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सामाजिक बाधाएं और बलात्कार

बलात्कार किसी व्यक्ति के साथ होने वाली क्रुरतम, घृणित और नीच अपराध है। यह राष्ट्रीय कानूनों का नहीं बल्कि नैतिकता और धार्मिक मान्यताओं का भी उल्लंघन है। अध्ययनों से पता चला है कि ‘आपराधिक मानसिकता’ के लोग अन्य लोगों की परवाह नहीं करते। अगर इन्हें मौका मिले तो ये किसी भी तरह का अपराध करने से हिचकते नहीं हैं। अपने से कमजोर का शोषण करना उनकी आदत बन जाती है।

एक व्यवस्थित और सुरक्षित समाज के लिए ऐसे अपराधों को रोकने के लिए धार्मिक, नैतिक और कानूनी, तीन तरह की सामाजिक बाधाएं होती हैं।

इन बाधाओं में सबसे पहला धर्म है। लोग भगवान द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन को पाप समझते हैं और इससे डरते हैं। प्राचीन काल में समाज धरम, करम और ज्ञान पर आधारित थे, जिसके कारण हत्या, बलात्कार और अत्याचार न के बराबर थे। उस समय इस तरह के पाप अकल्पनीय थे और इसका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था।

धर्म को अक्सर शंकालुओं द्वारा असंगत और मूर्ख कह कर खारिज कर दिया जाता है। धर्म अक्सर बुराई से बचने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन इसका उल्लेख भी आज आक्रामक माना जाता है। परिणामस्वरूप धर्म बुराईयों को रोकने में निष्प्रभावी बन गया है। वास्तव में कई ‘शिक्षित’ लोग धर्म के उल्लंघन को ‘प्रगतिशीलता की निशानी’ मानते हैं, वहीं कुछ लोग इसे ‘असभ्य’ मानते हैं।

नैतिकता अपराध के प्रति दूसरे सामाजिक बाधा के रूप में काम करती है। नैतिकता एक सामाजिक संहिता है। यह समाज में शालीनता, सम्मान और आदर की परिभाषा है। नैतिकता एक परिपूर्ण व्यक्ति की परिभाषा है। इसका उद्देश्य केवल दोषियों को दंडित करना है। यह वांछनीय मूल्यों के प्रति लोगों का मार्गदर्शन करता है। आज सामाजिक टिप्पणीकारों का मानना है कि नैतिकता को थोपना एक सामाजिक बुराई है। उन्हें लगता है कि नैतिक और अनैतिक का नाम देना आपत्तिजनक है। उनका मानना है कि पोशाक या शिष्टाचार के आधार पर नैतिक और अनैतिक नहीं ठहराया जाना चाहिए।

अंतिम बाधा कानून है। बहुत लोगों का मानना है कि कानून ही व्यक्ति के स्वतंत्रता के लिए अंतिम बाधा होनी चाहिए। ब्रिटिश शासन के दौरान हमारे स्वदेशी संस्कृति के हर पहलू को पुराना और मूर्ख कहकर उपहास उड़ाया जाता था। यह मानसिकता आज भी जारी है। इस मानसिकता को प्रतिक्रियावादी पश्चिमी विचारधारा द्वारा मजबूती मिली है। नारीवाद जैसी विचारधारा पश्चिमी दुनिया में सामाजिक, कानूनी बीमारियों की तरह थी। यहां सारे अधिकारों और सुरक्षा को केवल सफेद पुरुष जमीन मालिकों के लिए बढ़ा दिया गया।

यह पश्चिम के लिए काम कर सकते हैं, लेकिन यह भारत के लिए अनुपयुक्त है। अमेरिका या ब्रिटेन में एक अपराध के कमीशन में सजा मिलना लगभग निश्चित है। जासूस इसका पता लगाएगा, पुलिस गिरफ्तार करेगी, वकील दोषी ठहराएगा और जज सजा का निर्धारण करेगा। पश्चिम में कानून तोडऩा जुआ है जो केवल दुस्साहसिक ही खेलता है।

जब समाज कानून को सामाजिक बाधा के रूप में समझता है और राष्ट्र इसे लागू करने में असमर्थ होता है तो यह अपराधियों के लिए एक खुली छूट होती है। जब तक हम इन तीन बाधाओं में से हर एक की मरम्मत नहीं करते, तब तक अपराधों में गिरावट जारी रहेगी और निर्दोष लड़कियां इसका भुक्तभोगी बनती रहेंगी।

आकाश कश्यप

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