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जनता ने आखिर बदल दी तस्वीर

अब तक यह माना जाता था कि भाजपा मुख्य तौर पर उत्तर भारत की पार्टी है और इसके साथ केवल खाता-पीता वर्ग ही जुड़ा है। लेकिन इन चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि मोदी लहर विन्ध्याचल को पार कर कन्याकुमारी की लहरों तक पहुंच गई है और पूर्वी भारत को उसने पूरी तरह आप्लावित कर दिया है। जो लहर जयप्रकाश नारायण के काल में विन्ध्याचल के शिखरों को पार नहीं कर सकी, उस लहर ने मोदी युग में महर्षि अगस्त्य की स्मृति की याद दिला दी। पूर्वी भारत के बिहार, बंगाल और ओडीशा तक इस बार मोदी प्रभाव में दूर तक रंगा गया।

भारत की आम जनता जिसे साफ देख रही थी और जिसमें उसकी सक्रिय भागीदारी भी थी, उसे सोनिया गांधी और उसके आसपास के लोग देखने से इंकार ही नहीं कर रहे थे, बल्कि एक दिन पहले तक किसी भी तरीके से भारतीयों की सामूहिक आकांक्षा को परास्त करने की हर संभव कोशिश भी कर रहे थे। इसे क्या संयोग ही कहा जाए कि चुनाव आयोग ने मतगणना के लिए 16 मई का ‘नारद जयन्ती’ दिन ही चुना। क्योंकि, ऐसा तो हो नहीं सकता कि ‘नारद जयन्ती’ कीऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए चुनाव आयोग ने इस दिन का चयन किया होगा। यदि ऐसा होता तो सारी ‘सेक्युलर ब्रिगेड’ चुनाव आयोग पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगा देती। नारद पत्रकारिता जगत में आदि पत्रकार के तौर पर प्रतिष्ठापित हैं। कहा जा सकता है कि ‘नारदीय परम्परा’ से जुड़े मीडियाकर्मी पिछले लगभग दो महीने से हवा को सूंघते हुए, देश के भीतर ही भीतर एक सकारात्मक परिवर्तन की ओर बढ़ते झुकाव को स्पष्ट देख ही नहीं रहे थे, बल्कि उसकी रपट भी प्रसारित कर रहे थे। लेकिन ऐसे लोग जिनका देश की मिट्टी से सम्पर्क कट चुका है, वे अमेरिका से प्रचारित टाईम पत्रिका के इस सर्वेक्षण को तो वेद वाक्य मान कर सुबह शाम रटते रहे कि मोदी से कहीं ज्यादा अरविन्द केजरीवाल लोकप्रिय हैं, लेकिन नेपथ्य में बह रही शीतल मोदी बयार के स्पर्श को जिदपूर्वक नकारते रहे। ‘नारद जयन्ती’ के अवसर पर भारत के 125 करोड़ लोगों द्वारा दिए गए अभिमत को सुन और देख कर शायद ऐसे लोगों को निश्चय ही मानसिक धक्का लगा होगा।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने बलबूते ही लोकसभा में अपनी स्थिति मजबूत बना ली है। उसने अकेले ही 282 सीटें प्राप्त की हैं। एनडीए ने सीटें लेने के मामले में तो पुराने और छंटे हुए धुरंधरों के कयास तक झुठला दिए। उसे 336 सीटें मिली हैं। मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान ही कहा था कि सोनिया गांधी की पार्टी सौ का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाएगी। तब बहुत से लोगों ने इसे केवल चुनावी छौंक कह कर उड़ा दिया था। लेकिन मोदी के नजदीक के लोग जानते थे कि मोदी चुनाव अभियान के दौरान भी अपने शब्दों का प्रयोग बहुत सावधानी से करते हैं। अपने पूरे इतिहास में, यदि सोनिया कांग्रेस से पहले की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास को भी जोड़ लिया जाए, इस दल ने इतना पतन नहीं देखा, जितना सोलहवीं लोकसभा के चुनावों में सीटों के मामले में इसका इस बार हुआ है। 543 सीटों वाली लोकसभा में वह केवल 44 सीटें ही जीत पाई। इन 44 सीटों में से भी कर्नाटक और केरल में जीती सीटों को छोड़ दिया जाए तो शेष बची उसकी बीस पच्चीस सीटें किसी न किसी छिटपुट प्रान्त से एक-एक जोड़ कर ही प्राप्त हुई हैं। यानि सही शब्दों में कहा जाए तो यह कहा जा सकता है कि अब देश का कोई हिस्सा बचा नहीं है, जिसमें सोनिया गांधी अपने किसी जनाधार का दावा कर सके। अमृतसर से लेकर कोलकाता तक एक प्रकार से उसका सूपड़ा ही साफ हो गया है। गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा और त्रिपुरा में तो वह अपना खाता तक नहीं खोल पाई। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के नेतृत्व की हालत यह रही कि राहुल गांधी अमेठी से अपनी सीट बड़ी मुश्किल से बचा पाए। यदि प्राप्त मतों की ही बात की जाए तो कांग्रेस इन चुनावों में उन्नीस प्रतिशत के आसपास ही मत प्राप्त कर सकी। भारतीय जनता पार्टी ने भी, अपने जनसंघ के इतिहास काल को जोड़ कर अपनी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव छुआ है। इसे भी महज संयोग ही कहा जा सकता है कि भारत के इतिहास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों का आन्दोलन और दूसरी ओर विदेशी प्रेरणा से साम्यवादी आन्दोलन लगभग एक साथ ही 1925 में शुरु हुआ था, लेकिन इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में राष्ट्रीय शक्तियां तो अपने ही बलबूते सत्ता के केन्द्र में पहुंच गईं और साम्यवादी आन्दोलन इस देश की मिट्टी से न जुड़ पाने के कारण अस्ताचलगामी हो गया।

पिछले कई दशकों से भारत की राजनीति में यह संदेश घर करने लगा था कि देश में राष्ट्रीय दलों की भूमिका हाशिए पर आ गई है और लम्बे दौर तक क्षेत्रीय दलों के सहयोग से खिचड़ी सरकारों के सहारे ही देश चलने वाला है। 1984 के बाद से किसी भी दल को अपने बलबूते सरकार चलाने के लिए जनादेश नहीं मिला था। यही कारण था कि प्रधानमंत्री के रुप में देवगौड़ा, वी.पी. सिंह, इन्द्रकुमार गुजराल इत्यादि के रुप में टाईम गैप अरेंजमेंट होता रहा। प्रधानमंत्री के पद का अवमूल्यन हुआ। इसका सबसे खतरनाक उदाहरण तो सोनिया कांग्रेस ने मनमोहन सिंह के रुप में प्रस्तुत किया। उससे देश में न तो कोई सशक्तविदेश नीति बन पा रही थी और न ही इक्कीसवीं सदी के प्रतिस्पर्धात्मक युग में देश को आर्थिक क्षेत्र में आगे बढऩे का अवसर मिल पा रहा था और न ही वैश्विक मामलों में उसको कोई गंभीरता से सुन रहा था। नरेन्द्र मोदी ने ऐसे सभी मिथकों को धराशायी कर दिया है, जो देश में गठबन्धन की राजनीति रहने का दावा करते थे। उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा को मिली सफलता ने सिद्ध कर दिया है कि जब देश की प्रतिष्ठा का प्रश्न आता है, तो आम भारतीय अपनी जाति, भाषा और मजहब का भेद भूल कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है। ताज्जुब तो इस बात का है कि इस संकट काल में जब आम जनता भी समझ चुकी थी कि अब की बार क्षुद्र प्रश्नों को छोड़ कर राष्ट्रीय प्रश्नों के आधार पर ही मतदान करना है, तब भी इस देश की जनता की नब्ज को पहचानने का दावा करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी यही मान कर चलते रहे कि नरेन्द्र मोदी की राष्ट्र को सशक्त बनाने की अपील जाति और मजहब के गड्ढों में दम तोड़ देगी। इस पूरे चुनाव में बिहार और उतर प्रदेश में मिली अप्रत्याशित सफलता ने सिद्ध कर दिया है कि जो लोग इन प्रान्तों को जाति या मजहब के नाम पर अपनी व्यक्तिगत जागीर की तरह चला रहे थे और वहां के लोगों को बंधुआ की तरह इस्तेमाल कर रहे थे, उनका तिलस्म भी मोदी की अनवरत साधना ने ध्वस्त कर दिया है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की अस्सी सीटें हैं। कहा जाता है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है। लेकिन पिछले लम्बे अरसे से भाजपा के लिए यह रास्ता अवरूद्ध हो चुका था। इस राजमार्ग पर जाति और मजहब की बिसात बिछा कर, मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने कब्जा किया हुआ था। भाजपा ने इस राजमार्ग पर पुन: आधिपत्य जमाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन जाति और मजहब की दलदल से पार पाना कठिन होता जा रहा था। भाजपा इस प्रदेश में दस सीटों का आंकड़ा ही पार नहीं कर पा रही थी। लेकिन इस बार देशभर में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी शक्तियों ने एकजुट होकर जोर लगाया तो जाति और मजहब के दलदल को सूखते देर नहीं लगी। प्रदेश की अस्सी सीटों में से भाजपा ने 73 सीटें जीत कर नया रिकॉर्ड कायम कर दिया। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को अपना खाता ही नहीं खोलने दिया। इतना ही नहीं मत प्रतिशत में भी बसपा तीसरे नम्बर पर रही। प्रदेश में सरकार चला रही समाजवादी पार्टी (सपा) केवल पांच सीटें ही जीत सकी। ये पांच सीटें भी मुलायम सिंह के परिवार के सदस्यों ने ही जीतीं। उसके बाकी सभी प्रत्याशी खेत रहे। सोनिया कांग्रेस केवल मां-बेटे की दो सीटें ही बचा पाईं। उत्तर प्रदेश और बिहार के नतीजों ने विशेष रुप से यह संकेत दिया है कि देश की जनता अब जाति, सम्प्रदाय और मजहब की राजनीति से तंग आ चुकी है। वह नए युग में, नए कारकों के आधार पर आगे बढऩा चाहती है। यही कारण है कि उसने परम्परागत राजनीति के मठ त्याग कर मोदी के साथ विकास के नए रास्ते पर चलने का निर्णय किया है। नरेन्द्र मोदी शुरु से ही अपने चुनाव अभियान में विकास को और गुजरात में हुए विकासोन्मुख-परिवर्तन के नाम पर वोट मांग रहे थे। सभी विरोधी दलों ने बहुत प्रयास किया कि इस चुनाव को भी किसी तरह जाति और मजहब के अखाड़े में लडऩे का प्रयास किया जाए, लेकिन चुनाव परिणामों ने सिद्ध कर दिया कि जनता इस बार मजबूती से मोदी के साथ ही खड़ी रही।


चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, इसलिए…


चुनाव समाप्ति के निकट चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेतृत्व के बीच हुए झगड़े ने एक बार फिर दिखा दिया कि भारतीय राजनीति किस निम्न स्तर तक चली गई है। आयोग वह संस्था है जिस पर निष्पक्ष और स्वतन्त्र चुनाव सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है और उसकी निष्पक्षता को चुनौती दिया जाना एक गंभीर घटनाक्रम है।

आयोग की ऑथॉरिटी केवल इसलिए नहीं है कि वह एक संवैधिानिक संस्था है, बल्कि इसलिए भी है कि उससे निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। भाजपा के नेताओं ने भी आयोग पर यही सवाल उठाया था। आयोग और भाजपा नेताओं के बीच यह झगड़ा अनियन्त्रित हालात पैदा कर सकता था। यह झगड़ा लोकतन्त्र के आधार – निष्पक्ष और स्वतन्त्र चुनावों को भी धक्का पहुंचा सकता था।

इसके लिए किस को दोष दिया जाए? इस का फैसला करना अनुचित हो सकता है, लेकिन सच्चाई यह है कि चुनाव आयोग न केवल निष्पक्ष हो, बल्कि उसे निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए। चुनाव आयोग का आचरण संदेह की छाया में आ गया था जब उसने मोदी और राहुल के लिए चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करने पर अलग-अलग ढंग से व्यवहार किया।

आयोग ने मोदी के खिलाफ गांधीनगर में एक मतदान केन्द्र के निकट कमल का चिन्ह दिखाए जाने की कथित शिकायत मिलने के कुछ ही घंटों में एफआईआर दर्ज कर ली। लेकिन चुनाव आयोग ने राहुल गांधी के खिलाफ आचार संहिता का उल्लंघन करने की शिकायतें मिलने पर ऐसा कोई त्वरित कदम नहीं उठाया।

मतदान केन्द्र में एक ईवीएम पर झांकते और एक अन्य मतदान केन्द्र पर कुछ लोगों, संभवत: मतदाताओं से बातें करते राहुल गांधी की फोटो टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुई थीं और विभिन्न टीवी चैनलों पर भी दिखाई गई थीं। चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया इन पर बहुत ही हल्की थी। आयोग ने कहा कि वह स्थानीय अधिकारियों से इसकी रिपोर्ट मंगवाएगा। उसके पास कुछ चित्र थे। राहुल गांधी से स्पष्टीकरण मांगा गया, लेकिन कुछ दिन बाद आयोग ने मामला यह कहते हुए बंद कर दिया कि राहुल एक खराब ईवीएम की ओर देख रहे थे।

विडंबना यह है कि टाईम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित फोटो के साथ छपी रिपोर्ट में वे फोटो लेने वाले समाचार-पत्र के फोटोग्राफर का कहना इससे उलट था। उन फोटो में राहुल विभिन्न मतदान केन्द्रों पर कुछ लोगों के साथ, संभवत: वे मतदाता रहे होंगे, ईवीएम के निकट दिख रहे थे। फोटोग्राफर का कहना था कि उस वक्त मतदान जारी था।

चुनाव आयोग ने कैमरामैन के कथन से पैदा हुए अन्तर्विरोध को आराम से नजरअंदाज कर दिया। क्यों? यह एक गंभीर आरोप है। चुनाव आयोग ने अपनी निष्पक्षता पर शंकाएं क्यों पैदा होने दीं। आयोग ने मोदी के खिलाफ तो इस कथित शिकायत कि पुष्टि नहीं कराई कि उन्होंने कमल का चिन्ह दिखाते हुए मतदान केन्द्र से 100 मीटर से कम की दूरी पर एक प्रेस वार्ता को संबोधित किया और आयोग ने मोदी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दे दिए। लेकिन राहुल के मामलों में ऐसा नहीं किया। मोदी के मामले में आयोग ने स्थानीय अधिकारियों से रिपोर्ट क्यों नहीं मंगवाई और एफआईआर दर्ज कर ली। इसे देखते हुए आयोग के खिलाफ निष्पक्ष न रहने के आरोप न्यायोचित हैं। एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने जब जांच की तो पता लगा कि मोदी 120 मीटर दूर थे। चुनाव आयोग के पास तब कोई उत्तर नहीं था।

चुनाव आयोग पर दोहरे मानक अपनाने के आरोप तब भी लगे जब वाराणसी के चुनाव अधिकारी, जिला मजिस्ट्रेट प्रांजल यादव ने शहर के बनियागंज क्षेत्र में नरेन्द्र मोदी की एक रैली पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन उस समय उसी स्थल पर रैली करने के लिए राहुल को अनुमति दे दी गई।

इस संबंध में जो स्पष्टीकरण दिया गया, उसके अनुसार मोदी की सुरक्षा पर गंभीर खतरा बताया गया और विभाजित करने वाले व्यक्ति राहुल के बारे में कहा गया कि वह मोदी की तरह बड़ी भीड़ एकत्र नहीं करते। सच्चाई यह है कि वह विभाजित करने वाले नेता नहीं हैं और मोदी की तरह उन पर खतरा नहीं है। क्या तारीफ की है?

मुख्य निर्वाचन आयुक्त वी.एस. सम्पत ने कहा कि सामान्य लोगों और नेताओं के जीवन पर खतरा हो सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि इतने बड़े चुनाव के अन्तिम चरण में आयोग पर आरोप लगाने की वह ‘निन्दा’ करते हैं।

लेकिन उनके अपने साथी चुनाव आयुक्त एच.एस. ब्रह्मा ने स्वीकार किया कि चुनाव पैनल को अमेठी के वोटिंग क्षेत्रों में कुछ मतदान केन्द्रों में जाने के कांग्रेस नेता राहुल गांधी के मामलों पर अधिक तेजी से कार्यवाही करनी चाहिए थी, क्योंकि देरी किए जाने से लोग आयोग की मंशा पर सवाल उठा सकते हैं।

हेडलाइन्स टुडे में करण थापर के साथ एक साक्षात्कार में उनका कहना था कि यदि ऐसे मामलों में देरी की जाती है और मानक अलग होते हैं तो लोगों को उंगली उठाने का मौका मिलता है। ब्रह्मा उस सवाल का जवाब दे रहे थे जब उनसे पूछा गया था कि चुनाव आयोग ने गांधीनगर में कमल का चिन्ह दिखाए जाने पर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ तो कुछ ही घंटों में चुनाव आचार संहिता का कथित उल्लंघन करने के आरोप में चुनाव आयोग ने एक एफआईआर दर्ज कर ली थी, लेकिन राहुल गांधी द्वारा चुनाव आचार संहिता का कथित उल्लंघन किए जाने के 48 घंटे बाद भी आयोग ने कोई ऐक्शन नहीं लिया था।

मोदी को रैली करने की अनुमति न दिए जाने के संबंध में उन्होंने वाराणसी में चुनाव अधिकारियों और बीजेपी के बीच ‘कम्युनिकेशन गैप’ रहने की बात भी स्वीकार की। ऐसा नहीं है कि कुछ को कानून से ऊपर बताया जाना और संवैधानिक संस्थाओं के अधिकारियों के साथ उनकी सांठगांठ होने के आरोप अकारण होते हैं। ऐसा लगता है कि चुनाव आयोग के लिए राहुल निश्चित रूप से आयोग से ऊपर हैं।

इसी बीच उन्हीं कुछ समाचार प्रस्तोताओं, टिप्पणीकारों, मीडिया विश्लेषकों और गैर-भाजपा राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं ने भाजपा नेताओं द्वारा आयोग पर पक्षपात करने के आरोप लगाए जाने की आलोचना की। उन सभी ने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना नहीं की जानी चाहिए।

चुनाव आयोग के एक सेवानिवृत्त सदस्य ने भाजपा द्वारा लगाए गए आरोप की गहराई में जाए बगैर ही कहा कि अच्छा होता आयोग पर पक्षपात करने का आरोप लगाने की बजाय चुनावों के बाद भाजपा को अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए था। देखा, एक संत की क्या बढिय़ा सलाह है?

अदालतों में ऐसे मामलों का भविष्य क्या होता है? चेन्नई उच्च न्यायालय में पी. चिदम्बरम् के खिलाफ 2009 में दाखिल किया गया एक मामला अब तक लटका पड़ा है। उस मामले में अब कोई भी फैसला याचिका दायर करने वाले के लिए किसी भी मतलब का नहीं है। याद करें कि कांग्रेस मंत्रियों और नेताओं ने सीएजी विनोद राय के बारे में क्या कटाक्ष किया था। सीएजी भी तो एक संवैधानिक पद है।

सच्चाई यह है कि ये चुनाव वंशवाद और मोदी के बीच करो-या-मरो की लड़ाई में तब्दील हो गए थे। यह हाई वोल्टेज लड़ाई ने सबको झुलसा दिया था। भावनाएं काफी गर्म थीं। कोई आश्चर्य नहीं कि कठोर शब्दों ने सबको बेंध डाला था।

लेकिन ऐसे शर्मनाक फसादों से बचने के लिए भाजपा नेता यशवंत सिन्हा द्वारा दी गई सलाह विचारणीय है। उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की एक बेंच बनाई जा सकती है जो जल्द फैसलों कर सके। चुनाव आयोग बगैर किसी न्यायिक पट्टे के चुनावों का प्रबंध करे। दूसरी बात सदस्यों के चयन के लिए पारदर्शी प्रणाली होनी चाहिए। पदाधिकारी तो आते-जाते रहते हैं, लेकिन एक संवैधानिक संस्था की तरह चुनाव आयोग की गरिमा सुरक्षित रहनी चाहिए।

 विजय दत्त


अब तक यह माना जाता था कि भाजपा मुख्य तौर पर उत्तर भारत की पार्टी है और इसके साथ केवल खाता-पीता वर्ग ही जुड़ा है। लेकिन इन चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया की मोदी लहर विन्ध्याचल को पार कर कन्याकुमारी की लहरों तक पहुंच गई है और पूर्वी भारत को उसने पूरी तरह आप्लावित कर दिया है। जो लहर जयप्रकाश नारायण के काल में विन्ध्याचल के शिखरों को पार नहीं कर सकी, उस लहर ने मोदी युग में महर्षि अगस्त्य की स्मृति की याद दिला दी। पूर्वी भारत के बिहार, बंगाल और ओडीशा तक इस बार मोदी प्रभाव में दूर तक रंगा गया। ओडीशा और बंगाल में भाजपा अपने बलबूते चुनाव लड़ रही थी। इन दोनों प्रान्तों में पार्टी के प्रदर्शन ने सिद्ध कर दिया कि यदि वह बैसाखियां छोड़ कर आगे बढऩा चाहे, तो यहां अपना सशक्त आधार विकसित कर सकती है। इन प्रदेशों में जो स्थिति उभरी है, उसमें सोनिया गांधी की पार्टी हाशिए पर जाती दिखाई दे रही है। पूर्वोत्तर भारत में भाजपा की सीटें संकेत देती हैं कि निकट भविष्य में असम में दो दलीय व्यवस्था विकसित हो सकती है, जिसमें एक भाजपा और दूसरी सोनिया कांग्रेस या कोई स्थानीय दल हो सकता है। असम में जिस प्रकार लोगों ने एकजुट होकर नरेन्द्र मोदी में विश्वास व्यक्त किया है, वह उसी प्रकार का है जैसा कुछ दशक पहले उसने असम गण परिषद् में व्यक्तकिया था। अरुणाचल प्रदेश के बारे में माना जाता है वहां लोकसभा का चुनाव वही पार्टी जीतती है, जिसकी सरकार राज्य में होती है। लेकिन सोनिया कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद भाजपा ने वहां लोकसभा की दो में से एक सीट जीत कर, इसे गलत सिद्ध कर दिया है। प्रदेश में भाजपा को 45 प्रतिशत और सोनिया कांग्रेस को 41 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। इससे सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों के भेद को समझने की काबलियत आमजन में है।

क्षेत्रीय दलों में जो अपनी पकड़ बचा सके हैं, उनमें तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, तेलुगु देशम, तेलंगाना राष्ट्र समिति ही कही जा सकती हैं। ये वे क्षेत्र हैं, जहां भाजपा का अपना कोई सशक्त संगठनात्मक ढांचा व जनसाधारण नहीं है। लेकिन इन इलाकों में भाजपा को मिले मत प्रतिशत इस बात का संकेत करते हैं कि पार्टी ने मोदी लहर के सहारे इन इलाकों में भी दूरस्थ क्षेत्रों तक पकड़ स्थापित की है। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक परिणाम जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की नेशनल कान्फ्रेंस का है। इस पार्टी की जो दुर्दशा हुई है, उससे निश्चय ही इस राज्य की राजनीति की दिशा बदलेगी। फारुख और उमर अब्दुल्ला, दोनों ने ही कहा था कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बनते हैं तो वे दोनों पाकिस्तान चले जाएंगे। जाहिर है कि भारत के लोगों ने मोदी को जीताकर और कश्मीर घाटी की जनता ने नेशनल कान्फ्रेंस की दुर्दशा करके इनके पाकिस्तान जाने का रास्ता साफकर दिया है। देखना होगा अब्दुल्ला परिवार राजनीति से रुखसत होता है या —– ?

दरअसल नेशनल कान्फ्रेंस समेत अन्य कई दल भाजपा की बढ़त रोकने के लिए मुस्लिम कार्ड का इस्तेमाल करते रहे हैं। मोदी को लेकर इन सभी दलों ने पहले की ही भांति मुसलमानों को भय के आधार पर गोलबन्द करना शुरु कर दिया था। लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और विशेष कर हिन्दी पट्टी के दूसरे राज्यों ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि बहुत बड़ी संख्या में मुसलमानों ने भी भाजपा को वोट देकर नए परिवर्तन के संकेत दिए हैं। कहा जा सकता है कि गुजरात में हुए विकास ने मुसलमानों का मोदी के प्रति दृष्टिकोण बदला है, जिसका लाभ इन चुनावों में भाजपा को हुआ। आखिर जब देश में बुनियादी विकास होगा तो उसका फायदा मुसलमान समेत सभी को तो मिलेगा? यह बात मोदी बहुत सीमा तक देश के मुसलमानों को समझाने में सफल रहे हैं।

इस चुनाव से एक और संकेत मिलते हैं, जिसकी ओर बहुत से विश्लेषकों का ध्यान नहीं गया है। वह संकेत है साम्यवादी टोले का भारतीय राजनीति में अप्रासंगिक हो जाना। ममता के प्रभाव को साम्यवादी बंगाल में भेद नहीं पाए। पश्चिम बंगाल पर निरन्तर तीन दशकों से भी ज्यादा समय तक राज करने वाली सीपीएम केवल दो सीटें प्राप्त कर सकी। यदि केरल से उसे पांच सीटें न मिलतीं तो वह आम आदमी पार्टी से भी पीछे रह जाती, जिसने कम से कम पंजाब से चार सीटें जीत कर अपना नाम तो बचा ही लिया। मोदी को प्रधानमंत्री न बनने देने की घोषणा करने वाले वर्धन की सीपीआई 543 सीटों की लोकसभा में कुछ नहीं कर पाई। जनता पार्टी का प्रयोग जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरु हुआ था। समाजवादियों ने आरएसएस के मुद्दे पर उस प्रयोग को ध्वस्त किया था। लेकिन भाजपा के उस प्रयोग से अलग हो जाने के बाद समाजवादी स्वयं भी एकजुट नहीं रह पाए। बिहार में उसी जनता पार्टी की एक शाखा जद (यू) ने पुन: भाजपा के साथ हाथ मिला कर उस प्रयोग को जिन्दा करने का प्रयास किया था। उसी कारण जद(यू) के नीतिश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बन पाए। लेकिन शायद समाजवादियों में   स्व-विनाश की आदिम वृत्ति समाप्त नहीं हुई और नीतिश बाबू ने भाजपा से नाता तोड़ लिया। बिहार के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि इस बार भी जद(यू) गलत था और भाजपा ही ठीक थी।

चुनाव परिणामों ने संकेत देकर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि देश एक ऐसा सशक्त प्रधानमंत्री चाहता है जिसमें वैचारिक स्पष्टता के साथ स्वयं निर्णय लेने और अपने निर्णयों को क्रियान्वित करने की क्षमता हो। देश ऐसा प्रधानमंत्री चाहता है जिसे स्वयं पर भी विश्वास हो। मोदी का अब तक का कार्य, उनकी कार्य शैली और उनका समग्र व्यक्तित्व इसका प्रतीक रहा है। इसलिए देश के लोगों ने मोदी में विश्वास व्यक्त किया है। बाकी दल इन चुनावों में भी देश के लोगों की धड़कने को सुन नहीं पाए और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के पुराने सूत्रों को ही आधार बना कर चुनाव जीतने की लड़ाई लड़ते रहे, जबकि मोदी ने अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की कृत्रिम दरारों से उपर उठ कर केवल भारत और भारत के विकास की बात की। इस बार लोगों ने न तो जाति को वोट दिया और न ही मजहब को। लोगों ने केवल भारत को वोट दिया और मोदी के नेतृत्व में भारत जीत गया।

नेहरु-गांधी युग के अवसान की घंटियां इस चुनाव परिणाम में स्पष्ट सुनाई देने लगीं हैं। भारतीय राजनीति में मोदी युग का पदार्पण हुआ है। जो लोग मोदी की कार्य-प्रणाली से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि यह युग लम्बा चलने वाला है और इसी में भारत की भलाई है।

डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

 

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