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एशिया में ऑनलाईन मानव-तस्करी में वृद्धि

तस्करों का जाल गोद लेने के लिए बच्चों की खोज करने वालों से लेकर व्यवसायिक यौन शोषण, ड्रग तस्करी और बाल मजदूरों तक चाह रखने वालों तक फैला हुआ है।सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले 18 साल से कम उम्र के बच्चे अक्सर तस्करों के जाल में फंस जाते हैं।

दक्षिण-एशिया में ऑनलाईन के जरिए मानव-तस्करी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। 600 मिलियन जनसंख्या वाले एसियान क्षेत्र में लगातार बढ़ती आबादी के साथ ही इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या भी दुगुणा हो गई है।  तकनीक आधारित तस्करी प्रारंभिक सोच की अपेक्षा ज्यादा वृहद और अनुकूल है, लेकिन सीमा पार तस्करी को रोकने के लिए उपकरणों का भी बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्षेत्र में मोबाईल फोनों के प्रयोग में विस्फोटक वृद्धि, तस्कारों की भर्ती के साथ-साथ वेश्यावृत्ति और बेगार के लिए अधिकतम संख्या में पीडि़तों को उपलब्ध कराने के लिए रियल-टाईम संचार और समन्वय की सुविधा उपलब्ध कराता है। इससे उनका कार्यक्षेत्र और अपने शिकारों तक उनकी पहुंच बढ़ जाती है। यूनाईटेड नेशन्स ऑफिस ऑफ ड्रग्स ऐंड क्राईम (यूएनओडीसी) के अनुसार, मोबाईल ब्रॉडबैंड के प्रति उपभोक्ताओं के बढ़ते झुकाव के कारण वैश्विक जुड़ाव में जबरदस्त वृद्धि हुई है। एक तरफ व्यक्तिगत साईबर अपराध में वृद्धि हुई है, तो दूसरी तरफ संगठित आपराधिक समूहों ने बिना दक्षता की जरूरतों वाले नए अवसरों को खंगाला है। उदाहरण के लिए, सोशल मीडिया ने लोगों को तस्करी, बाल उत्पीडऩ सामग्री का वितरण और पीडि़तों की नई भर्ती के लिए कई रास्ते उपलब्ध करा दिए हैं।

यद्यपि, एसियान देशों ने व्यक्तिगत रूप से तस्करी, खासकर महिलाओं और बच्चों की तस्करी के खिलाफ घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन इसे लागू करने के लिए उन्होंने कोई विशेष उपाय नहीं किए गए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पूर्वी एशियन देश लंबी दूरी और अंतर-महाद्वीपीय तस्करी के एक बड़े स्रोत हैं। तस्करी पर यूएनओडीसी के ताजा वैश्विक रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल पीडि़त बच्चों में पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र के 40 प्रतिशत बच्चे हैं। इसके अलावा, इस क्षेत्र के पीडि़त बच्चे लगभग 60 देशों में फैले हुए हैं।

तस्करों का जाल गोद लेने के लिए बच्चों की खोज करने वालों से लेकर व्यवसायिक यौन शोषण, ड्रग तस्करी और बाल मजदूरों की चाह रखने वाले लोगों तक फैला हुआ है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले 18 साल से कम उम्र के बच्चे अक्सर तस्करों के जाल में फंस जाते हैं। पहली बार में एक किशोर, उस व्यक्ति का फ्रेंड रिक्वेस्ट प्राप्त करता है, जिसे वह जानता तक नहीं, फिर भी उसे स्वीकार कर लेता है। तस्कर पहले बातचीत का सिलसिला बढ़ाते हैं, उसके बाद मुलाकात के लिए सहमति बनाते हैं और उसके बाद सोशल मीडिया के जरिए कई मुलाकातें करते हैं। इस तरह वह बच्चा अवैध व्यापार का हिस्सा बन जाता है। माना जाता है कि इंडोनेशिया में गुमशुदा बच्चों की लिखाई गई रिपोर्टों में एक-तिहाई बच्चे अपने बंधकों से फेसबुक जैसी सोशल साईटों के जरिए मिले थे।

फरवरी 2014 में चीनी अधिकारियों ने 382 शिशुओं को बचाते हुए, बच्चों की ऑनलाईन खरीद-बिक्री करने के संदेह में लगभग 1,000 लोगों को गिरफ्तार किया था। यह बात चीनी अधिकारियों के 6 महीनों के अभियान में निजी तौर गोद लेने के लिए बढ़ावा देने वाली एक बेवसाईट के तहकीकात से पता चला। उसके बाद कानून प्रवर्तन अधिकारियों ने एक नामी चीनी मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर 30 समूहों, ऑनलाईन फोरम और चार वेबसाईटों के जरिए बच्चों की अवैध खरीद-बिक्री का खुलासा किया था।

कानून प्रवर्तन विभाग पीडि़तों की पहचान डेटाबेस और डेटा एनालिटिक्स के जरिए फोरेंसिक प्रक्रिया को मजबूत करने जैसे तरीकों में लगातार सुधार और विकास कर रहा है। जो भी हो, एसियान क्षेत्र के देशों को एक बहुआयामी रणनीति अपनाने की जरूरत है, जिसमें निजी क्षेत्रों को शामिल करते हुए इसके लिए सजा के प्रावधान और जागरूकता फैलाने पर विशेष ध्यान देना खास है।  सिंगापुर ने राष्ट्रीय कार्य योजना 2012-15 का विकास किया है, जिसमें ‘4पी’ – प्रिवेंशन (रोकथाम), प्रॉस्क्यूशन (अभियोजन), प्रोटेक्शन (संरक्षण) और पार्टनरशिप (भागीदारी) की रणनीति बनाई गई है।

पूरे एशिया में लोगों द्वारा इंटरनेट के उपयोग में हो रही भारी वृद्धि के साथ ही इसकी सक्रियता में लगातार विकास एवं वृद्धि होगी। मानव तस्करी को रोकने के लिए कई कदम उठाए गए हैं, जैसे कि अमेरिका द्वारा मानव तस्करी से लडऩे के लिए बनाई गई नीतियां और कॉर्पारेट सोशल रिस्पॉन्शबिलिटी स्कीम। इस क्षेत्र में सबसे अधिक नवाचार अमेरिका और यूरोप द्वारा शुरू किए गए हैं। तकनीकी रूप से उच्च इन तरीकों को लागू करने की जरूरत अब एशियाई देशों को होने लगी है।

वर्चुअल वैश्विक कार्यदल ने बच्चों को ऑनलाईन बाल-उत्पीडऩ से बचाने के लिए प्रवर्तन एजेंसियां, गैर-सरकारी स्वयंसेवी संस्थानों और औद्योगिक भागीदारों को साथ लाने का प्रयास किया है। 2012 में ऑपरेशन एनडेवर, जिसमें ऑस्ट्रेलियाई, ब्रिटीश, अमेरिकी और फीलीपीनी एजेंसियों ने संयुक्त रूप से कार्य किया, डेटा एनालिसीस के जरिए फीलीपींस के उन इलाकों की पहचान करने की कोशिश की गई, जहां बाल उत्पीडऩ से संबंधित सामग्रियों को प्रेषित किया गया था। ऑपरेशन एनडेवर में 29 लोगों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरफ्तारी हुई जिसमें 11 फीलीपींस के थे। इस ऑपरेशन में ऐसे संगठित अपराध समूह को ध्वस्त किया गया, जो मांग के अनुसार बाल उत्पीडऩ का लाईव स्ट्रीमिंग दिखाते थे।

लंदन में गुलामी विरोध दिवस के अवसर पर अक्टूबर 2013 को ऐंटी-ट्रैफिकिंग मोबाईल फोन ऐप्लीकेशन की शुरूआत की गई। इस मोबाईल फोन ऐप्लीकेशन का विकास अमेरिका में रेडलाईट ट्रैफिक द्वारा सन 2013 में किया गया था। अमेरिकी गैर-सरकारी संगठन पोलरिस की परियोजना के साथ-साथ यह ऐप्लीकेशन अपने उपयोगकर्ताओं को तस्करी का संभावित संकेत और पीडि़तों के लिए रेड फ्लैग का संकेत देता है। साथ ही, तस्करी को पहचानने के लिए 20 मिनट का प्रशिक्षण, संदिग्ध मामलों में स्थानीय अधिकारियों को गुमनाम सूचना पहुंचाने और मानव तस्करी के खिलाफ एक स्थानीय सामुदायिक नेटवर्क स्थापित करने की सुविधा भी देता है।

वल्र्ड ट्यूरिज्म ऑर्गनाईजेशन, यूएनओडीसी और यूनेस्को भी इस वैश्विक अभियान – ‘योर ऐक्शन काउंट – बी अ रिपॉन्शिबल ट्रैवनलर’ में मार्च 2014 में शामिल हो गए। यह अभियान निजी क्षेत्र के समर्थन से शुरू किया गया है। मैरियट इंटरनेशनल और सब्रे होल्डिंग्स जैसी कंपनियां अपनी बेवसाईटों के जरिए, ऑनलाईन बुकिंग प्लेटफॉर्म, अपने ट्रिपकेस मोबाईल ऐप्लीकेशन और गेटदेयर बुकिंग के जरिए इसे प्रोत्साहित करेंगी।

इस तरह के मल्टी-स्टेकहोल्डर की पहल टिकाऊ और जागरूकता बढ़ाने वाली है, खासकर एशिया-प्रशांत में, जिसकी पहचान मानव तस्करों के स्रोत और स्थान के रूप में किया जाता है। ब्रिटेन और अमेरिका में संपर्क में लाए गए कई मल्टी-स्टेकहोल्डर मानव तस्करी को रोकने के लिए आईसीटी का प्रयोग करते हुए ऑनलाईन पिटीशन, डाटा मैपिंग और जागरूकता अभियान को चला रहे हैं। सरकार और कानून प्रवर्तन एजेसिंयों के लिए अकेले इस पर काबू पाना मुश्किल है। इसलिए मल्टी-स्टेकहोल्डर और निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की सहयोग वाले अर्थपूर्ण गठबंधन एशिया प्रशांत में मानव तस्करी को रोकने और अपराधियों पर रोक लगाने के लिए बहुत जरूरी हैं।

एलिस्टर डी.बी. कूक और कैट्रीओना एच. हेन

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