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अनैतिक रिश्ते

इस देश में सदियों से, वैदिक काल से स्वतन्त्रता के बाद अब तक बिना शादी के किसी भी तरह के स्त्री-पुरूष सहवास, ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ को कानून, धर्म, समाज, परिवार या व्यक्ति द्वारा किसी तरह की स्वीकृति-अस्वीकृति का प्रश्न ही नहीं उठा। जब कभी गुप्त सम्बन्धों को देखते तो पंचायत या घरवाले तुरन्त बात बिगडऩे से पहले शादी-विवाह करवाते और रिश्ते को मान्यता दे देते या मिलना-जुलना बन्द करवा देते।

दुनिया के किसी भी धर्म ने बिना शादी, विवाह, निकाह, मैट्रीमनी, मैरेज के किसी स्त्री-पुरूष का पति-पत्नी की तरह सहवास (लिव-इन-रिलेशनशिप) को अधर्म माना है। स्वीकार नहीं किया है। इसे अपराध से कम नहीं माना गया है। नास्तिक समाज भी जो ईश्वर या धर्म में विश्वास नहीं रखते, उन्हें भी बिना शादी स्त्री-पुरूष का सहवास (जिसे फैशनेबल तरीके से ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कहा जा रहा है) अनुचित और अनैतिक लगता है।

हिन्दू, सिख, ईसाई, मुस्लिम, यहुदी, जैन, बौद्ध, ताओ, सिन्तो, कन्फूसियन, पारसी आदि सभी धर्मों में स्त्री-पुरूष सहवास, आपसी रजामन्दी हो या न हो, शारीरिक सम्बन्ध हो या ना हो (सहवास होने पर शक तो होता ही है) कहीं भी, कभी भी स्वीकार नहीं है। इसे पाप ही कहते हैं। आदम और इव के सहवास को स्वभाविक होने पर भी ‘सिन’ का विश्लेषण ही दिया गया है। किसी भी कबीले, जाति, वनवासी, आदिवासी, किसी भी क्षेत्रीय नियमावली में बिना सामाजिक स्वीकृति, आर्शीवाद, मान्यता के रिश्ते को गलत एवं अवांछनीय माना जाता है। विवाह और सहवास की जानकारी सार्वजनिक करना अनुशासन और सामाजिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है। रिश्ता जग जाहिर होना चाहिए, ताकि उससे सुविधानुसार कोई पलट न पाए।

पशु और अमानवीय प्राणी जगत में नर-मादा के रिश्ते का कोई विधान नहीं होता है। परन्तु पशुता से आगे बढ़कर मानवता की सभ्यता का सूत्रपात इसी रिश्ते की नियमावली से ही होता है। यौनाचार की व्याख्या और नियमावली ही गृहस्थ, घर-परिवार रिश्तों की आधार बनती है। उसी की अनुपालना द्वारा घर, परिवार, गांव, जाति, क्षेत्र में जीवनशैली को मान्य, सभ्य, शान्त होने का आधार बनता है।

इस देश में सदियों से, वैदिक काल से स्वतन्त्रता के बाद अब तक बिना शादी के किसी भी तरह के स्त्री-पुरूष सहवास, ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ को कानून, धर्म, समाज, परिवार या व्यक्ति द्वारा किसी तरह की स्वीकृति-अस्वीकृति का प्रश्न ही नहीं उठा। जब कभी गुप्त सम्बन्धों को देखते तो पंचायत या घरवाले तुरन्त बात बिगडऩे से पहले शादी-विवाह करवाते और रिश्ते को मान्यता दे देते या मिलना-जुलना बन्द करवा देते। कभी-कभी कुछ परिस्तिथियों में दंड भी देते।

लिव इन’ का कानूनी पक्ष

हिन्दू मैरिज एक्ट जो 1955 में ही संसद द्वारा पास हुआ, उसमें भी इस तरह के ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की कोई कल्पना नहीं की गई। गन्धर्व विवाह भी इस श्रेणी में नहीं गिना गया। स्त्री पुरूषों के सम्बन्धों में आठ तरह के शास्त्रीय मान्यताओं में भी ‘लिव-इन-रिलेशन’ की मान्यता तो दूर, जिक्र भी नहीं। शरियत आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज नियमावली या बाईबिल, ओल्ड टेस्टामेन्ट में इस रिश्ते का कहीं कोई नाम भी नहीं है और वास्तव में ऐसे रिश्ते को अवैध ही माना गया है।

आज भी सिर्फ भारत ही नहीं, किसी भी देश के कानून में ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ नाम से किसी रिश्ते को मान्यता नहीं है। किसी तरह के कानून न होने पर भी भारत में सबसे पहली बार सर्वोच्च न्यायलय (सुप्रीम कोर्ट) ने सन् 2010 में बद्री प्रसाद बनाम डिप्टी डाइरेक्टर ऑफ कन्सोलीडेशन में ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ को न्यायिक मान्यता दी।

सन् 2000 और 2010 के बीच, शादी के किए गए आश्वासन को अन्तत: क्रियान्वित नहीं करने की नियत या अन्यत्र नए साथी के साथ रहने लग जाने या चेष्टा करने के कई मसले कोर्ट में आए। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे अनेक केसों में पीडि़ता स्त्री को मुआवजा और अधिकार दिलाने वाले और सहवास से जन्मी सन्तान पुत्र/पुत्री को पितृत्व (पिता का नाम) अधिकार दिलाने के न्यायिक दृष्टि से इस तरह के सहवास के रिश्ते को शादी, विवाह के समकक्ष मान लिया और ऐसा ही बराबर का दर्जा दे दिया। ऐसे किस्सों में सहवास ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ को शादी की तरह मानने के लिए हिन्दू मैरिज ऐक्ट में और अन्य धर्मों के संबंधित विवाह कानूनों के अनुसार शादी के योग्य पात्रता होना एक आवश्यक शर्त रखी गई। लिव-इन-रिलेशनशिप में भी लड़के की उम्र 21 वर्ष से कम न हो, लड़की 18 वर्ष से कम न हो, दोनों में से कोई भी शादीशुदा न हो आदि जरूरी है। स्त्री-स्त्री, पुरूष-पुरूष जैसे एकल लिंगीय लिव-इन-रिलेशनशिप मान्य नहीं है।

कुछ मामूली समय या एक-दो मुलाकात या वॉकिंग रिलेशनशिप, वन-नाईट-स्टेंन्ड इत्यादि लघु सम्बन्धों को न्यायलयों ने शादी के समक्ष गिनने से इंकार कर दिया। ये सब अवांछनीय यौनाचार है। विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध भी गलत है। पाप है। अधर्म है। अभी भी कितनी अवधि सहवास की हो कि उसे शादी का दर्जा माना जा सके, ऐसा कोई न्यायालय द्वारा निश्चित नहीं किया गया है। इस बारे में विधान तो है ही नहीं। इसका निर्णय परिस्थितियों के आधार पर और न्यायधीश की समीक्षा पर निर्भर है।

सन् 2000 से पहले भी और स्वतंत्रता के पहले कुछ मामलों में प्रिवी काउन्सिल (ब्रिटिश राज में सर्वोच्च न्यायालय) ने भी कई तरह के सहवास की स्तिथियों को शादी का दर्जा दिया और पीडि़ता को न्याय दिलाया। इससे पीडि़त स्त्री को न्याय मिलने का रास्ता खुला। सभ्य समाज कभी भी स्त्रियों पर अन्याय या अत्याचार नहीं सह सकता। फिर भारत में तो नारी नारायणी है। मां है। देवी है। मातृ शक्ति है। सदा से पूज्य ही है।

लिव इन’ से समस्याएं’

जिस तरह से पश्चिमी संस्कृति की हवा चल रही है युवक-युवती उसी तरह के तौर-तरीके और सांस्कृतिक डांचे में ढ़ल रहे है। पहनावा, रहन-सहन, खान-पान, सोच, शिक्षा, चाल-चलन, हर चीज में व्यक्तिगत स्वछन्दता, सब कुछ पश्चात्य शैली की तरह है।

नर्सरी से लेकर विश्वविद्यालय तक लड़के-लड़की सह शिक्षा का ही बोल बाला है। मौजूदा व्यवस्थाओं में अगर बच्चे हॉस्टल में पढ़ रहे हैं और पति-पत्नी अलग-अलग शहर में काम कर रहे हों, तो भी अक्सर इस तरह के सहवास से रिश्ते बन जाते है। आज के वातावरण में छोटे प्राईमरी स्कूल और नर्सरी स्कूल के बच्चे भी गर्लफ्रेन्ड या ब्वॉयफ्रेन्ड के रिश्ते समझने लगे हैं और ऐसे रिश्तों में जीने भी लगे हैं। पुराने जमाने में ब्वॉयफ्रेन्ड-गर्लफ्रेन्ड की शब्दावली मुंह तक भी नहीं आती थी और आज परिवार में स्पष्टता के कारण इसकी चर्चा तक होने लगी है। पहले ऐसे रिश्ते अपवाद स्वरूप ही होते थे, अब तो सिलसिला ही चल पड़ा है।

इसी तरह वर्तमान परिस्थितियों में प्रेम विवाह, लाईफ पार्टनर को स्वयं ढूंढना, चयन करना, डेटिंग सिस्टम, सिंगल रहना, विजातिय और विधर्मिय विवाह करना, खाप, जाति परिवार में अमान्य रिश्तों की बौछार हो गई हैं। स्त्रियों पर यौन अत्याचार की बढ़ती घटनाएं, रेप के दर्द भरे किस्से, बढ़ती तलाक की दर, दहेज प्रताडऩा के शर्मनाक किस्से, घरेलू हिंसा, लव मैरिज में बढ़ोतरी आदि की बातें बढ़ती ही जा रही हैं। सरकार भी अंतरजातिय, अन्तरधर्मिय और दलित-स्वर्ण जातियों की शादियों को प्रोत्साहन करने और आर्थिक सहायता भी दे रही है।

शहरों, गांवों तक में रहने की जगह की कमी, प्राइवेसी की कमी, वातावरण में बिगड़ाव स्पष्ट देखा जा सकता है। महगांई और खर्चा बचाने के लिए भी काम करने की जगह और शिक्षा जैसी जगहों में सहवास की शुरूआत हो जाती है।

जब युवक, युवतियों का काम सहवास से ही चल जाए, खर्चा न लगे, विकल्प भी खुले रहें, कुछ आर्थिक सहुलियत भी मिले, मां-बाप, परिवार की सहमति की जरूरत न हो या उनकी बेटी-बेटे की शादी करवाने में अर्थिक या अन्य मजबूरी हो तो रीति-रिवाज विवाह की बजाय आपसी रजामन्दी से सहवास में क्या हर्ज है? अनेक युवकों के लिए जब यह विकल्प मिल रहा है तो क्यों करे शादी और क्यों करे शादी कर सेटल होने की जल्दी की बात? कुछ तो फन हो जाने दो। ये खेलने के दिन है, शादी की क्या जल्दी है? अगर मामला गड़बडाया तो सुविधा से दूसरी च्वॉइस भी मिलेगी। विधवा पेंशन और अन्य सरकारी सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए भी पति-पत्नी तलाक देकर अलग गुप्त रूप से सहवास करते हैं। ऐसे अनेक किस्से उजागर हुए हैं।

पश्चात्य प्रभाव

लिव-इन-रिलेशनशिप या बिना विवाह सहवास के मामलों में न्यायपालिका ने पीडि़ता वर्ग को सुरक्षा और हक देने का रास्ता खोला, लेकिन इस प्रथा से विवाह जैसी संस्कारित संस्था की अनदेखी सिर्फ हिन्दू ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मो में भी होने लगी हैं। इससे विवाह पद्धति और वैवाहिक संस्था को धक्का लग रहा है। यौनाचार की बढ़ती रफ्तार में पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी अधिक से अधिक युवक-युवतियां काफी समय से शादी की जगह लिव इन में रह रहे हैं। कुछ तो शादी से बचते हुए कई सारे एक्सपेरिमेन्ट करते रहना चाहते हैं। कभी रंगीन सपनों के लिए, कभी धोखा देने के लिए, कभी पैसा बचाने के लिए, इस तरह का सबसे गलत उदाहरण जाने-अनजाने में अभिनेता, स्पोर्टसमैन, सेलिब्रिटी, नेतागण दिखा रहे हंै। लोग उनका अनुकरण करते हंै और आगे भी करेंगें। टी.वी. सीरियल, फिल्में, पत्र-पत्रिकाओं में भी इस तरह की गलत सामग्री की उपलब्धता बढ़ती जा रही है। जिससे युवाओं में गलत संदेश जाता है। वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान और पड़ोसी देशों में भी युवक-युवतियां अविवाहित रहकर इनकी प्रतिशत 5-7 से बढ़कर यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर 50-60 प्रतिशत पहुंच जाएगी।

भ्रूण हत्या और घटता हुआ लिंग अनुपात, बहुओं के न मिलने और विवाह न होने की परिस्तिथियां विकट हो रही हैं। अविवाहितों की संख्या बढ़ती जा रही हैं। 30 या 40 वर्ष से ज्यादा उम्र के अविवाहितों की गिनती हर वर्ष बढ़ ही रही है और यह सब गलत तरीके से यौनाचार को बल दे रही है।

रजिस्ट्रेशन कानून जरूरी हो

लिव-इन-रिलेशनशिप अभी किसी भी ऐक्ट द्वारा, विधान द्वारा, विधायिका द्वारा, संसद द्वारा, विधानसभा द्वारा निश्चित कानूनी ऐक्ट या नियमावली पर आधारित नहीं है। संसद या विधायिका को चाहिए कि इस विषय पर अलग बिल लाए। अगर अलग ऐक्ट नहीं भी लागू करना हो तो हिन्दू मैरिज ऐक्ट, अन्य धर्मों के मैरिज लॉ में आवश्यक संशोधन कर मैरिज की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए। न्यायलयों के आदेशों के अनुसार बिना विवाह के रास्ते ‘डीमड मैरिज’ यानी के मैरिज के बराबर का दर्जा मैरिज ऐक्ट में ही प्रदान किया जाए और अगर संस्कार विधि से उन सभी में जिस धर्म, जिस जाति में जिस तरह की प्रथा हो उसे उसके द्वारा अगर विवाह या रिश्ता को मान्यता प्राप्त नहीं कर पाया या लागू नहीं कर पाया तो उसका रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) अवश्य होना चाहिए। खासतौर पर इसलिए सहवासी युगल को अपनी सम्बन्धित धर्म, जाति के अनुसार, विवाह-शादी, संस्कार के अनुसार कबूलनामा नहीं हो तो रजिस्ट्रेशन हर तरह मददगार होगा और ऐसा उचित भी है। अगर रिश्तों की लिखित पंजीकरण में, समझ हो सके तो उसे शादी या शादी के समकक्ष मानने में कोई हर्जा नहीं है। इसकी पद्धति सुगम, सरल, तत्कालिक होनी चाहिए। तत्कालिक और सुगम रिकोर्डिंग व्यवस्था से स्त्री पक्ष को और अधिक सुरक्षा मिलेगी। किसी भी गलत पुरूष या गलत अन्देशा रखने वाले पुरूष सहवासी से धोखा नहीं हो सकेगा। विवाद घटेंगे और विवाद होंगे भी तो जल्दी सुलझेंगे।

न्यायलयों ने अब तक लिव-इन-रिलेशनशिप को विवाह के बराबर का दर्जा देने के लिए लंबी अवधि के सहवास को तर्क संगत पाया। लेकिन न्यायलयों की शर्त सहवास वाली स्त्री को अड़ोसी-पड़ोसी, समाज में अपने-आपको, अपने पति-पत्नी के रूप में दिखाना भी एक आवश्यक शर्त न्यायलयों ने रखी है। लेकिन सहवास स्वेच्छा से दोनों पक्षों द्वारा हो और किसी भी पक्ष में एक-दूसरों को धोखा देने का इरादा ना हो तो रिश्तें की शुरूआत से पहले उसे रजिस्ट्रेशन करना और जगजाहिर करना आवश्यक होना चाहिए। काफी समय सहवास होने के बाद अधिकार की लड़ाई चले तो एक पक्ष पलटा न मार लें, इसलिए सहवास पूर्व रजिस्ट्रेशन कानूनी होना चाहिए।

शादी की तरह शारीरिक संबंध से पहले भी कानूनी सहवास की तरह आवश्यक शर्त होनी चाहिए। दहेज और विवाह के प्रसंग पर अनावश्यक फजूल खर्च भी खत्म हो सकता है। दहेज प्रथा पर अंकुश लग सकता है। संक्षिप्त में शादी के लिए परिवार वालों पर निर्भरता खत्म हो सकती है। युगल जोड़ी स्वयं शादी के बन्धन में बिना परम्परावादी रिवाजों और स्वयं सादगी से सम्पन्न कर सकते हैं। उससे निम्न वर्ग और मध्य वर्ग के लोग भी, कम साधन वाले परिवार को भी राहत मिल सकेगी। उससे समाज को काफी बड़े तबके को सहुलियत और लाभ मिल सकेगा। सिविल मैरिज से भी इस तरह की शादी-रिश्ता और सरल, सुगम, आसान और सहज ही होगा।

धर्मगुरू और समाज के कर्णधारों द्वारा भी इस तरह के प्रस्तावों को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए समाज, धर्म और जाति के बीच विचार-विर्मश, चिंतन, समीक्षण कर उसको योजनाबद्ध तरीके से स्वीकृत परिपाटी से विधायिका द्वारा तय करने के प्रयास किए जाने चाहिए। इस समस्या से सम्बन्धित सभी आवश्यक वर्गों पर हर दृष्टि से विचार-विर्मश, चिंतन, मनन करके प्रत्येक धर्म, जाति के वर्ग के लोगों की अभी तक के स्त्री-पुरूष रिश्ते, विवाह आदि पर पूर्णतया स्पष्टीकरण हो और प्रत्येक परिस्तिथियों में सम्बन्धित पक्षों के वर्ग की व्याख्या हो, जानकारी हो। जितना जल्दी यह काम सम्पन्न हो सके, उतना ही विवाह जैसी पवित्र संस्कार को, घर-परिवार को, समाज में सुख-शान्ति की माहौल बनेगा। हिन्दू धर्म में ही नहीं, क्रिश्चियन और अन्य धर्मों में भी होने वाली मैरिज को धर्मपति-धर्मपत्नी की तरह व्याख्या की जाए। इसलिए धर्म सम्मत विवाह को बदलते समाज और विधायिकी द्वारा, निर्धारित नियमों को लिपिबद्ध होना आवश्यक है।

दिल्ली में विवाह रजिस्ट्रेशन अनिवार्य

हाल ही में दिल्ली में सभी धर्म और जाति की शादियों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन ने भी कुरान आधारित पारिवारिक कानून की वकालत की है और एक बदलाव का मसौदा तैयार किया है। मुस्लिम परिवार में होने वाली शादी, तलाक, पति-पत्नी विवाद इत्यादि के कारण बदलाव की मांग की गई है। मौजूदा कानून में मुस्लिम समाज के सभी शरियत ऐप्लीकेशन कानून, 1937 के अन्तर्गत शादी जैसे मसले पर महिलाओं के अधिकार बेहद सीमित हैं। डॉक्टर नूरजहां साफिया नियाज ने मसौदे की रूपरेखा पेश करते हुए कहा कि लड़की की शादी की उम्र 18 और लड़के की 21 करने, जुबानी एकतरफा तलाक और हलाला पर कानूनी पाबंदी लगाने, बहुपत्नीत्व पर रोक लगाने और शादी का पंजीयन कराने जैसे मुख्य मांगे शामिल की गई हैं। इसका मसौदा तैयार करने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और बिहार सहित 15 राज्यों में चर्चा आयोजित कराई गई। यह मसौदा कानून व इस्लामिक विशेषज्ञों की देखरेख में तैयार कराई गई है और इसे केन्द्रीय व राज्य अल्पसंख्यक आयोग, महिला और मानवाधिकार आयोग, कानून मंत्रालय, महिला व बल विकास मंत्रालय और सांसदों को भेजा जाएगा, ताकि इस पर चर्चा शुरू की जा सके।

शादी, विवाह, व्यक्तिगत यौन रिश्ते, लिव-इन-रिलेशनशिप कुछ भी हो आज के युग में सभी धर्म, सभी जाति, सभी पंथ और सभी क्षेत्रों में महिलाओं को सशक्त बनाने और उनके अधिकारों की रक्षा करने, उनको बराबरी का मौका देने का मानस पूरी दुनियां में बना है और इस सोच पर बदलाव शीघ्रता से हो रहा है। यह उल्लेखनीय है कि जब माताएं शिक्षित, चिंतनशील और विचारित होंगी तो संतान भी संस्कारित होगी और तभी मंगल काम की स्थापना सम्भव होगी। लिव-इन-रिलेशनशिप को जब शादी का दर्जा दे दिया गया है तो शादी की रजिस्ट्रेशन भी आवश्यक है और लिव-इन-रिलेशनशिप की रजिस्ट्रेशन भी आवश्यक हो। हर प्रान्त में, हर जाति के लिए, हर धर्म के लिए, इससे विवाद व झगड़े घटेंगे और अधिकारों की रक्षा होगी।

पारिवारिक अशान्ति महंगी होती है

शुद्ध दूध में भी पानी तो होता ही है। इसी तरह हर एक युग में हर एक सभ्यता में कुछ असभ्यता के अंश तो रहते ही है। आगे भी रहेंगे। ऐसे में यौनाचार की विकृतियां स्वभाविक भी है, अपवाद भी हैं। मान्यता के बदलाव में भी विकृतियां अपरिभाषित रह ही जाती है। ऐसे में न्यायसंगत कानून बनना ही अच्छा है। लिव-इन-रिलेशनशिप, विवाह बिना सहवास, यौन अपराध, अनैतिक यौन व्यवहार, घरेलू हिंसा, स्त्री दमन, बलात्कार, अवैधानिक सम्बन्धों से मानसिक तनाव बढ़ता है। व्यक्ति एवं परिवार, घर की शान्ति भंग होती है। पारिवारिक उलझनें बढ़ जाती हैं। अपराध बढ़ते हैं। बिमारियां जैसे हार्ट अटैक, मधुमेह, डाइबिटीज आदि बढ़ते हैं। आत्महत्याएं बढ़ती हैं। अपराधों के बढऩे पर प्रशासन, पुलिस, कोर्ट-कचहरी पर काम-काज बढ़ता है। इस तरह यौन अपराध और अनैतिक रिश्तों से व्यक्तिगत सुख-शान्ति, धन-मन का नुकसान तो है ही परन्तु बड़ा भारी सामाजिक प्रशासनिक नुकसानदेह भी है।

सहवास सदैव धर्मसम्मत ही होना चाहिए। सभी धर्म यही चाहते हंै। विवाह बिना सहवास को अधर्म ही गिना जाना चाहिए। अत: लिव-इन-रिलेशनशिप का संज्ञान शुरू में ही लिया जाना चाहिए, न कि शारीरिक सम्बन्धों के बाद। अगर विवाह और लिव-इन-रिलेशनशिप एक समान है ही तो फिर दोनों की रिकॉर्डिंग, (रजिस्ट्रेशन) कानूनी मान्यता कम से कम सिविल मैरिज के बराबर तो होनी ही चाहिए।

डॉ. रिखब चन्द जैन

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