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मोदी एक नम्र विजेता

भारत के किसी और प्रधानमंत्री को इतनी कठोर और न्यायिक जांच से नहीं गुजरना पड़ा जितना इन 12 सालों में मोदी को गुजरना पड़ा। किसी और प्रधानमंत्री को इस तरह निशाना नहीं बनाया गया। यह कहना भी गलत नहीं होगा की पिछली यूपीए सरकार ने मोदी को दंडित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

भारत के पास नरेंद्र मोदी के रूप में अब एक नया प्रधानमंत्री है। उनके बारे में विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जगदीश भगवती ने सच ही कहा है – ‘लोगों के प्रधानमंत्री’। इसके पीछे एक विनम्र मूल और बाद में संघर्ष है। उनके कोई गुरू या गॉडफादर नहीं थे, जिन्होंने उन्हें बचपन और जवानी में पाला हो। इस परिप्रेक्ष्य में मोदी बी.आर. अंबेडकर से अलग हैं जिनकी उच्च शिक्षा को बड़ौदा (वडोदरा) के महाराजा ने प्रायोजित किया था, जिसे मुझे स्वयं मोदी के 16 मई के विजयी भाषण ने याद दिलाया। मोदी ने अपनी शिक्षा का खर्च स्वयं पत्रव्यवहार पाठयक्रम के जरिए उठाया। संघ के कार्यकर्ता होने के नाते उनकी खुद की जरूरतें काफी कम थीं। यह सत्य है कि अपने शुरूआती जीवन में जीविका के लिए उन्होंने सेवक तक का काम किया था।

मेरे लिए वे ‘लोगों के प्रधानमंत्री’ ही हैं, जिसके कई महत्वपूर्ण कारण हैं। पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की अपेक्षा, मोदी की उम्मीदवारी जमीनी स्तर से उभरी। मोदी दिल्ली में बैठे पार्टी के दिग्गजों की पसंद नहीं थे, ना ही वे आरएसएस के दिग्गज नेताओं की पसंद थे जैसा उनके आलोचकों का मानना था। मेरी राय में अगर आरएसएस या भाजपा मोदी को चुनते तो इसका कारण पार्टी और बाहर के असंख्य कार्यकर्ताओं का दवाब ही होता। इसी वजह से मोदी भाजपा के नेतृत्व करने के लिए आम आदमी की पसंद हैं।

भारत के किसी और प्रधानमंत्री को इतनी कठोर और न्यायिक जांच से नहीं गुजरना पड़ा जितना इन 12 सालों में मोदी को गुजरना पड़ा। किसी और प्रधानमंत्री को इस तरह निशाना नहीं बनाया गया। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि पिछली यूपीए सरकार ने मोदी को दंडित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा और जांच एजेंसियों ने निर्लज्जता के साथ दुव्र्यवहार किया। मोदी अपने राजनैतिक करियर को खत्म करने वाले इन सभी आरोपों से बचने में सफल रहे। राष्ट्रीय मीडिया, समाज के संभ्रांत वर्ग और विदेशों से प्रायोजित गैर सरकारी संस्थानों में बार-बार इसी बात के चर्चे होना अपने आप में एक दिलचस्प कहानी है। इन सभी बातों ने मोदी के लिए जनता में सहानुभूति अर्जित की और यही सहानुभूति उनके लिए जनता का समर्थन लेकर आयी।

पार्टी के अंदर और बाहर मोदी के आलोचकों और दुश्मनों ने कदम-कदम पर मीडिया में मोदी को बांटने वाले नेता के रूप में प्रस्तुत किया और कहा कि गुजरात के बाहर पार्टी के लिए वे एक राजनैतिक आपदा बनकर आएंगे। ऐसा विनाशकारी अभियान चल रहा था, जो इशारा कर रहा था कि भाजपा एक पार्टी के रूप में बिखर जाएगी, अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो। ऐसा भी कहा जा रहा था कि मोदी के कारण गठबंधन भी टूट जाएगा। यह बात तो सत्य है कि गैर मोदी पक्ष ने जेडीयू और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भड़का दिया और उन्होंने अपने रास्ते अलग कर लिए और सोचा कि ऐसा करने से मोदी की उम्मीदवारी ठप हो जाएगी। नीतीश जाल में फंस गए और वे गठबंधन छोड़ चले गए और अब वे जिंदगी भर अपने फैसले पा पछताएंगे।

यह लेख लिखते हुए मुझे बताया गया कि नितीश ने इस्तीफा दे दिया है और बिहार में नए सिरे से चुनाव के लिए कहा है।

इसी कॉलम में कभी मैंने लिखा था कि नीतीश ने राजनैतिक आत्मदाह कर लिया है, जब उन्होंने एनडीए छोड़ी थी। यह भारत के लोग ही थे, जिन्होंने मोदी की बांटने वाली छवि को फुस्स कर दिया, जिसे उनके आलोचकों ने बनाया था। उनके नेतृत्व में भाजपा ने एक नामुमकिन-सा लक्ष्य हासिल कर लिया। भाजपा कांग्रेस को काफी पीछे छोड़ वाकई एक राष्ट्रीय पार्टी बन कर उभरी। भाजपा को देशभर से समर्थन मिला है। पार्टी ने बेशक केरल, तमिलनाडु, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में भले ही अच्छा प्रदर्शन नहीं किया हो पर मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इन राज्यों में अपना आधार मजबूत ही किया है। पश्चिम बंगाल में तो पार्टी तृणमूल कांग्रेस के विकल्प के तौर पर सामने आ सकती है जब दो साल बाद विधानसभा के चुनाव होंगे। पश्चिम बंगाल में भाजपा कांग्रेस और वाम मोर्चा से ज्यादा ताकतवर बन कर उभरी है।

यह मोदी के नेतृत्व में ही हुआ है कि भाजपा ने भारत के पार्टी सिस्टम में एक ऐतिहासिक राजनैतिक कहानी लिखी है। 1984 के बाद पहली बार है भाजपा एक ऐसी पार्टी बनी जिसने पूर्ण बहुमत हासिल किया है। इसी के साथ उस मिथक को भी झुठला दिया कि भारत में कभी एकल पार्टी की सरकार नहीं बन सकती और गठबंधन ही एकमात्र रास्ता है। यह इस बात को दर्शाता है कि गठबंधन वाली सरकार खराब होती हैं। भाजपा के पूर्ण बहुमत के बावजूद मोदी गठबंधन वाली सरकार के ही मुखिया होंगे। महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी की गठबंधन वाली सरकार उनके पहले की सरकारों से ज्यादा सशक्त होगी। क्योंकि उनकी खुद की पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल है, ऐसे में प्रधानमंत्री पर गलत बातों का दवाब नहीं होगा। मनमोहन सिंह की तरह मोदी मायावती, मुलायम और लालू पर टैक्स संबधी केस वापिस नहीं लेंगे। अपने पूर्ववर्ती सरकार की तरह मोदी दिल्ली के भवन कानूनों के साथ समझौता नहीं करेंगे और ना ही मायावती को सरकारी बंगले तोहफे में देंगे।

निस्संदेह, मोदी ने अब विश्व में सारे राजनीतिक पंडितों को मौजूदा सिद्धांतों की समीक्षा करने के लिए मजबूर कर दिया है। मोदी ने जाति, धर्म और क्षेत्र की राजनीति की सीमाओं को साबित कर दिया है। इस चुनाव के परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि लोगों ने जाति के आधार पर वोट नहीं दिया है। यही कारण है कि मायावती, मुलायम सिंह, नीतीश कुमार और लालू यादव ने इतना निराशाजनक प्रदर्शन किया है।

अगर लोग जाति और धर्म की सीमा से उठकर वोट करें तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत होगा। दुर्भाग्य से हमारे समाज के प्रभावी वर्ग जिसमें हमारे बुद्धिजीवी भी शामिल हैं, पहचान की राजनीति को बढ़ावा देते हंै। उदहारण के तौर पर यादव, मुस्लिम और दलित के ब्लॉक के रूप में वोट देते हैं। वे अपने संबंधित अधिकारों को मजबूती देने के लिए इस घटना की प्रशंसा करते हैं और अगर कोई इस प्रवृत्ति का विरोध करता है तो उसे सांप्रदायिक ठहरा दिया जाता है। मेरे विचार से इस चुनाव में बड़े पैमाने पर लोगों ने इस महत्वपूर्ण घटना और उसके चैंपियंस को सिरे से खारिज कर दिया है। यह टिकाऊ जवाबी घटना होने जा रही है या नहीं यह देखने की बात है।

इसी तरह, मेरा मानना है कि ज्यादातर लोगों ने बहुमत से कांग्रेस को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा न कर पाने के तहत इस चुनाव में तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी की ओर से जबरदस्त सांप्रदायिकता पर आधारित चुनाव प्रचार को पूरी तरह खारिज कर दिया है। यह भी संभव है कि बहुसंख्यक समुदाय, जो कि हिन्दू है, उनको दंडित किया है और वह केवल अल्पसंख्यक वोट के लिए सह-अपराधी हैं। यही कारण है कि मैं अक्सर मुद्दे पर बहस करता हूं कि तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी भारतीय अल्पसंख्यकों के असली दुश्मन हैं। नासमझ अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण और उनके अतिवादी तत्वों और विचारों की अनदेखी हिंदु बहुसंख्यक समुदाय से प्रतिकूल प्रतिक्रिया आकर्षित करेगा। यह याद रखना चाहिए कि भारत धर्मनिरपेक्ष उसके बहुसंख्यक समुदाय के धर्मनिरपेक्ष होने के कारण है, न कि किसी और कारण से।

अब तक देखा गया है कि तथाकथित सेकुलरिस्ट और आइडंटिटि पॉलिटिक्स के माहिरों की सजा का भारत के लोगों ने हमेशा स्वागत किया है। उम्मीद है कि तथाकथित सेकुलरिस्ट या पूरा देश अब आइडंटिटि पॉलिटिक्स के दुष्प्रभावों का आत्म-मंथन करेगा। लेकिन हृदयव्यापी तो भारतीय युवाओं का नरेंद्र मोदी पर विश्वास है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत में 81,459 मिलियन पंजीकृत मतादाता हैं, जिनमें 100 मिलियन पहली बार वोट डाल रहे थे। मोदी के सुरक्षा, सकुशल और विकास के मुद्दों पर युवाओं ने भरोसा जताया। उन्हें मोदी आकांक्षपूर्ण व्यक्ति लगे। और केवल युवा ही मोदी को पसंद नहीं करते, शहरों और गावों के गरीब भी गरीबी के स्तुतिगान की राजनीति को लात मारते हुए मोदी से उम्मीद लगाए बैठे हैं। आखिर उनका भी सशक्तिकरण होना अनिवार्य है, ताकि वे गरीबी से पार पा सकें। हमेशा गरीब न बनें रहें और सरकार की स्कीमों और फंडों पर आश्रित न रहें व अन्य दलों के लिए वोट बैंक न बनें रहें। यह बात इसी तरफ इशारा करती है कि पिछले छह महीनों में यूपीए की कई स्कीमों, जिन्हें वोट खरीदने के उद्देश्य से लाया गया था के बावजूद लोगों ने भाजपा को वोट किया। उम्मीद है कि अब खैरात की राजनीति का रिव्यू होगा।

मोदी ने साबित कर दिया है कि पैसा या कुछ और बांट कर वोट नहीं छीने जा सकते। भारत की जनता ने मोदी को शानदार तरीके से समर्थन दिया है। उन्होंने एक बार फि र से सारी भविष्यवाणी को खारिज किया जिसमें उन्होंने मोदी के लगभग आठ महीने पहले से चुनावी अभियान शुरू करने को सबसे बड़ी गलती कहा गया था। उन्होंने कहा कि मोदी का अभियान समय से पहले परिपक्व हो जाएगा और उनका देश भर में जाकर लोगों से मिलना और उन्हें सम्बोधित कर अपना सन्देश देने का सपना पूरा नहीं हो सकता। पर अब मोदी की बारी है कि वो उन्हें निराश न करें।

प्रकाश नंदा

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