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रासा

कहा जाता है कि ‘किसी के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से होकर जाता है।’ इस कथन को फलिभूत किया है, शिवदास श्रीधरन ने। एक समय केरल में छोटी-सी चाय की दुकान चलाने वाले श्रीधरन आज भारत में ही नहीं बल्कि इंग्लैंड में भी बड़े नामों में शुमार हैं। श्रीधरन ‘रासा’ नाम से ब्रिटेन के सात स्थानों पर भारतीय रेस्टोरेंट चलाते हैं, जिसकी एक शाखा बंगलुरू में भी है।

विनम्र और सरल स्वभाव के साधारण-से दिखने वाले शिवदास श्रीधरन, अपने रेस्टोरेंट का नाम ‘रासा’ रखने की वजह बताते हुए कहते हैं- ‘प्रवाह, संगीत की तरह प्रवाह। संगीत कानों और भावनाओं के लिए बेहद मधुर होता है। इसी तरह स्वादिष्ट भोजन भी शरीर के साथ-साथ भावनाओं के लिए रुचिकर होता है। मुझे इतना यकीन है कि एक दिन पूरे विश्व में भारतीय रेस्तरां रासा खोलकर पूरी दुनिया को जीत लूंगा।’ उदय इंडिया से बात करते हुए श्रीधरन ने बताया कि उनका रेस्तरां बंगलुरू के पॉश इलाके इंदिरानगर में स्थित है।

भविष्य को लेकर चमकती आंखों से श्रीधरन कहते हैं- ‘भारतीय व्यंजनों का वैश्विकरण और वैश्विक व्यंजनों का भारतीयकरण’ हमारा मंत्र है। मैं पेट के रास्ते खुद के और विश्व के प्रति भारत का प्यार बढ़ा रहा हूं। यदि प्राचीन भारतीय अध्यात्म के माध्यम से विश्व को जीत सकते हैं, तब भोजन भी एक तरह की अध्यात्मिकता ही है। इसे हम ‘अन्न ब्रह्म’ कहते हैं। भारतीय व्यंजनों के द्वारा हम विश्व में भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह हमारी प्राचीन संकल्पना ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ से मेल खाता है।

श्रीधरन ने खुद को रासा तक ही सीमित नहीं किया है। वह नए संघटकों के साथ प्रयोग करते हैं और नए आकर्षक व्यंजन बनने तक जारी रखते हैं। उनका कहना है कि वह विश्व को थाली में परोसते हैं, जो सिर्फ भारतीय पाक-कला से ही संभव है। यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि आज से 3 हजार साल और उससे भी पहले जब पूरा विश्व सिर्फ कच्चे खाने तक ही सीमित था, उस समय भी प्राचीन भारतीय स्वादिष्ट पाक-कला में पारंगत थे। श्रीधरन ने विभिन्न देशों की पाक-कला और व्यंजनों पर गहन शोध किया है। श्रीधरन के पिता केरल में चाय की दुकान चलाते थे। अकाउंटिंग पढऩे के लिए वह केरल छोड़कर लंदन चले गए, लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के प्रति उनकी प्रयोगधर्मिता नहीं बदली। श्रीधरन न सिर्फ अपने रेस्तरां रासा में स्वादिष्ट व्यंजन बनाते हैं, बल्कि उन्होंने भारतीय व्यंजनों को ब्रिटेन में पसंद करने वाला वैश्विक समुदाय भी बनाया है।

श्रीधरन कहते हैं- ‘मेरा पहला रेस्तरां रासा 1994 में स्टॉक नेविंगटन में खुला था। प्रतिदिन के प्रशासनिक कामों को संभालने के लिए लंदन स्थित हमारे सातों रेस्तरां में 200 कर्मचारी हैं। मैं महीने में 15 दिन लंदन और 15 दिन बंगलुरू और भारत के अन्य हिस्सों में रहता हूं। मेरा इरादा मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, जम्मू और अहमदाबाद में भी रासा की शाखाएं खोलने की है। फिलहाल मैं इसी परियोजना पर काम कर रहा हूं।’

दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास से सराबोर श्रीधरन मंझे हुए पेशेवर और भारतीय संस्कृति, परंपरा और विरासत के प्रबल समर्थक हैं। श्रीधरन का किसानों के साथ सीधा संपर्क है। वह अपने रेस्तरां के लिए किसानों के उत्पादों- फल, सब्जियों, दूध आदि को सीधे किसानों से ही लेते हैं। बिचौलियों को दरकिनार करने के पीछे उनका मानना है- ‘भारतीय संस्कृति किसी के शोषण में विश्वास नहीं करती। इसलिए मैं हमेशा मिल कर काम करने में विश्वास करता हूं। खाना साझा करना, संस्कृति और चरित्र निर्माण का पहला चरण है।’

अपने पुराने दिनों को याद करते हुए श्रीधरन कहते हैं- ‘मैंने अपने जीवन के शुरूआती 19 साल अपने जन्म स्थान केरल में बिताए, जहां हमारा परिवार सब्जियां और फल उगाता था। उस खेत में मैं अपने परिवार की सहायता करता था। मैं अपनी छोटी-सी चाय की दुकान पर भी अपने पिताजी की मदद करता था, जो बाद में एक कैंटीन में बदल गई। उसके बाद मैं अकाउंटिंग की पढ़ाई करने के लिए लंदन चला गया। खाना पकाने में रूचि होने के कारण, 1994-95 में रासा की नीव रखी। उस समय न्यूयार्क टाईम्स में इस पर रिपोर्ट लिखी गई। उसके बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।’ लंदन के विभिन्न भागों में रासा की सात शाखाएं हैं, जिनमें से एक न्यू कासल में है।

श्रीधरन ने महसूस किया कि खेती ने अपनी सामाजिक भागीदारी खो दी है, जो कि एक सामूहिक प्रयास होता है। श्रीधरन कहते हैं- हम धीरे-धीरे बीज से खाना बनाने की अपनी परंपरागत पाक-कला को भूलते जा रहे हैं। यही अनुभूति रासा गुरूकुल की शुरूआत बनी।’ सहकारी किसानों के अलावा रासा गुरूकुल पाक-कला के छात्र और कलाकारों जैसे अतिथियों के लिए भी खुला है। 48 वर्षीय श्रीधरन का कहना है- ‘यह एक ऐसी जगह है, जहां लोग खाना पकाने के दौरान प्राकृतिक खुशी महसूस कर सकते हैं।’

रासा के व्यंजनों की गुणवत्ता बेहतरीन है, लेकिन रासा की गुलाबी रंग की आंतरिक सजावट वहां आने वाले अतिथियों को ज्यादा आकर्षित करती है। श्रीधरन उत्साह से कहते हैं- ‘गुलाबी रंग और भी बहुत कुछ कहता है, जो रासा के लिए सार्थक है। कृतज्ञता और सहानुभूति के अलावा गुलाबी रंग फेंग-सुई में यिन का प्रतिनिधित्व करता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, गुलाबी रंग शांतिदायक होता है। इसके अलावा गुलाबी रंग गहरी दोस्ती को भी दर्शाता है।’

श्रीधरन की हार्दिक इच्छा है कि वृद्धजनों के लिए एक आश्रम और गरीब तबके से आने वाली छात्राओं के लिए एक आवासीय विद्यालय खोला जाए। उनका मानना है कि – ‘समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब मेरी बारी है कि समाज को लौटाऊं और आने वाली पीढिय़ों के लिए, बेहतर समाज बनाऊं। ‘

बेंगलुरू से एस. ए. हेमंत कुमार

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