ब्रेकिंग न्यूज़ 

संघ ने किया नमो नम:

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी संघ परिवार और इस प्रकार के उसके तत्वों की मांग को दूर रख सकें। यद्यपि उन्हें इस बात का संज्ञान लेना पड़ेगा कि पार्टी में उनका कद बढ़ाने और उनकी विजय सुनिश्चित कराने में आरएसएस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नरेन्द्र मोदी के लिए आरएसएस का यह खुला समर्थन उनकी मुआवजे की मांगों से अधिक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। आरएसएस के समक्ष चुनौती होगी कि सत्ता के लाभ और उसके साथ आवश्यक रूप से आने वाली जंग को कैसे संतुलित किया जाए।

हाल ही में सम्पन्न हुए चुनावों में भाजपा का लोकसभा प्रचार खुला आरएसएस प्रचार था। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने जन सम्पर्क कार्यक्रम के माध्यम से चुनाव लडऩे का प्रभार ले लिया है। इससे मतदाताओं का भारी संख्या में वोट डालने के लिए जाना सुनिश्चित हो गया है। इसके अतिरिक्त, उम्मीदवारों के चयन में, रणनीति बनाने और उसके क्रियान्वयन में चुनाव घोषणा-पत्र बनाने और बूथ प्रबंधन में भी यह महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहा है।

आरएसएस मोदी का समर्थन क्यों कर रहा है? इसके शीर्ष नेता क्यों व्यक्तिगत रूप से चुनावों की तैयारी पर नजर रखे हुए हैं? सच्चाई यह है कि मोदी 2014 में भाजपा के सर्वश्रेष्ठ दाव हैं। आरएसएस ने मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर केवल स्वीकार ही नहीं किया है, जैसा कि उसने 2009 में आडवाणी को स्वीकार किया था, बल्कि गोद भी लिया है और अपनाया भी है। आरएसएस का कहना है कि उसने मोदी का समर्थन हिन्दुत्व एजेंडे को शामिल करने के लिए नहीं, बल्कि देश को यूपीए शासन से मुक्त कराने के लिए किया है। आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने कहा कि– ‘आरएसएस के लिए केवल सुरक्षा, वित्तीय, जाति, क्षेत्र, धर्म, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने के नाम पर नष्ट किए जा रहे सामाजिक तानेबाने से जुड़े मुद्दे हैं। अब आप उनमें से कोई एक चुन लें और कहें कि यह हिन्दुत्व है। लेकिन मैं कहुंगा कि ये सब हिन्दुत्व हैं। सभी कुछ हिन्दुत्व है।’

मोदी और भाजपा वर्तमान चुनावों में लोकप्रियता की जिस ऊंचाई पर सवार हैं, वह आरएसएस के लिए दोधारी तलवार है। चुनाव परिणामों की घोषणा हो जाने के बाद, भाजपा की विजय का कुछ श्रेय आरएसएस वैचारिक और संगठनात्मक स्तर पर उसके (आरएसएस) द्वारा किए गए अच्छे कार्यों को देगा और चाहेगा कि भाजपा उसके हुक्म को माने। मोदी सरकार के लिए पसीना बहाने वाले संघ के स्वयंसेवक इसे वास्तविकता में बदलने पर अपना हक मांगेगे।

वाजपेयी की तरह, नरेन्द्र मोदी इस सिद्धान्त के पैरोकार हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति है। परिवर्तन लाने के लिए सामाजिक आन्दोलन से, जो आरएसएस ने विकसित किया है, अधिक ताकतवर हथियार राजनीति है। आरएसएस भी इसे स्वीकार करती है और यही कारण है कि उसने भाजपा में एक राजनीतिक भूमिका खेलना क्यों चुना और पार्टी को इसकी मुख्य चिन्ताओं की ओर मोडऩे की कोशिश क्यों की। और उम्मीद है कि किसी तरह अमृत की शक्ति अपनी मरणासन्न हालत को पुनर्जीवित कर देगी।

नरेन्द्र मोदी के रूप में भारत को एक प्रचारक प्रधानमंत्री मिलने की उम्मीदें बहुत हैं। यह विचार कि यूपीए को केन्द्र में शासन करने का एक और मौका मिल सकता है, जो आरएसएस की मृत्यु के लिए समाधिवाली झंकार गा सकता है और उसके संगठन को कमजोर कर सकता है, पूरे भारत में आरएसएस के कैडर को लोकसभा चुनावों में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की जीत निश्चित करने हेतु उत्तेजित करने के लिए काफी है। यूपीए ने सच्चर कमिटी रिपोर्ट, साम्प्रदायिक हिंसा बिल से लेकर भगवा आतंक के आरोपों तक हिन्दुत्व ब्रिगेड पर सब कुछ फेंक दिया है। सिविल सोसायटी में अपने जाल के बावजूद आरएसएस हमेशा दुश्मन सरकारों के डर से खड़ी रही है और सहानुभूतिपूर्ण सरकार का लाभ लिया है। नागपुर के लिए यह करो या मरो की लडाई है।

राजनीति के खिलाफ अपने सभी आख्यानों के बावजूद, आरएसएस पूरी तरह से हमेशा से एक राजनीतिक संगठन रहा है और अब भी है। बारीकी से बातचीत करने और आमतौर पर अपनी चुनावी शाखा, भाजपा के मंडल स्तर से शीर्ष तक के कार्यकलापों में हस्तक्षेप करने में सक्रिय रहा है। इससे स्वयंसेवकों का राजनीतिकरण हुआ है। आरएसएस ने हमेशा दावा किया है कि ‘चरित्र निर्माण’ उसका प्राथमिक लक्ष्य है और राजनीति उसके लिए अभिशाप है। हालांकि गोल्वलकर के वक्त में इसके गठन के समय 1951 से ही आरएसएस ने जनसंघ को अपने नियन्त्रण में रखा था, लेकिन फिर भी हेडगेवार और गोलवलकर, दोनों ने संगठन को चुनावी राजनीति के संक्षारक प्रभाव से दूर रखने की कोशिश की थी। गोल्वलकर के उत्तराधिकारी बालासाहेब देवरस ने गीयर बदले और जनता पार्टी में जनसंघ के विलय को आशीर्वाद दिया। बीजेपी के जन्म से ही उसका आरएसएस से अटूट संबंध रहा और आरएसएस से उसकी नाल कभी काटी नहीं गई।

अधिसंख्य आरएसएस कैडर को चुनावी राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है, कुछ हैं जिन्हें विभिन्न स्तर पर काम करने के लिए लगाया गया है, तो उनके पास बहुत शक्ति है। संगठन सचिव, बीजेपी के कार्यों पर नजर रखने वाले प्रचारकों को निजी रूप में काम करना होता है। वे पर्दे के पीछे से पार्टी को निर्देश देते हैं और आरएसएस तथा उसके राजनीतिक संगठन के बीच पुल का काम करते हैं। वे पार्टी में शक्ति के केन्द्र होते हैं और वे पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपनी उंगली पर नचाते है।

प्रधानमंत्री के तौर पर नरेन्द्र मोदी संघ परिवार और इस प्रकार के उसके तत्वों की मांग को दूर रख सकें। यद्यपि उन्हें इस बात का संज्ञान लेना पड़ेगा कि पार्टी में उनका कद बढ़ाने और उनकी विजय सुनिश्चित कराने में आरएसएस का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नरेन्द्र मोदी के लिए आरएसएस का यह खुला समर्थन उनकी मुआवजे की मांगों से अधिक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है। आरएसएस के समक्ष चुनौती होगी कि सत्ता के लाभ और उसके साथ आवश्यक रूप से आने वाली जंग को कैसे संतुलित किया जाए।

2012 में आरएसएस कालातीत होने की ओर बढ़ रहा था। उसकी शक्ति घट रही थी। इस बात पर चिन्ता बढ़ रही थी कि शाखाओं की ओर युवाओं को कैसे आकर्षित किया जाए। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण था कि स्वयं सेवकों की गुणवत्ता को कैसे बनाए रखा जाए। हिन्दुओं की चिन्ताओं और भारतीय समाज के बड़े मुद्दों के लिए आरएसएस अप्रासंगिक दिख रही थी। यह बगैर उद्देश्य वाली प्राचीन सेना थी। गलियों में औसत हिन्दुओं के लिए इसका कोई उपयोग नहीं था।

शाखाओं की संख्या घट रही थी। यद्यपि सदस्यता के लिए कोई रजिस्टर नहीं बनाया गया था, लेकिन फिर भी वे स्वीकार करते थे कि पर्याप्त संख्या में युवा लोग स्वयं सेवक के अनुशासित जीवन की ओर आकर्षित नहीं थे। तथाकथित हिन्दू आतंकवादी गतिविधियों में आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका पर यूपीए सरकार की छानबीन, प्रात:कालीन शाखाओं में घटती उपस्थिति और संगठन की रीढ़ की हड्डी माने-जाने वाले सवर्ण जाति के युवाओं की खतरनाक ढंग से घटती सदस्यता संघ को चिन्ता में डाले हुए थी।

अचानक, संगठन जो मरणासन्न अवस्था की ओर जा रहा था, और लग रहा था कि समय के साथ यह भी समाप्त हो जाएगा, उसमें परिवर्तन आने लगा और तेजी से गिरता हुआ उसका ग्राफ रूक गया। एक साल से भी कम समय में चार हजार से भी अधिक नई शाखाएं देश में शुरू हो गईं। 2014 के आरम्भ में भारत में शाखाओं की संख्या 44,982 पर पहुंच गई। इनमें से 8417 तो केवल उत्तर प्रदेश में थीं।

आरएसएस ने कोई सदस्यता रजिस्टर नहीं बनाया हुआ। इससे स्वयं सेवकों की संख्या का पता लगाना मुश्किल था, लेकिन शाखाओं की संख्या इस बात के स्पष्ट संकेत थी कि संगठन की ताकत बढ़ रही है, या घट रही है। आरएसएस, जिसने प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री को पाला और उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, उसके बारे में क्या सोचती है। देखने में तो लगता है कि इन चुनावों में आरएसएस पूरी तरह से मोदी की जीत के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन फिर भी उनके बारे में उसकी अनेक शंकाएं हैं। मोदी ने राष्ट्रव्यापी प्रचार अभियान के दौरान विभिन्न रैलियों में आरएसएस से जुड़ा अपना परिचय दिया। उन्होंने गुरू गोल्वलकर पर एक पुस्तक भी लिखी।

नागपुर में अनेक के लिए मोदी खंडित व्यक्तित्व के अवसरवादी व्यक्ति हैं। जबकि मोदी खुद को आरएसएस का कर्मठ स्वयं सेवक मानते हैं और उसकी विचारधारा को तेजी से बताते हैं। लेकिन न तो उनकी चटकीली जीवनशैली और न ही उनकी कार्यशैली आरएसएस के सिद्धान्तों की पुष्टि करते हैं। वह अनुशासित स्वयंसेवक तो बिल्कुल नहीं हैं, जो एकचाकानुव्रत को मानता है, जिसका अर्थ है कि नियमों के अनुसार चलना। एकचाकानुव्रत को आमतौर पर ऐसे भी परिभाषित किया जाता है कि– ”सूचना के बाद, सोचना बंद। यानी आदेश मिलने पर सोचना बंद, केवल आदेशों का पालन करो। यह मोदी के लिए नहीं है। वह मस्तिष्क से काम लेने वाले व्यक्ति हैं, जो किसी भी प्रकार से अपने लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी प्रकरण, चुनाव घोषणापत्र की असफलता उनके सतत और सोद्देश्य दुर्जेय रहने के उदाहरण हैं। वह मोदी ही थे जिन्होंने 2002 में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को धमकी दी थी कि यदि उनके प्रतिद्वन्द्वी हरेन पांड्या को चुनाव लडऩे के लिए टिकट दिया गया तो वह मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे। पांड्या एक कैबिनेट मंत्री थे। उन्हें टिकट नहीं दिया गया और उसके कुछ समय बाद ही उनकी हत्या हो गई। हत्या की गुत्थी अब तक सुलझी नहीं है।

अपने लिए मोदी को आरएसएस का जमीन पर केवल लॉजिस्टिकल समर्थन नहीं चाहिए, बल्कि वह चाहते हैं कि आरएसएस उनकी पार्टी के सहयोगियों के खिलाफ भी उनके पक्ष में उनके साथ खड़ी रहे। मोदी को भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ मोर्चा लेना है। वह केवल आरएसएस की मदद से ही ऐसा कर सकने की उम्मीद कर सकते हैं। इस बार आरएसएस की शाखाओं के आसपास माहौल भिन्न है। स्वयं सेवक 1999 के बाद पहली बार उम्मीदों और उत्साह से भरे हैं। नरेन्द्र मोदी की लहर देश के हर नुक्कड़ पर दिखाई दे रही है। नागपुर से भेजा गया संदेश स्पष्ट था– ‘आगे बढ़ो और वोटरों की सूची बनाओ। यह सुनिश्चित करो कि वे भाजपा को वोट दें।’ मोदी की उम्मीदवारी ने आरएसएस को उत्तेजित कर दिया है। स्वयं सेवकों ने संदेश को नीचे तक– शाखाओं ओर पांच-छह लोगों की सभा तक पंहुचा दिया। आरएसएस इस प्रकार के जनसंपर्क और बूथ प्रबंधन में विशिष्ठ है।

आरएसएस के ये कदम के सिपाही हर घर के दरवाजे तक गए। लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से यकीन दिलाया कि वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को वोट करें। उन्होंने लोगों को समझाया कि संघ की विचारधारा किस प्रकार से राष्ट्र के लिए है और यह उनके हित में है कि वे उन नेताओं के लिए वोट करें, जो राष्ट्र के संबंध में सोचते हैं। वे नरेन्द्र मोदी को प्रमोट करने के लिए नहीं निकले, बल्कि भाजपा के लिए निकले। वह बात अलग है कि मोदी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।

इस बार आरएसएस हिन्दुओं के लिए मुक्त-विचारों वाले बुद्धिजीवियों से सावधान है। इसके बावजूद, सच्चाई यही है कि ठोस बुद्धिजीवी आधार बनाए बगैर आरएसएस का कोई भविष्य नहीं है। अधिसंख्य समझदार बुद्धिजीवी स्वयं सेवक इसे छोड़ गए हैं और वे सामाजिक क्षेत्र में चले गए हैं। गोविन्दाचार्य जैसे लोग अब आम आदमी पार्टी को प्रमोट कर रहे हैं। या ‘आरएसएस के गुम हुए वर्ष’ के लेखक संजीव केलकर आरएसएस छोड़ कर ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र प्रोजेक्ट चला रहे हैं और उनकी सहानुभूति दलितों की समस्याओं के लिए है। अपने भविष्य के लिए आरएसएस को नकारात्मकता और अल्पसंख्यकवाद-विरोध के बगैर विकास मार्ग की जरूरत है। दीवार पर स्पष्ट रूप से इबारत लिखी है: जीवित रहने के लिए आरएसएस को पुनर्विचार करना होगा और नया अंदाज अपनाना होगा। अपने वर्तमान स्वरूप् में, उसका कोई भविष्य नहीं है और अपक्षय निश्चित है।

मार्च 2000 में अपने एक साक्षात्कार में मोहन भागवत ने खुद कहा था कि– ‘ हम विश्वास करते हैं कि समाज में परिवर्तन लाने के लिए एक व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ औजार है। शाखा ऐसे व्यक्तियों को बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ औजार है।’

кто посещал страницу вкпсихофизиологическая экспертиза тесты

Leave a Reply

Your email address will not be published.