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कमजोर बैंच स्ट्रैंथ लचर रोटेशन पॉलिसी

टी-20 विश्व कप के फाईनल में निराशाजनक हार के साथ ही भारतीय क्रिकेट का वर्ष 2013 सीजन निराशापूर्ण तरीके से खत्म हुआ। अगर इस सीजन में भारत के प्रदर्शन पर नजर डालें तो टीम ने कुल 32 एकदिवसीय मैचों में 18 जीत और 12 हार दर्ज कीं। यहां सबसे रोचक बात यह है कि इस दौरान भारत ने जिंबाब्वे के खिलाफ 5 मैच खेले और सभी मैच जीते। वहीं टेस्ट मैचों में भारत ने कुल 6 मैच खेले और 2 जीते व 2 ही हारे। टी-20 की बात करें तो भारत ने कुल 7 मैचों में 6 जीते और केवल एक मैच हारा। लेकिन दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इसके बाद भारत एशिया कप में भी श्रीलंका और पाकिस्तान को हराने में नाकाम रहा। इस नजरिए से भारत का प्रदर्शन मिला-जुला ही रहा।

आने वाला सीजन इंडियन प्रीमियर लीग (आई पी एल) का है और दुनिया की अधिकतर टीमों के खिलाड़ी अपनी-अपनी फैंरचाइजी के लिए एक दूसरे से भिड़ेंगे। पिछले वर्ष आई पी एल को फिक्सिंग के आरोपों ने डस लिया था। आई पी एल के लगभग हर सीजन में किसी न किसी विवाद ने इसका दामन दागदार किया। लेकिन, इसे केवल फिक्सिंग या विवादों की लीग समझना बेवकूफी होगी। यह उन तमाम खिलाडिय़ों के लिए एक मंच है जो अपने देश के लिए खेलना चाहते हैं या देश की टीम में वापसी करने को उत्सुक हैं।

लेकिन, क्या वाकई भारतीय टीम में ऐसा हो रहा है? अब इसका उत्तर तो इसी बात से मिल जाएगा कि नए चेहरों का टीम में चयन तो हो जाता है, पर उन्हें मैच खेलने का मौका एक या दो दौरों के बाद ही मिलता है। उदाहरण के लिए पिछले वर्ष संपन्न हुई चैंपियंस ट्रॉफी में भारतीय टीम में मुरली विजय, इरफान पठान, विनय कुमार और अमित मिश्रा को शामिल किया गया था, लेकिन इनमें से किसी को भी मैच खेलने को नहीं मिला। चलो, यहां भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही थी, तो टीम में बदलाव करना ठीक नहीं था, यह बात समझ में आती है। पर ऐसा ही कुछ हुआ, वेस्टइंडीज में, जहां भारत की टीम में विजय के साथ अंबाटी रायूडू और इरफान पठान शामिल थे। लेकिन, विजय को छोड़ पठान और रायूडू तो केवल वेस्टइंडीज घूम कर लौटे। भारत ने फाईनल जरूर जीता, लेकिन शुरूआती मैचों में भारत का प्रदर्शन ढीला था, तब इन खिलाडिय़ों को मौके दिए जा सकते थे।

इसके बाद तो, जो हुआ वह समझना काफी मुश्किल है। जिंबाब्वे के आसान दौरे पर टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों ने अपने आप को आराम देना मुनासिब समझा। अब उम्मीद थी कि भारतीय युवा प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा। भारत ने ऐसा किया भी। टीम के 15 सदस्यों में से करीब 7 युवा चेहरे थे। दौरे पर खेले जाने वाले पांच मैचों में इन 7 खिलाडिय़ों को रोटेट कर मौका देना संभव था। लेकिन, भारतीय टीम ने पहले तीन मैचों में कोई बदलाव नहीं किया। कारण सीरीज जीतने पर तवज्जो को बताया गया। नतीजा रहाणे, मोहित शर्मा और पुजारा जैसे खिलाड़ी केवल एक या दो ही मैच खेल पाए। वहीं जम्मू-कश्मीर के उभरते हुए ऑफ स्पिनर परवेज रसूल एक भी मैच नहीं खेल सके।

भारत की इस संकीर्ण मानसिक्ता की देश भर में खिल्ली उड़ी। दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम नंबर 10 के पायदान पर बैठी टीम के विरूद्ध सीरीज जीतने को महत्व दे रही है। भारतीय टीम के पूर्व कप्तान दिलीप वेंगसरकर ने भी भारतीय टीम मैनेजमेंट की जमकर आलोचना करते हुए कहा कि- ‘यह बहुत आश्चर्य की बात है, और इससे चयनकर्ताओं के बीच दूरगामी सोच का ना होना साफ झलकता है। नए खिलाडिय़ों को मौका दिए जाने में टीम प्रबंधन जिद्दी दिखाई देता है। हम क्यों बार-बार उन्हीं खिलाडिय़ों को मौका दिए जा रहे हैं।’

इसके बाद भी भारत ने न्यूजीलैंड में ऐसी ही कहानी दोहराई। चेत्तेश्वर पुजारा के साथ-साथ रीवा, मध्यप्रदेश के उंचे लंबे कद के तेज गेंदबाज ईश्वर पांडे और कर्नाटक के अॅलराउंडर स्टुअर्ट बिनी को टीम में तो जगह मिली, लेकिन अंतिम एकादश में नहीं। न्यूजीलैंड में भारत पहले एकदिवसीय श्रंखला हारा और फिर टेस्ट श्रंखला में मात खा गया। सुनील गावस्कर ने भी गुस्सा जताते हुए कहा कि-‘भारत के इस रवेयै को समझना मुश्किल है, इससे मैं खुद असमंजस में हूं।’ एशिया कप के चयन पर तो उन्होंने टीम पर पसंदीदा खिलाडिय़ों को मौका देने का आरोप लगा दिया। हार की यही गाथा दक्षिण अफ्रीका में भी गाई गई। इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी दिग्गज टीमें जहां खेल के तीनों प्रारूपों में अलग-अलग टीमें उतार चुकी हैं, वहीं भारत एक ही टीम के साथ खेलता है।

नौ महीने बाद विश्व कप खेला जाना है। अपनी श्रेष्ठ टीम को टूर्नामेंट में उतारने के लिए सभी टीमें कम से कम अपनी दो टीमें तैयार कर रहीं हैं। वहीं भारत बैंच स्टै्रंथ और रोटेशन पॉलिसी के गणित को नहीं समझ पा रहा है। अगर भारत को खिताब बचाना है, तो अभी से युवाओं को अधिक मौके देकर उन्हें विपरीत परिस्थिति का अनुभव देना होगा।

सौरभ अग्रवाल

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