ब्रेकिंग न्यूज़ 

वैदिक-सईद मुलाकात शोर से आगे

वरिष्ठ संपादक-पत्रकार वेद प्रताप वैदिक पाकिस्तान में हाफिज सईद से क्या मिले, भारत में हंगामा हो गया। किसी ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की। किसी ने उन्हें आर.एस.एस. का एजेंट बताया। किसी ने सरकार से सफाई मांगी, तो किसी ने वैदिक को राष्ट्रद्रोही करार दे दिया। दो दिन तक खूब हंगामा रहा। नई खबर की खोज में लगातार रहने वाले खबरी चैनलों की तो पौ बारह हो गई। वैदिक ने भी खूब मजा लिया। हर चैनल पर सुर्खियां, लगातार इंटरव्यू और चर्चा में हिस्सा लेने का आनंद ही कुछ और होता है!

जरा इस शोर-शराबे और हंगामे से आगे जाने की जरूरत है। देखते हैं कि हुआ क्या था? वैदिक एक प्रतिनिधिमंडल के साथ पाकिस्तान गए थे। बाकी लोग तो आ गए, लेकिन वैदिक वहां रुक गए। वहां पर एक दिन वे हाफिज सईद से मिलने गए। हाफिज सईद भारत, अमेरिका, यूएन सबकी नजर में एक अवांछित व्यक्ति है। भारत में उसे मुंबई में 26/11 के हमलों का मुख्य कर्ता-धर्ता भी माना जाता है। अब सवाल है कि वैदिक उससे क्यों मिले? वैदिक एक पत्रकार हैं, और बतौर पत्रकार किसी से भी मिल सकते हैं। असल में मिलना-जुलना और खबर तलाशते रहना तो एक खबरनवीस का काम है ही। इसलिए समझ नहीं आता कि इसका इतना विरोध क्यों? किसी ने कहा कि अगर वह खबर के लिए मिलने गए थे, तो फिर खबर कहां है? वैदिक ने जो इंटरव्यू लिया, वह कहां है?

परंतु कई बार किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से कई बार मिलने के बाद इंटरव्यू मिल पता है। तो अगर खबर नहीं छपी, तो भी कोई ज्यादा बड़ी बात नहीं लगती।

फिर हल्ला मचा कि वह भारत सरकार के दूत के तौर पर सईद से मिले। इसका खंडन स्वयं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा में बयान देकर कर दिया। लेकिन राहुल गांधी तो सबसे आगे चले गए और उन्होंने यह बयान दाग दिया कि वैदिक तो आर.एस.एस. के सदस्य हैं और संघ के नुमायंदे के तौर पर वह सईद से मिले। वैसे यह बड़ा पुराना घिसा-पिटा रिकार्ड बजाने जैसा है कि हर चीज में संघ को घसीट दो। यूं भी राहुल को अब ज्यादा गंभीरता से लिया नहीं जाता। पर मेरा सवाल तो यह है कि क्या पत्रकार वैदिक का एक घोषित भारत विरोधी आतंकवादी से मिलना इतना बड़ा गुनाह था कि कुछ राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ पत्रकारों तक ने वैदिक की गिरफ्तारी की मांग कर डाली?

अगर इस आधार पर गिरफ्तार किया जाना है, तो बहुत सारे पत्रकारों और अन्य लोगों को जेल जाना चाहिए। जितने लोग जंगलों में जाकर नक्सलवादी नेताओं से मिलते हैं, उनके पक्ष में लिखते हैं तथा उनकी पैरवी करते हैं, उनके लिए ऐसी आवाज क्यों नहीं उठाई जाती? फिर तो अरुंधती रॉय, स्वामी अग्निवेश और बहुत से पत्रकार जो माओवादियों से मिल कर रिपोर्ट लिखते हैं बाहर क्यों हैं? मैं स्वयं कितने ही कश्मीरी आतंकवादियों, चंबल के डकैतों आदि से मिला हूं-स्टोरी की है। पत्रकार का तो काम ही यही है। इसलिए इस आधार पर वैदिक की निंदा नहीं बनती। उन्होंने ऐसा कोई ‘अपराध’ नहीं किया, जो अन्य पत्रकार नहीं करते। इसलिए उन पत्रकार बंधुओं से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि वैदिक के लिए यह दोहरा मापदंड क्यों अपनाया गया? क्या इसलिए कि वह हिन्दी के पत्रकार हैं? अथवा इसलिए कि वह वैचारिक तौर पर उस खेमे के नहीं हैं, जिसने मान लिया है कि वे ही सारे पत्रकारीय मूल्यों के ‘एक्सक्लूसिव’ ठेकेदार हैं।

यहां हम इतना जरूर कहना चाहेंगे कि वैदिक ने भी इस प्रकरण को निखालिस पत्रकार की तरह नहीं लिया, बल्कि ट्विटर पर इस भेंट की तस्वीर डालने के बाद जब यह मामला उछला, तो वह एक राजनीतिक नेता की तरह इससे मिलने वाले प्रचार का मजा लूटने में लग गए। और ऐसा लगा कि उन्होंने प्रचार की तलब में ही यह सब किया। बदनाम हुए तो क्या, नाम तो होगा की तर्ज पर वह स्टूडियो-स्टूडियो घूमे। वह अपनी बात कहकर चुप भी बैठ सकते थे। मगर जो वैदिक को जानते हैं, उन्हें मालूम है कि वह प्रचार का कोई भी अवसर चूकते नहीं हैं। इसलिए उनकी इस मुलाकात का अंदरखाने मतलब कोई भी रहा हो, मगर जनता को ऐसा लगा कि प्रसिद्धि के लिए उन्होंने इसका इस्तेमाल किया। इस नाते उनका अगर कोई अपराध था, तो वह एक नैतिक किस्म का अपराध था। इस तरह के प्रकरण में जिस गंभीरता की अपेक्षा उन जैसे वरिष्ठ संपादक-पत्रकार से की जाती है, वह उन्होंने नहीं बरती। अगर वह ऐसा करते तो शायद यह ज़्यादा बड़ी स्टोरी होती।

उमेश उपाध्याय

эмигрант израилькак взломать пароль

Leave a Reply

Your email address will not be published.