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कोलगेट का पर्दाफाश सांसदों की भूमिका

यह कोई साधारण बात नहीं की सांसद इस तरह के अवांछनीय हरकतों में शामिल रहते हैं। वो सांसद भी जिन पर बड़ी जिम्मेदारियां होती हैं जैसे चेयरमैन ऑफ पार्लियामेन्ट समिति, कभी कभी निगमों के अध्यक्षों से असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं और इज्जत नहीं देते हैं।

कोयला मंत्रालय में पद सभालते ही मैंने सारे अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशकों को मीटिंग के लिए बुलाया ताकि कोयले की कमी से जूझने के लिए कुछ उपाय निकला जा सके। इस मीटिंग के कुछ सुझावों में से एक सुझाव था कि छोटे और उथले कोयले के खदानों को निजी कम्पनियों को नीलाम कर दिया जाए। इन खदानों की जीवन सीमा 2 से 5 साल होती है। कोल इंडिया लिमिटेड के पास मजदूर तो थे पर उनको इधर से उधर करना बहुत ही मुश्किल काम था। साथ ही सी.आई.एल का ऐसे छोटे उपकरणों में निवेश करना कोई फायदे का सौदा नहीं था। दूसरे तरफ निजी कॉन्ट्रैक्टर्स इन्हीं उपकरणों का इस्तेमाल अन्य कार्यो में कर सकते थे। इस हिसाब से ही भारत ने कोकिंग कोल और सेंट्रल कोल फील्ड्स लिमिटेड के कुछ खदान निजी एजेंसिओं को कॉन्ट्रैक्ट पर दे दिए। इन खदानों पर काम शुरु होने के कुछ ही दिनों बाद मुझे एक फोन आया। चंद्रशेखर दुबे जो धनबाद से कांग्रेस के सांसद और पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग समिति (कोयला) के भी मेंबर थे, उन्होंने मुझे फोन किया : –

च. दु. – सेक्रेटरी साहब , आपने बिना मेरे परमिशन के कैसे बीसीसीएल के कोयले को आउटसोर्स करने की इजाजत दे दी?

मैं – दुबे जी इसमें मंत्रालय का कोई रोल नहीं होता। कंपनी की बेहतरी के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ऐसे फैसले लेते हैं।

च. दु. – नहीं, मुझे बताया गया है की आपने ऐसा आर्डर दिया है।

मैं – नहीं यह सीआईएल का फैसला था, जिसे मैंने मान लिया बस।

च. दु. – लेकिन बिना मेरी जानकारी के उन्होंने ऐसा फैसला कैसे ले लिया। मैं सांसद हूं इस क्षेत्र का।

मैं – दुबे जी मैनेजमेंट के ऐसे फैसले में कोई सांसद को क्यों कंसल्ट करेगा मैंने भी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनिया संभाली हैं और उसके लिए मैंने किसी सांसद या विधायक से संपर्क नहीं किया है कि मैं कंपनी कैसे चलाऊ।

च. दु. – ऐसा आपके आंध्र प्रदेश में होता होगा हमारे झारखंड में नहीं। आप तुरंत इस आउटसोर्सिंग को रोकिए, नहीं तो मैं रोकूंगा।

अपने शब्दों की सार्थकता साबित करते हुए दुबे के समर्थकों ने अगले ही दिन खदान को घेर लिया और काम रुकवा दिया। बीसीसीएल के चेयरमैन मिस्टर भट्टाचार्य ने मुझे फोन कर के बताया कि दुबे के समर्थक मजदूरों को खदान में जा कर काम करने से रोक रहे हैं। मैंने तुरंत झारखंड के मुख्य सचिव को फोन करके धनबाद के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को निर्देश देने की विनती की ताकि मजदूर काम कर सके। अगले दिन दुबे ने फिर मुझे कॉल किया और कहा की उसने काम बंद करवा दिया है और मुख्य सचिव को फोन करने का कोई फायदा नहीं है। कोई सचिव या डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट उसके मजदूरों को हटा नहीं सकता। जल्द ही समझ आ गया मुझे कि झारखण्ड में कोई भी नौकरशाह कोयला माफिया से टक्कर नहीं ले सकता। दुबे की वजह से खदान हफ्तों बंद पड़ी रही और बड़ी तादाद में कोयला जल कर बर्बाद हो गया। यह सब देख कर मुझे अपने आंध्र प्रदेश में कलेक्टर के कार्यकाल की याद आती है। इस तरह की समस्यायों के निराकरण के लिए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को खुली छूट होती थी और यहां मुख्य सचिव तक यह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि एक उद्दंड सांसद को कानूनी तौर पर सजा दिलवा सके।

बीसीसीएल के बहुत से घरों पर कुछ अति विशिष्ट लोगों का बहुत समय से अनाधिकृत कब्जा है। इन लोगों ने न सिर्फ इन घरों पर अनाधिकृत कब्जा किया हुआ है बल्कि वो बीसीसीएल की अन्य सुविधाओं जैसे मुफ्त बिजली और पानी का मजा ले रहे है। राजनीतिक संरक्षण की वजह से बीसीसीएल इनका कुछ बिगाड़ नहीं पा रही है। चुनाव जीतने के बाद दुबे ने भी बीसीसीएल के एक घर को अलॉट करवाने की मांग रखी थी, पर भट्टाचार्य ने मना कर दिया। इससे गुस्साए दुबे ने भट्टाचार्य का अपमान करना और मीडिया में उसके खिलाफ झूठे आरोप लगाने शुरू कर दिए। दुबे इन अनाधिकृत कब्जा करने वालों का संरक्षक बन गया। अपने गुंडों की मदद से उसने इन घरों को खाली करना तो दूर, उनकी गिनती भी नहीं होने दी। दुबे की हरकतों पर जो चिठ्ठी मुझे सी.एम.डी. ने लिखी उससे साफ पता चलता है कि किस तरह सांसद अपने को कानून से ऊपर मानते हैं।

सरकार की कानून को लागू करने में असमर्थता ही इन चुने हुए प्रतिनिधियों को हर लेवल पर ठेका मैनेजमेंट में दखल देने के लिए उत्प्रेरित करती है। यह हर जगह है, पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक। वो सरकार के कामकाज, निजी कम्पनियों, सार्वजनिक निगम तक कहीं भी दखल देते हैं। यह सभी देश का खून चूसने वाले नेता अपराध को बढ़ावा देते हैं साथ ही इससे इनकी अपनी एक सामानांतर अर्थव्यवस्था चलती है। धनबाद के कलैक्टर या पुलिस सुपरिंटेंडेंट भी वहां के कोयला माफिया और उनके राजनीतिक संरक्षकों से समझौता किए बगैर रह नहीं सकते। रिटायरमेंट के बाद जब मैं एक खदान एक्सीडेंट के मामले की तहकीकात के लिए धनबाद गया तो मुझे पता चला कि दुबे डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से उलझे हुए है। एक दिन उसने डिस्ट्रिक्ट कलेक्टोरेट में ही ताला लगा दिया। उसको इस आपराधिक कार्य के लिए सजा होनी चाहिए थी पर उसकी जगह डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट का ही तबादला कर दिया गया। और दूसरे मुख्यमंत्रियों की तुलना में, जो कि अपने ऑफिसर्स के साथ खड़े रहते थे, कोई मधु कोड़ा जैसे इंसान से ये उम्मीद नहीं कर सकता कि वो अपने उन ऑफिसर्स के साथ खड़े होते जो की कोयला माफिया से भिडऩे का माद्दा रखता हो।

पहले बीसीसीएल के कोयले की ई-नीलामी की सफलता से कोयला माफिया की चूलें तक हिल गयी। सभी कोयला कंपनियों ने यह तरीका अपनाना शुरू कर दिया, इससे इन माफियाओं के राजनीतिक संरक्षकों की अवैध कमाई पर रोक लगने लगी। जल्द ही मुझे कोयला मंत्रालय से हटाने की कोशिश शुरू हो गई। दुबे ने पहला हमला बोला। वो मुझसे पहले ही नाराज था, मेरे बीसीसीएल के सी.एम.डी का साथ देने के लिए। नवंबर के शुरुआत में दुबे ने प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखी और आरोप लगाया की मेरे स्विस बैंक में एकाउंट्स है और मैं स्विट्जरलैंड उन्हें अपडेट करने जाता हूं। दुबे सीबीआई या संसद की कमिटी से इसकी जांच चाहते थे।

दुबे की चिठ्ठी के जवाब में मैंने कैबिनेट सचिव से सीबीआई या किसी और एजेंसी से जांच करवाने की विनती की और आरोप झूठे साबित होने की स्थिति में दुबे पर एक वरिष्ठ नौकरशाह को बदनाम करने के लिए कानूनी कार्यवाही की मांग की। मैंने ये भी विनती की कि दुबे की हरकतों को स्पीकर के नजर में भी लाया जाए। दुबे के चिठ्ठी के साथ ही साथ एक और माननीय सांसद गिरधारी यादव ने भी मेरे खिलाफ चिठ्ठी लिखी।

सांसदों द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के अधिकारियों का ब्लैकमेल करने के, दुबे और गिरधारी कोई पहले उदहारण नहीं है। सांसदों द्वारा अनुचित मांग करना और न पूरा होने की स्थिति में झूठे आरोप लगाना कोई नई बात नहीं है। नरेंद्र कुमार कुशवाहा जो की ‘कैश फॉर क्वेरी’ के लिए बदनाम रहे है, कुछ वैसे ही सांसद हैं। इस बसपा के सांसद ने पूरी बेशर्मी से नॉर्थर्न कोल फील्ड्स लिमिटेड के तत्कालीन सी.एम.डी. से पैसे मांगे और न मिलने की सूरत में उनके खिलाफ शिकायत कर दी। मैंने कैबिनेट सचिव को इस ब्लैकमेल को रोकने के लिए खत लिखा। एक दूसरे खत के माधयम से मैंने सांसद के फिरौती मांगने की कोशिश को सेंट्रल विजिलेंस कमीशन (सीवीसी) के सामने लाने की कोशिश भी की। जवाब में सीवीसी ने सुझाया की सारे अफसरों के खिलाफ जो शिकायतें हैं, उनकी जांच के लिए सीवीसी को नोडल एजेंसी बनाया जाए। किसी भी अफसर के खिलाफ कोई भी स्वतंत्र जांच बिना सीवीसी के परमिशन के नहीं हो सकती।

मैंने कैबिनेट सचिव को लिखा की एक संस्थागत तंत्र होना चाहिए ताकि सांसद अपनी मर्यादाओं में रहे और सीनियर अफसरों को ब्लैकमेल न करें। मैंने सचिवों की समिति की एक बैठक बुलाने का भी आग्रह किया ताकि इस समस्या का समाधान निकाला जा सके। लेकिन मेरे रिटायर होने तक ऐसी कोई बैठक नहीं हुई।

एक और उदाहरण में सांसद फुरकान अंसारी ने आर.पी. रतोलिआ सी.एम.डी सेंट्रल कोल फील्ड्स के सामने जामताड़ा के 100 मुस्लिमों को कंपनी में लेने की मांग रखी। मांग नामंजूर करने पर अंसारी और दुबे ने प्रधानमंत्री को चिठ्ठी में लिखी

और सी.एम.डी पर झूठे आरोप लगाए। पीएमओ ने अपनी जांच की और आरोपों को झूठा पाया। पीएमओ ने मुझे अंसारी को यह बताने को कहा।

यह कोई साधारण बात नहीं की सांसद इस तरह के अवांछनीय हरकतों में शामिल रहते हैं। वो सांसद भी जिन पर बड़ी जिम्मेदारियां होती हैं जैसे चेयरमैन ऑफ पार्लियामेन्ट समिति, कभी कभी निगमों के अध्यक्षों से असंसदीय भाषा का प्रयोग करते हैं और इज्जत नहीं देते हैं। एक ऐसे ही उदहारण में अनंथ कुमार जो चेयरमैन ऑफ स्टैंडिंग समिति ऑन कोल एंड स्टील थे, सीआईएल के सी.एम.डी की बात सुने बिना ही भड़क गए। अनंथ ने उनको एक अफसर का तबादला रोकने को कहा था। उन्होंने कहा ”सीआईएल और एमसीएल के सी.एम.डी. का ऐसा व्यवहार बिलकुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मेरी पार्टी (भाजपा) यह देखेगी कि यह अपनी गलती मानें और राजनीतिक नेतृत्व का मतलब समझे। वो उस दिन को रोएंगे जब मिस्टर साहा की विनती नहीं सुनी गई, अगले 10 महीनों में (शशी कुमार सी.आई.एल. सीएमडी का बचा हुआ कार्यकाल)उन्हें ऐसा सबक सिखाया जाएगा कि वो पछताएंगे’’ कुमार की मुझे लिखी चिठ्ठी से साफ पता चलता है कि राजनीतिज्ञ अपनी मनमानी करवाना और निगमों के कर्मचारियों से दुव्र्यवहार करना पसंद करते हैं।

जो अधिकारी अपने हितों को साधने के लिए राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं, वो नियमों का उल्लंघन करते हैं। मिस्टर साहा को कोलकाता में बनाए रखने पर जोर दे कर अनंथ कुमार, साहा के अनाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। कुमार यह भी भूल गए कि पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग समिति के चेयरमैन होने के नाते उनसे कम से कम सभ्य और शालीन व्यवहार की उम्मीद तो की ही जाती है। शायद उन्होंने सोचा की चेयरमैन होने के नाते उनके पास आर्डर देने, धौंस जमाने और सीआईएल के सी.एम.डी को धमकाने का अधिकार है। मैंने कुमार पर कार्रवाई हेतु राज्य मंत्री द्वारा एक नोट प्रधानमंत्री को भेजा। लेकिन मुझे पता नहीं कि राज्यमंत्री ने वो नोट प्रधानमंत्री को भेजा भी की नहीं।

शिबू सोरेन के दूसरी बार इस्तीफा देने के बाद और प्रधानमंत्री के मंजूरी से कोयले की ई-नीलामी सभी कोयला कंपनियों के लिए लागू कर दी गई। महानदी कोल फील्ड्स लिमिटेड में ई-नीलामी लागू होने के बाद धर्मेन्द्र प्रधान जो की भाजपा के तल्चर से सांसद हैं मुझ से आकर मिले। वो चाहते थे कि नॉन कोर कंस्यूमर को नोटिफाएड कीमत पर कोयला बेचा जाए। मैंने उन्हें बताया कि ई-नीलामी के नोटिफिकेशन के बाद ऐसा नहीं हो सकता। इससे वो बहुत खुश नहीं हुए। ई-नीलामी के आने से कोयला बेल्ट में काले धन पर काफी हद तक रोक लग गई थी। ये सभी सांसद मेरे और सीआईएल चेयरमैन के खिलाफ हो गए। इन लोगों ने अपने गुस्से का इजहार करने के लिए पार्लियामेंट्री कंसल्टेटिव समिति का प्रयोग किया। इस समिति की अगस्त में हुई एक बैठक में प्रधान ने मेरे लिए काफी अपमानजनक बातें कहीं। राज्यमंत्री जो कि इस बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे उन्होंने प्रधान को डांटने की बजाए बोलते रहने दिया।

मेरी कोयला सेक्टर को सुधारने की इतनी कोशिश (वो भी इतने मुश्किल हालात में) के बाद एक सांसद के ऐसे शब्द पचाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। मैंने इस्तीफा देने का निश्चय कर लिया। अगले ही दिन मैने स्वैछिक रिटायरमेंट के लिए लिखा। कैबिनेट सेक्रेटरी बी.के.चतुर्वेदी को अपनी चिठ्ठी में मैंने लिखा- ‘धर्मेन्द्र प्रधान, सांसद ओडिशा के 5 अगस्त 2005 को हुई कंसल्टेटिव समिति की बैठक में किए आचरण से ये साफ पता लगता है कि हमारे संसदीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली में हम इतने घटिया स्तर तक पहुंच गए हैं कि कोई भी नौकरशाह अपनी मन-मर्यादा, इज्जत और पेशेवराना ढंग से काम कर ही नहीं सकता। ऐसे विषैले माहौल में काम करना मेरे लिए मुश्किल हो गया है, इसलिए मुझे तत्काल प्रभाव से सेवा मुक्त किया जाए। इस चिठ्ठी को ही मेरे स्वैछिक रिटायरमेंट के लिए विनती समझा जाए। इस विनती के माने जाने तक मैं 9 अगस्त 2005 से अर्जित अवकाश पर जा रहा हूं।’ 17 अगस्त 2005 को मैं प्रधानमंत्री से मिला। माफिया उनसे सांसदों द्वारा नौकरशाहों और निगमों के अधिकारियों का अपमान करने पर अपनी चिंता प्रकट करने गया था। मैंने प्रधानमंत्री से पूछा की सांसद अगर भारत सरकार के सचिवों के साथ ऐसा बरताव करते हैं तो फिर वो जिला मजिस्ट्रेटों के साथ कैसा बरताव करते होंगे। कैसे जिला के अधिकारी पारदर्शी तरीके से काम करेंगे जब उन्हें इस तरह के चुने हुए प्रतिनिधियों का ब्लैकमेल झेलना पड़ता है। प्रधानमंत्री ने अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहा कि उन्हें यह चीज हर रोज झेलनी पड़ती है। लेकिन अगर वो हर मुद्दे पर अपना इस्तीफा देते रहे तो यह राष्ट्र के हित में नहीं होगा।

मुझे नही पता की देश को मनमोहन सिंह से बेहतर प्रधान मंत्री मिलता कि नहीं मिलता अगर वो अपने मंत्रियों के द्वारा किए गए अपमान या अपने ही निर्णय को बदल पाने में असमर्थ होने पर अपना इस्तीफा दे देते। एक ऐसी सरकार का नेतृत्व करना जिसमे उनकी कहीं से राजनीतिक आधिपत्य नहीं था और 2-जी और कोलगेट की वजह से भी उनकी छवि पर असर पड़ रहा था जबकि उनके पास अपना खुद का बेदाग रिकॉर्ड था। बिना कोई समाधान दिए प्रधानमंत्री ने मुझ पर अपना पूरा विश्वास जताया और मुझे सलाह दी कि मैं स्वैछिक अवकाश की न सोच कर अपने रिटायरमेंट तक अपने पद पर बना रहूं। उनकी सलाह मानते हुए मैंने 22 अगस्त 2005 से वापस अपनी ड्यूटी जॉइन कर ली। लेकिन मुझे एक चीज साफ समझ आ गई की प्रधानमंत्री के सीमित अधिकारों को देखते हुए मुझे कोयला क्षेत्र में बदलाव की गुंजाइश रत्ती भर भी नहीं दिखती। कंसल्टेटिव समिति में हुई घटना के तुरंत बाद धर्मेन्द्र प्रधान ने प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर अपने दुव्र्यवहार का औचित्य बताया। पीएमओ ने मुझसे इस मुद्दे पर मेरे विचार मांगे जो कि कोयला मंत्रालय के एक मेमोरेंडम की शकल में मेरे पास आया। यह तरीका अपने आप में बहुत कुछ बतलाता है। ये दिखाता है कि हमारे चुने हुए प्रतिनिधि कितने अनभिज्ञ, प्रतिशोधी और असंयमित हो सकते हैं। प्रधान ने मुझे सीआईएल चेयरमैन के व्याख्यान पर नियंत्रण न रख पाने के लिए दोषी समझा। शायद उन्हें पता नहीं था कि कंसल्टेटिव समिति में हर अफसर को अपने विचार रखने की पूरी स्वतंत्रता होती है। उन्हें किसी भी मिनिस्टर या अफसर के विचारों का ध्यान रखना जरुरी नहीं होता।

अपने बचाव में प्रधान ने नेहरु के समाजवादी प्रजातंत्र का हवाला दिया जिसका उनकी पार्टी (भाजपा) का दूर-दूर तक लेना देना नहीं है। उन्हें लगा की इस मॉडल, जिससे देश कब का छोड़ चूका है के प्रतिकूल कोई विचार आ ही नहीं सकता। आर एंड आर के मुद्दे पर उन्होंने जानबूझ कर मेरे वक्तव्य का गलत मतलब निकाला। उन्होंने सोचा की इन बहानों की वजह से उन्हें एक वरिष्ठ नौकरशाह का अपमान करने का लाइसेंस मिल गया है। सभी सांसदों और विधायकों को यह समझना चाहिए कि संविधान ने उन्हें यह विशेषाधिकार सदन की गरिमा बढ़ाने के लिए दिया है। अपने दुव्र्यवहार और अनाचार से वे न सिर्फ अपनी छवि बल्कि जिस सदन का वो प्रतनिधित्व करते हैं, उसकी छवि को भी धूमिल करते है।

(भारत सरकार के पूर्व कोयला सचिव की किताब ‘क्रूसेडर और कांसपिरेटर’ [मानस पब्लिकेशन, नई दिल्ली] के कुछ अंश)

पी. सी. परख

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