ब्रेकिंग न्यूज़ 

नरसिम्हा राव के असफल शिष्य हैं मनमोहन सिंह

मनमोहन सिंह को अपने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव, जिन्हें मैं इस देश का अब तक सबसे सशक्त प्रधानमंत्री मानता हूं, से कुछ सीख लेनी चाहिए थी। राव ने एक अल्पमत सरकार को पांच साल तक चलाया था जबकि वो भी सिंह की ही तरह सोनिया के चुने हुए थे।

मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के रूप में कोई कैसे आंकेगा? आजकल देश भर के राजनैतिक व बुद्धिजीवी वर्ग में यह सवाल पूछा जा रहा है, खासकर जबसे उन्हीं के पूर्व मीडिया सलाहकार की उनके उपर लिखी एक किताब मार्किट में आई है। मैनें फिलहाल यह किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए मैं इसकी विषय वस्तु पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। लेकिन, किताब के लेखक संजय बारू कहते हैं कि यह मनमोहन सिंह के पहले प्रधानमंत्री कार्यकाल (2004-09) का सकारात्मक ब्यौरा है। पार्टी अध्यक्षा सोनिया गांधी का मनमोहन के प्रधानमंत्री कार्यकाल में महत्वपूर्ण कैबिनेट मंत्रियों और सरकार के एजेंडे पर सीधा नियंत्रण होने के कारण पैदा हुए मुश्किल हालातों पर महत्वपूर्ण संदर्भ हैं ऐसा संजय बारू कहते हैं।

अपनी आखिरी प्रेस कांफ्रेस में (जो सिंह के कार्यकाल में दुर्लभ ही थी) प्रधानमंत्री ने कहा कि वे अपनी सरकार को आंकने का फैसला इतिहास पर छोड़़ते हैं। आलोचक चाहे कुछ भी कहें, तथ्य तो यही बयां करते हैं कि मनमोहन को, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद प्रधानमंत्री के रूप में देश के तीसरे सर्वाधिक कार्यकाल अवधि वह्न करने वाले नेता के रूप में याद रखा जाएगा। अगर उनका यह रिकार्ड आने वाले किसी प्रधानमंत्री द्वारा तोड़ा भी जाता है तो भी उन्हें एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद रखा जाएगा जो 2009-2014 में लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने गए, वो भी तब जब उन्होंने गठबंधन वाली सरकार को पूरे पांच साल (2004-09) तक चलाया। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।

यहां इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि सन् 1989 से आज तक कोई भी बड़ी पार्टी लोकसभा में पुर्ण बहुमत से जीती नहीं है। परिणामस्वरूप, तब से अब तक हर सरकार या तो अल्पमत की सरकार रही है, जिसे दूसरे दलों ने समर्थन प्रदान किया या वह गठबंधन की सरकार रही है। इसका मुख्य कारण था कि 1989 से अभी तक देश में ऐसी कोई पार्टी नहीं आयी जो केंद्र में अपने दम पर सरकार बना उसे चला सके। दिल्ली में 1989 से अभी तक जो भी सरकार बनीं वह किसी न किसी प्रकार के गठबंधन या ऐसी विविधताओं के सहयोग से ही बनीं। अधिकतर प्रधानमंत्री तो लोकसभा की किसी बड़ी पार्टी से ही चुना गया है लेकिन उसकी सरकार का गठन छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टीयों की मदद से ही संभव हुआ।

वी. पी. सिंह की लीडरशिप में जनता दल के नेतृत्व वाली नेशनल फ्रंट की सरकार (1989-90) बाहरी समर्थन पर आधारित (भाजपा और सी पी एम जिनकी सरकार में भागीदारी नहीं थी) अल्पमत सरकार थी। यह सरकार भाजपा के अयाध्या में मंदिर बनाम मस्जिद विवाद के कारण समर्थन वापिस लिए जाने से गिरी। इसके बाद जनता दल से टूटे 50 के आसपास के सांसदों द्वारा चंद्रशेखर के नेतृत्व में कांग्रेस के बाहरी समर्थन से अगली सरकार बनी। लेकिन यह व्यवस्था छह महीने भी नहीं ठहर पाई। पी वी नरसिम्हा राव के नेतूत्व वाली अल्पमत में बनीं कांग्रेस सरकार (1991-1996) ने अस्थिरता के बावजूद अपना कार्यकाल पूरा किया। लेकिन, इसके लिए सरकार ने संदिग्ध तरीका अपनाते हुए छोटी पार्टियों को घूस देकर समर्थन प्राप्त किया और दल-बदल कर लोकसभा में विश्वास मत हासिल किया।

1996-98 के दरमियान एकल सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा को सरकार नहीं बनाने दी गई। लेकिन, पहले देवेगौड़ा और फिर आई के गुजराल के शासनकाल वाली जनता दल के नेतृत्व वाला युनाईटेड फ्रंट छोटी-छोटी पार्टियों का एक समूह था। लेकिन उसे उस वक्त की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि सरकार के पास लोकसभा में विधायी बहुमत है, जो सरकार के गठन की शर्त होती है। यह प्रयोग बहुत जल्द विफल साबित हुआ क्योंकि कांग्रेस ने साधारण से मुद्दों को तूल देकर अपना समर्थन वापस ले लिया। अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एन.डी.ए.) सरकार (1999-2004) और मनमोहन सिंह की कांग्रेस के नेतृत्व वाली युनाईटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार (2004-2009) ने साबित किया कि गठबंधन की सरकार भी पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सकती हैं। यहां तक कि 2009 में मनमोहन सिंह ने कांग्रेस की बदौलत बड़े अंतर से जीत हासिल करी ही और साथ ही पहली अवलंबी संघीय गठबंधन सरकार के मुखिया बनें जो एक बार फिर से अगले पांच साल के लिए चुनी गई थी।

खैर, इतिहास केवल यह ही याद नहीं रखता कि कोई इंसान क्या है या क्या था, बल्कि यह भी याद रखता है कि किसी ने क्या किया या कोई क्या करता है। दूसरे शब्दों में, इतिहास में किसी इंसान की जगह का उसकी उपलब्धियों या विफलताओं से पता चलता है। अगर इस तरह देखा जाए तो हम मनमोहन सिंह को किस लिए याद रखेंगे? यहां सेवामुक्त होने वाले प्रधानमंत्री की भारी कमियां नजर आती हैं। बारू कि किताब आम होने से पहले ही यह बात साफ देखी जा सकती थी कि मनमोहन सिंह अपने अधिकारों का बलपूर्वक प्रयोग नहीं कर पा रहे हैं। वे एक खराब वक्ता साबित हुए। वे विश्वास और स्पष्टता की भावना तक दिखाने में नाकाम रहे जो एक अच्छे नेता के गुण होते हैं। ये सभी गुण जो उन्हें विशेष बना सकते थे, न तो कांग्रेस और न ही पार्टी अध्यक्षा की संदिग्ध राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति से उत्पन्न हुए।

बारू ने जरूर कहा है कि, अपने पहले कार्यकाल के दौरान, मनमोहन भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के लिए अपनी सरकार को दांव पर लगा और कम्युनिस्टों के यूपीए छोडऩे के बावजूद, किसी पर्वत की तरह अड़े रहे थे। जहां तक मेरी राय है यह आधा सत्य है। अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की योजना पिछली वाजपेयी सरकार के समय ही बना ली गई थी, ऐसा तो मनमोहन भी कई बार भाजपा का समर्थन हासिल करने हेतु कह चुके हैं। दूसरा, अगर यह परमाणु समझौता मनमोहन के लिए इतना महत्वपूर्ण था तो उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान संसद द्वारा पारित बकवास परमाणु समझौते के उत्तरदायित्व परिच्छेद के कारण क्यों ध्यान नहीं दिया गया, इसका स्पष्टीकरण कौन देगा। अगर सिंह में दृढ़ विश्वास होता तो वे भाजपा द्वारा उत्तरदायित्व परिच्छेद के बताए गए विषयों का पुरजोर विरोध करते। उत्तरदायित्व परिच्छेद के विषय इतने भयावह हैं कि उसकी वजह से अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत परमाणु बाजार में अकेला पड़ गया है।

इसी तरह सिंह अपने उन मंत्रियों और नौकरशाहों- जो सोनिया से सीधे तौर पर डील करते हैं से निबटने की हिम्मत नहीं जुटा सके।

यह सोचा नहीं जा सकता है की किसी भी देश का प्रधानमंत्री ये कहे, वो भी उच्चतम न्यायालय में, कि पीएमओ के अधिकारी उनकी जानकारी के बिना 2 जी घोटाले या कोयला घोटाले की फाइलों को देखते हैं और उनके अधिकारियो के हरकतों के लिए वो जिम्मेदार नहीं हैं। मुद्दा यह है की मनमोहन एक मूक दर्शक की भांति सत्ता के शीर्ष प्रधानमंत्री के संस्थान को ढहते हुए देखते रहे।

मनमोहन सिंह को अपने प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव, जिन्हे मैं इस देश का अब तक सबसे सशक्त प्रधानमंत्री मानता हूं, से कुछ सीख लेनी चाहिए थी। राव ने एक अल्पमत सरकार को पांच साल तक चलाया था जबकि वो भी सिंह की ही तरह सोनिया के चुने हुए थे। लेकिन उनकी उपलब्धियां देखिये। जब राव प्रधानमंत्री बने तब देश दिवालियेपन के कगार पर था। ये वो ही थे जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को उदारीकरण की तरफ बढ़ाया और इस काम के लिए उन्होंने एक नौकरशाह को वित्त मंत्री के रूप में चुना, जो कोई और नहीं, मनमोहन सिंह थे। सिंह को चुनने के लिए राव ने सोनिया की इजाजत नहीं मांगी थी।

प्रधानमंत्री के नाते राव में स्पष्टता और हिम्मत थी जिससे वह जनता के साथ सीधे संवाद कर सकते थे उन्होंने देश के नाम अपने संबोधन में कहा था ”हम अर्थव्यवस्था की समस्याओं से निबटने के लिए निर्णायक रूप से ढृढ़ हैं। यह सरकार त्वरित औद्योगीकरण के रास्ते में आने वाली हर रुकावट को समाप्त करने के लिए प्रतिबद्ध है। उभरते वैश्विक अर्थव्यस्था द्वारा उपलब्ध मौको का फायदा उठाते हुए हम भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्त्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक बनाने को लेकर काम करेंगे। हम अपनी विकास की गति को बढ़ाने, उन्नत तकनीक और अपने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विदेशी प्रत्यक्ष निवेश का स्वागत करते हैं। हम विदेशी निवेश के रास्ते में आने वाले हर रुकावट को खत्म करेंगे। एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत हमारी औद्योगिक नीति तैयार की जाएगी जो की एक जीवंत अर्थव्यवस्था के हमारे सपने को पूरा कर सके’’। अगर भारत आज दुनिया की नजरो में कुछ करने वाला देश मन जाता है तो इसका पूरा श्रेय राव को जाता है। एक मौलिक विश्लेषण के अनुसार एक सशक्त प्रधानमंत्री वो नहीं होता जो मुश्किल तंत्र की कठिनाइयों से डर जाये बल्कि वो होता है जो उन्ही कठिनाइयों को साधन बना नीति निर्धारण और सरकार प्रबंधन के लिए अच्छे निर्णय ले सके।

यही राव ने किया, प्रधानमंत्री और अपने पार्टी के नेता होने के अधिकारों पूरा उपयोग करते हुए। उन्हें अच्छी तरह से पता था की लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री की सत्ता पर पकड़ उसके बहुमत वाली पार्टी के लीडर होने के नाते होती है और जो प्रधानमंत्री इस पकड़ को छोड़ देता है, उससे सरकार चलाना मुश्किल होता है। इसका यह मतलब नहीं है की एक प्रभावशाली प्रधानमंत्री अपनी ही पार्टी या पार्टी अध्यक्ष की अवहेलना करेगा, बल्कि इसका मतलब यह है की प्रधानमंत्री की इच्छाओं को प्रतिबिंबित होना चाहिए पार्टी के अंदरूनी निर्णय निर्धारण में। अगर किसी नीति के लिए प्रधानमंत्री ने कोई निर्देश जारी किया है और उस पर कोई कानून आना है तो पार्टी से कुछ उत्तम विचार आने चाहिए। दुर्भाग्य से मनमोहन सिंह के 10 साल के प्रधानमंत्री कार्यकाल में ऐसा कुछ हुआ नहीं इसलिए उन्हें इस देश के सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का अयोग्य शिष्य कहा जा सकता है।

प्रकाश नंदा

Что такое Nofollowчто такое чистка зубов у стоматолога

Leave a Reply

Your email address will not be published.