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”मैं देश नहीं मिटने दूंगा…’’

जब गुजरात के वडनगर रेलवे स्टेशन पर एक छोटा सा बच्चा अपने हाथों में चाय की केतली लिए हुए एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे की ओर ‘चाय-चाय’ चिल्लाता हुआ दौड़ लगा रहा था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यही बालक बड़ा होकर भारतीय राजनीति का एक अमिट अध्याय लिखने वाला है। गरीबी की मार से बेहाल परिवार में जन्मा यह बालक अपने छ: भाई-बहनों में तीसरी संतान होने के कारण परिवार में अपनी जिम्मेदारियों को बखुबी समझते हुए जीवकोपार्जन के लिए अपने पिता की चाय की दुकान पर हाथ बंटाने लगा। परिवार की जिम्मेदारी और अदम्य जीजिविषा ने इस बालक के मन को समय की भट्ठी में तपाकर ऐसा कुंदन बनाया कि उसकी अभिलाषाएं परिवार के दायरे से बाहर निकलकर राष्ट्र के लिए बलवती होती चली गईं। मजबूत इच्छाशक्ति और लोगों के मन की गहराई तक उतर कर अपनी बातों को पहुंचाने की क्षमता रखने वाले इस अमाप्य कद के व्यक्ति को आज न सिर्फ पूरे राष्ट्र, बल्कि पूरे विश्व के ताकतवर राजनेताओं की पंक्ति में सबसे आगे खड़ा कर दिया है। यह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि आज भारत के प्रधानमंत्री की ताजपोशी के लिए तैयार बैठे विश्व के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक भाजपा के नेता नरेन्द्र मोदी हैं।

विश्व की राजनीतिक बिरादरी में सबसे ज्यादा संताप झेलने वाले नरेन्द्र मोदी पर गुजरात दंगों का आरोप था। लेकिन तमाम आयोगों और न्यायालयों द्वारा उन्हें दोषमुक्त घोषित किए जाने के बावजूद, राजनीति के गलियारे में उन्हें ऐसे कातिल के तौर पर पेश किया जाता रहा, जिसने अपने राज्य में कथित तौर पर अल्पसंख्यकों का कत्लेआम कराया था। नरेन्द्र मोदी विरोधियों के हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करते रहे, लेकिन भारतीय संविधान और कानून की अनदेखी कर उन पर बार-बार दबाव बनाया जाता रहा कि वे गुजरात दंगों की जिम्मेदारी खुद पर लेकर, विरोधी दलों के तुष्टीकरण की राजनीति को मजबूत करने में सहयोग दें। लेकिन हिंदुत्व के संस्कार के पालने में पले नरेन्द्र मोदी को यह स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने इसे नकारते हुए तुष्टीकरण के बजाय राष्ट्रवाद की राजनीति को ज्यादा तरजीह दी और कहते रहे कि मैं एक हिंदू राष्ट्रवादी हूं, जो भारत के हर तबके को विकास के समान पथ पर अग्रसरित होते हुए देखना चाहता है। भारतीय लोकतांत्रिक राजनीतिक इतिहास के वे पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने वोटों की राजनीति से अलग अपनी पहचान को बदलने से इंकार कर तुष्टिकरण की राजनीति को नकारते हुए, समग्र विकास के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

चरित्र निर्माण के जरिए शिखर पुरूष बने मोदी को संस्कार और अनुशासन अपने माता-पिता से मिला और विद्यालय में भी शिक्षकों को उनके स्वभाव की स्थिरता अचंभित करती रही। चाय की दुकान के सामने ही बालक नरेन्द्र मोदी का विद्यालय था, जहां दोपहर में अवकाश के दौरान चाय की दुकान पर आकर अपने पिता का सहारा बनते। देखते-देखते समय बितता गया और बालक नरेन्द्र मोदी चाय की दुकान पर ही किशोरावस्था में प्रवेश करता गया। रेलवे स्टेशन होने के कारण दुकान राजनीतिक बहस का अड्डा बना रहता, जहां किशोरवय मोदी उन बातों में गहरी रूचि दिखाते। बगल में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा होने के कारण स्वयंसेवक भी उनकी दुकानों पर चाय पीने के लिए आते। विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की राष्ट्रवाद की बातें उन्हें बहुत आकर्षित करतीं। चाय विक्रेता के पुत्र में राष्ट्रभक्ति की सहज भावना को भांपने में संघ के कार्यकर्ताओं ने भी देर नहीं लगाई और उन्हें संघ से जुडऩे का न्यौता दे डाला। एक राष्ट्रभक्त को इससे बेहतर और क्या प्रस्ताव मिल सकता कि उसे देश के लिए कुछ करने का न्यौता मिला है।


आपके प्यार को सच्चे प्यार में बदल दूंगा’’


विजयोपरांत बडोदरा में जनता के संबोधन के दौरान नरेन्द्र मोदी के भाषण के मुख्य अंश :

  • सबका साथ सबका विकास यही हमारी कार्यशैली है। इसीलिए जनता ने हमें स्पष्ट बहुमत दिया है। स्पष्ट बहुमत के बावजूद भी हम देश चलाने के लिए सबको साथ रखना चाहते हैं।
  • विजय कितनी ही भव्य क्यों न हो, भारत का संविधान और भारत का लोकतंत्र मिलकर चलने का रास्ता दिखाता है। प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन लोकतंत्र में सब अपने हैं।
  • देश में जो सरकार होती है, वह किसी दल की नहीं होती। सरकार कुछ विशेष लोगों की नहीं होती, सरकार पूरे हिंदुस्तान की होती है। सरकार के लिए न तो कोई अपना होता है न कोई पराया होता है। सरकार की प्राथमिकता होती है जनता।
  • आज मैं सयाजीराव गायकवाड़ जी की इस धरती से देशवासियों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि हमें आजादी के लिए मरने का सौभाग्य नहीं मिला, लेकिन आजाद हिंदुस्तान में सुराज्य के लिए जीना, ये हमारा संकल्प है।
  • मुझ पर आपने भी बहुत प्रयास किया, विरोधियों ने भी बहुत प्रयास किया। मैं बिना कटुता के दोनों किस्म के प्यार का आदर करता हूं। मैं आपके प्यार के बूते उस प्यार को भी सच्चे प्यार में बदल दूंगा
  • यह पहला दल है, जो राष्ट्रवादी विचारधारा पर चलते हुए एक गैर कांग्रेसी सरकार बना पाने में सफल हुआ है।
  • परिश्रम करने की मेरी जो पराकाष्ठा है उसमें देश में किसी को शक है क्या? हम तो मजदूर नंबर वन हैं। देश को मेरे जैसा मजदूर नहीं मिलेगा।
  • अब तक देश में जितने चुनाव हुए, उनमें नेतृत्व उनके पास था, जो आजादी के पहले पैदा हुए। ये पहला चुनाव है, जिसका नेतृत्व आजादी के बाद जो पैदा हुए, उनके हाथ रहा, चाहे कांग्रेस हो, चाहे भाजपा हो।
  • इस चुनाव में गुजरात ने अदभुत रिकॉर्ड कायम किया है, 26 में 26। मैं बताता हूं, 26 में 25 भी आतीं तो कल बुराई हो जाती।

लेकिन संसारिकता का भी अपना स्वभाव है, अपने पथ हैं, जिसकी जकडऩों से खुद को आजाद रखने में सक्षम व्यक्तित्व विश्व पटल पर अपना इतिहास लिख डालता है। गुजरात के मेहसाणा जिले में दामोदरदास मूलचंद मोदी और हीराबेन के इस संतान ने भी ऐसा ही किया। किशोरा अवस्था में जशोदीबेन से शादी होने के पश्चात नरेन्द्र मोदी इन सांसरिक बंधनों के मोह में नहीं फंसे और जशोनाबेन को अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखने की बात कहकर वे स्वयं की खोज में निकल पड़े। वैराग्य की इस प्रचंड भावना ने उन्हें ऋषिकेश से लेकर बनारस की पवित्र भूमि तक यात्रा कराई। लेकिन राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रारब्ध इस व्यक्ति को वैराग्य के रूप में देशसेवा की अद्भूत दृष्टि की अनुभूति हुई। फिर क्या था, वह लौट आया अपने वडनगर के उसी चाय दुकान पर, जिसने इस बाल मन को राष्ट्रवाद की अवधारणा से उद्विग्र किया था।


पराजय का सामना करने वाले प्रमुख नेता


मायावती: मायावती की बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में लगभग 20 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन बसपा एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुई। इस तरह उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक पर मायावती की दावेदारी पूरी तरह खत्म हो गई।

नीतीश कुमार: नीतीश कुमार को भाजपा से नाता तोडऩा महंगा साबित हुआ। जनता दल यूनाईटेड महज 2 सीटें जीतने में कामयाब रही।

शरद पवार: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो शरद पवार को इस चुनाव में सिर्फ 4 सीटों से संतोष करना पड़ा।

मुलायम सिंह यादव: उत्तर प्रदेश विधानसभा में जबरदस्त बहुमत हासिल करने वाले मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को मात्र 5 सीटें मिली हैं। इस तरह तीसरे मोर्चे के बल पर दिल्ली की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने का उनका सपना पूरी तरह बिखर गया।

प्रकाश करात: प्रकाश करात के नेतृत्व में माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी महज 9 सीटें जीतने में ही कामयाब रही है। इस तरह उसे राष्ट्रीय दल का खिताब छिनने का डर सताने लगा है।

अरविंद केजरीवाल: दिल्ली विधानसभा चुनावों में 40 में से 29 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी को इस चुनाव में गहरी निराशा हाथ लगी है, खासकर दिल्ली की जनता से। पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल न सिर्फ वाराणसी से 3 लाख वोटों के अंतर से हारे, बल्कि दिल्ली में अपना खाता खोलने में भी नाकाम रहे। लेकिन पार्टी के लिए सबसे राहत देने वाली बात यह है कि इतने कम समय में दिल्ली की गद्दी संभालने के बाद संसद में भी अपने 4 सदस्यों को भेजने में कामयाब हो हुई है।


आहिस्ता-आहिस्ता समय गुजरता गया और युवा नरेन्द्र मोदी के हृदय पटल पर राष्ट्रभक्ति की अमिट कहानी लिखती चली गई। संघ की शाखाओं में होने वाली उनकी उपस्थिति दिनचर्या की हिस्सा बनती चली गई और साथ में देश के लिए मर मिटने का जज्बा भी बलवती होती गई। गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की शिक्षा भी जारी रही, लेकिन उसमें भी राष्ट्रवाद की खनक थी। शिक्षा में राष्ट्रवाद को ढुंढने वाले सोने के इस टुकड़े को संघ ने इस कदर तपाया कि नरेन्द्र मोदी कुंदन बनकर निकले और गुजरात में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को संवारने की जिम्मेदारी मिल गई। अपने मोहरे में नायक बनने की क्षमता को भांपते हुए संघ ने उन्हें 1987 में गुजरात भाजपा का महासचिव बनाकर डूब रही पार्टी के जनाधार को संभालने और संवारने के लिए रणनीतिज्ञ के रूप में भेज दिया। उसी दौरान मोदी ने भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा को इस कदर सफल बनाया कि वे राजनीति के दिग्गजों के दिल-ओ-दिमाग में अपनी छवि स्थापित करते चले गए। मुरली मनोहर जोशी के आवास को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले इस युवा के एकता यात्रा में सफल प्रबंधन के बाद उन्हें गुजरात भाजपा के महामंत्री का दायित्व दिया गया। लेकिन कंटीली राहों पर चलने के आदी नरेन्द्र मोदी को गुजरात में वहां के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकर सिंह बघेला और संगठन महामंत्री संजय जोशी के साथ विचारों की टकराहट ने अज्ञातवास में दिल्ली जाने पर मजबूर कर दिया। अपनी सांगठनिक क्षमता और दीप्यमान प्रतिभा के कारण भाजपा के वरिष्ठों से सम्मान पाने वाले नरेन्द्र मोदी को भाजपा का राष्ट्रीय सचिव बनाकर दिल्ली भेज दिया गया।

1998 में केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही पार्टी के कई महामंत्री कैबिनेट मंत्री बना दिए गए। तब महामंत्री का पद रिक्त होने के कारण नरेन्द्र मोदी को भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री का पदभार मिल गया। लेकिन नरेन्द्र की प्रतिभा को उस समय आकार मिला जब भाजपा के संगठन महामंत्री गोविंदाचार्य द्वारा वाजपेयी को संघ का चेहरा कहने के कारण, इस ताकतवर पद को छोडऩा पड़ा। इस पद पर नरेन्द्र मोदी को प्रतिष्ठित कर दो राज्यों का प्रभारी नियुक्त कर दिया गया। 1999 के लोकसभा चुनावों में गुजरात में भाजपा के प्रदर्शन को देखते हुए, संघ के मार्गदर्शकों के सलाह पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने मोदी को 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा दिया। इस दौरान मोदी को लगातार अग्नि परीक्षा से गुजरते रहना पड़ा। एक तरफ भूकंप की तबाही से कराहते गुजरात के आंसू पोंछने थे, तो दूसरी तरफ आपसी खींचातान से भाजपा के बिखरते जनाधार को समेटना था। नरेन्द्र मोदी ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर गुजरात को फिर से खड़ा किया ही था कि 2002 में गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में यात्रा कर रहे रामभक्तों को जिहादियों ने पेट्रोल डाल कर जिंदा जला दिया। इस कुत्सित कार्रवाई में 59 लोग जिंदा जला दिए गए, जिनमें ज्यादातर स्त्रियां और अबोध बच्चे थे। गोधरा कांड के इस वीभत्सम रूप को देखकर पूरा गुजरात जल उठा, लेकिन पड़ोसी राज्यों के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने गुजरात सरकार द्वारा सुरक्षाबलों की मांग को दरकिनार करते हुए इसे राजनीति दांव

के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। दबाव इस कदर था कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को कहना पड़ा कि मोदी राजधर्म का पालन करें, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी द्वारा संवारे गए इस व्यक्तित्व के बीच लालकृष्ण आडवाणी खुद पितामह बनकर खड़े हो गए। उसके बाद गुजरात की जनता मोदी को हर समस्या का समाधान मानकर उन्हें हर बार अपना मुख्यमंत्री चुनती चली गई। बावजूद इसके, जनता के न्याय को अनदेखा कर विरोधी उनके हर कदम पर गहरे आघात देते चले गए।


१६वीं लोकसभा चुनाव के प्रमुख विजेता


जे. जयललिता: तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता अपने प्रतिद्वंद्वी डीएमके को पीछे छोड़ते हुए भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। जयललिता की ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक मुनेत्र कडग़म ने 37 सीटें जीतीं हैं।

ममता बनर्जी: पश्चिम बंगाल में माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी को पीछे छोड़ते हुए अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस देश में चौथी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इसका सारा श्रेय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी को जाता है। तृणमूल कांग्रेस को 34 सीटें मिली हैं।

नवीन पटनायक: ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल ने संसद की 20 सीटें जीतकर देश की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी होने का गौरव प्राप्त किया है।

उद्धव ठाकरे: शिवसेना 18 सीटें जीतने मे कामयाब रही है। एनडीए का सबसे विश्सनीय सहयोगी शिवसेना भारत की 6ठी सबसे बड़ी राजनीतिक दल के रूप में उभरी है।

चंद्रबाबु नायडू: राजनीति में लगभग हाशिए पर पहुंच चुके तेलगुदेशम के प्रमुख चंद्रबाबु नायडू, एनडीए गठबंधन के सहयोगियों में से एक हैं। आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 16 सीटें जीतकर राजनीतिक परिदृश्य में अपनी मजबूत स्थिति बनाई है।

के. चंद्रशेखर राव: अलग तेलंगाना राज्य के लिए पूरे आंध्र प्रदेश में आंदोलन चलाने वाली तेलंगाना राष्ट्र समिति ने लोकसभा की 11 सीटें जीतीं हैं। साथ ही तेलंगाना राज्य के लिए हुए विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत हासिल कर के. चंद्रशेखर राव को राज्य का पहला मुख्यमंत्री बनने का गौरव हासिल हुआ है।


मीडिया और एनजीओ के संचालक मोदी के ऊपर कीचड़ उछालते रहे और खुद को विश्व समुदाय का रहनुमा कहने वाले देश मोदी के रास्तों पर अंगारे बिछाते हुए साथ देते रहे। मानवाधिकार के नाम पर अमेरिका ने नरेन्द्र मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया, लेकिन सत्य पर खड़ा राजनीति का यह कद्दावर नेता विचलित हुए बिना अपना काम पूरे मनोयोग और ईमानदारी से करता गया। आयोगों और विशेष जांच दलों द्वारा दोषमुक्त किए जाते रहने के बावजूद केन्द्र सरकार द्वारा उनके खिलाफ जांच के लिए नए-नए जांच दल गठित किए जाते रहे। अंत में माननीय उच्चतम न्यायालय को कहना पड़ा कि एक ही मामले में किसी व्यक्ति पर बार-बार अभियोग नहीं चलाया जा सकता। लेकिन मोदी की राजनीतिक यात्रा को करीब से देखने वाले भारत के घाघ राजनेता उन्हें कदम-कदम पर फंसाने के लिए चालें चलते रहे। मीडिया और एनजीओ की इन एकतरफा कार्रवाईयों ने भारतीय जनमानस में मोदी को और नजदीक से जानने की इच्छा पैदा कर दी। परिणाम यह हुआ कि सरकार तथा उसके सहयोगी दलों की पोल परत दर परत खुलती चली गई और नरेन्द्र मोदी की कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार छवि लोगों के दिलों में गहराई तक उतरती चली गई। बदनाम होने के चक्कर में उनका नाम का ऐसा डंका बजा कि पूरी दुनिया चकित रह गई।

अब जवान भारत के दिलों में जोश हिलोरें मार रही थीं और सोशल मीडिया के जरिए उसका सीधा असर राजनीतिक गलियारों में हो रहा था। भारत के कोने-कोने से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की मांग उठ रही थीं। अंतत: भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने संघ की स्वीकृति के बाद उन्हें भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। 2014 का चुनाव लगभग डेढ़ साल दूर था और मोदी के सामने गुजरात को संभालते हुए देश के जोश को बनाए रखने की चुनौती थी। अपनी रणनीति और कठिन परिश्रम से नरेन्द्र मोदी ने इस असाध्य काम को साधा भी। यात्राओं और रैलियों का आगाज हुआ तो देश के युवाओं का कारवां भी साथ निकल पड़ा। भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे ज्यादा रैलियां और लोगों को संबोधित करने वाले नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी स्थापित होते चले गए। परिणाम यह हुआ कि अब तक के सबसे लंबे चुनाव में लोगों का जोश बरकार रखते हुए नरेन्द्र मोदी ने पिछले 30 साल के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए और भाजपा के इतिहास में पहली बार भाजपा को अपने दम पर 282 सीटें दिलाकर बहुमत तक पहुंचा दिया। यह मोदी का करिश्मा ही था कि एनडीए के घटक दलों के सीटों की संख्या भी बढ़ती गईं और यह ऐतिहासिक 336 के आंकड़े तक पहुंच गई। दूसरी तरफ, कांग्रेस का कई राज्यों में सूपड़ा साफ हो गया और क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व पर भी निशान लग गए।

यह मोदी का व्यक्तित्व ही था कि 1990 में मंडल से शुरू हुई जातिवाद की राजनीति पूरी तरह ध्वस्त हो गई। जातिवादी राजनीति की मसीहा मायावती को एक भी सीटें नसीब नहीं हुईं, वहीं तुष्टीकरण की राजनीति के बेताज बादशाह मुलायम सिंह यादव को 80 में से सिर्फ 5 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा, वह भी अपने परिवार वाले सीटों पर। इस आंधी में लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद पंवार पूरी तरह हाशिए पर चले गए। भारतीय राजनीति में जातिवाद को अहम बताने वाले बुद्धिजीवियों के लिए यह आघात के साथ-साथ विश्मय भरा अवसाद का क्षण था। लेकिन यह लोकतंत्र की खुबसुरती का ही नतीजा था कि न सिर्फ एक चाय बेचने वाला बालक अपनी निष्ठा और लगन से प्रधानमंत्री पद तक पहुंच गया, बल्कि भारतीय राजनीति की नसों में गहरे तक समाया जातिवाद के जहर को भी अपने व्यक्तित्व के सोमरस से निष्प्रभावी कर दिया। यह उनकी प्रतिभा और देश के प्रति काम करने की ललक ही थी कि उनके हर बोल पर जनता मंत्रमुग्ध होकर उनके पीछे चलती चली गई और राजनीतिक को अपना बंधक समझने वाले राजनेता उन्हें खुले मुंह से देखते रह गए। कल तक वीसा के लिए आवेदन की मांग करने वाला अमेरिका, खुद उन्हें अमेरिका आने का निमंत्रण दे रहा है, तो भारत को पराजित कर उसके स्वाभिमान को हमेशा के लिए चकनाचूर करने वाला चीन भारत से बेहतर रिश्ते होने की बात कर रहा है। अब तक भारत को आतंकवाद की भट्ठी में सेंकते रहने वाला पाकिस्तान, अब पाकिस्तानी मुसलमानों के हित में काम करने के लिए मोदी से गुहार लगा रहा है। यही है मोदी का करिश्मा और आशान्वित होकर उन्हें देखती भारतवर्ष की नजरें। मोदी के ‘मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं शीश नहीं झुकने दूंगा…’ के स्वर को भारत ने करताल के साथ स्वागत किया।

सुधीर गहलोत

 

 

 

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