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आखिर कब थमेंगे ऐसे अपराध…

अच्छा दिन आने वाले हैं… सबने यही सोचा है। विकास के पथ पर भी देश आगे बढ़ेगा, ऐसी आशा और विश्वास सबको था। लेकिन, अच्छे दिन लाना सिर्फ प्रधानमंत्री का काम है, राज्य सरकार और आम आदमी की इसमें कोई भूमिका नहीं है? क्या हमारी यह यह जिम्मेदारी नहीं है कि अपनी सभ्यता और संस्कृति पर चलते हुए उसके उच्चतम मूल्यों का पालन करें? उत्तर प्रदेश के लखनऊ सहित तमाम जगहों और बंगलुरू सहित देश के विभिन्न भागों में जो बेदर्द और शर्मनाक घटनाएं हो रही हैं, वो हमारी भावी पीढिय़ों के लिए एक धब्बा है। लगता है आज समाज में नैतिक शिक्षा और सामाजिक संस्कार की घोर अभाव है।

रेप… रेप… रेप…। उफ… आखिर कब तक? 6 साल की बच्ची से लेकर 70 साल की बुजुर्ग महिला तक को नहीं बख्श रहे हैं विकृत मानसिकता के ये व्यक्ति। विद्या के मंदिर से लेकर भगवान के घर तक, पुलिस स्टेशन से लेकर चर्च-मदरसों तक और खेत-खलिहानों से लेकर शहर की चौड़ी सड़कों तक आज बच्ची से लेकर बुजुर्ग तक कोई भी महिला अब सुरक्षित नहीं रह गई हैं। सब जानते हैं कि बलात्कार एक सामाजिक अपराध ही नहीं, बल्कि एक मानसिक विकृति भी है, जो अंदर छुपे वहशीपन को बाहर निकालती है। कानून-व्यवस्था के पिंजरे में कई आपराधी फंस जाते हैं, तो कई छूट भी जाते हैं, लेकिन दोनों ही स्थितियों में महिला को उम्र भर का दर्द सहना पड़ता है।

सबसे अधिक तकलीफ तब होती है, जब अखबारों में यह पढऩे को मिलता है कि पिता ने पुत्री का, गुरू ने शिष्या के प्रति इस भयावह अपराध को अंजाम दिया। इस अपराध को रोकने में क्या भारत की कानून-व्यवस्था असमर्थ हो चुकी है? हजारों वर्ष पुरानी भारतीय सभ्यता क्या आज बीच चौराहे पर खड़ी है? क्या हमारे पूर्वजों के दिए गए संस्कारों से ‘मूल्यबोध’ गायब हो चुका है? क्या भारत की नई पीढ़ी रामकृष्ण परहंस को भूल गई, जिन्होंने पत्नी शारदा देवी में एक नई आकृति देखते हुए उनके पैर छू लिए थे, या पश्चिमी सभ्यता, जो अर्थोपार्जन में सहायक है, ने भारतीय जनमानस को बुरी तरह अपने में जकड़ लिया है?

सामाजशास्त्री मानते हैं कि महिलाओं के आचार-व्यवहार में आए असंगत परिवर्तन ने उनके विरूद्ध पुरूषों में मानसिक विकृति पैदा कर दी है। ऐसे गंभीर और घातक मानसिक बदलाव को समाजशास्त्री आज अत्यंत ही चिंता का विषय मानते हैं। लेकिन हैरानी और अत्यंत अपमानजनक तब लगता है, जब उत्तर प्रदेश के कार्यवाहक राज्यपाल रहे उत्तराखंड के राज्यपाल अजीज कुरैशी कहते हैं – ”पूरी सेना लगा दी जाए या भगवान भी धरती पर आ जाएं तो यूपी में बलात्कार की घटना को रोका नहीं जा सकता।’’ यह बयान उनकी संवेदनशीलता को उजागर करता है। दुष्कर्म की घटनाओं को लेकर वैसे तो पूरे देश में बेतुके बयानों की बाढ़-सी रही है, लेकिन राज्यपाल जैसी गरिमामयी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसे बयान की उम्मीद शायद ही किसी ने की होगी।

बंदायू में दो नाबालिग बहनों के साथ दुष्कर्म के साथ उनकी हत्या कर शवों को आम के पेड़ पर लटकाने की घटना का अभी पूरी तरह से पटाक्षेप भी नहीं हुआ था कि लखनऊ के मोहनलालगंज में एक 36 वर्षीया दो बच्चों की मां के साथ क्रूरता की हद पार कर दी गई, लेकिन शासन प्रशासन के लिए यह अब भी एक साधारण अपराध है और उसे दबाने के लिए वह तरह-तरह की अतार्किक दलीलें दे रही है। बंदायू कांड के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रशासनिक फेर-बदल कर ऐसी घटनाओं को रोकने के संकेत दिए थे, लेकिन अराजकता के दौर से गुजर रहे इस प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं।

महिला तो महिला उत्तर प्रदेश में पुरूष भी सुरक्षित नहीं हैं। बात है मथुरा के बरसाना थाने के महराना गांव की। इस गांव के एक 30 वर्षीय पुरूष को गांव के ही चार लोगों ने अगवा कर उसके साथ अप्राकृतिक सहवास किया। इसके पहले 19 जुलाई को इसी जिले के पिंगरी गांव की एक नाबालिग लड़की के साथ उसी के गांव के छह लोगों ने सामूहिक दुष्कर्म किया था और मुंह खोलने पर जान से मारने की धमकी दी थी।

दिसंबर 2012 को दिल्ली में 23 वर्षीया मेडिकल छात्रा निर्भया की दुष्कर्म के बाद हत्या ने लोगों को उद्वेलित कर दिया था। इसके विरोध में देश के कोने-कोने से लोग सड़कों पर उतर आए थे। जनाक्रोश को देखते हुए तत्कालीन यूपीए सरकार के हाथ-पांव फूल गए और आनन-फानन में उसने दुष्कर्म रोकने के लिए कानून को और कठोर बनाने बनाने की बात कही और उसके लिए कदम भी उठाया। लेकिन एक से एक भयावह दुष्कर्म कांडों से बदनाम हो रहे उत्तर प्रदेश में राजनेता से लेकर प्रशासनिक अमला तक इसे बस एक मामूली अपराध साबित करने की कोशिश में जुटा रहता है। जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता और समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने विवादित बयान दिया तब राजनीतिक हलके में बवाल मच गया। अप्रैल में मुरादाबाद की रैली में मुलायम सिंह ने कहा था कि ‘लड़कियां पहले दोस्ती करती हैं, फिर मतभेद होने पर दुष्कर्म का नाम दे देती हैं। लड़कों से गलती हो जाती है, इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें फांसी दे दी जाए।’

मुलायम सिंह अपराध को कम करने के बजाय इसे जायज ठहराने के उद्देश्य से कहते हैं कि ‘उत्तर प्रदेश की आबादी 21 करोड़ से ज्यादा है। इतनी आबादी के बावजूद देश में सबसे कम कहीं रेप होते हैं तो वह है उत्तर प्रदेश। राज्य में हर अपराध को नियंत्रित नहीं किया जा सकता।’ जबकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि 2013 के मुकाबले उत्तर प्रदेश में महिलाओं से रेप के मामले में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म के बाद हत्या कर पेड़ पर लटकाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। लेकिन शासन-प्रशासन के चेहरे पर शिकन तक नहीं है।

दुष्कर्म की क्रूर से क्रूर घटनाएं सामने आतीं जरूर हैं, लेकिन ये घटनाएं सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। असम से लेकर गुजरात और कश्मीर से लेकर तामिलनाडु तक में ऐसी घटनाओं की भयावहता लगातार बढ़ती जा रही हैं। कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू में एक छह वर्षीया बच्ची के साथ उसी के स्कूल के स्केटिंग के टीचर मुस्तफा ने बलात्कार किया। मुस्तफा बिहार के दरभंगा जिले का मूल निवासी है। इस घटना के बाद बंगलुरू के फ्रेजर रोड कांड को लेकर लोगों में पहले से ही जारी गुस्से को हवा मिल गई है। फ्रेजर रोड कांड का मुख्य आरोपी हैदर नसिर अपने छह साथियों के साथ एक पोस्ट ग्रेजुएट की एक छात्रा को अगवा कर लिया था और उसके दोस्त के सामने ही चलती गाड़ी में सामूहिक दुष्कर्म किया था।  वहीं बिहार के भागलपुर जिले के गोपालपुर में एक महिला के साथ दुष्कर्म करने के बाद उसकी हत्या कर पेड़ से लटका दी गई। लड़की के जन्म पर उत्सव मनाने वाला यह गांव अब अपनी विरासत पर हैरान है और आंसू बहाने को मजबूर है। मध्य प्रदेश के सागर जिले के बीना में एक 19 वर्षीया लड़की के साथ दुष्कर्म हुआ और वह नंगी अवस्था में भटकने को मजबूर होती रही। पुलिस की लापरवाही और नजरअंदाजगी से तंग आकर अंतत: उसने 70 फीट टावर से कूद कर आत्महत्या कर ली। राजस्थान में भी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाओं का क्रम जारी है।

ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिसने राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरीं हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में पीडि़ता लोकलाज के भय से पुलिस के पास जाने से कतरातीं हैं। ऐसे में कई मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाते। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2013 में मध्य प्रदेश में बलात्कार की 4335 और उत्तर प्रदेश में 3050 घटनाएं हुईं। जबकि इसी वर्ष में मध्य प्रदेश में महिलाओं के अपहरण की 2873 घटनाएं हुईं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 9737 है। उत्तर प्रदेश की कुल बलात्कार की घटनाओं में लगभग 80 प्रतिशत घटनाएं छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों से दर्ज की गईं हैं। इस तरह महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की स्थिति बेहद भयावह है।

सबसे चिंताजनक बात है दुष्कर्म की घटनाओं में नाबालिगों की बढ़ती संख्या। वर्ष 2013 में भारतीय दण्ड संहिता के कुल दर्ज मामलों में नाबालिगों की कुल प्रतिशत 1.2 है। इनमें नाबालिगों द्वारा सबसे ज्यादा अपराध महिलाओं के खिलाफ किए गए। पिछले साल की अपेक्षा 2013 में नाबालिगों द्वारा किए जाने वाले बलात्कार में 60 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो वाकई चिंता का विषय है। दिल्ली में निर्भया कांड और मुंबई के शक्ति मील दुष्कर्म कांड में नाबालिगों की संलिप्तता और उनके द्वारा किए गए क्रूरतम कारनामों ने देश में बलात्कार के मामलों में नाबालिगों की उम्र सीमा निर्धारण करने के लिए एक बहस छेड़ दिया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी बलात्कार में संलिप्त नाबालिगों के दंड प्रावधान में की उम्र सीमा घटाने के लिए न्यायालय का दरवाजा तक खटखटा चुके हैं। भाजपा की वरिष्ठ नेता मेनका गांधी ने मांग की है कि अगर 18 साल से कम उम्र का व्यक्ति जब बलात्कार जैसा जघन्य अपराध कर सकता है तो दंड भी उसे व्यस्क के लिए निर्धारित कानून के अनुसार मिलनी चाहिए। भाजपा नेता वरूण गांधी भी बलात्कार में शामिल नाबालिगों को कठोर सजा दिलाने के लिए कानून में उम्र सीमा घटाने की मांग कर चुके हैं।

बंगलुरू के 6 वर्षीया बच्ची के साथ दुष्कर्म कांड का आरोपी मुस्तफा पोर्न फिल्मों का व्यसनी है। पुलिस ने गिरफ्तारी के बाद उसके मोबाईल और लैपटॉप से बच्चों से संबंधित कई पोर्न फिल्में जब्त की हैं। बलात्कार के पीछे कई समाजशास्त्री शराब जैसे नशा को एक प्रमुख वजह मानते हैं, तो कई लोग इसके लिए टीवी और सिनेमा में बढ़ती अश्लीलता को दोषी ठहराते हैं। लेकिन आश्चर्य तब होता है, तब इसके लिए महिलाओं के कपड़ों और उनकी जीवन शैली को दोषी ठहराया जाता है।

बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के लिए चाहे जो भी कारक जिम्मेदार हों, इसकी पहचान कर उसमें सुधार करने की गुंजाईश है, ताकि खुद को सभ्य कहने वाले समाज से ऐसी बुराईयों का खात्मा हो सके। लेकिन, इस बात का अवश्य ध्यान रखना होगा कि इससे महिलाओं की स्वतंत्रता और उनकी गरिमा पर किसी तरह की आंच न आए।

सुधीर गहलोत

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