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तमिल संस्कृति की रक्षा के लिए जया का ‘धोती कानून’!

तमिलनाडु के अखबारों की सुर्खियां ‘धोती कानून’ का फरमान सुना रही थीं। मुख्यमंत्री जयललिता ने 16 जुलाई को विधानसभा में ऐलान किया कि वे ब्रिटिश स्टाईल क्लबों में धोती को मान्यता दिलाने के लिए कानून लाएंगी, ताकि तमिल संस्कृति के अपमान से बचा जा सके। सभी पार्टियों ने उनका खुलकर समर्थन किया तो अब इस कानून का बनना महज औपचारिकता भर रह गई है।

ताजा वाकया शुक्रवार 11 जुलाई का है। मद्रास हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति हरि परनथमान और वरिष्ठ वकील आर. गांधी और जी.आर. स्वामीनाथन एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में हिस्सा लेने मद्रास क्रिकेट क्लब (टीएनसीए) पहुंचे तो उन्हें धोती पहनने के कारण अंदर जाने की इजाजत नहीं दी गई, क्योंकि यह टीएनसीए के पोशाक के नियमों के विरुद्ध था। संयोग से किताब के लेखक सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति टी.एस. अरुणाचलम थे, जो मद्रास हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश रह चुके थे। गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश पी.आर. गोपालकृष्णन किताब का विमोचन करने वाले थे और पहली प्रति हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश वी. रत्नम को सौंपी जानी थी। उन तीन मेहमानों को छोड़कर बाकी सभी का पहनावा क्लब के पोशाक के अनुकूल ही था।

इस क्लब की स्थापना अंग्रेजों ने 1846 में की थी और तभी से यहां पोशाक के ये नियम लागू हैं। पोशाक के ऐसे ही नियम मद्रास जिमखाना क्लब और मद्रास क्लब में भी लागू हैं। इन दोनों क्लबों की स्थापना भी अंग्रेजों ने की थी। ये सभी क्लब अंग्रेजों ने अपने लिए अपने देश से बाहर अपना-सा माहौल बनाने के लिए की थी। अंग्रेजों ने जो क्लब संस्कृति शुरू की, वह आजादी के बाद भी जारी रही और महानगरों में कई तरह के क्लब खुल गए। आजादी के बाद खुले क्लबों में पोशाक के नियम ढीले कर दिए गए, लेकिन अंग्रेजों द्वारा स्थापित तीनों क्लबों ने पोशाक के नियम को कायम रखा। चेन्नई के धनाढ्य, अफसरशाही और न्यायपालिका के सदस्य इन क्लबों की सदस्यता पाने को हमेशा लालायित रहे हैं। इसलिए इन तीनों कल्बों के पोशाक के नियमों से उपरोक्त तीनों सज्जन अनजान होने की बात नहीं कह सकते। वे यह भी नहीं कह सकते कि आयोजकों ने उन्हें पहले नहीं बताया था, क्योंकि दूसरे सम्मानित मेहमानों ने उन नियमों का उल्लंघन नहीं किया। हालांकि यह साफ नहीं हो सका कि वे जान-बूझकर वहां धोती पहन कर गए थे या अनजाने में।

चूंकि ‘पीडि़त’ हाईकोर्ट के जज और दो प्रतिष्ठित वकील थे, इसलिए मामला तूल पकड़ गया और राजनैतिक तथा कानूनी हलकों में हड़कंप मच गया। मुख्यमंत्री जयललिता, द्रमुक प्रमुख करुणानिधि, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष ज्ञानदेसिकन, एमडीएमके अध्यक्ष वायको, पीएमके नेता डॉ. रामदॉस, वीसीके अध्यक्ष तिरुमावालावन और कम्युनिस्ट पार्टियों समेत सभी दलों के नेताओं ने टीएनसीए की कड़ी निंदा की और उस पर कड़ी कार्रवाई करते हुए लाइसेंस रद्द करने की मांग की। लिहाजा, तमिलनाडु विधानसभा बजट सत्र में अनुदानों पर बहस के लिए बैठी तो सभी पार्टियों ने एक स्वर से ‘तमिल संस्कृति’ के अपमान का मुद्दा उठाया। कई सदस्यों ने टीएनसीए की निंदा की। कथित तौर पर मुख्यमंत्री जयललिता ने रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटीज को टीएनसीए क्लब को कारण बताओ नोटिस भेजने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री ने इस घटना को ‘निरंकुश’ बताया और कहा, ”न्यायमूर्ति डी. हरिपरनथमन को प्रवेश की इजाजत न देकर तमिल संस्कृति और सभ्यता का अपमान किया गया है। वाकई, यह वारदात टीएनसीए के नियमों के भी खिलाफ है, क्योंकि उसके बाइलॉज में कहीं धोती पहनने का निषेध नहीं किया गया है।’’ बाद में जयललिता ने ऐलान किया कि इस ‘असंवैधानिक’ प्रथा को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए इसी सत्र में कानून लाया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने बहस के दौरान कई उदारण भी दिए। मसलन एक बार प्रिंस ऑफ वेल्स की आगवान के लिए चेन्नई नगर निगम के तत्कालीन अध्यक्ष दिवंगत सर पी. त्यागराय ने धोती न पहनने के नियम को मंजूर करने से इनकार कर दिया था। ऐसी ही दूसरी घटना अस्सी के दशक की है जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज वी.आर. कृष्णअय्यर को मद्रास जिमखाना क्लब में प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी गई थी। उन्होंने गेस्ट बुक में विरोध दर्ज किया था। हालांकि राजाजी से लेकर कामराज, अन्नादुरै, करुणानिधि या एमजीआर जैसे तमिलनाडु के अब तक के मुख्यमंत्रियों को ब्रिटिश स्टाइल के इन क्लबों के कार्यकलापों में बदलाव के लिए कानून बनाने की जरूरत महसूस नहीं हुई। यहां तक कि पोशाक के नियम का शिकार होने वाले सर त्यागराय और न्यायमूर्ति कृष्णअय्यर ने भी इन क्लबों के नियम बदलने की मांग नहीं की। वजह यह है कि इन नेताओं की पक्की राय थी कि ये ब्रिटिश स्टाइल के क्लब भारतीय संस्कृति से पूरी तरह अलग हैं और इनके नियम और प्रक्रियाओं को बदलवाने के लिए सरकार का समय जाया नहीं करना चाहिए। खासकर इसलिए भी कि जब इसके सदस्यों को पोशाक के नियमों पर कोई आपत्ति नहीं है तो गैर-सदस्यों या कभी-कभार आने वालों को इसे क्यों मुद्दा बनाना चाहिए? वे किस हैसियत से ऐसा करना चाहेंगे?

मुख्यमंत्री ने तो टीएनसीए की हरकत को ‘असंवैधानिक’ बता दिया, लेकिन माननीय हाईकोर्ट की राय कुछ और ही थी। एक वकील ने जनहित याचिका दायर की कि राज्य के क्लबों के कामकाज के नियम बनाने और शहर में कई क्लबों के खिलाफ लाइसेंस रद्द करने समेत कानूनी कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार को निर्देश दिया जाए। इस याचिका पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.के. अग्रिहोत्री और न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश की पीठ ने 16 जुलाई को फैसला सुनाया कि इसे मंजूर नहीं किया जा सकता, क्योंकि कोई संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन नहीं हुआ है। पीठ ने आश्चर्य जताया कि किसी निजी क्लब के नियम बदलवाने को कैसे मजबूर किया जा सकता है। पीठ की टिप्पणी थी कि कथित घटना एक निजी पुस्तक विमोचन काय्रक्रम के दौरान हुई, न कि किसी सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान और जज वहां आमंत्रित थे। वे जज की हैसियत से नहीं गए थे। पीठ की यह टिप्पणी जज हरि परनथमन के पहले दिए बयान के उलट हैं कि ”मैं वहां अपनी आधिकारिक कार में शाम 5.25 बजे गया और यह जानकर हैरान रह गया कि क्लब के कर्मचारी मुझे इसलिए अंदर नहीं जाने चाहते, क्योंकि मैंन ‘वेष्टि’ पहन रखी थी। मैंने यह समझाने की कोशिश की कि मैं क्लब में किसी निजी कार्यक्रम में नहीं आया हूं। फिर भी मैं लौटा दिया गया।’’

हालांकि हाईकोर्ट की पीठ ने याचिका मंजूर लायक नहीं माना, लेकिन उसे खारिज नहीं किया और सुनवाई के लिए दूसरी पीठ के हवाले कर दिया। इस बीच तमिलनाडु की कानून बिरादरी को धोती और काला कोट पहनकर तमिल संस्कृति के अपमान के खिलाफ प्रदर्शन करते देखा गया। कोई हैरान हो सकता है कि कोट और टाई क्या तमिल संस्कृति का हिस्सा है। आजादी के 64 साल के बाद भी अदालतों में कई ब्रितानी तौर-तरीके जारी हैं (मसलन, ‘माई लॉर्ड’ और ‘योर ऑनर’ जैसा संबोधन वगैरह), लेकिन किसी को इस पर आपत्ति नहीं होती! क्या इन तौर-तरीकों का तमिल संस्कृति से कोई लेना-देना है? कानूनी पंडितों का मानना है कि पोशाक के नियम बनाना किसी निजी क्लब का मौलिक अधिकार है जो न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता। आम तौर पर लोगों की भी राय है कि सरकार और राजनैतिक दल बेवजह बेबात का बतंगड़ बना रहे हैं और विधानसभा का समय बर्बाद कर रहे हैं। आखिर कोई पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम किसी ब्रिटिश स्टाइल क्लब में क्यों रखेगा, अगर वह खुद या उसका कोई दोस्त सदस्य न हो? जज और वकील ऐसी क्लब संस्कृति से अपरिचित नहीं हैं। इसलिए दोष उन पर भी जाता है जो धोती पहन कर वहां गए। इस मामले में दिलचस्प तथ्य यह भी है कि पूरा राजनैतिक वर्ग और मुख्यमंत्री एक ऐसे ‘सांस्कृतिक अपमान’ पर हंगामा मचा रहे हैं जो हुआ ही नहीं। वे यह नहीं समझते कि क्लब का मकसद तमिल संस्कृति का अपमान नहीं था, वरना स्त्रियों को साड़ी में जाने की इजाजत कैसे होती? मामला बस इतना है कि धोती क्लब की पोशाक की सूची में नहीं है। इसके अलावा कोई धोती पहन कर क्रिकेट, गोल्फ, टेनिस या बिलबोर्ड नहीं खेल सकता या कोई वोदका या ह्विस्की का सेवन कर डांस फ्लोर पर धोती पहन कर नहीं जा सकता। इसलिए क्लब के पोशाक के नियमों में कुछ भी गलत नहीं है, इसका तमिल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है।

उधर, जयललिता को ‘तमिल संस्कृति’ की रक्षा का एक और मुद्दा मिल गया है। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की पूरे देश में सीबीएसई के स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाने की पहल का पुरजोर विरोध किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखी चिट्ठी  में जयललिता ने कहा, ”तमिलनाडु में प्राचीन तमिल भाषा की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है। राज्य में सामाजिक न्याय और भाषा का तगड़ा आंदोलन हो चुका है। इसलिए तमिलनाडु में ‘संस्कृत सप्ताह’ का आयोजन बेहद अनुचित है। बेहतर तो यह होता कि हर राज्य में उसकी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप शास्त्रीय भाषा सप्ताह मनाया जाता। हमारे विविध सांस्कृतिक और भाषायी देश को ध्यान में रखकर यही श्रेयस्कर है।’’ उन्होंने प्रधानमंत्री से यह अपील भी की कि वे अधिकारियों को हर राज्य के सीबीएसई स्कूलों को वहां की भाषा और संस्कृति को ध्यान में रखकर सप्ताह मनाने का संशोधित निर्देश जारी करने को कहें।

यह क्षेत्रीयतावाद की राजनीति के सिवाय कुछ नहीं है। मानव संसाधन मंत्रालय का निर्देश सिर्फ सीबीएसई के स्कूलों के लिए है, राज्य बोर्ड के स्कूलों के लिए नहीं। इसलिए मुख्यमंत्री का यह रवैया बेतुका है। पूरी तरह बाखर राजनैतिक नेता होने के नाते उन्हें पता है कि तमिल के साथ संस्कृत का कितना अहम रिश्ता रहा है। तमिल और संस्कृत को अलग करना एकदम मुश्किल है। सदियों से कर्मकांड और प्रथाएं इसीके अनुरूप हैं।

इसके अलावा संस्कृत भाषा इस महान राष्ट्र की सभ्यता का प्रतीक है। इस देश के महान ग्रंथ वेद, पुराण और दूसरे शास्त्र पहले संस्कृत में ही लिखे गए हैं। इसलिए केंद्र सरकार का यह दायित्व है कि वह इस भाषा को शह दे ताकि वह इस देश के विभिन्न समुदायों में एकता का सूत्र बने।

प्रधानमंत्री को अपनी चिट्ठी  में उन्होंने ‘विविध संस्कृति और भाषायी देश में संवेदनशीलता’ की भी बात की है, जो पूरी तरह बेतुका है। किसी और राज्य ने तो मानव संसाधन मंत्रालय के सर्कुलर का विरोध नहीं किया। बाकी सभी राज्य मानते हैं कि संस्कृत देश की एकता को बढ़ाती है। सिर्फ तमिलनाडु में द्रविड़ नेता अपने क्षेत्रीयतावाद का प्रदर्शन कर रहे हैं, जो देश की एकता के लिए खतरा है।

विडंबना देखिए कि ‘संस्कृत सप्ताह’ 2001 से और ‘संस्कृत दिवस’ का आयोजन 1969 से किया जाता है। चेन्नई स्थित वरिष्ठ पत्रकार प्राइम प्वाइंट श्रीनिवासन कहते हैं, ”इसकी शुरुआत 1969 में कांग्रेस सरकार ने की थी। श्रावण पूर्णिमा के दिन ‘संस्कृत दिवस’ मनाया जाता है। सभी राज्य सरकारों/विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से इस दिवस को सभा-गोष्ठियों, संस्कृत विद्वानों की बैठकों और संस्कृत नाटकों के मंचन वगैरह का आयोजन करने को कहा जाता है। इसका नोकटिफिकेशन केंद्र से जारी होता है। 2001 में वाजपेयी के राज में इसे सप्ताह भर का आयोजन बना दिया गया (श्रावण पूर्णिमा के तीन दिन पहल और तीन दिन बाद तक)। यानी यह आयोजन 45 साल से जारी है। मोदी सरकार तो बस उसी परंपरा का निर्वाह कर रही है।’’

यह परंपरा तो यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार के दौरान भी जारी रही है और करुणानिधि की सरकार भी दस साल तक उसका पालन करती रही है। इसलिए श्रीनिवासन पूछते हैं, ”अब कांग्रेस के नेता ऐसे क्यों उछल रहे हैं जैसे कोई अपराध हो गया हो? हमारे तमिलनाडु के टीवी एंकर भला इस पर इतना क्यों चीख-पुकार मचा रहे हैं? अपने राज में संस्कृत सप्ताह मनाने के बाद अब कांग्रेस और द्रमुक के नेता क्यों इसका विरोध कर रहे हैं? क्या इन्हें मालूम नहीं है कि कांग्रेस सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘हिंदी दिवस’ 40 साल से तमिलनाडु में भी आयोजित किया जा रहा है।’’ कोई यह भला यकीन कैसे करेगा कि हर मामले में बाखबर रहने वाली मुख्यमंत्री को इन तथ्यों की जानकारी नहीं होगी। इसलिए वे ओछी राजनीति कर रही हैं।

तमिलनाडु में युवा पीढ़ी इस क्षेत्रीयतावाद की संकीर्ण राजनीति से ऊब चुकी है। युवा तो ज्यादा से ज्यादा भाषा सीखना चाहते हैं। वे बाहर निकलना और दूसरे राज्यों में सैर-सपाटे में यकीन रखते हैं। संस्कृत भारती जैसी संस्थाएं राज्य के हर जिले में सक्रिय है और संस्कृत की कक्षाएं पूरे राज्य में लगातार बढ़ रही हैं। युवा पीढ़ी की रुचि फ्रांसीसी और जर्मन भाषाओं में भी है। उनके मां-बाप भी उन्हें ऐसी कक्षाओं में भेज रहे हैं। अगर मुख्यमंत्री को तमिल भाषा और सांस्कृतिक धरोहर की इतनी ही चिंता है तो उन्हें स्कूलों में प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में भाषा की पढ़ाई को शह देना चाहिए। इसके विपरीत उनकी सरकार ने स्कूलों में पढ़ाई का माध्यम घोषित कर दिया है जिसका तमिल पर असर तो पडऩा ही है।

मुख्यमंत्री को भाषायी मीडिया, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों की चिंता करनी चाहिए, जो एक-दूसरे की होड़ में तमिल भाषा को बर्बाद कर रहे हैं। इसमें अन्नाद्रमुक की जया टीवी भी बदस्तूर भूमिका निभा रहा है। वे सिर्फ भाषा का ही कबाड़ा नहीं कर रहे हैं, बल्कि सीरियलों और रियलिटी प्रोग्राम के नाम पर अश्लीलता और बकवास परोस रहे हैं। कोई भी समझदार सरकार संस्कृत का विरोध करने के बदले तमिल के विकास पर फोकस करेगी।

अगर मुख्यमंत्री को सांस्कृतिक विरासत की इतनी ही चिंता है तो उन्हें मंदिरों पर ध्यान देना चाहिए। तमिलनाडु में खासकर चेर, चोल, पंड्य, पल्लव सहित कई राजवंशों ने हजारों मंदिर बनवाए, जो हजारों साल पुराने हैं। राज्य सरकार का हिंदू धार्मिक व धर्मार्थ ट्रस्ट विभाग (एचआर ऐंड सीई) राज्य में 36,000 मंदिरों का प्रबंधन करता है। एचआर ऐंड सीई विभाग के प्रबंधन में जिम्मेदारी और जवाबदेही रत्ती भर नहीं है। वित्तीय गड़बडिय़ों के अनेक किस्से हैं। इस विभाग को मंदिरो के शिलालेखों की रक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं है जो तमिल संस्कृति की धरोहर हैं।

देश का कानून भी कहता है कि सौ साल पुराने सांस्कृतिक स्मारकों का रखरखाव ढंग से होना चाहिए, लेकिन राज्य में पुराने मंदिरों की बेकद्री देखकर कोई भी हैरान रह जाएगा। इनकी शिलालेखों, मूर्तिशिलपों की रक्षा के लिए कायदे-कानूनों की परवाह नहीं की जाती। हाल में चेन्नई में त्यागराज स्वामी मंदिर, जिसे वदिवुदाल अम्मान मंदिर के नाम से जाना जाता है, के पुनरुद्धारा का काम विभाग ने लापरवाह ढंग से किया तो इतिहासकार और श्रद्धालु भड़क उठे थे क्योंकि उस मंदिर में सबसे ज्यादा शिलालेख बताए जाते हैं। तमिलनाडु पुरातत्व विभाग के पूर्व निदेशक डॉ. आर. नागराज बताते हैं कि इस मंदिर के नीचे सातवीं सदी का ढांचा मौजूद है। उन्होंने कहा, ”सन 1020 में इसे राजेंद्र चोल ने दोबारा बनवाया था। ये पत्थर वहां हजार साल से हैं। इस मंदिर के पुनर्रुद्धार के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समिति ने पुरातत्व विभाग से संपर्क नहीं किया।’’ विशेषज्ञों ने इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की आपत्तियों पर भी ध्यान नहीं दिया। यही नहीं, हाल में इरोड जिले के चेन्नैमलाई में एक हजारों साल पुराने मुरुगन मंदिर को तोड़कर वहां सीमेंट से नया मंदिर बना दिया गया। यहां तक कि सदियों पुराने स्तला विरुक्षम मंदिर को भी नहीं बख्शा गया।

इसी तरह हमारी प्राचीन संस्कृति की प्रतीक गाय की भी रक्षा नहीं की जा रही है। हर मंदिर में गोशाला होनी चाहिए और इसके लिए सरकारी बजट भी उपलब्ध है, लेकिन अधिकारी इसकी कोई परवाह नहीं करते। श्रद्धालुओं द्वारा दान की गई गायों को भूखे मरने को छोड़ दिया जाता है। हाल में तिरुवन्नामलाई में दो दर्जन गाएं मर गईं।

प्राचीन संस्कृतियों और धरोहरों की ऐसी उपेक्षा करने वाली सरकार तमिल संस्कृति की दुहाई देकर संस्कृत सप्ताह का विरोध कर रही है। द्रविड़ राजनीति के इस विद्रुप चेहरे से ही जयललिता धेती कानून और संस्कृति विरोध की हिमाकत कर पा रही हैं।

चेन्नई से बी.आर. हरन

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