राम में जन्मे आचार्य का पूरा जीवन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए मानवता के उन उदार मूल्यों को स्थापित करने में बीता, जिसके ह्रास के गाथा की चर्चा प्राय: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किया करती है। श्री श्यामलाल और श्रीमती अध्योया देवी के मंझले पुत्र के रूप में जन्मे आचार्य की प्राथमिक शिक्षा हाथरस और अलीगढ़ में हुई। आगरा से अपने इंटर की शिक्षा के दौरान उनकी मुलाकात संघ के दीनदयाल उपाध्याय और भाऊ जुगादे से हुई और अंतत: संघ के निमित्त अपने जीवन को समर्पित करने का उन्होंने निर्णय ले लिया और बाद में संघ के प्रचारक बने।

आचार्य गिरिराज का जीवन लक्ष्य और निष्ठा पर आधारित था। भारत की खोई हुई गरिमा को वापस लाने के लिए वे संघ के प्रचारक बने। प्रचारक के रूप में मैनपुरी, आगरा, धौलपुर, जालौन, उड़ीसा सहित देश के कई भागों में पुनर्रूत्थान के लिए कार्य करते रहे। महात्मा गांधी की हत्या में षड्यंत्रपूर्वक संघ का नाम आने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी के अनमोल 13 महीने मैनपुरी, आगरा, बरेली और वाराणसी की जेलों में बिताए। जेल से मुक्त होने के बाद उन्होंने आगे की शिक्षा जारी रखते हुए इतिहास, हिन्दी और राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। भारतीय संस्कृति के मूल्यों को और नजदीक से परखने के लिए उन्होंने संस्कृत में साहित्य रत्न और प्रथमा की परीक्षा उत्तीर्ण कर भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की पुस्तकों का गहन अध्ययन किया।

राष्ट्र के लिए स्वयं को समर्पित कर चुके आचार्य के जीवन में उस वक्त एक नया मोड़ आया जब छोटे भाई की मृत्यु के बाद परिवार का बोझ उन पर आ गया। परिवार के जीवकोपार्जन करने के लिए उन्हें मध्य प्रदेश के भिंड के अड़ोखर महाविद्यालय का प्राचार्य बनाया गया। कहा जाता है कि इस दौरान महाविद्यालय के छात्रावास के छात्रों को डाकूओं के आक्रमण से बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी।

संगठन के प्रति उनकी लगन और निष्ठा को देखते हुए उन्हें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया और बाद में उन्हें संगठन का महामंत्री बनाया गया। उनके सांगठनिक कौशल में दिल्ली में पहली बार विद्यार्थी परिषद् को विजयश्री ने वरण किया। बाद में उन्होंने जनसंघ के संगठनमंत्री के रूप में राजस्थान को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।

समझौतावादी रुख सार्वजनिक जीवन का अहम हिस्सा होता है। लेकिन संघ को एक ऐसे संगठन के रूप में विश्व भर में जाना जाता है जो संवाद के लिए तैयार तो रहता है, लेकिन समर्पण का रूख नहीं अपनाता और इसमें आचार्य का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। अयोध्या में राममंदिर आंदोलन की नींव रखने से लेकर उसे अपने लक्ष्य तक पहुंचाने में सफल रहे आचार्य ने राममंदिर को लेकर कभी कोई समझौतावादी रूख अपनाने से इंकार कर दिया। राममंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने कहा था कि दुनिया की कोई शक्ति राम मंदिर के निर्माण को नहीं रोक सकती, न्यायपालिका भी नहीं।

केरल के मीनाक्षीपुरम् में 1979 में जब एक ही गांव के 3 हजार लोगों ने इस्लाम अपना लिया था, तब चिंतित तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने डॉ. कर्ण सिंह को कुछ करने को कहा। उन्होंने संघ के साथ मिलकर विराट हिन्दू समाज नाम से एक संस्था बनाई। संघ की ओर से इस काम के लिए अशोक सिंघल को नियुक्त किया। इस संगठन ने देश के कई हिस्सों में विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया, जिसकी पूरी जिम्मेवारी आचार्य के कंधों पर रही। उनके नेतृत्व कौशल और समर्पण को देखते हुए संघ ने उन्हें 1983 में विश्व हिन्दू परिषद् के साथ काम करने का दयित्व सौंप दिया। उनके कार्यों को देखते हुए अशोक सिंघल अक्सर उन्हें फील्ड मार्शल कहा करते थे। संघ में अशोक सिंघल और आचार्य गिरिराज किशोर को राम-लक्ष्मण की जोड़ी कहा के रूप में देखा जाता था। दोनों की वेश-भूषा में अंतर जरूर दिखता था, लेकिन दोनों की भाषा और भाव एक होते थे। दोनों ही हिन्दू अधिकार और हिन्दू हित की बात करते थे।

बाबरी मस्जिद के राजनीतिकरण को लेकर उन्होंने कभी भाजपा पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा था कि हमारी सबसे बड़ी गलती यह रही कि हमने भाजपा को अपना आंदोलन हाईजैक करने दिया। पेसमेकर लगा होने के बावजूद आचार्य मंदिर आंदोलन में पूर्ण सक्रिय थे। ढांचा गिराने की आठवीं वर्षगांठ पर आचार्य को उत्तर प्रदेश में गिरफ्तार किया गया, लेकिन समर्थकों के कारण उन्हें जेल से रिहा करना पड़ा। सन 2003 में विश्व हिन्दू के कार्यकर्ताओं को संबोधित करने के कारण उन्हें अपने 1,000 समर्थकों के साथ लखनऊ में गिरफ्तार किया गया। अपने बयानों के कारण आचार्य को कई बार विवाद में फंसना पड़ा। उन्होंने सोनिया गांधी पर विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि जिस दिन इंदिरा गांधी की हत्या हुई, उस दिन उन्होंने अपना बुलेटप्रूफ जैकेट नहीं पहना था। जिस दिन राजीव गांधी की हत्या हुई, उस दिन सोनिया गांधी उनके साथ नहीं थीं। इसके कारण सोनिया गांधी की भूमिका संदेहास्पद है।

2010 में लिव-इन रिलेशनशिप को मान्य करार देने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा श्रीकृष्ण और राधा का उदाहरण देने के कारण उन्होंने न्यायालय की सार्वजनिक रूप से आलोचना की थी। उन्होंने कहा कि 12 वर्ष की बाल्यावस्था में कृष्ण ने वृंदावन को त्याग दिया था। कृष्ण और राधा का दैवीय प्रेम बाल्यावस्था का था। ऐसे में तथ्यहीन संदर्भ देना न्यायालय की मर्यादा को कम करता है। उन्होंने कहा था कि न्यायाधीश महोदय को पहले तथ्यों को जानने की जरूरत है। उन्हें अपने दिए गए संदर्भ को तुरंत वापस लेना चाहिए। आचार्य ने लिव इन रिलेशनशिप को स्वतंत्रता नहीं, बल्कि स्वच्छंदता बताते हुए व्याभिचार को बढ़ाने वाला बताया था।

हिन्दू हितों की बात करने के कारण उन्हें उन राजनीतिक दलों द्वारा दक्षिणपंथी कहा जाता था, जो तुष्टीकरण की राजनीति पर विश्वास रखते हैं। लेकिन भारत का अधिसंख्य वर्ग आज भी उन्हें एक ऐसे पुरूष के रूप में याद करता है, जो देश की बहुसंख्यक आबादी के लिए हमेशा ही अपनी आवाज बुलंद रखता था। 94 वर्ष की अवधि में प्रोस्टेट कैंसर के कारण उनकी इहलीला समाप्त जरूर हो गई, लेकिन मानव कल्याणार्थ उन्होंने अपने शरीर को दान कर जाते-जाते अपना सब कुछ यहीं सौंप कर सदगति की ओर प्रस्थान कर गए।

सुधीर गहलोत

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