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क्रिकेट: मैदान से अखाड़े तक

क्रिकेट को भद्रजनों का खेल कहा जाता है, जहां गेंद और बल्ले के मध्य युद्ध होता है। नहीं, भद्रजन से तात्पर्य किसी ऐसे व्यक्ति से हर्गिज नहीं है जो साफ-सुथरा हो, सूट-बूट पहने हुए हो, बाल संवारे हुए हो और शिष्टता एवं नैतिकता की मिसाल हो। यहां भद्रजन का संदर्भ ऐसे खिलाड़ी या खिलाडिय़ों से है जो खेल को मर्यादा में रहकर खेलते हों। मर्यादा से तात्पर्य एक-दूसरे के प्रति सम्मान, सराहना और एक-दूसरे की मदद से है।

लेकिन, प्रतिस्पर्धा के इस दौर ने खिलाडिय़ों को खेल की मर्यादा का उल्लंघन करने पर मजबूर कर दिया है। रनों और विकेटों की भूख और प्रसिद्धि के जुनून में आज खिलाड़ी इतने खो गए हैं कि खेल की गरिमा को भी ठेस पहुंचाने से बाज नहीं आते। गाली-गलौज, मार-पीट, एक-दूसरे की नकल और तो और सौदेबाजी करने तक से पीछे नहीं रहते। क्रिकेट का जन्म 19वीं शताब्दी में हुआ और तब से आज तक इस खेल ने कई महान खिलाड़ी दुनिया को दिए हैं।

फिर भी, कहीं न कहीं इन महान खिलाडिय़ों के बीच हमेशा से एक ऐसा खिलाड़ी मौजूद था जो अपने अमर्यादित तौर-तरीकों से लोगों का मनोरंजन करता और खेल में एक अलग रवानगी बरकरार रखता था। अतीत और वर्तमान में ऐसे कई किस्से मौजूद हैं जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि खेल की मर्यादा का कदम-कदम पर उल्लंघन हुआ है। इस उल्लंघन की शुरूआत 1932-33 की विश्व प्रसिद्ध ऐशेज श्रंखला से हुई। इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहले टेस्ट में बाउंसर गेंदों का प्रयोग किया और मैच जीत लिया। ऑस्ट्रेलिया इस तरह से हार को पचा नहीं सका और एडिलेड में उसने इंग्लैंड को इसी तरह मात दी। लेकिन, इसके बाद दोनों देशों के राजनैतिक संबधों में भी दरार पड़ गई। नौबत श्रृंखला को बीच में ही समाप्त करने तक पहुंच गई। खिलाडिय़ों के मन में एक-दूसरे के प्रति घृणा का संचार हो गया। इतिहास में यह श्रृंखला ‘बॉडीलाइन सीरीज’ के नाम से जाना जाता है।

इतना ही नहीं, ऑस्ट्रेलिया के रॉड मार्श और इयान चैपल 60 के दौर में विपक्षी खिलाडिय़ों को बुरा-भला बोल उन्हें उकसाने की कोशिश में रहते थे। क्रिकेट के खेल में इसे ‘सिलेजिंग’ कहते हैं। तब से आज तक यह खेल का एक अहम हिस्सा बन गया है। आज लगभग सभी मैचों में खिलाड़ी एक-दूसरे को बात-बात पर बुरा-भला बोलते रहते हैं। केवल यही नहीं, कुछ मौकों पर तो खिलाड़ी आपस में और दर्शकों तक से भिड़ते नजर आए। 1997 में इंजमाम भारत के खिलाफ बल्लेबाजी करते हुए अचानक दर्शक दीर्घा में पहुंच कर एक दर्शक को पीटने लगे। 1992 के भारत-पाक के उस मैच को कोई क्रिकेट प्रेमी नहीं भूला होगा जब पाकिस्तान के जावेद मियांदाद बल्लेबाजी के दौरान अचानक किरन मोरे की नकल कर कूदने लगे।

1996 के भारत-पाक क्वार्टर फाईनल को भी शायद ही कोई भूल पाए। आमिर सोहेल ने वेंक टेश प्रसाद की गेंद पर चौका लगाया और बल्ले से इशारा करते हुए कहा कि ‘दुबारा मारूंगा’। लेकिन अगली गेंद पर जो कुछ भी हुआ उसने इस मैच को ऐतिहासिक बना दिया। साल भर पहले आस्ट्रेलिया की बिग बैश में दिग्गज स्पिनर शेन वार्न और वेस्टइंडीज के मार्लन सैमयूल्स के बीच कहा-सुनी हुई।

इसी कड़ी में अब आईपीएल भी शामिल होता जा रहा है। 2008 में हरभजन ने मैच हारने के बाद श्रीसंत को थप्पड़ जड़ दिया था। पिछले साल गौतम गंभीर और विराट कोहली के बीच गर्मा-गर्मी हो गई थी। इसी सीजन में वेस्टइंडीज के काइरोन पोलार्ड और आस्ट्रेलिया के मिशेल स्टार्क आपस में भिड़ गए। स्टार्क के शब्दों से पोलार्ड इतने भड़क उठे कि उन्होंने स्टार्क पर बल्ला ही फेंक दिया।

क्रिकेट के 138 वर्ष लंबे इतिहास में खेल में कई बदलाव हुए हैं। कई नए प्रारूपों ने खेल को दिलचस्प तो बनाया ही है साथ ही खेल से सभ्यता और शालीनता को दूर कर दिया है। शांति को उद्दंडता और विनम्र मानसिकता को मौखिक आक्रामकता ने प्रतिस्थापित कर दिया है। यह सब और ऐसी अनेकों घटनाओं से आखिर भद्रजनों का खेल किस तरफ बढ़ रहा है? क्या आज पैसा, जीत और रूतबा ही खेल का अंग बन गया है, खेल की गरिमा और मर्यादा का कोई महत्व नहीं? खैर ऐसे हजारों प्रश्न अतीत से उठते आ रहे हैं, लेकिन सच तो यह है कि आज के दौर में यही सब चलता है और दर्शकों को भी यही चाहिए।

सौरभ अग्रवाल

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