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मोदी को रोकने वालों का हश्र!

कांग्रेस की गंदी कोशिशें करने वाले विभाग ने जासूसी कांड को मथना शुरू कर दिया और मोदी की छवि और उनकी कार्यप्रणाली को ‘फासिस्ट और तानाशाही’ वाली बनाने में लग गया। उनकी शादी होने की ‘खोज’ और उनकी पत्नी को तुरूप का इक्का माना जाने लगा जो उन्हें हरा कर प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर कर सकता था।

मोदी आलोचक अब तक लाभ कमाने वाले एक व्यवसाय में व्यस्त थे जो छिप कर सहायता करने के लिए सरकार और राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता रहा। यह सच्चाई है कि अभियान चलाने वाले इन लोगों के पास असीमित संसाधन हैं और उन्हें कई तरफ से समर्थन मिलता हुआ लगता है। अधिसंख्य प्रणाली में काफी गहराई तक घुसे हुए थे। वे मोदी के खिलाफ नए आरोप लाने में काफी सक्रिय थे। नव-उदारवादी, बुद्धिजीवी, मीडिया और वामपंथी मोदी के खिलाफ स्वर तेज करने वालों में सबसे आगे थे। 2012 में जब गुजरात विधानसभा के चुनाव होने वाले थे, तब फरीद जकारिया ने लिखा था – ”मोदी की राष्ट्रीय नेता बनने की संभावना नहीं है। दिसम्बर (2012) तक वह क्षेत्रीय नेता भी न रहेंगे।’’ मणिशंकर अय्यर ने कहा कि वह वादा कर सकते हैं कि मोदी 21वीं सदी में प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। ये सज्जन किस प्रकार से इन निर्णयों पर पहुंचे? जकारिया ने यहां तक उम्मीद जताई थी

कि मोदी 2012 में राज्य के चुनावों में हार जाएंगे। अय्यर संभवत: मोदी से घृणा करते हैं और वह उन्हें अपमानित करना चाहते थे, क्योंकि वह एक चायवाला थे और सेंट स्टीफेंस में भी नहीं पढ़े थे।

जयन्ती नटराजन, लालू यादव, नीतीश कुमार, टीवी चैनलों के मालिक, प्रिंट मीडिया के दिग्गज और विदेशी-सहायता प्राप्त सैंकड़ों एनजीओ जैसे पूरे ट्राइब ने मोदी को सेंकने के लिए फ्राईंग पैन गर्म किए रखा। लालू ने घोषणा कर दी कि यदि वह लालकृष्ण आडवाणी को हिरासत में ले सकते हैं (आडवाणी जब आयोध्या जा रहे थे।), तो उनके चेले को तोडऩा आसान होगा, यानी कि मोदी का सत्ता की ओर किया जा रहा मार्च रोकना आसान होगा।

फरीद जकारिया और अय्यर की दोषसिद्धि से संभ्रांत वर्ग का एक साधारण परिवार में जन्म लेने वाले मोदी के एक राष्ट्रीय नेता बनने के स्वप्न का खंडन करना प्रतिबिंबित होता है। अन्य उन्हें इसलिए घृणा करते हैं क्योंकि वे उन्हें गोधरा दंगों के प्रिज्म से देखते हैं और यह तथ्य स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि राज्य में 2002 के बाद से कोई दंगे नहीं हुए। न ही वे इस तथ्य पर विश्वास करने के लिए तैयार हैं कि गुजरात बहुत विकसित राज्य हो गया है और विदेशी निवेशक वहां लाईन लगा कर आ रहे हैं।

इसी बीच तीस्ता सीतलवाड, उनके पति और दिवंगत मुरली सिन्हा, संजीव भट्ट और कई अन्य लोगों ने मिल कर मोदी की छवि खराब करने वाली ‘घातक ब्रिगेड’ बना ली। उन्होंने मोदी की एक चतुराई भरी रणनीति के तहत घेरने के बाद अपनी गति तेज कर दी।

मोदी ने गुजरात से बाहर आकर हाई प्रोफाइल स्पीच देनी शुरू कर दी। इस क्रम में उन्होंने पहला भाषण दिल्ली में श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (एसआरसीसी) में दिया, जिसने अधिकांश मीडिया का ध्यान आकर्षित किया। यह उनका अपना तरीका था खुद को राष्ट्रीय स्तर पर अपना परिचय देने का। भारत ने मोदी को समझना शुरू कर दिया और लोगों ने तीस्ता जैसों की बातों पर शंका करना। हर भाषण के साथ मोदी राष्ट्रीय स्तर की ओर बढऩे लगे। मोदी के भाषणों के लिए श्रोताओं और भाषण-स्थल का चयन बहुत ही सावधानी से किया जाता था। 2013 के मध्य तक उन्हें राष्ट्रीय स्तर के तौर पर स्वीकार कर लिया गया।

उनकी मुख्य प्रतिद्वन्द्वी कांग्रेस पार्टी ने उनकी ओर से खतरा महसूस किया और उनकी छवि खराब करने की जिम्मेदारी पार्टी से बाहर दे दी। एक बहुरंगा मोदी विरोधी समूह, जिसकी 2002 के दंगों के मुद्दे पर में ही हवा निकल गई थी, गुजरात मॉडल को ध्वस्त करने और मोदी को ‘झूठा’ और ‘फेकू’ सिद्ध करने की कोशिश में जुट गया।

कांग्रेस की गंदी कोशिशें करने वाले विभाग ने जासूसी कांड को मथना शुरू कर दिया और मोदी की छवि और उनकी कार्यप्रणाली को ‘फासिस्ट और तानाशाही’ वाली बताने में लग गया। उनकी शादी होने की ‘खोज’ और उनकी उनकी पत्नी को तुरूप का इक्का माना जाने लगा, जो उन्हें हराकर प्रधानमंत्री की दौड़ से बाहर कर सकता था। कपिल सिब्बल ने तुरन्त ही चुनाव आयोग से मांग की कि मोदी को इस आधार पर चुनावों में अयोग्य घोषित कर दिया जाए।

मोदी की छवि खराब करने का अभियान और उन्हें रोकने की कोशिशों को उस वक्त जबर्दस्त धक्का लगा जब जून 2013 में गोवा में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में लालकृष्ण आडवाणी और उनके साथियों के भारी विरोध के बावजूद मोदी को भाजपा की प्रचार अभियान कमिटी का चेयरमैन बना दिया गया।

इसी बीच उनके विरोधी संकट में फंस गए। तीस्ता के एक विश्वासपात्र ने एक मामला दायर कर दिया कि तीस्ता ने गवाहों को पैसा देकर उन्हें झूठा शपथ-पत्र दायर करने के लिए मजबूर किया है। भट्ट झूठी मुठभेड़ करने के आरोप में फंस गया। मुरली सिन्हा मोदी के खिलाफ गंभीर आरोप लगा रहा था लेकिन उसे नजरअन्दाज कर दिया गया।

कांग्रेस, लालू यादव और नीतीश कुमार इस बात को लेकर बेहद कुंठित होते जा रहे थे कि मोदी पर किसी बात का कोई असर नहीं हो रहा है। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने उन्हें गालियां देनी शुरू कर दिया। यहां तक कि सोनिया गांधी ने कहा कि वह खूनी मैदानों में फसल उगाता है। विपक्ष एक प्रकार के पागलपन का शिकार होता जा रहा था।

मोदी को जब भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया तो जैसे युद्ध छिड़ गया। मोदी पर सभी प्रकार के आरोप मढ़े गए। यहां तक कि मोदी पर आपराधिक आरोप जडऩे के लिए कुछ संस्थानों का दुरूपयोग भी किया गया। सबसे पहले इशरतजहां झूठी मुठभेड़ के मामले में उन्हें फंसाने की कोशिश की गई। मोदी विरोधी मीडिया शहर तक गया और उन्हें दोषी सिद्ध कर दिया। लेकिन तब आईबी ने कहा कि वह लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी थी और उसके बाद मोदी को फंसाने की कोशिशों पर रोक लग गई।

कांग्रेस ने सीबीआई और आईबी के बीच खींचतान को बढ़ावा भी दिया। इससे गुप्त सूचनाएं प्राप्त होने के नेटवर्क के खराब होने की आशंका भी पैदा हो गई। लोकसभा में भाजपा की सीटों पर अंकुश लगाने के लिए कांग्रेस के रणनीतिकारों को अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी (आप) मिल गई। लेकिन ‘आप’ ताश के पत्तों की तरह बिखर गई।

रविवार ने लिखा- ”पूरी एमएसएम द्वारा मोदी को नुकसान पहुंचाने के लिए हर प्रकार की भ्रष्ट पत्रकारीय कोशिशें की गईं। दिल्ली चुनावों के बाद वे सभी चिल्लाए थे कि क्या अरविन्द केजरीवाल मोदी को रोक सकते हैं?’’

”उसके बाद से उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को सीधे अल्लाह द्वारा भेजे गए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया। एके को मीडिया हाइप मिलनी शुरू हो गई और उसने बहस से लेकर गुजरात के डाटा तक मोदी को हर प्रकार की चुनौतियां देनी शुरू कर दी। मुझे एके के बारे में सोच कर दुख होता है। इसलिए नहीं कि उसने अपनी बुद्धि खो दी थी, बल्कि इसलिए कि उसे मूर्ख बनाया गया।’’ लेकिन एके भी अपने ‘क्रान्तिकारी’ मीडिया दोस्तों की तरह ही पाखंडी है….एके भी दावा करता है कि उसके पास पैसा नहीं है जबकि अन्यों के खजाने भरे हैं। वह भूल गया कि उसने दो करोड़ रूपए अपनी सम्पत्ति दिखाई हुई है।

रोड शो पर उसने कहा कि उसके पास केवल पांच सौ रूपए ही हैं। तब किस की जेब से वह अभियान चला रहा था। वाराणसी में मतदाताओं को नगदी बांटते हुए कौन पकड़ा गया था।

सिंहासन पर पहुंचने से मोदी को रोकने की सभी योजनाएं, हर प्रकार के खराब से खराब आरोप, गालियां जो उनके अभियोग पत्र पर थीं और मोदी को परेशान करने वाली मीडिया के दिग्गजों की कोशिशों को पांच सौ रैलियां करने और सैंकड़ों हजारों लोगों को संबोधित करने के लिए देश भर में घूम रहे मोदी ने खंडित कर दिया। मोदी ने लगभग 3 लाख मील का दौरा किया। इसका अर्थ था कि वह सात बार विश्व का चक्कर लगा आए। उन्होंने 3डी के जरिए विकास के स्वप्न बेचने की कोशिश की और वह सफल भी हुए!

अब जब कि मोदी जनता के आदेश पर प्रधानमंत्री के कक्ष में घुस रहे हैं तो उन्हें रोकने की कोशिश करने का अभियान चलाने वाले ‘स्टॉप मोदी कैम्पेनर’ तो बेरोजगार हो गए। कांग्रेस अब तीस्ता की ‘सहायता’ नहीं करेगी और न ही भट्ट को उपमहानिदेश के पद का वादा कर सकेगी।

मीडिया में बैठ कर अपने स्थान का दुरूपयोग करने वाले लोग भाजपा के किसी न किसी नेता की मदद से बचने की कोशिश कर रहे हैं। इस सिलसिले में अरूण जेटली की सबसे अधिक तलाश हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि मोदी बदले की भावना से कोई कदम उठाएंगे। वह समझदार हैं और चरण सिंह की तरह काम नहीं करेंगे, जिन्होंने इंदिरा गांधी को शहीद का आभामंडल दे दिया था।

उनके सबसे सक्रिय और विषैले आलोचकों को पर्याप्त कानूनी खतरा होने का भय हो सकता है। अन्य को हालात का सामना करना पड़ेगा जो खुद को राजा से कहीं अधिक निष्ठावान सिद्ध करने की कोशिश कर रहे थे। मोदी के भारत का एक अध्याय खुल गया है। तीस्ता और जासूसी कांड इतिहास बन गए हैं।

विजय दत्त

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