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रेप कल्चर : परंपरा और नैतिक मूल्य

ऐसा लगता है कि देश में बलात्कार के मामलों का कोई अंत ही नहीं है। हाल ही में बंगलुरु में एक स्कूल कर्मचारी द्वारा एक 6 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और उसी स्कूल के चेयरमैन का इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिश करना, इसी सड़ांध का उदहारण है। लखनऊ में निर्भया काण्ड की तरह ही एक 25 वर्षीया लड़की के साथ बलात्कार और फिर उसी तरह के क्रूरतम अत्याचार के बाद हत्या का मामला भी सामने आया है। इधर-उधर जहां-तहां होने वाले अनगिनत बलात्कारों के बीच इन दोनों मामलों ने मीडिया का ध्यान आकर्षित कर लिया है।

इस बार भी बहुत आक्रोश प्रकट किया गया, लेकिन क्या इससे स्थितियां बदली जा सकती हैं? यौन हिंसा की जड़ें देश में गहराई तक फैल चुकी हैं और अगर इसे बढऩे से रोकना है तो इसकी जड़ों पर हमला करना होगा। हमें खुद से सवाल पूछना होगा कि कैसे हम समाज के इस निकृष्टम अपराध की रोकथाम कर सकेंगे? क्या समाज की मदद के बिना सरकार और पुलिस इन अपराधों पर काबू पा सकेंगी? मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। जहां खून का रिश्ता नहीं होता वहां सामाजिक रिश्ता तो होता ही है। उसके ऊपर हम एक प्रजातंत्र में रहते हैं, जिसमें हर नागरिक की जिम्मेदारियां और जवाबदेही तय होती हैं। आज की सिविल सोसाइटी काफी हद तक स्वार्थी और कायर हो गयी है और इसी वजह से यौन हिंसा के मामले दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं।

एक सतर्क, जागरूक और जिम्मेदार समाज ही पुलिस, सरकार और प्रशासन को जागरूक, उत्तरदायी और प्रभावशाली बना सकता है। जब समाज मजबूत और जिम्मेदार होगा, आपराधिक गतिविधियों में खुद-ब-खुद कमी आएगी। अगर हमें लगता है कि देश के कानून-व्यवस्था में बदलाव होना चाहिए तो पहले हमें खुद में बदलाव लाना होगा। बलात्कार के बढ़ते मामलों के लिए शहरी क्षेत्रों में औरतों की हर क्षेत्रों में बढ़ती भागीदारी और ग्रामीण क्षेत्रों में जड़ जमा चुकी जाति-व्यवस्था को दोष दिया जा रहा है। लेकिन समस्या इससे ज्यादा गंभीर है और भारत को इसके बारे में कुछ न कुछ तो सोचना ही होगा।

भारत में कुछ हद तक माता-पिता, शिक्षक और राजनीतिज्ञ यौन संबंधी विषयों की अज्ञानता को बढ़ावा देते हैं। अमूमन माता-पिता तो चुपचाप इसका ख्याल रखते है जबकि पुजारियों और राजनीतिज्ञों का ऐसे मुद्दों पर मुखर होना तो आम बात हो गई है। मीडिया में उछलते हर बलात्कार पर अजीबोगरीब कारण देते हुए अंतत: लड़की को ही दोषी करार दे दिया जाता है। सबसे बेतुके वक्तव्य तो राजनेताओं के आते हैं। इन नेताओं ने बलात्कार के लिए मांसाहारी भोजन, मोबाइल का प्रयोग, ग्रामीण क्षेत्रों तक टीवी का प्रसार, यहां तक की दुकानों में लगाए पुतलों तक को जिम्मेदार ठहराया है।

सवाल यह उठता है कि यह तथाकथित विशेषज्ञ बंगलुरु में हुए 6 साल की बच्ची के साथ हुए बलात्कार का क्या कारण गिनवाएंगे? यह पहली बार नहीं है कि एक बच्ची के साथ बलात्कार हुआ है। ऐसे मामले भी देखे गए, जहां कुछ महीने की अबोध बच्चियों के साथ भी बलात्कार हुआ है। स्कूल बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह मानी जाती रही है। सदियों से प्रतिष्ठित गुरु-शिष्य परंपरा का निरंतर क्षरण हो रहा है।

स्कूल से ही बच्चों को स्त्रियों का सम्मान करना, व्यक्तिगत जीवन का सम्मान करना और कानून के प्रति जिम्मेदार होना सिखाना होगा। हम अपने बच्चों की परवरिश कैसे करें, इसके लिए हमें आत्ममंथन करना होगा। लड़कियों को बताना होगा कि वो भी समाज में बराबरी का दर्जा रखती हैं। स्कूलों में लड़कियों के लिए आत्मरक्षा की कक्षाएं होनी चाहिए। लड़कों को भी समझाना होगा कि लड़कियां भी उनके समकक्ष योग्यता रखती हैं। हमारे संभ्रांत स्कूलों में भी बच्चों को यौन और उससे जुड़े अपराधों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं होता। हमें बच्चों को बताना होगा की क्या गलत है और क्या सही। परिवार के साथ साथ स्कूलों को भी इसके लिए कोशिश करनी होगी। भारतीय समाज जिस तरह से पौरुष, नारीत्व और लैंगिक आधार पर सोचता है, इस चीज को बदलने की सबसे ज्यादा जरुरत है। बलवान पुरुष होने के क्या मायने हैं और आधुनिक समाज में स्त्री की क्या भूमिका और स्थिति है, इस पर भी सोच बदलने की जरुरत है।

घर के अंदर, ग्रामीण क्षेत्रों और निम्न आय वर्ग में होने वाली यौन हिंसा की घटनाएं ज्यादातर दर्ज होती ही नहीं हैं। यह समाज में औरतों की स्थिति बताता है। क्या औरतों का समाज में कोई हिस्सा है, क्या उन्हें स्वायत्तता है, क्या उनके पास कमाने का जरिया है? लेकिन फिर यह बच्चों के अधिकारों का भी मुद्दा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हमारे पास विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है, जिससे हमने ऐतिहासिक परम्पराए और मानवीय मूल्य प्राप्त किए हैं। लेकिन लगातार होने वाले बलात्कार हमारे इन सब दावों को खोखला साबित कर रहे हैं।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

 

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