ब्रेकिंग न्यूज़ 

मोदी और जशोदाबेन का बलिदान ‘भामति’ से बड़ा

इसी परिप्रेक्ष्य में जशोदाबेन- जो सर्वदा दामपत्य जीवन के सुख से वंचित रहीं- एक शिक्षिका बन गईं। उन्होंने करीब 30 वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया और फिलहाल वे एक सेवानिवृत जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। अपने पति द्वारा दांपत्य जीवन के सुखों से वंचित किए जाने पर भी उन्हें मोदी जी के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है, जैसा शायद किसी भी अन्य स्त्री को होती ऐसी स्थिति में।

नरेंद्र मोदी और जशोदाबेन के बीच बचपन में हुई शादी आजकल राष्ट्रीय खबर बनकर देश के मीडिया में छाई हुई है। डॉ. जोएस ने नरेंद्र मोदी और जशोदाबेन की शादी को वाचस्पति मिश्र और भामति की शादी से तुलनात्मक स्तर पर ज्यादा अनुकरणीय बताया है। महान दर्शनशास्त्री वाचस्पति मिश्र ने बादरायण के ब्रह्मसूत्र में विश्व प्रख्यात दार्शनिक प्रबंध लिखे हैं। बह्मसूत्र पर काफी टिप्पणियां मौजूद हैं, लेकिन ऐसा कहा गया है कि ‘भामति’ सबसे अच्छी है। यह टिप्पणी संस्कृत के प्रसिद्ध विद्वान और महान दर्शनशास्त्री वाचस्पति मिश्र ने लिखी है। उन्होंने अपने दाम्पत्य जीवन का त्याग कर करीब 15 वर्ष की अवधि के बाद इसे पूरा किया है।

एक रात जब वाचस्पति मिश्र बादरायण के ब्रह्मसूत्र के लिए अपने प्रबंध को लिखकर अपनी सीट से उठ रहे थे, तो उन्होंने देखा कि रात में मोमबत्ती की रोशनी में एक औरत चुपचाप उनके लिए खाना परोस रही है। यह वाकया इतिहास में दर्ज है। मिश्र ने उनसे पूछा कि- ‘तुम कौन हो और इस वक्त यहां क्या कर रही हो?’ तो उस औरत ने जवाब दिया कि- ‘मेरे परमेश्वर, आप अपने लेख में इतने खो गए हैं कि आप यह भी भूल गए कि वर्षों पूर्व आपने मुझ से विवाह किया था। मैं आपकी पत्नी भामति हूं।’ वाचस्पति मिश्र ने जवाब दिया- ‘हां अब मुझे याद आ गया।’ लेकिन, अब बहुत देर हो चुकी है। मैंने कसम खाई है कि जिस दिन मेरी टिप्पणी खत्म हो जाएगी, उस दिन मैं संन्यास ले लूंगा और हिमालय चला जाउंगा। यह सुन कर भामति ने कहा- ‘मैं कभी आपके पथ की बाधा नहीं बनूंगी। मेरे लिए यही बहुत है कि मुझे आपकी पत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और मैंने शांतिपूर्वक आपकी ब्रह्मसूत्र के लिए टिप्पणी लिखने में मदद की। मुझे इसी बात से संतोष है।’ मिश्र 15 साल तक अपनी पत्नी की श्रद्धा व समर्पण से मंत्रमुग्ध रहे। उन्होंने अपनी पत्नी से कहा- ‘तुम्हारे जैसी धैर्यवान और कर्मशील औरत, जिसमें त्याग करने की गजब क्षमता हो, उसे पत्नी रूप में पाना बेहद कठिन है और इसलिए मैं इस टिप्पणी का नाम ‘भामति’ रखता हूं। ऐसा करने से तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा।’

वाचस्पति मिश्र द्वारा ब्रह्मसूत्र के इस प्रबंध पर ऊपर दिए गए उपाख्यान की जशोदाबेन और नरेंद्र मोदी के दामपत्य जीवन से तुलना की गई है, जिस में भामति 15 साल तक वाचस्पति को नियमित भोजन परोसती हैं और अपने आप को दाम्पत्य जीवन के सभी सुखों से वंचित रखती हैं।

यह बात अब जगजाहिर है कि मोदी और जशोदा की शादी बचपन में ही कर दी गई थी। प्राचीन भारत में रीति रिवाजों के तहत माता-पिता बेटी की शादी कर देते थे और उसे पति के घर भेज कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाया करते थे। जहां तक मोदी जी की बात है, वह अपनी शादी से काफी पहले राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ में स्वयं सेवक बन गए थे। उन्हें वहां मातृभूमि की सेवा करने की प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला। मातृभूमि की सेवा की प्रेरणा और मार्गदर्शन के लिए शाखा में नियमित की जाने वाली प्रार्थना में अन्य स्वयं सेवकों के साथ वह इन शब्दों को दोहराया करते थे।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्। महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे पतत्वेष कायो नमस्ते। नमस्ते प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता इमे सादरं त्वां नमामो वयम् त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये। अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत् श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं स्वयं स्वीकृतं न: सुगं कारयेत् समुत्कर्षनि:श्रेयस्यैकमुग्रं परं साधनं नाम वीरव्रतम् तदन्त: स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा हृदन्त: प्रजागर्तु तीव्रानिशम्। विजेत्री च न: संहता कार्यशक्ति विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्। परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।

भारत माता की जय ।।

लाखों लोगों की तरह मोदी जी के व्यक्तित्व पर भी प्रार्थना की इन पंक्तियों का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने फैसला किया कि वे जीवन भर मातृभूमि की सेवा करते रहेंगे ना कि पारिवारिक मसलों में उलझ कर रह जाएंगे। इसी कारण मोदी शादीशुदा होने के बावजूद प्रचारक बने और अपने आप को दामपत्य जीवन से परे रखा ताकि वे अपना सारा ध्यान और शारिरिक ऊर्जा का कण कण मातृभूमि की सेवा में अर्पण कर सके।

इसी परिप्रेक्ष्य में जशोदाबेन- जो सर्वदा दामपत्य जीवन के सुख से वंचित रहीं- ने एक समझदारी भरा कदम उठाया और शिक्षिका बन बच्चों को पढऩा शुरू कर दिया। उन्होंने करीब 30 वर्षों तक बच्चों को पढ़ाया और फिलहाल वे एक सेवानिवृत जीवन व्यतीत कर रहीं हैं। अपने पति द्वारा दांपत्य जीवन के सुखों से वंचित किए जाने पर भी उनके मन में मोदी जी के प्रति कोई कड़वाहट नहीं है, जैसा शायद किसी भी अन्य स्त्री को ऐसी स्थिति में हो सकती थी। इसका कारण- वे मोदी जी का देश सेवा के प्रति ढृढ़ संकल्प और इसे साकार करने में उनके द्वारा दिया अपना सारा समय की अहमीयत को समझ उनके इस फैसले की इज्जत करती हैं। वे कहतीं हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि मोदी जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे।

इसके अलावा किसी भी अन्य स्त्री की तरह मोदी जी के साथ चुनाव प्रचार में न रहकर उन्होंने तीर्थयात्रा कर अपने पति की सुख शांति की कामना करने का मार्ग अपनाया। जशोदाबेन की इन्हीं खूबियों के कारण उनकी तुलना सुप्रसिद्ध ‘भामति’ से की गई है। नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई मोदी कहते हैं कि बचपन से ही नरेंद्र के आचरण को निस्वार्थ देश सेवा के प्रति ढाला व प्रेरित किया गया था। नरेंद्र का खुद को जशोदाबेन और परिवार के अन्य सदस्यों से अलग रखने के पीछे का असली कारण यही था। मोदी और जशोदाबेन का चरित्र वाकई मिसाल देने वाला है और दूसरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है। आज भी जशोदाबेन अपने हस्ताक्षर जशोदाबेन नरेंद्र मोदी लिखकर करती हैं और उन्हें मोदी के प्रति कोई मतभेद या मनभेद नहीं हैं।

नरेंद्र मोदी के विरोधियों के द्वारा उनकी लोकप्रियता को सहन न कर पाना व उनकी और जशोदाबेन के त्याग और बलिदान और उनके सुचरित्र की सराहना न कर पाने पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। साथ ही एक शपथपत्र में उनके द्वारा जशोदाबेन को अपनी पत्नी स्वीकारने- जिसका उनके परिवार और दोस्तों को पता था- पर विरोधियों की आलोचनाओं पर भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

जस्टिस एम रमा जोएस

ноутбук lenovo ценылучшие игровые ноутбуки 2013 года

Leave a Reply

Your email address will not be published.