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कैसा होगा मोदी का अर्थशास्त्र?

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का 50 शेयरों पर आधारित संवदी सूचकांक निफ्टी 147.03 अंकों की तेजी के साथ 7270.20 पर खुला और 79.85 अंकों, यानी 1.12 प्रतिशत की तेजी के साथ 7203 पर बंद हुआ। लगातार प्रयास और अपेक्षाएं चलते रहे और यह बातचीत चलती रही कि मोदी सरकार के आने पर इन क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी होती रहेगी।

राष्ट्र इस समय चकित है। इस प्रकार की विजय राष्ट्र ने इससे पूर्व न देखी और न अनुभव की। विजय की सुनामी कहें या विजय का उतुंग हिमालय या फिर पहली बार भारतीय जनता की भावनात्मक्ता, जो सीधे मतों में परिवर्तित हुई हैं। इन सब बातों के लिए शायद भारतीय लोकतंत्र में शब्दकोश के शब्द सही स्थिति को बयां नहीं कर सकते। इस बार मोदीजी की विजय को भारतीय जनता पार्टी की विजय कैसे परिभाषित की जाए, यह वास्तव में शब्दों में बांधना कठिन है। किंतु शायद शाब्दिक भ्रम के अतिरिक्त या शाब्दिक फेरबदल के अतिरिक्त इस विजय को राजनीतिक, आर्थिक और भारतीयता की परिभाषा से उदय के तौर पर आंका जाना इतिहास से अपेक्षित है।

अगर इस विजय को ध्यानपूर्वक देखा जाय तो यह भारतीयता को पून: परिभाषित करने और एक आम भारतीय की जो राज्य से अपेक्षांए होती हैं उनको शायद नए सिरे से समझने और क्रियान्वयन करने का यह एक नया युग आरंभ होगा ऐसा दिखाई देता है। अपेक्षाओं के एक लंबे समय में जब हम तार्किक तौर पर कई तथ्यों को देखने का प्रयास करते हैं तो बहुत से ऐसे तथ्य सामने आते हैं जिन पर चर्चा होनी चाहिए। सबसे पहले तो पिछले दो-तीन दिनों में जिस प्रकार का उछाल बाजार में आया और जिस प्रकार के उछाल को बाजार ने परिलक्षित किया वह अपने आप में बड़ी चर्चा का विषय बना। देश के शेयर बजारों में व्यापक हलचल और विचलन पिछले कुछ दिनों में दर्ज किया गया। जिस समय यह लेख लिखा जा रहा है ठीक उसी समय बंबई स्टॉक एक्सचेंज की शेयरों पर आधारित संवेदी सूचकांक 365.94 अंकों की तेजी के साथ खुला और 216.14 अंकों यानी 0.90 फीसदी की तेजी के साथ बंद हुआ।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का 50 शेयरों पर आधारित संवदी सूचकांक निफ्टी 147.03 अंकों की तेजी के साथ 7270.20 पर खुला और 79.85 अंकों, यानी 1.12 प्रतिशत की तेजी के साथ 7203 पर बंद हुआ। लगातार प्रयास और अपेक्षाएं चलते रहे और यह बातचीत चलती रही कि मोदी सरकार के आने पर इन क्षेत्र में लगातार बढ़ोतरी होती रहेगी। इन क्षेत्र में जिनमें स्टॉक्स पर ऊंचाई के आंकड़े अपेक्षित किए गए वे कैपिटल गुड्स, ऑयल और गैस, पावर और बैंकिग के महत्वपूर्ण सैक्टर्स थे। सच कहें तो आर्थिक संरचना को बांधनेवाले यही महत्वपूर्ण सैक्टर्स होते हैं, किंतु तब भी यही स्पष्टता से समझना चाहिए कि शेयर मार्केट्स या स्टॉक एक्सचेंज में होने वाली गतिविधियों से होने वाली राष्ट्र की आर्थिक नीतियां बनती बदलती नहीं हैं।

वास्तव में जिस किसी ने भी मोदीजी के द्वारा दी गई विजय भाषण को ध्यान से सुना हो तो उसमें स्पष्टता से परिलक्षित होता है कि वे 125 करोड़ लोगों के विकास की उद्यमिता के एजेंडे को लेकर चलने की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं के देश के 125 करोड़ लोग अगर एक-एक कदम भी आगे चलते हैं तो देश 125 करोड़ कदम आगे बढ़ेगा। साथ ही वे यह भी कहते हैं कि विकास कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं है। यह दोनों बातें बहुत स्पष्ट संदेश देतें हैं कि पहली बार भारत में, भारत के किसी विजनरी प्रधानमंत्री ने आशा के अर्थशास्त्र की बात की है। अगर उनके पूरी चुनाव अभियान को देखें तो दो बातें साबित होती हैं। पहली बात यह है कि आशा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मूलमंत्र के तौर पर लेना चाहिए और दूसरी बात ये कि आशा पर अर्थशास्त्र रचा जा सकता है। इन दो बातों के आधार पर जो उन्होंने विकास की भूमिका की बात की थी, उससे लगता है कि देश में एक नए प्रकार की आर्थिक रचना की बात होगी। उसमें आशा के आधार पर अर्थशास्त्र रचा जाएगा।

मुझे लगता है कि उनके पूरे भाषणों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी तौर पर विकास को न लेकर प्रत्येक व्यक्ति उद्यमिता के आधार पर विकास की बात करेगा और उसकी यह उद्यमशिलता नीतियों में परिवर्तित होंगी। उनका ‘लीस्ट गवर्नमेंट एंड बेस्ट गवर्नेंस’ की बात मुझे अगला मूल मंत्र लगता है। पूरे एक वर्ष की लंबी चुनाव अभियान की परिधि में उन्होंने ये कहा कि सरकार केवल फेसिलिटेटर या उद्दीपक की भूमिका अदा करे, कम से कम गवर्नमेंट एक बेहतर गवर्नेंस दे सकती है। भाजपा के पूरे घोषणा-पत्र में यही दो बातें महत्वपूर्ण दिखाई देती हैं। आर्थिक सुधारों के साथ संरचनागत निमार्ण के साथ मैनुफैक्चरींग सेक्टर के तेज विकास के साथ या कृषि सेक्टर में समस्त उद्दीपक क्रिएट किए जाने की सारी भूमिका के प्रति किसी ने अगर ख्याल से देखा हो तो सारे के सारे घोषणा-पत्र में दो आधारभूत सिद्धांत काम करते हैं। पहला सिद्धांत है मुख्य अर्थव्यवस्था को आशा की अर्थशास्त्र के साथ जोड़कर ऐसा उठाव लाया जा सकता है जिसकी इस देश ने कभी कल्पना नहीं की थी। आशा के अर्थशास्त्री को नजरदांज नहीं किया जाना चाहिए। सरकार में उत्पादक बनने की जगह उत्पादन बढ़ाने में जोर देना चाहिए। मुझे लगता है कि ‘मोदीनोमिक्स’ कहें या मोदी विजन कहें, एक अर्थशास्त्री के नाते अगर पोलीटिकल इकोनॉमी के ताने-बाने के भीतर मोदीजी के स्पष्ट संदेश समझे तो उनके रिफॉम्र्स का आधार यही होने वाले हैं। हालांकि इस समय इस बारे में कोई भी बातचीत करना बहुत जल्दी होगा, किंतु तब भी भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र के आधार पर हम जैसे कार्यकर्ता, पंडित दीन दयाल उपाध्याय के आर्थिक विजन को समझते हैं और यह भी जानते हैं कि अब नए संदर्भ में अर्थनीति को पुन: परिभाषित करने की आवश्यक्ता है। राइट विंग अर्थशास्त्र को पूरी गति मिलने के बावजूद भी अर्थव्यवस्था का आधार अंत्योदय और जन कल्याण के आधार पर ही रचे जाएं।

जो भी पिछले समय से अर्थव्यवस्था और पोलिटिकल इकोनॉमी के इस रोचक सम्मेलन को देखते और समझते रहे हैं, वह यह तीन बातें स्पष्ट तरीके से जानते हैं। पहली बात भारत में पोलिटिकल ऑथीरिटी या पोलिटिकल सत्ता के रिन्यूअल से आर्थिक सुधारों की एक नए युग का निर्माण होगा। स्पष्ट तरीके से ‘मोदीनोमिक्स’ या मोदी विजन इस आर्थिक प्रभुसत्ता को, जो जनता ने बहुत उदारता से उन पर उड़ेल दी है, इसके लिए निश्चित तौर पर इस्तेमाल करेगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जो अर्थशास्त्र, विकास और इंक्लुजन के द्वंद्व में फंस गए था, जिसे यूपीए 1 और 2 की योजनाएं किसी भी तरीके से इस द्वंद को खोल नहीं कर पाए, उस द्वंद को पीछे छोड़ दें तो दो मुख्य बातें सामने आती हैं। पहली बात ये है कि पूरा अर्थशास्त्र या अर्थनीति इस आधार पर तय होना चाहिए कि ग्रोथ और इंक्लुजन दो विरोधाभाषी शब्द नहीं हैं। विकास अपने आप में ही इंक्लुजन का शब्द नहीं है। यह समय के राजनीतिकरण का विकास है, क्योंकि माननीय मोदीजी के अपने पहले दिन के विजय भाषण मे स्पष्ट कर दिया था कि विकास का एजेंडा जन भागीदारी के आधार पर ही तय होगा।

वामपंथ की जन-भागीदारी दिखावटी, शाब्दिक और बार-बार फेर बदल करके निधारित होने वाली केवल आदर्शपूर्ण शब्दावली ही है। राजकोषीय घाटे को कम करना एक बड़ी चुनौती है। हालांकि यूपीए सरकार ने एक लाख करोड़ की पैट्रोलियम और अन्य अनुधानों को अगले साल के लिए स्थगित करके राजकोषीय घाटे को 4.6 प्रतिशत पर नियंत्रित रखने का दिखावटी काम तो कर दिया था, लेकिन मोदी को अब इस चुनौती का वास्तविक में सामना करना पड़ेगा। देश के समक्ष चालु खाते का घाटा हालांकि घट कर जीडीपी का 1.75 प्रतिशत ही रह गया है, लेकिन इसके लिए सरकार ने सोने के आयात पर प्रतिबद्ध लगाने का काम भी किया था और इसका सीधा प्रभाव स्वर्ण आभूषण निर्यात में गिरावट भी सामने आया। उससे लाखों लोगों का रोजगार जा चुका है। इसी प्रकार से जो भी परिवर्तन यूपीए सरकार ने पिछले कुछ समय में लाए उनका अध्ययन नहीं किया गया। उसमें खाद्य सुरक्षा बिल को लागू करना भी एक महत्वपूर्ण विषय है। देश के सकल घरेलु उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी भी घटकर केवल 12-13 प्रतिशत रही है, जबकि कृषि पर आज की दो तिहाई लोगों कि आजीविका निर्भर है। इस पर एक कोर ग्रुप पर काम करना चाहिए यही हमारा मत है। जबकि गुजरात का मोदी विजन स्पष्टता से जनभागीदारी से कैसे पूंजीगत भागीदारी के ढांचें में परिवर्तन लाया जा सकता है। मैनुफैक्चरिंग सेक्टर को उठाया जा सकता है। कृषि के दृष्टि से सरकार स्वयं कृषि के पास पहुंच कर कैसे उनकी आवश्यकताओं को समझती है और उस आधार पर पूंजीगत ढांचे की वरीयता तय करती है, यह उसका स्पष्ट उदाहरण है। बहुत बड़ी चुनौतियां सामने हैं। मोदीजी का ट्रैक रिकार्ड यह बताता है कि उन्हें हर चुनौती को एक अवसर के रूप मे इस्तेमाल करना चाहिए और भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने आने वाली चुनौतियों को भी वह अवसरों में बदल देंगे, यह जन विश्वास है। विदेशी निवेश की दृष्टि से भी शानदार संकेत मिल रहे हैं, लेकिन तब भी यह प्रश्र उठते रहेंगे कि क्या ये उठाव जन कल्याणकारी नीतियों पर हावी हो जाएगा? क्या स्टाक मार्केट की वरीयताओं के आधार पर भारत की आने वाले उदयमान आर्थिक नीतियां निर्धारित होंगी? क्या किसी एक राजनीतिक प्रकल्प के जादुई कॉम्बिनेशन से विकास की दर 8 प्रतिशत या कम से कम 7 प्रतिशत तक आ सकेगी? महंगाई को नियंत्रण में लाने के किस प्रकार के उपकरण राज्यों के स्तर पर कारगर होंगे? वह केन्द्र के स्तर पर किस प्रकार से अनुभित किए जाएंगे? ऐसा कैसे हो सकेगा कि प्रति वर्ष चार करोड़ रोजगार लक्ष्यतित होने की आवश्यक्ता को पूरा किया जाएगा? पूरी की पूरी मोदी वेव नव मतदाताओं की इस रेली पर आधारित है। इस रेली की सबसे बड़ी आवश्यक्ता यह है कि कृषि आधारित क्षेत्र में रोजगारी की एक ऐसी नीति का निर्माण हो जिसमें रोगार स्वयं को खुद रिन्यू करे। इस प्रकार के अक्षय रोजगार के स्रोत कहां और कैसे बनेंगे यह सब चुनौतियों के विषय हैं। इसके साथ ही साथ कृषि क्षेत्र में जो आधारभूत सुधारों की बात की गई है उन्हें किस प्रकार से लाया जाएगा और लाने के बाद से सस्टेनेबल बनाया जाएगा यह भी महत्वपूर्ण बातें हैं।

मुझे लगता है कि आने वाले समय में इन विषयों पर चर्चा आवश्यक है। अगर पीछले तीन दिनों के अखबारों को टटोला जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि अभी से ही यह लॉबिंग आरंभ हो गई है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर को किस तरह अपनी जगह पर स्थापित रहने दिया जाए। अभी से ही मोदी समीक्षकों ने अपने अपने स्लोगन खड़े कर दिए हैं। अभी से ही वह आर्थिक लॉबिंग आरंभ हो गई है जो यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि भाजपा के, आरएसएस के, स्वदेशी के, आम भारतीय के आर्थिक एजेंडे को कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सके। तो इन सब से मार्ग निकलेगा कैसे? इस देश के लिए मोदी की अभूतपूर्व विजय का सही अर्थ परिभाषित कैसे होगा?

उनकी विजय की आकार ने ही बाजारों को उत्साह दे दिया है। अब यही उत्साह ब्यूरोक्रेसी में भी आना अनिवार्य है, क्योंकि पिछले कुछ समय से ब्यूरोक्रेसी में आया पॉलिसी पैरालाईसिस और उसके साथ-साथ यूपीए द्वारा कुछ क्षेत्रों में आया नया लाइसेंसराज, जो कम से कम चार क्षेत्रों जिसमें पर्यावरण, वन, आदिवासी और भूमि संबंधित मामले थे, शामिल हैं। उनमें से एक क्षेत्र में जिस प्रकार का एक अलिखित लाइसेंसराज यूपीए सरकार ने संस्थागत कर दिया है ये उम्मीद की जाती है कि बहुत तेजी से इन क्षेत्रों में आधारभूत सुधार किए जा सकेंगे ताकि आर्थिक विकास को एक तीव्र गति दी जा सके। हालांकि यूपीए 2 ने भी इन क्षेत्रों में पिछले दो साल कैबिनेट कमिटी ऑन इंवेस्टमेंट बनाकर 6लाख करोड़ रूपए के प्रोजेक्ट पारित किये थे तब भी यह प्रोजेक्ट पारित होना किसी भी तरह से कैपिटल गुड्स या कॉन्ट्रेक्ट के अनुकूल नहीं हो पाया।

कम से कम इसके तीन चौथाई प्रोजैक्टस इंवेस्टमेंटस राज्य स्तर पर अटकी हैं और इस पर कोई कुछ नहीं कर सकता। बहुत से इंफ्रास्ट्रक्चरल प्रोजैक्ट्स राज्य स्तर पर अटके हैं जिनके लिए कुछ भी केन्द्रीय प्रयत्न यूपीए के लेवल पर नहीं किए गए। एक मजबूत मोदी सरकार से उम्मीद की जाती है कि कम से कम राज्यों के स्तर पर सारी आवश्यकताएं पूरी की जा सकें। यह भी अपेक्षा की जाती है कि कुछ ऐसे रचनात्मक सुधार करके ऐसे मार्ग निकालेंगे जिससे फंसे हुए प्रोजेक्ट के क्लियरेंस सिस्टम को एक रचनात्मक विकास का मार्ग मिल सके। यह भी उम्मीद की जाती है कि डीजल सब्सिडी को एक वर्ष के अंदर क्रमवार लाना, फिजिकल डेफिसिट में कमी करना और बेहद आवश्यक फंड्स – जैसे बैंक डिकैपिटलाईजेशन, इंफ्रास्ट्रकचर आदि इन पर वरीयता से काम किया जाना चाहिए। एक अपेक्षा यह भी है कि वे बहुत सारे मंत्रालयों को एकीकृत करेंगे।

अंतर्राष्ट्रीय निवेश बढ़ाने के सीधे उपाय करना, सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही का शासन देना, मंहगाई और आर्थिक खाते पर नियंत्रण के साथ फिसकल कंसोलीडेसन बहुत बड़ी वरीयता बन जाती है। हमें अपेक्षा है कि ‘मोदीनोमिक्स’ विकास के एक वैकल्पिक मॉडल के तौर पर उतरेगा, जिसमें जन-कल्याण के अधिकतमीकरण के लिए साधनों के अनुकुलतम उपयोग की भारतीय संकल्पना को साकार किया जाएगा।

किंतु यह संकल्पना तकनीक, आधुनिकीकरण, उदार आर्थिक और व्यापार नीति, और सभी प्रकार की उन आधुनिक अवधारणाओं पर आधारित होगी, जिन्होंने पिछले दो दशाब्दियों में एक ग्लोबलाईस्ड विश्व रचनें में अपनी भूमिका निभाई है। मोदी का प्रधानमंत्री के तौर पर उदय यह सिद्ध करता है कि बिल्कुल देशीय लक्ष्यों को भी आधुनिकीकृत उपायों से प्राप्त किया जा सकता है। यह देशीय लक्ष्य समझने के लिए कोई रॉकेट सांइस नहीं चाहिए। यह देशीय लक्ष्य है देश की आर्थिक अस्मिता को पुन: स्थापित करना और साथ ही देश के हर नागरिक को उसके विकास के लिए वे समस्त परिस्थितियां उपलब्ध कराना, जिनका वह अधिकारी है और जिसकी उसने एक युग तक प्रतीक्षा की है।

ज्योति किरण

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