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कुनबा-परस्ती में कांग्रेस

रॉबर्ट वाड्रा कौन है? कौन है दहयाभाई पटेल? पूरा देश जानता है कि राबर्ट वाड्रा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद हैं और करोड़पति बिजनेसमैन हैं जो हाल तक गलत कारणों से खबरों में रहे। लेकिन वर्तमान पीढ़ी, और यहां तक कि राजनेता भी दिमाग पर पूरा जोर डालने के बाद भी दहयाभाई पटेल को याद नहीं कर पाएंगे।

आरोप है कि रॉबर्ट वाड्रा के लिए भूपिन्दर सिंह हुडा के नेतृत्व में कांग्रेस की हरियाणा सरकार ने उदारता दिखाई। जब कथित घोटाला सामने आया तो उसकी जांच करने की मांग उठी। जांच का परिणाम एक ईमानदार आईएएस अधिकारी अशोक खेमका की तलाश तक पहुंची जो पोस्टिंग के लिए अब दर-दर भटक रहा है।

अब आते हैं दहयाभाई पटेल पर। वह देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लबभाई पटेल के बेटे हैं। उनके पास केन्द्रीय गृह मंत्रालय का प्रभार भी था। दहायाभाई व्यवसाय से इलैक्ट्रिक कांट्रेक्टर थे और उनकी शैक्षणिक योग्यता एक इलैक्ट्रिक इंजीनियर की थी। विभाजन और आजादी से पूर्व अविभाजित भारत में दहयाभाई का कराची, बम्बई और अहमदाबाद में बिजनेस था।

इस कथा के लिए मामले को सही परिप्रेक्ष्य में रखने के लिए, मुझे जल्दी से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दिए गए बयान को याद करने दीजिए। इन दोनों ने हाल ही में कहा था कि सरदार पटेल कांग्रेस के थे और उन्हें इस बात पर गर्व है कि वे उस पार्टी से जुड़े हैं, जिससे सरदार पटेल जुड़े थे।

लेकिन क्या वर्तमान कांग्रेस का आचार-व्यवहार, खासतौर पर रॉबर्ट वाड्रा के संदर्भ में, उन्हें गर्व महसूस कराता है या उनका सिर शर्म से झुका देता है? पूरा कांग्रेसी नेतृत्व और यूपीए सरकार ने उदासी चुप्पी साध ली है। हरियाणा में जब वाड्रा से जुड़ा भ्रष्टाचार सामने आया तो मंत्रियों और नेताओं सहित राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चाटुकारों के चेहरों पर बेवकूफी वाली बेशर्मी की मुस्कुराहट आ गई।

पार्टी का एक भी नेता या सरकार में मंत्री ऐसा नहीं था जिसके पास इतनी नैतिकता होती कि वह सोनिया गांधी से अपने दामाद को जमीन की नकली डील करने में संयम बरतने के लिए कह सके, जो कि पार्टी की बची-खुची विश्वसनीयता और छवि को नष्ट कर रही है।

दूसरी ओर उन्होंने यह कह कर वाड्रा की लैंड डीलिंग को न्यायोचित ठहराने की कोशिश की कि वाड्रा एक बिजनेसमैन है और कांग्रेस पार्टी या कांग्रेस नीत यूपीए को किसी के व्यक्तिगत मामले से कुछ लेना-देना नहीं है।

लेकिन किसी एक के पास भी इस बात का जवाब नहीं था कि जब अशोक खेमका की जांच में एक के बाद एक दस्तावेज सामने आ गए जिनसे यह सिद्ध हुआ कि नियमों को बदला गया है, नियमों की धज्जियां उड़ा दी गई हैं, और कानून की अनदेखी की गई है तथा रॉबर्ट वाड्रा को लाभ पहुंचाने के लिए भूपिन्दर सिंह हुडा के नेतृत्व में हरियाणा कांग्रेस सरकार ने मंत्रिमंडल को दब्बू बना दिया गया। दूसरी ओर सरदार वल्लभ भाई पटेल का अपने बेटे दहयाभाई के बिजनेस में क्या रूचि थी?

मेरे पास एक ऐसे पत्र की प्रति है जो सरदार वल्लभ भाई पटेल ने तत्कालीन पुनर्वास राज्य मंत्री अजीत प्रसाद जैन को लिखा था। 22अगस्त 1950 को लिखे इस पत्र में स्पष्ट रूप से इस प्रकार लिखा था:

”…मुझे आज प्रात: ही पता लगा है कि कराची की इलैक्ट्रिक सप्लाई कम्पनी में सामान सप्लाई करने से संबंधित उनकी दिलचस्पी के कुछ मामलों में, दहयाभाई सम्पति या शेयरों में बदलाव के प्रस्ताव के साथ आप से या आपके मंत्रालय से संपर्क कर रहे हैं। हालांकि दहायाभाई के व्यक्तिगत और बिजनेस हित उनके अपने मामले हैं और उनसे मुझे कुछ लेना देना नहीं है-मेरे लिए यह असम्भव है कि मैं उन्हें अपने हितों की रक्षा करने या उन्हें बढ़ाने से रोक सकूं।

मैं केवल यह चाहता हूं कि उन्हें इसलिए कोई लाभ न दिया जाए, क्योंकि वह मेरे पुत्र हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि आप उनके साथ कोई पक्षपात ना करें और यदि आप या आपका मंत्रालय उनके किसी अनुरोध या ज्ञापन पर विचार करता है तो वह पूरी तरह से निष्पक्ष और पूरी तरह से श्रेष्ठता के आधार पर होना चाहिए। यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि उनसे मेरा कुछ लेना देना नहीं है…’’

सरदार इस संबंध में पूरी तरह से स्पष्ट थे कि केन्द्र सरकार उनके बेटे के बिजनेस हितों के संबंध में कोई पक्षपात न करे।

सरदार पटेल के 22 अगस्त 1950 के पत्र के जवाब में अजीत प्रसाद जैन का जवाब भी उतना ही अच्छा था। उसी दिन यानी 22 अगस्त 1950 को लिखे अपने पत्र में उन्होंने सरदार पटेल को लिखा:

”…आपके 22अगस्त के पत्र के लिए धन्यवाद। मुझे कभी भी तनिक भी शंका नहीं रही है कि आप चाहते हैं कि मैं मामले में पूरी तरह से अव्यैक्तिक और श्रेष्ठता के आधार पर काम करूं। इस संबंध में कुछ समय पहले ही आदेश जारी किए जा चुके हैं…।’’

भाई-भतीजावाद पर यह था सरदार पटेल और अजीत जैन का नैतिक चरित्र और नैतिक साहस। यह थी उन दिनों में कांग्रेस के दोनों नेताओं की स्पष्टता और प्रतिबद्धता।

क्या रॉबर्ट वाड्रा के मामले में डॉ. मनमोहन सिंह, राहुल गांधी, सोनिया गांधी या देश की सबसे पुरानी पार्टी या सरकार का कोई नेता इस प्रकार बोल सकता है या सरदार पटेल जैसा कदम उठा सकता है। यदि नहीं, तो यह दावा करने का क्या अर्थ है कि उन्हें उस कांग्रेस से जुडऩे में गर्व है, जिससे सरदार पटेल जुड़े हुए थे।

यह न केवल रॉबर्ट वाड्रा का मामला है जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने रहस्यमय चुप्पी साधे रखी है। हाल ही में रूस और जर्मनी की एक पत्रिका ने दिवंगत राजीव गांधी के परिवार की कहानी बताई जिसमें कहा गया था कि स्वीस बैंक में भारी मात्रा में उनका धन जमा है। सोनिया को केवल इतना करना है कि वह इसका खंडन करें और उसे बकवास बताएं या अपने परिवार के खिलाफ कलंकी और दुर्भावनापूर्ण प्रचार अभियान चलाने के लिए उन पत्रिकाओं के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करें।

इन आरोपों के बारे में देश ने सोनिया या देश के प्रथम परिवार से जो कुछ सुना, वह थी धमाकेदार चुप्पी। कम से कम इस देश के लोगों के लिए ही सही धमाकेदार खंडन की बात छोड़ो, इस संबंध में कोई कानाफू सी तक नहीं हुई। सरदार पटेल शेर थे। मनमोहन सिंह, राहुल गांधी और सोनिया गांधी और उनके नीचे हर कोई चूजे और चूहे हैं, जो संकट पैदा होने पर शरण लेने के लिए भागते हैं और सरकार से लाभ उठाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। डॉ. मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी या राहुल गांधी में से किसी को भी यह नैतिक अधिकार नहीं है कि वह सरदार पटेल का उत्तराधिकारी होने का दावा करे। नाम के लिए गांधी बने नेताओं के नेतृत्व में आज की कांग्रेस नैतिक रूप से दिवालिया है और सरदार वल्लभ भाई पटेल से दूसरे ध्रुव पर है और ध्रुव कभी नहीं मिला करते।

राहुल गांधी ने जब एक दिन यह कहा कि प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को सरदार पटेल के बारे में बोलने का कोई हक नहीं है, तो मैं अपनी हंसी रोक नहीं सका।

मुझे भारत के इस शहजादे को याद दिलाने दें कि मोदी की माताजी, जो एक घरेलू नौकरानी थीं, अपने उस बेटे के साथ निम्न-मध्यम वर्ग के घर में रहती रहीं, जिनका नाम हम अधिसंख्य लोग जानते हैं और जो गुजरात सरकार में एक प्रथम श्रेणी क्लर्क के तौर पर काम कर रहा है। इस प्रथम श्रेणी क्लर्क के बारे में हम जो जानते हैं कि उसका भाई मुख्यमंत्री है और अपने भाई या मुख्यमंत्री से बिल्कुल भेंट नहीं करता। मोदी अपनी मां या भाई से तब मिलते हैं जब वह अपने जन्मदिन पर मां का आशीर्वाद लेने घर जाते हैं।

कहां मोदी, कहां राहुल? वह प्रथम श्रेणी क्लर्क कहां है जिसका भाई मुख्यमंत्री है और वह प्रधानमंत्री बनने की प्रतीक्षा में है। और कहां रॉबर्ट वाड्रा? मैं राहुल के अंहकार और अज्ञान से चकित हूं।

एस.ए. हेमन्त कुमार

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