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समझ समझ का फेर

लोग कहते हैं कलयुग है, अच्छा कैसे हो सकता है? कलयुग का ही असर है कि ऐसे अवगुण, आज सब जगह व्याप्त हैं। उनका दर्शन है – सतयुग के चार पांव थे, त्रेता आया, तीन रह गए, द्वापर आया दो रह गए और कलयुग में एक पांव है। कैसे चलेगा ये एक पांव पर? इसलिए तो यह समय आ गया, जो बुरे से बुरा है। क्या इस मनोदशा के साथ हम आगे जा सकते हैं? क्या हमने अपने आपको स्वयं पीछे रखने की नहीं ठानी है? क्या अंतर्मन में निम्नता नहीं भर दी हमने। सही बात तो यह है कि कोई युग बुरा नहीं होता। क्या आज से पहले के युग में अपराध नहीं थे, झगड़े नहीं थे, चोरी, दुराचार नहीं थे? सब थे। कई हजार साल पहले बेबीलोन की सभ्यता के शिलालेखों के जरिए अच्छे काम करने की और अपराध न करने की अपील की गयी थी। उन पत्थरों पर खुदाई के माध्यम से कहा गया था कि चोरी मत करो, किसी स्त्री को मत भगाओ, धोखा मत दो। महात्मा बुद्ध, अपने जीवन के 40 वर्षों तक के प्रवचन में चोरी से दूर रहने और किसी स्त्री पर बुरी नजर नहीं डालने की सीख देते रहे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हर युग में हर तरह के लोग थे। सतयुग क्या, द्वापर क्या और त्रेता क्या, तो हम कलयुग में ही दोष क्यों देखें? आज हमारे पास जो है उसका मोल नहीं है और जो नहीं है उसकी चाह है। इसी चक्कर में जीवन कट जाता है। जीवन का दर्शन वैज्ञानिकता से भरा होना चाहिए। बचपन से जवानी तक और फिर बुढ़ापे तक का सफर ऐसा होना चाहिए, जो प्रमाण हो हमारी दिनों दिन विकसित होती सूझबूझ का।

दो तरह के लोग हैं दुनिया में। एक वो, जो जीवन जीते नहीं, काटते हैं। बचपन अच्छा, बुढ़ापा बुरा होने की शिकायत उन्हीं को है। दूसरी तरह के लोग वो हैं, जो बुद्ध की तरह जीते हैं। बचपन में आनंद से सराबोर थे। जो प्रभु का दिया खजाना था, बढ़ाया उसे जवानी में, बुढ़ापे में तो जैसे परमानन्द की प्रतिमूर्ति बन गए। उनकी मृत्यु एक घटना नहीं महोत्सव है। एक मंगल मिलन की घड़ी है। एक अंश का परम अंश में एकाकार होने का क्षण है ये। एक बार स्वामी रामतीर्थ भारत की विराट संस्कृति के प्रतिनिधि बनकर अमेरिका गए। अमेरिका के राष्ट्रपति उनसे मिलने आये तो स्वामी रामतीर्थ कहने लगे कि मेरी उंगली के इशारे से चांद-तारे चलते हैं। बात सोच की है, उनके बड़ेपन की है। सोच बड़ी हो तो आदमी स्वयंमेव बड़ा बन जाता है। जो जागरण में जीते हैं वो मानते है कि युग का विकास हुआ है, ह्रास नहीं। हर युग पहले से ज्यादा वैज्ञानिक है। पहले कलयुग था, आज स्वर्णयुग है और आगे और भी ज्यादा स्वर्णिम युग होगा। कलयुग की धारणा पतन की सूचक है।

आयाम बदलने हैं, तकदीर बदलनी है,

टूटे हुआ ख्वाबों की ताबीर बदलनी है।

अश्कों से जो लिखा है, तहरीर बदलनी है,

हालात के मारों की तकदीर बदलनी है।

मुश्किल से न घबरा के, हालात से टकरा के

इस गर्दिश-ए-दौर की तस्वीर बदलनी है।

नदारियो मुफलिस की इन्साने मुकद्दस की

पांव में पड़ी है जो जंजीर बदलनी है।

है जिनके मुक्कदर में नाकामी ओ महरूमी,

उन अपनी दुआओं की तासीर बदलनी है।

हम ये सोच अपने अन्दर लाएं कि कलयुग पहले था, अब सतयुग है और आगे का युग और सत्यनिष्ठ होगा। हमें आम और खास, लौकिक और अलौकिक और संसारिक एवं अध्यात्मिक के भेद की सोच मिटानी होगी।

चढ़ती थी उस मजार पर चादरे बेशुमार

और बाहर बैठा एक फकीर सर्दी से मर गया।

ललित अग्रवाल

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