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बंद करो ये तू-तू मैं-मैं की राजनीति

देश की राजनीति किस हद तक नीचे चली गई है। विरोधियों को ”उल्लू का पट्ठा, चिरकुट, दलाल, शिखंडी, भेडिय़ा, राक्षस, शैतान, कातिल, मौत के सौदागर आदि कहा जाता है, जो बॉलीवुड की चुटकियों कुत्ता-कमीना से अलग नहीं है। विरोधियों की तुलना पौराणिक कथाओं के चरित्रों– ‘यमराज, भस्मासुर, विभिषण, रावण, कुम्भकरण, कंस’ आदि से की जाती है। विरोधियों पर– ‘बदले की आग, बोटी बोटी कर दूंगा जैसे वाक्यों से तीखे हमले करना सामान्य बात हो गई है। दिग्गजों को उनके नामों से पुकारना बंद कर दिया गया है और एक दूसरे के लिए शहजादे, फेंकू आदि शब्दों से पुकारा जाने लगा है।

बदनाम करने वाला और अपमानकारी राजनीतिक प्रचार नया नहीं है। इस प्रकार का राजनीतिक प्रचार सदियों से चल रहा है। चुनाव प्रतियोगिता को जन्म देता है। और हर बात उनके लिए उचित है। जब करोड़ों रूपए दांव पर लगे हों, तो बदसूरत पक्ष अधिक दिखाई देता है। और दूसरे को बदनाम करने और अपमानकारी राजनीतिक कार्य समस्या का हिस्सा है। यदि ये काम नहीं करते, तो राजनेता इसे जारी रखने के लिए करोड़ों रूपए खर्च नहीं करते। काफी पहले से राजनीति में बेहद खराब भाषा का प्रयोग किया जाता रहा है। राजनीतिक गाली-गलौज का प्रसार जो वर्तमान में हो रहा है, वे सामाजिक मानदंडों और मीडिया के परिदृश्य में दिखाई दे रहा है। विरोधी की बदनामी फैलाने वाला प्रचार तकनीक के कारण तेजी से फैल जाता है। पहले भी ऐसा होता था, लेकिन बेतकल्लुफ हो कर की जाने वाली टिप्पणियां वीडियो में बंद हो जाती हैं और उन्हें पूरी हवा दी जाती है।

राजनीतिक बदनामी भारतवासियों के लिए गप्पों में समय काटने का एक बड़ा साधन है। वर्तमान भारतीय राजनीतिक परिदृष्य में ऐसे नेता नहीं हैं, जो सज्जन हों, इसकी बजाय, देश मिश्रित नेता पैदा कर रहा है जिन्हें केवल चाटुकार, धनी, आपराधिक रिकॉर्ड वाले, वंशवादी और अधिसंख्य धूर्त उद्योगपति, गुंडे, धार्मिक और सामुदायिक नेता, अज्ञानी, मूर्ख, बदमाश और ऊंचे स्तर के दुष्टों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

अब लंबे चुनावों में शामिल ये चुनाव जैसे-जैसे मतदान के विभिन्न चरणों से गुजर रहे हैं, वैसे-वैसे राजनीतिक प्रवचनों का स्तर अधिक तीखा, कथन कड़ुवा, उनमें से कुछ पेट में दर्द पैदा करने वाला और आरोप व प्रत्यारोप परेशान करने वाले होते जा रहे है। भारतीय नेता समझ गए हैं कि देश जिन वास्तविक मुद्दों का सामना कर रहा है, उन्हें हाशिए पर डालने के लिए अधिसंख्य जनता को भावनाओं के समन्दर में बहा ले जाना चाहिए।

जैसे लोकतन्त्र गहरा होता जा रहा है, वह गहराई से मुक्त हो रहा है। भारतीय राजनेता जैसे चाहे वैसे अपने विरोधी की बदनामी फैला सकता है, उसे गालियां दे सकता है, उसका जुलूस निकाल सकता है। वह जानता है कि न्यायिक प्रणाली उसे पकड़ नहीं पाएगी, कोई सम्पादक उसके विचारों को नरम नरम नहीं कर पाएगा और न्यूज मीडिया उसे स्थान देने से इंकार नहीं कर सकेगा। वह गालियां देने में निश्चिन्त हो सकता है और आरोप लगाने में लापरवाह बन सकता है। वह गणतन्त्र को गालियां दे सकता है। वह इस राष्ट्र की स्थापना करने वाले देश के नेताओं को गालियां दे सकता है। वह राष्ट्र के सशस्त्र बलों, न्यायिक व्यवस्था पर और यहां तक कि संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े कर सकता है।

आज, जिन विधायकों और सांसदों को हम वोट देते हैं, उनमें से अधिसंख्य बौद्धिक रूप् से दिवालिया है और उनमें संवेदनशील ढंग से सोचने की क्षमता की कमी है। उनका एकमात्र लक्ष्य धन और शक्ति अपनी भावी पीढिय़ों के लिए बचाने का होता है। इससे पहले, कुछ दिमाग वालों को राज्यसभा भेज दिया गया, लेकिन उनका रिक्त स्थान भी उनके आने वालों के लिए डंपिंग ग्राउंड बना दिया। उच्च सदन में हाल में दिखा सदस्यों का व्यवहार उनके गुणों का ज्वलंत उदाहरण है। जब यह जग जाहिर है कि किसी के विधायक बनने की कीमत दो से पांच करोड़ (अगर यह आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, उत्तर पूर्व हो तो 10 से15 करोड़ रूपए) होती है। सांसद बनने की कीमत 25 से 40 करोड़ रूपए होती है। भारतीय संसद इस संदर्भ में ऐसी लगती है, जैसे फोब्र्स सूची पढ़ी जा रही है। संसद में बैठे करोड़पतियों और अरबपतियों के दिमाग उस गरीब देश के हित में कोई तर्क नहीं आता, जहां विश्व के सबसे अधिक गरीब नागरिक रहते हैं।

स्वतन्त्रता संग्राम में, अधिसंख्य नेताओं ने देश की आजादी के लिए अपनी सम्पत्ति बेच दी। आज इसका उलटा है। वे अपनी तिजोरी भरने के लिए देश को बेच रहे हैं। सांसद और विधायक अपनी सम्पत्ति बढ़ाने या अपनी मौजूदा धन-सम्पत्ति बचाने के लिए सदन में हैं। चुनाव आयोग में उनके द्वारा स्वघोषित उदाहरण इसका ज्वलंत उदाहरण है कि किस प्रकार भारतीय राजनीति आज धन बनाने की मशीन है। दूसरे बार के प्रत्याशी की सम्पत्ति में तेजी से वृद्धि आंखें खोल देती है।

इस परिदृश्य में चुनाव जीतना कोई वर्जित लड़ाई नहीं रह गई है। राजनेता चुनाव जीतने के लिए किसी भी अनैतिक हद तक जा कर कोई कसर बाकी नहीं रखते, चाहे उसके लिए उन्हें कुछ भी क्यों न करना पड़े। राजनीतिक प्रवचन उनमें से एक होता है।

जोरशोर से कटु और अपशब्दों के प्रयोगों के साथ लड़ाई काफी जहरीली हो गई है। असंसदीय भाषा चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन गई है। दस्ताने उतार लिए गए है। जब राजनेता इस स्तर तक नीचे उतर आएं तो समझना चाहिए कि यह नितान्त कुंठाग्रस्त होने की निशानी है। अपनी जुबान संभालना अप्रासंगिक हो गया है। यह ‘अशोभनीय आचरण’ दिखता है जो विरोधी के खुले अपमान और उसका नाम धरने से शुरू होता है। नेता गलियारों में खेलते हैं और इस प्रकार विरोधी का अपमान करना उनकी जयकार कराता है।

हिन्दी पट्टी में इस प्रकार से जो फैल रहा है, वह उसका नमूना है कि राजनीति किस हद तक नीचे चली गई है। विरोधियों को ”उल्लू का पट्ठा, चिरकुट, दलाल, शिखंडी, भेडिय़ा, राक्षस, शैतान, कातिल, मौत के सौदागर आदि कहा जाता है, जो बॉलीवुड की चुटकियों कुत्ता-कमीना से अलग नहीं है। विरोधियों की तुलना पौराणिक कथाओं के चरित्रों– ‘यमराज, भस्मासुर, विभिषण, रावण, कुम्भकरण, कंस’ आदि से की जाती है। विरोधियों पर– ‘बदले की आग, बोटी बोटी कर दूंगा जैसे वाक्यों से तीखे हमले करना सामान्य बात हो गई है। दिग्गजों को उनके नामों से पुकारना बंद कर दिया गया है और एक दूसरे के लिए शहजादे, फेकू आदि शब्दों से पुकारा जाने लगा है।

सार्वजनिक सभाओं या इंटरव्यू देते हुए और टीवी चैनलों पर हो रही पैनल चर्चाओं में भाषा को बिगाड़ कर बोला जाता है। दुर्वचन बोलना, जबर्दस्त व्यक्तिगत हमले, व्यंग्यात्मक शैली में बात कहना, अपमानजनक और अप्रतिष्ठाकारी भाषा बोलना, गाली गलौज करना, कीचड़ उछालना, अन्य पार्टी के नेताओं को देशद्रोही, डकैत, लुटेरे, गुंडे, विदेशी एजेंट कहना मानदंड बन गए हैं। यदि इस प्रकार की ‘गंदी गंदी बातें’ सार्वजनिक रूप से कही जाती हैं तो प्रायवेट में क्या कहा जाता होगा, अनुमान लगाना कठिन नहीं है।

क्या इस प्रकार के निचले स्तर के सार्वजनिक प्रवचनों की किसी ने शिकायत की है? सच में किसी ने कोई शिकायत नहीं की है। जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आता है, भाषा अधिक खराब होती चली जाती है। और, इसे चाहे हम पसंद करें या न करें, भारतीय मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा इस प्रकार की अपमानजनक भाषा को हजम कर लेता है। इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करने वाले नेताओं की सूची बढ़ती चली जाती है। यह बात अलग है कि अपमानजनक भाषा बोलने वाले, चरित्र हनन करने वाले और विरोधियों पर कलंक लगाने वाले अपना ही चरित्र उजागर करते हैं। अपने विरोधी पर नाम धरने का पैंतरा तब अपनाया जाता है जब अन्य सभी रणनीतियां असफल हो जाती हैं और बचाने के लिए जब कुछ नहीं बचता। दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय राजनेता आज यहां तक पंहुच गए हैं।

प्रबुद्ध मानेजाने वाले सलमान खुर्शीद, नरेन्द्र मोदी को ‘नपुंसक’ कहते हुए शब्दों को चबाते नहीं। उन्होंने न केवल अपने शब्दों को वापस लेने से इंकार किया बल्कि उनका तब तक बचाव किया जब तक कि उनके बॉस राहुल गांधी ने उन्हें यह कह कर झिड़क नहीं दिया कि– ”मैं इस प्रकार की भाषा पसंद नहीं करता।’’ दूसरी तरफ मोदी ने अपनी 56 ईंच की छाती फुलाते हुए ऐसा जताया जैसे कि वह खुश हुए हैं और खुर्शीद की बेवकुफाना टिप्पणी से अपमानित महसूस नहीं किया है। कुछ अन्य शिक्षित नेताओं ने भी अपना राजनीतिक बदला लेने के लिए असंसदीय भाषा को अपनाना शुरू कर दिया है।

मोदी राजनीति करने और शब्दों से खेलने में माहिर हो गए है। वह अपनी पार्टी को प्रसिद्धि दिलाने के लिए शब्दों का खेल खेलते हैं। अनोतोव कलाशनिकोव अपनी कब्र में तिलमिला गए होंगे जब मोदी ने एके को पहले एके-47 के लिए और दूसरी बार एके एंटनी के लिए और तीसरी बार एके-49 के लिए प्रयोग किया। इसके टुकड़े तब हुए जब उन्होंने केजरीवाल को पाकिस्तान का एजेंट कहा। उनके भाषण को लिखने वाले की तारीफ की जाएगी।

वह इससे भी आगे गए और कांग्रेस को ‘दीमक’ की संज्ञा दी, जो भारत को चाट रही है। उसके लिए भाजपा के कार्यकर्ताओं के ‘पसीने’ को उन्होंने ‘कीटनाशी’ बताया। हाल के दिनों में सबसे बड़ा विवाद वह बना जो उन्होंने ‘पप्पी’ पर टिप्पणी की।

दिग्विजय सिंह सोशल मीडिया पर भाजपा द्वारा सबसे अधिक गाली-गलौज की टिप्पणियों से पीडि़त नेता है। दिग्विजय सिंह को पिग्विजय सिंह कहा जाता है। वह कांग्रेस के साउंडिग बोर्ड हैं। उनके हमलों को कांग्रेस आराम से उनके व्यक्तिगत विचार

बता कर अपना पल्ला झाड़ लेती है। उन्होंने मोदी को ‘रावण’ कहा और यहां तक कि उन्होंने मोदी की मृत्यु की भविष्यवाणी भी यह कह कर दी कि -‘उनका अहंकार और घमंड उन्हें नष्ट कर देगा।’

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी नवासारी की रैली में गरजीं और उन्होंने नमो को ‘मौत का सौदागर’ कह दिया। जो ‘धर्मनिरपेक्षता’ के गीत गाता है। उन्होंने मोदी की तुलना एडोल्फ हिटलर से की और उन्हें ‘लहू पुरूष’ कहा। कांग्रेस के इमरान मसूद ने मोदी के टुकड़े-टुकड़े करने की धमकी दे दी। अमित शाह ने बदला लेने की बात कही। आजम खान ने शब्दों की अंधाधुंध गोलियां चलाई। उन्होंने भारतीय सेना की ईमानदारी पर ही शक किया। अमित शाह और आजम खान– दोनों की चुनाव आयोग ने भत्र्सना की और उनके खिलाफ प्रतिबंध के आदेश जारी कर दिए। आजम खान ने करगिल युद्ध के बारे में शानदार दावा किया कि यह लड़ाई हिन्दुओं ने नहीं, बल्कि मुस्लिम सिपाहियों ने जीती थी। उन्होंने तो मोदी को ‘कुत्ते के बच्चे का बड़ा भाई’ तक कह डाला।

ऊट-पटांग बोलने वाले इस प्रकार के राजनेताओं की सूची बहुत लंबी है। कांग्रेस के राज बब्बर और रशीद मसूद, नेशनल कांफे्रंस के फारूक अब्दुल्ला, भाजपा के चन्दन मित्रा भी इस बीमारी से ग्रस्त हैं। मित्रा ने टिप्पणी की थी कि अमृत्य सेन को दिया गया ‘भारत रत्न’ वापस ले लिया जाना चाहिए। अपनी इस टिप्पणी पर चन्दन मित्रा ने यह कह कर खेद व्यक्त किया था कि वह कुछ ज्यादा ही कह गए।

असुधारीय बेनी प्रसाद वर्मा समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के खिलाफ नाखुशी जाहिर करने की वजह से अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के साथ बार-बार समस्या में घिरे। उन्होंने कहा था कि समाजवादी सुप्रीमो प्रधानमंत्री बनने के अभिलाषी हैं लेकिन ‘पहले उन्हें प्रधानमंत्री निवास में स्वीपर की जॉब लेनी चाहिए।’ उन्होंने मोदी को आरएसएस का ‘सबसे बड़ा गुंडा’ ओर बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को ‘उसका गुलाम’ कहा था।

राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह ने मोदी पर अपनी वैवाहिक स्थिति को गुप्त रखने का ताना कसा था। गांधी ने कहा था कि बीजेपी के पोस्टरों ने ‘महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान के लिए संघर्ष करने’ का वादा किया था, लेकिन हमारे एक मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अपनी सारी कोशिशें एक महिला की जासूसी करने के काम में लगा दीं। यह टिप्पणी कुछ वर्ष पहले मोदी द्वारा एक महिला वास्तुकार की जासूसी कराने के संदर्भ में आई रिपोर्ट को लेकर की गई थी। कांग्रेस के राशिद अल्वी वाराणसी में मोदी के खिलाफ चुनाव लडऩे के बेहद इच्छुक थे। उन्होंने कहा– ‘यदि एक व्यक्ति अपनी पत्नी का ध्यान नहीं रख सकता, तो वह पूरे देश का ध्यान कैसे रख सकता है।’

भाजपा ने पहले धमकी दी और अब उसने कांग्रेस के नेतृत्व पर पोस्टरों के माध्यम से हमला किया जिसमें मोदी को ‘देश प्रेमी’ बताते हुए उनकी तुलना जवाहरलाल नेहरू को ‘पत्नी प्रेमी’ बताते हुए की। पोस्टर में जवाहरलाल नेहरू के साथ एडविन माउंटबेटन को खड़े हुए हंसने की मुद्रा में दिखाया गया था। पोस्टर में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी के गाल पर एक महिला द्वारा ‘किस’ करते हुए दिखाया गया था। भाजपा ने दिग्विजय सिंह और मुलायम सिंह पर दो-दो पत्नियां और भारतीय मुसलमानों में पांच पत्नियां रखने की सीमा से अधिक छह पत्नियां रखने का आरोप समाजवादी पार्टी के ताकतवर स्तम्भ आजम खान पर लगाया था। पोस्टर में शशि थरूर की तीन पत्नियों की रहस्यमय मृत्यु पर भी सवाल खड़ा किया गया था। यहां तक कि संकोची प्रियंका गांधी ने अपने चचेरे भाई वरूण को अपनी इस टिप्पणी से कसने की कोशिश की कि वह भटक गए हैं और उन्हें वापस रास्ते पर लाने की जरूरत है। वाराणसी से चुनाव लडऩे की प्रियंका की इच्छा पर आए समाचारों पर टिप्पणी करते हुए भाजपा नेता सुब्रहमणियम स्वामी ने कहा कि वह बहुत अधिक शराब पीती हैं और उसका प्रभाव रहा होगा तथा उनका नाम खराब होगा। एक भी भाजपा नेता ने इसकी आलोचना नहीं की। अपने पिता के हत्यारों से जेल में मिलने जाने के लिए प्रियंका को स्वामी ने कृतघ्न बेटी भी कहा।

पश्चिम बंगाल में, बंगाल में भद्रलोक राजनीतिज्ञों के दिन चले गए। फारवर्ड ब्लाक के महासचिव देबव्रत बिस्वास चीजों को उस वक्त एक नए निचले स्तर पर ले गए, जब उन्होंने तृणमूल से पूछा: ”एर कोटो दिन राजनीतिक बेशाबृत्ति कोरबेन’’ (और कितने दिन आप राजनीतिक वेश्यावृत्ति में मशगूल रहेंगे?)। बिस्वास तृणमूल के राजनीतिक सिधाई के बारे में बात कह रहे थे। तृणमूल कांग्रेस पहले भाजपा के साथ जुड़ी और फिर कांग्रेस के साथ, लेकिन उनके शब्द कोई असर नहीं दिखा सके। बिस्वास ने बाद में बिना शर्त क्षमा भी मांगी।

सूचना एवं प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी वकील हैं। इस बार वह पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। वह कहते हैं– ‘यदि आप बोलने की स्वतन्त्रता में विश्वास करते हैं और संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार से किसी का अपमान करते हैं तो जिस व्यक्ति का अपमान किया गया है, तो वह कानून का दरवाजा भी खटखटा सकता है। ऐसे में मानहानि के मामले अपना उद्देश्य पूरा करते हैं।’ लेकिन विडम्बना यह है कि अन्ना हजारे ने तिवारी पर अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने पर मुकदमा दायर किया हुआ है।

प्रेजिडेंसी कॉलेज के प्रधानाचार्य अमल मुखोपाध्याय इस बात से सहमत हैं कि– ‘राजनेता शालीनता की सभी हदें पार कर रहे हैं।’ उनका कहना है कि– ‘पिछले दशक में वाम मोर्चा के शासन में कुछ वरिष्ठ सीपीएम नेताओं ने मूढ़ किस्म की टिप्पणियां कीं, लेकिन वे अपवाद थीं, लेकिन अब यह नियम बन गया है। यह केवल राजनीतिक दिवालियापन दर्शाता है।’

भारतीय राजनीति की शैली आज राजनीति का आरम्भ करने वाले हमारे नेताओं से बहुत दूर है। वह अलग ही युग था जब भारत ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी और उस वक्त देश की सेवा करने के लिए नेताओं के पास शिक्षा, ईमानदारी, प्रतिभा और क्षमता थी। वे अपने प्रोफेशन में सफल थे और लोगों द्वारा उन्हें नेता स्वीकार किए जाने से पहले ही उनके पास अपना जीवनयापन करने के ईमानदारपूर्ण साधन थे।

आजादी के बाद इस परिदृश्य में तेजी से भारी परिवर्तन आया। इससे पहले कि वह आजाद भारत में नैतिकता के मानदंड स्थापित करते, हमने गांधी को मार डाला। जवाहरलाल नेहरू ने आजाद भारत में जल्दी ही राजनीति की जो नींव डाली, वह बड़े औद्योगिक घरानों के चंदों पर निर्भर हो गई। शायद उन्होंने उस तरीकों की तरफ से आंखें फेर लीं, जिन तरीकों से कांग्रेस पार्टी के प्रबंधक पैसा इकट्ठा किया करते थे। नेतृत्व के एक नए वर्ग ने जन्म लिया और उसके साथ ही संदेहात्मक चरित्र भी आए जिनका सरकार और सरकार के नेताओं पर उल्लेखनीय प्रभाव था। संविधानेतर शक्ति के केन्द्र फलने-फूलने लगे। विश्व के सबसे विशाल समावेशी लोकतन्त्र ने हत्यारों, ठगों और डाकुओं सहित सबको गले से लगा लिया और लोकतन्त्र के मंदिर में उन्हें एक अवसर दिया, जहां उनका अधिकांश कार्य राष्ट्रीय स्तर का था। वह 365 दिन में से कम से कम 60 दिन की उपस्थिति थी। और जब वे काम करने के लिए बैठ जाते तो उनके पास चिल्लाने, पेपर फाडऩे और काली मिर्च का पाउडर छिड़कने के लिए बहुत सारा समय होता।

संकीर्ण फोकस और वोट बैंक राजनीति ने आर्थिक कल्याणकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे राष्ट्रीय मुद्दों को हाशिए पर डाल दिया। एक सौ करोड से अधिक लोगों के देश में कुछ करोड़ लोगों का अस्तित्व तो गिना ही नहीं जाता, जहां 37 प्रतिशत से अधिक की जनसंख्या गरीबी की रेखा से नीचे रहती है, जहां भ्रष्टाचार अनियन्त्रित हो और लगभग एक तिहाई भारतीय सांसद ‘मानव तस्करी, आप्रवासी रेकेट, गबन, बलात्कार और हत्याओं जैसे संगीन आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हों, और जहां आतंकवाद, नक्सलवाद, मुद्रास्फीति मुख्य समस्याएं हों, वहां पूरी तरह से एक शक्तिशाली और शुचितापूर्ण राजनीति ढांचे की जरूरत है जहां सभी राजनीतिक पार्टियां साथ मिल कर तालमेल के साथ काम करें, गुटबाजी संघर्ष पूरी तरह से रूक जाए और आपराधिक मुकदमों का सामना कर रहे सभी गुंडे किस्म के नेताओं को हटा दिया जाना चाहिए।

हर भारतीय को वोट देने के अपने अधिकार का प्रयोग करना चाहिए और अपने चारों और घटित होने वाले माहौल और घटनाचक्र से सावधान रहना चाहिए। जो कुछ भी गलत हो रहा हो उसे महसूस करते हैं और जो कुछ भी गलत घटित होने के बारे में जानते हैं, हमने उसके खिलाफ आवाज उठाई है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम इस व्यवस्था में शामिल होने के बारे में सोचें, क्योंकि यदि हम इस प्रणाली की सफाई करने के बारे में सोचेंगे तो वह इसके भीतर घुस कर ही हो सकती है।

सब कुछ कहा और किया जा चुका है। गालियां राजनीतिक वर्तनी का हिस्सा रही हैं। इसमें अपेक्षाकृत नया क्या है, संभवत: प्रतिदिन के व्यक्तिगत हमले, केन्द्र के वरिष्ठ राजनेता कम से कम एक बार उन्हें प्रयोग करने से गुरेज करें। राज्य स्तर पर या केन्द्र में जब पार्टियां सत्ता में होती हैं तो भाषण कला और सभी व्यवहार में वे समान होता हैं।

अनिल धीर

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