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‘गहलोत सरकार’ कठघरे में

अगर सरकार ही कर की चोरी तथा कानून का उल्लंघन करने लग जाए तो आम आदमी का क्या होगा और अगर सदन यह देख कर भी मौन बैठा रहे तो फिर आम आदमी के विश्वास का क्या होगा? पिछली सरकार ने ये दोनों काम किए। चोरी करके और क्षमा मांग लेना अपराध को कम करना नहीं है।

इस भावना के साथ भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ विधायक राव राजेन्द्रसिंह ने राजस्थान विधानसभा में 2014-15 के परिवर्तित बजट पर हुई बहस के माध्यम से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार (2008-2013) को कठघरे में खड़ा करते हुए संविधान के उल्लंघन, सदन की गरिमा की अवहेलना तथा वित्तीय अभिलेखों के आंकड़ो में विसंगतियों को विस्तार से रेखांकित किया।

संविधान के अनुच्छेद 202 और बजट के संदर्भ में बहस की शुरूआत में राव राजेन्द्रसिंह ने कहा कि सदन में बजट पर अपनी बात अभिव्यक्त करते हैं तो दलों की मर्यादा को पहले ध्यान में रखा जाता है और संविधान की मर्यादाओं को अनदेखा करने की हम भूल कर बैठते हैं। बजट और तत्संबंधी दस्तावेजों की शत-प्रतिशत सत्यता के संदर्भ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान के संघीय ढांचे के तहत गठित सरकार के वित्त विभाग द्वारा लेखा-जोखा पेश किया जाता है, वहीं संवैधानिक संस्था महालेखाकार की रिपोर्ट भी सदन में प्रस्तुत की जाती है। अगर इन दोनों अभिलेखों में विरोधाभास हो तो हम किसे सत्य मानें? इसके उदाहरण स्वरूप बजट भाषण तथा ‘बजट ऐट ए ग्लांस’ में पिछले वित्तीय वर्ष में ढ़ाई हजार करोड़ के राजस्व घाटे का उल्लेख है, लेकिन कम्पट्रोलर ऐंड ऑडिटर जनरल के बजट एस्टीमेंट की साईट में यह घाटा 5328 करोड़ रूपये का दिखता है। यह बजट एस्टीमेंट (बीई.) का घाटा है और इसके बाद रिवाइज्ड एस्टीमेट (आर.ई.) होने के बाद 31 मार्च से लगाकर आज हम जुलाई के अंतिम पड़ाव पर हैं। यदि इन दोनों अभिलेखों का तुलनात्मक विश्लेषण करेंगे तो चाहे पूंजीगत खर्च हो या राजस्व खर्च हो अथवा पूंजीगत प्राप्तियां हो या राजस्व प्राप्तियां हो, हर एक के उपनाम और उपशीर्ष में आपको भिन्न-भिन्न आंकड़े मिलेंगे। उन्होनें कहा कि वित्त विभाग द्वारा समय-समय पर प्रेषित आंकड़े सदन के पटल पर भी रखे जाते हैं जो आम लोगों के सामने भी जाते हंै और जो सीएजी का अभिलेख होता है, अगर उनमें भिन्नता हो तो आसन कम से कम उस पर अपनी व्यवस्था प्रदान करें कि सदन के 200 सदस्य और छ: करोड़ 85 लाख की जनता किन अभिलेखों पर विश्वास कर राज्य सरकार और राज्य की वित्त स्थिति के संबंध में अपना मंतव्य स्थापित करें।

इसी श्रृखंला में राव राजेन्द्रसिंह ने कहा कि अगर हम अद्र्धवार्षिक बजट एस्टीमेट देखते हैं और सीएजी के दस्तावेज देखते हैं तो सितम्बर 2013 में सीएजी ने अपनी साईट अपडेट की जब भी 2066.68 करोड़ का राजस्व घाटा बता दिया और उस वक्त की सप्लीमेंट्री ग्रांट सिर्फ 3918 करोड़ का था, जो हम सितम्बर के मध्य में लेकर आए। इसके बाद वर्तमान सरकार को बाध्य होकर पिछली वित्तीय व्यवस्था के कुप्रबंध से 5200 करोड़ की सप्लीमेंट्री ग्रांट (पूरक अनुदान मांगे) लेनी पड़ी और जब सप्लीमेंट्री ग्रांट से हम दस हजार करोड़ से अधिक ले गए तो आर्थिक परिस्थिति और पृष्ठभूमि दोनों बिगड़ीं।

उन्होनें याद दिलाया कि सदन में 2013-2014 के बजट में भी गलत आंकड़े दिए गए और 1025 करोड़ का राजस्व आधिक्य बताया गया। मध्यकालीन विश्लेषण पर सीएजी की साइट 2066 करोड़ का राजस्व घाटा बता रही थी। इतना ही नही वित्तमंत्री की ओर से तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री ने सदन में कहा कि हमने राज्य के कोष से जो पैसा अधिक खर्च किया वो कंटीजेंसी से किया। कंटीजेंसी का पैसा, जो आपका कोरपस फंड है 300 करोड़ रूपये रहता है। इसमें से सिर्फ वह पैसा खर्च किया जा सकता है जो आपने कभी फोर्स ही नहीं किया हो। अगर आपके पास राजकोष में उसका पैसा नहीं था तो कंटीजेंसी से पैसा लेने का अधिकार न तो इस सदन ने आपको दे रखा है और ना ही संविधान ने दे रखा है। निवर्तमान सरकार ने संविधान का घोर उल्लंघन किया है। उन्होंने संविधान की और इस सदन की गरिमा की भी अवमानना की। सितम्बर 2013 के सत्र में निवर्तमान संसदीय कार्यमंत्री ने यहां तक कह दिया था कि कंटीजेंसी फंड में पांच हजार करोड़ होता है। जबकि उसका कॉरपस फंड ही 300 करोड़ है। इस संदर्भ में भाजपा विधायक ने कहा कि इस प्रकार की हम यहां अभिव्यक्तियों को लिखित करा देते हैं और जो चाहे वो बोलकर चले जाते हैं। आसन इस बात के लिए आश्वस्त करे कि यहां कही हुई बात अभिलिखित हो और जो अभिव्यक्त की जाती है उसमें सच्चाई का पुट 99 नहीं, सौ प्रतिशत होना चाहिए। क्योंकि संविधान आपसे और हम सबसे कर्तव्य और निष्ठा का पालन करने के लिए सत्य की पराकाष्ठा को सत्य की कसौटी पर पारंगतता के हिसाब से पेश करना चाहता है।

गहलोत सरकार की बहुचर्चित और प्रचारित मुफ्त दवा एवं मुफ्त जांच योजना तथा इसके खर्चे की हकीकत बयां करते हुए विधायक ने बताया कि 2012-13 में परिवर्तित अनुमान (आर.ई.) में मुफ्त दवा के लिए 126 करोड़ खर्च होने की बात थी। वास्तव में खर्चा हुआ 96 करोड़। इसी तरह मुफ्त जांच में आर.ई. में 178.47 करोड़ रूपये की तुलना में केवल 21.55 करोड़ खर्च हुए। दूसरी तरफ साढ़े सात लाख राजस्व कर्मचारियों के वेतन से मेडिकल एड के नाम पर 400 रूपये प्रतिमाह कटौती करके मासिक 30 करोड़ तथा सालाना 360 करोड़ की व्यवस्था पहले ही है फिर मुफ्त दवा जांच का ढिंढोरा पीटने का औचित्य क्या है।

सरकार के स्तर पर कर की चोरी और कानून के उल्लंघन की चर्चा करते हुए भाजपा विधायक ने पिछली सरकार पर यह आरोप लगाया। इसके उदाहरण में उन्होंने बताया कि बिजली वितरण कंपनियों ने जयपुर-जोधपुर नगर निगम क्षेत्र में उपभोक्ताओं से यूजर चार्ज के नाम सत्रह करोड़ रूपये की वसूली की जबकि इलेक्ट्रिसिटी ऐक्ट 2003 में यूजर चार्ज के लिए कोई परिवर्तन या संशोधन नहीं किया गया। फिर घाटे में चल रही कंपनियों ने दस करोड़ रूपये नगर निगम को हस्तांरित कर दिए। पहले तो वसूल करने का अधिकार नहीं था और कम्पनी लॉ यह कहता है कि जो स्वयं घाटे में चल रहा है वह दूसरे को दान कैसे दे सकता है। जिन कंपनियों पर साठ हजार करोड़ का घाटा हो वह अपने खातों से किसी नगर निगम को दस करोड़ दे दे… अगर इस प्रकार का संशोधन यह सदन स्वीकार भी कर ले तो केन्द्र सरकार ने इस तरह की गतिविधियों पर सर्विस टैक्स लगा रखा है। यदि आप और हम किसी काम से उपार्जन करें तो सर्विस टैक्स देना पड़ता है। इसके लिए टैक्स का पिन नम्बर देना पड़ता है। तीनों डिस्काम ने यूजर चार्जेस इक्कठे किए। यूजर चार्जेज करने पर इलेक्ट्रिसिटी ऐक्ट 2003 का उल्लंघन भी हुआ।

यदि इसे आप माफ भी कर देते हंै तो केन्द्र को कर, जो सर्विस टैक्स के हिसाब से देना चाहिए था, उसके लिए न तो अपने आपको पंजीकरण कराया और न उस कर का भुगतान केन्द्र को किया। जब सरकार ही कर चोरी कर रही हो तो आप और हम यहां बहस किस बात की कर रहे हैं। उनकी (पूर्ववर्ती सरकार) दुर्गति जिस प्रकार से होनी थी वह जनता ने तो कर दी, लेकिन इनका जो किया गलत कार्य है वह पुन: नहीं दोहराया जाए और जिन्होंने यह कार्य इनसे करवाया वह नौकरशाही में बैठने वाले लोगों पर आपको प्रताडऩा के रूप में किसी न किसी प्रकार की व्यवस्था देनी पड़ेगी। उद्देश्य यह है कि इस प्रकार की चीज को आप जैसा व्यक्ति आसन पर बैठकर स्वीकार कर ले और सदन इस बात से बेरूखी कर ले कि यहां कुछ भी कहा जाए, यहां कुछ भी अपलिखित किया जाए, किसी भी प्रकार का आंकड़ा पेश किया जाए, कोई मायने इसलिए नहीं रखता क्योंकि कही हुई बात सिर्फ आर्काइव्ज तक सीमित रहती है। आसन भी संविधान से बाध्य है कि संविधान के किसी भी विषय पर आसन की व्यवस्था की नहीं सदन की व्यवस्था होती है।

गहलोत सरकार की महत्वाकांक्षी जयपुर मेट्रो रेल की चर्चा करते हुए राव राजेन्द्रसिंह ने कहा कि इस पर नौ हजार करोड़ रूपये खर्च होंगे तथा ढाई हजार करोड़ से ज्यादा व्यय हो चुके हैं। लेकिन इसके लेखे-जोखे आज तक सदन में पेश नहीं हुए। जयपुर मेट्रो की वेबसाईट पर सितम्बर 2013 की चतुर्थ वार्षिक रिपोर्ट है लेकिन सदन में आज तक पेश नहीं हुई। सी.ए.जी. भी ऑडिट के लिए लेखे-जोखे मांग रहा है। इसी तरह मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को राजस्थान की परिसम्पत्तियां हस्तांतरित करने की व्यवस्था की गई। करीब 123 एकड़ जमीन में से 50 एकड़ जमीन दिए जा चुकी हैं, बाकी आप करने जा रहे हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि आखिर विधानसभा से इसकी अनुमति क्यों नहीं ली गई जो कि अनिवार्य है। हम यह गैर-संवैधानिक कार्य कर रहे हैं। इस प्रचण्ड बहुमत से आई सरकार से हम अपेक्षा करते हैं कि इस प्रकार की पहले सरकारों ने जो परम्परा डाल रखी है इस सदन के सर्वाधिकार की गरिमा को बनाकर रखने के लिए हमें इन पर अंकुश लगाना पड़ेगा।

मुख्यमंत्री ने एक जनवरी 2014 से मीसा एवं डी.आई.आर बंदियों तथा इनके दिवगंतों के परिजनों को प्रतिमाह 12 हजार रूपये पेंशन तथा 1200 रूपये चिकित्सा सहायता देने की घोषणा की। वसुंधरा राजे ने पहले शासनकाल में आपातकाल के दौरान ऐसे बंदियों के लिए पेंशन की घोषणा की थी किंतु गहलोत सरकार ने इस निर्णय पर रोक लगा दी थी। मुख्यमंत्री ने इस दिवाली तक शिक्षकों की भर्ती का भी ऐलान किया। सदन में विभिन्न विभागों की अनुदान मांगों पर चर्चा के साथ तीस जुलाई को वित्त एवं विनियोग विधेयक के जरिए परिवर्तित बजट 2014-15 को मंजूरी दी जाएगी।

गुलाब बत्रा

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