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क्या राहुल भी हैं भाजपा की जीत के हीरो?

पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी हेडक्र्वाटर पर दो मिनट के भाषण में हार की जिम्मेदारी अपने उपर ले ली। सुबह राहुल भी अमेठी से पीछे चल रहे थे पर नतीजे आने तक वे जीत ही गए। लेकिन, जीत का यह अंतर पिछली बार की अपेक्षा काफी कम था। राहुल गांधी मुस्कुरा रहे थे, शायद बहादुरी भरा अपना चेहरा दिखाना चाहते थे। लेकिन, जब पत्रकारों ने सवाल पूछने चाहे तो सर्तक मां उन्हें वहां से ले गईं।

2014 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को अपनी सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। भाजपा के कद्दावर नेता नरेंद्र मोदी की लहर कांग्रेस को वाकई उड़ा ले गई। पार्टी केवल 44 सीटें ही जीत पाई और इसके साथ ही उसका संसद में विपक्ष बनना भी खतरे में पड़ गया। हां, अगर यूपीए को एक मान लिया जाए तो वह विपक्षी दल बन सकता है।

कंाग्रेस पार्टी करीब 12 राज्यों में एक भी सीट नहीं जीत पाई। राजस्थान में सभी 25 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की है। भाजपा ने उत्तर भारत के छह राज्यों में शत प्रतिशत जीत हासिल की, लेकिन इन चुनावों की अहम बात पार्टी का उन राज्यों में बेहतरीन प्रदर्शन रहा जहां पार्टी की उपस्थिति ना के बराबर थी। इनमें असम और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा को 2 सीट ही मिलीं हैं लेकिन शहरी क्षेत्रों में पार्टी को काफी वोट मिले हैं। कोलकाता की 4 सीटों में पार्टी दूसरे नंबर पर रही और ग्रामीण क्षेत्रों में भी अपनी पैठ जमाने में पार्टी कामयाब रही।

केवल तमिलनाडु और केरल ही ऐसे दो राज्य हैं जहां भाजपा कुछ ज्यादा नहीं कर पाई। वहीं कर्नाटक में एक बार फिर भाजपा के पक्ष में वोट पड़े। नंदन निलकेणी भाजपा के अनंत कुमार से हार तो गए, लेकिन आम मत के अनुसार – ‘वे सही व्यक्ति हैं लेकिन गलत पार्टी से जुड़े हुए हैं।’ तो क्या लोकसभा की 543 सीटों में से केवल 50 सीटें जीतने वाली और 10 साल देश में शासन करने वाली कांग्रेस गलत पार्टी है और उसका मुखिया भी गलत?

पार्टी के नेता और राजनैतिक कार्यकर्ता सभी सदमे में हैं। पूरे दिन टीवी पर पार्टी के गिरते ग्राफ और कम होती सीटों को देख कर वे यह अनुमान ही नहीं लगा पा रहे थे कि कैसे कांग्रेस की इतनी दुर्गति हो गई। राहुल और उनकी टीम की राजनीति के प्रति लोगों में काफी गुस्सा था। केंद्र व राज्य के चुनाव में यही गुस्सा फूट पड़ा।

पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी हेडक्र्वाटर पर दो मिनट के भाषण में हार की जिम्मेदारी अपने उपर ली।सुबह राहुल भी अमेठी से पीछे चल रहे थे पर नतीजे आने तक वे जीत गए। लेकिन जीत का यह अंतर पिछली बार से काफी कम था। वे मुस्कुरा रहे थे, शायद एक बहादुरी भरा चेहरा दिखाना चाहते थे। लेकिन, जब पत्रकारों ने सवाल पूछने चाहे तो सर्तक मां उन्हें वहां से ले गईं।

कांग्रेस शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने सोनिया गांधी को हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा सौंपने की पेशकश की। लेकिन अभी तक 10 जनपथ से ऐसी कोई खबर नहीं आई कि राहुल गांधी ने भी ऐसी कोई पेशकश की है या नहीं। जैसे-जैसे एनडीए 300 से आगे और अकेली भाजपा पूर्ण बहुमत की ओर बढ़ रही थी वैसे-वैसे कांग्रेसी प्रियंका को पार्टी में लाने के नारे लगाने लगे – ‘प्रियंका लाओ कांग्रेस बचाओ।’ इसके अलावा अभी तक राहुल गांधी के प्रति आम जनता में कोई सार्वजनिक अंसतोष नहीं है। अगले हफ्ते कांग्रेस कार्य समिति की बैठक होनी है। उस समय अपने-अपने राज्यों से कांग्रेस के सभी नेता बैठक में शामिल होने के लिए उपस्थित होगें। बैठक में आगे की रणनीति के बारे में भी विचार किया जाएगा।

कांग्रेस के नेताओं के अनुसार, राहुल के प्रति वरिष्ठ नेताओं का रोष अपेक्षित है, क्योंकि वे उनकी शैली से खुश नहीं हैं। साथ ही युवा नेता भी अपने आप को दरकिनार किए जाने पर उनसे रूष्ट हैं। एक युवा कांग्रेस नेता ने माना कि राहुल के प्रति उनके मन में गुस्सा है और आने वाले दिनों में वह सामने भी आ जाएगा। प्रश्र यह है कि क्या यह गुस्सा क्रांति का रूप धारण करेगा या राहुल पर दवाब बनाएगा कि वे सभी को साथ लेकर चलें और सुनिश्चित करें कि पार्टी के निर्णय मिलजुल कर लिए जाएं।

एक वरिष्ठ एआईसीसी पदाधिकारी ने माना कि पिछले पांच साल बेहद मुश्किल रहे और यूपीए 2 इस दौरान कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने में विफल रही। उन्होंने कहा कि मंत्री और वरिष्ठ नेता बहुत अभिमानी हो गए हैं, ऐसे में राहुल खड़े हुए और वरिष्ठ नेता को दरकिनार कर दिया। देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार फैल गया और वे सभी कीमतों को बढऩे से रोकने में असफल रहे। ना तो पार्टी और ना ही सरकार लोगों के मन में अपने प्रति पनप रही गलत धारणा को रोक पाने में सफल हुई।

राहुल – जिन्हें एक अपरिपक्व नेता के तौर पर देखा जा रहा था और जो लोगों के बीच सरकार चलाने का विश्वास पैदा नहीं कर पा रहे थे – की तुलना में नरेंद्र मोदी ने अपने आप को एक सफल मुख्यमंत्री और एक परिपक्व इंसान के तौर पर प्रस्तुत किया। मोदी ने दिखया कि उनके पास नजरिया है, वे विकास कर पाएंगें और युवाओं को रोजगार दिलवा पाएंगे। मोदी ने युवा भारत की मनोस्थिति को समझ कर उसे सपने बेचे जो युवाओं ने भी समझे।

एक कुशल, सूक्ष्म और कामयाब अभियान जिसमें मोदी के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए पैसा भी पानी की तरह बहाया गया। मोदी को संघ का पूर्ण साथ मिला। संघ चाहता था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बने। इसलिए उन्होंने कांग्रेस निर्देशित यूपीए के खिलाफ कई मोर्चों पर अभियान छेड़े जिसमें भ्रष्टाचार मुख्य था, जिसके खिलाफ युवा पहले ही कांग्रेस से तंग हो चुके थे।

एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, बाबा रामदेव, अण्णा हजारे और अरविंद केजरीवाल सभी भाजपा के आदमी थे जिनका मुख्य निशाना कांग्रेस थी। 2014 के चुनावी नतीजों और वोटिंग से पता चलता है कि केजरीवाल की ‘आप’ ने कांग्रेस के मुस्लिम वोटों को छीनकर किस तरह बड़ी क्षति पहुंचाई है। मुसलमानों ने सोचा कि कांग्रेस भाजपा से न तो लड़ पाएगी और ना ही जीत पाएगी। इस आधार पर उन्होंने भाजपा को रोकने के लिए ‘आप’ को वोट दिया। केवल 4 सीटों के अलावा ‘आप’ ज्यादा कुछ नहीं जीत पाई, लेकिन कांग्रेस को बड़ी हार दिला गई।

एक वरिष्ठ एआईसीसी पदाधिकारी ने माना कि टाईम्स नाउ के साथ राहुल के साक्षात्कार ने पार्टी व उनकी खुद की छवि को भारी नुकसान पहुंचाया। यहां से जनता का मन बदलना काफी मुश्किल था। पार्टी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष अजय माकन, जिन्हें स्वयं राहुल ने चुना था, पूरे चुनावों के दौरान वे कभी-कभी दिखाई देते थे। आखिरी दिन उन्होंने भी स्वीकार किया कि कुछ गलतियां जरूर हुईं हैं। उनके पास क्षतिपूर्ति का न तो कोई उपाय है और न ही कोई समझ। और तो और उन्हें यह अहसास ही नहीं हुआ कि वे मोदी के बुने जाल में अपने आप ही फंस गए। रोज के भाषणों में बस मोदी की खींचाई और अपशब्द होते थे, जो मोदी के पक्ष में गए। माकन ने अन्य नेताओं को मीडिया से मुखातिब होने नहीं दिया और अपने किले को बचाने में भी असफल रहे।

एक अन्य वरिष्ठ नेता ने कहा कि राहुल की टीम सिर्फ गिने-चुने लोगों की ही थी, जो सारी चीजें मैनेज कर रही थीं, जबकि पहले की कमेटियां मिलजुल कर और सर्वसम्मित से कार्य करती थीं। राहुल ने पार्टी को लोगों तक पहुंचाने और फैलाने के उद्देश्य से ऐसा किया, लेकिन इसकी जगह वे महत्वपूर्ण फैसले लेने के अधिकार को कुछ लोगों के हाथों में सौंप बैठे, जिनके पास न तो नजरिया था, न अनुभव और न ही सोच।

जयराम रमेश को मुख्य चुनाव समन्वयक नियुक्त किया गया, जबकि उनसे बहुत गलतियां हुईं। वे वॉर रूम के प्रभारी थे, जबकि उन्हें स्वयं अनुभव नहीं कि लड़ाई कैसे लड़ी जाती हैं। उन्होंने एक विज्ञापन ऐजेंसी डेनत्सू से संपर्क किया, जिससे पार्टी को भारी नुकसान हुआ। अभियान के बीच-बीच में वे खुद भी साक्षात्कार देते रहे। उन्होंने एक बयान दिया था कि 70 वर्ष से उपर के सभी नेताओं को रिटायर हो जाना चाहिए, क्योंकि देश को एक युवा नेतृत्व चाहिए। कई वरिष्ठ नेता पहले ही राहुल से परेशान थे और अभियान के समय अपने घर पर ही रहते थे और राहुल को अकेले अभियान करने देते थे।

मधूसूदन मिस्त्री जो खुद पार्टी के लिए नए थे। उन्हें पार्टी के देशभर के उम्मीदवारों को चुनने का काम दिया गया। मोहन गोपाल और सुमन दुबे राहुल के दरबार के दो नए नवरत्न थे। इनके साथ भंवर जितेंद्र सिंह और हावर्ड, ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज से पढ़े कई युवक-युवतियों को बिना किसी अनुभव और जमीनी स्तर हकीकत की जानकारी के मौका दिया गया। राहुल ने कहा कि युवा नेता पार्टी को किसी कॉर्पोरेट की तरह चलाएंगे, लेकिन राहुल इस चुनाव के महाकुंभ में पार्टी के नेताओं को साथ लेकर चलना भूल गए।

इस पूरी प्रक्रिया में वे कांग्रेस को देश के कई हिस्सों से हटाकर केसरिया पार्टी को इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत से देश का प्रतिनिधित्व सौंप गए। भाजपा किसी और पर आश्रित नहीं है और अब वह भारत की एकता व सेकुलरवाद के लिए बेबाकी से फैसले ले सकती है। आरएसएस अब हिंदुत्व को पूरी तरह लागू करना चाहता है। और अब, जब राहुल को समझ आएगा कि उनकी इस प्रयोगात्मक राजनीति से देश का क्या हाल हुआ तो बहुत देर हो चुकी होगी।

रेणु मित्तल

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