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उम्मीदों की लहरों पर सवार मोदी

लोकसभा चुनावों की धमक के साथ ही एक सवाल खड़ा हुआ था। पांच चरणों के मतदान के बाद भी वह सवाल आज तक खड़ा है और लगता है 16 मई को परिणाम आने तक यह सवाल खड़ा ही रहेगा। इन चुनावों में यह सवाल लोगों की चर्चा के केन्द्र में सबसे अधिक चर्चित रहा है। यह सवाल है-‘मोदी प्रधानमंत्री बन जाएंगे?’ अब भी जिस किसी से कोई भी हो, या तो चर्चा इस सवाल से शुरू होती है, या फिर घूम फिर कर इसी सवाल पर आ जाती है- ‘क्या मोदी की लहर है?’

सब जानते हैं कि इस सवाल का सीधा जवाब कोई नहीं है। कोई कह दे कि मोदी की लहर चल रही है, तो उसकी इस राय की कोई काट नहीं है। और यदि कोई इससे इंकार कर दे कि मोदी की लहर नहीं चल रही तो भी उसकी बात को काटने का कोई ठोस आधार नहीं है।

अब यदि भाजपा के सीनियर नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने ही कह दिया कि– ‘मोदी की लहर नहीं, भाजपा की लहर है’ तो मोदी को खुद लोगों को समझना पड़ा कि भाजपा हो या मोदी, हैं तो दोनों एक ही। भाजपा को ‘मां’ समान बताते हुए मोदी ने सफाई दी कि कोई बेटा मां से बड़ा कैसे हो सकता है।

मोदी के साथ मजबूती से खड़े पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी इस संबंध में स्पष्टता से कहा है– ‘भाजपा और मोदी में क्या अंतर है? भाजपा ने बहुत सोच समझ कर नरेन्द्र भाई मोदी को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित किया है। इसमें किसी को न कोई शक होना चाहिए और न ही संशय। पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते अधिकृत तौर पर मैं यह कह सकता हूं।’

मोदी का स्वभाव कैसा भी हो, लेकिन वह हालात को अपने पक्ष में करना जानते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी खूबी है। इसी खूबी ने उन्हें अब तक जबर्दस्त तूफानों में भी अपनी किश्ती खेना सिखाया है। वह तूफानों के चलते अपनी किश्ती किनारे पर नहीं लाते, बल्कि तूफानों में भी अपनी किश्ती आगे बढ़ाते रहे हैं।

वैसे यदि इन चुनावों में मोदी की अब तक की यात्रा पर गौर करें तो स्पष्ट होगा कि भाजपा इस चुनावी संग्राम में मोदी को ही अपना आइकन बना कर उतरी है। चुनावों की पूरी रणनीति मोदी को केन्द्र में रख कर बनाई गई है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनावी प्रचार अभियान तक मोदी केन्द्र में रहे हैं। भाजपा के कार्यकर्ता हों या उसके समर्थक, सभी मोदी के लिए वोट मांग रहे हैं। इस वक्त यह चर्चा कोई नहीं कर रहा है कि राहुल गांधी या अन्य कोई नेता प्रधानमंत्री बनेगा या नहीं। यह चर्चा भी नहीं है कि यदि मोदी नही तो कौन होगा देश का अगला प्रधानमंत्री। इस बात की भी चर्चा नहीं है कि यदि भाजपा को मोदी के नाम पर 272 सीटें नहीं मिलीं तो मोदी क्या करेंगे। चर्चा मोदी के प्रधानमंत्री बनने के सवाल से शुरू होकर वहीं समाप्त हो जाती है। वैसे भी मोदी ने लोकसभा में अकेले दम भाजपा के लिए सीटें प्राप्त करने का लक्ष्य बढ़ा देने से एनडीए के बारे में भी चर्चा को विराम लग गया है। मोदी का लक्ष्य अब लोकसभा में 300 सीटें प्राप्त करने का है। इसके बाद चर्चा यह नहीं है कि एनडीए सत्ता की तिलस्म खोलने के 272 के आंकड़े तक कैसे पहुंचेगा, बल्कि अब चर्चा यह हो रही है कि मोदी का अगला कदम क्या होगा।

मोदी के नाम पर भाजपा का बटन क्यों दब रहा है? इस सवाल के जवाब में राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मोदी युवा नेता हैं जो देश के युवाओं में जोश भरने का दम रखते हैं। देश की गिरती अर्थव्यवस्था के समक्ष गुजरात के विकास का उदाहरण मोदी ने पेश किया है, जिससे देश का मतदाता बेहद प्रभावित है। जनता गुजरात जैसा विकास का मॉडल पूरे देश में चाहती है। इसके अतिरिक्त मोदी को वोट देने वालों में बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की भी है जिन्होंने मोदी को भाजपा द्वारा घोषित प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने के नाते वोट दिया। ऐसे मतदाताओं का कहना है कि यदि मोदी की जगह कोई अन्य नेता प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा का उम्मीदवार होता तो उनका वोट उसी को जाता। कुल मिला कर मोदी को उनके अपने व्यक्तित्व और गुजरात के विकास मॉडल के कारण वोट मिल रहा है, साथ ही प्रधानमंत्री पद पर भाजपा का उम्मीदवार होने के कारण जनता उन्हें वोट दे रही है। इसके अतिरिक्त एक और फेक्टर मोदी के लिए भाजपा का बटन दबवा रहा है। वह है यूपीए सरकार से वोटर का मोहभंग होना। यूपीए के खिलाफ सत्ता विरोधी फेक्टर से पैदा हुआ असन्तोष भी मोदी को बहुत अधिक लाभ पहुंचा रहा है। वास्तव में यह एक ऐसा फेक्टर है जो सारी चुनावी राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित कर रहा है।

मोदी के अपने व्यक्तित्व और गुजरात में उनके कार्यों के अतिरिक्त उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी की ओर ले जाने वालों में आरएसएस का बहुत बड़ा हाथ है। आरएसएस इन चुनावों में जिस प्रकार से खुल कर मोदी के पक्ष में खड़ा हुआ है, उससे पहले उसने ऐसा कभी नहीं किया। मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने से लेकर भाजपा की चुनावी रणनीति की बारीक से बारीक गतिविधि पर इस बार आरएसएस का अंकुश और मार्गदर्शन ही नहीं, बल्कि सक्रिय भागीदारी रही है। यहां तक कि भाजपा उम्मीदवारों के लिए वोटर को घर से निकालने से लेकर उनके पक्ष में वोट डलवाने के लिए प्रेरित करने तक की जिम्मेदारी भाजपा कार्यकर्ता के साथ आरएसएस के स्वयंसेवकों ने ली हुई है। भाजपा के मामलों में जो आरएसएस यह कहा करती थी कि उसकी भूमिका केवल मार्गदर्शन तक की है, निर्णय लेना और उन्हें लागू करना, भाजपा की खुद की जिम्मेदारी है, वही आरएसएस मोदी को 7 रेसकोर्स में पहुंचाने के लिए कटिबद्ध है।

मोदी के पक्ष में इस पूरी तार्किक कथा के बाद अभी यह समझ लेना जल्दबाजी होगी कि मोदी का 7 रेसकोर्स रोड पहुंचना पूरी तरह निश्चित है। चाय का कप होठों से लग जाने के बाद भी ऐसे कारण पैदा हो सकते हैं, जिनकी वजह से चाय का घूंट भरने की बजाय घूंट भरे बगैर ही प्याला वापस रख देना पड़ता है। भाजपा की अंदरूनी दिक्कतें निपटाने के लिए तो आरएसएस मोदी के पक्ष में खड़ा है। मोदी अब भाजपा से अधिक आरएसएस के उम्मीदवार दिखाई देते हैं। लेकिन कर्नाटक का अपवाद मान कर दक्षिण भारत में मोदी की स्थिति भाजपा के मित्र दलों के बगैर मजबूत नहीं हो सकती।

वर्तमान परिदृश्य में यह तो स्पष्ट है कि चुनाव परिणामों के बाद मोदी के नेतृत्व में भाजपा सबसे अधिक सीटें जीत कर सबसे बड़ी एकल पार्टी होगी और एनडीए चुनाव पूर्व का सबसे बड़ा गठबंधन होगा। हालांकि चुनावी सर्वे तो सारे हालात मोदी और भाजपा की ओर संकेत कर रहे हैं,

लेकिन अभी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि मोदी को 7, रेसकोर्स रोड पहुंचाने के लिए भाजपा या वर्तमान स्वरूप की एनडीए 272 के जादुई आंकड़े को पार कर पाएगी। हालांकि मोदी के निकटस्थ नेता इसे काल्पनिक हालात बता रहे हैं, लेकिन भाजपा, खासकर मोदी के रणनीतिकारों को ऐसे हालात से उबरने में संकटमोचक दोस्तों की तलाश के लिए कार्ययोजना भी बना कर रखनी होगी, जो 7 रेसकोर्स पहुंचने के उनके रास्ते के गड्ढों को भर सके।

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