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राजनीतिक घोषणा पत्रों की अभिव्यक्ति

भाजपा का घोषणा पत्र कुछ अन्तरों के साथ अलग है। यद्यपि यह परिवर्तन का चार्टर है, लेकिन पार्टी को इसमें बाबरी मस्जिद ढांचा गिराए गए स्थल पर राम मन्दिर निर्माण, संविधान की धारा 370 को समाप्त करने और समान नागरिक संहिता लाने और ‘गायों के संरक्षण और संवर्धन’ के मुद्दे मजबूरन शामिल करने पड़े। इन सभी मुद्दों को गैर-राजनीतिक मानते हुए ‘सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक के तहत शामिल किया गया है। कई अनेक पार्टियों ने दायरे से बाहर आकर आयकर, टोल टेक्स, रोड टेक्स माफ करने और शिक्षित युवकों को बेरोजगारी भत्ता देने का वादा भी किया है।

एक राजनीतिक पार्टी का घोषणा पत्र उसके इरादों और योजनाओं का दस्तावेज होता है, जो यह संकेत देते हैं कि यदि वह पार्टी सत्ता में आई तो वह मौजूदा और भविष्य की स्थितियों का आकलन किस प्रकार करेगी और उसकी क्या भूमिका होगी। उसका प्रारम्भिक लक्ष्य मतदाताओं को पार्टी में तब्दील करना होगा। प्रचार सत्र वादों का मौसम होता है और सत्ता पर काबिज होने, सत्ता को बनाए रखने और पुन: सत्ता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों के पास कसमे-वादों की कभी कमी नहीं होती। चुनाव घोषणा पत्र लोगों के मस्तिष्क में उम्मीदें जगाने और परिदृष्य में वास्तव में बदलाव होने का विश्वास दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

घोषणा पत्र राजनीतिक पार्टी के अपने आकलन में कि उससे कहां गलती हुई और भविष्य की उसकी नीतियों के बारे में काफी कुछ यह स्पष्ट कर देता है। यदि हम विभिन्न भारतीय राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणा पत्रों के पैराग्राफ कट-पेस्ट करें तो वह अपने आप में एक पूर्ण दस्तावेज होगा। उनमें अधिक अन्तर की बजाय काफी समानताएं होंगी। उनके तौर-तरीकों और उनकी डिग्रियों में अधिक अन्तर होगा और राजनीति के मसौदे में कम अन्तर होगा। यह अलग बात है कि एक बार सत्ता में आने के बाद कोई पार्टी अब तक वैसा नहीं कर पाई जैसा कि उसने अपने चुनाव घोषणा पत्र में वादा किया था।

भारतीय लोकतन्त्र के इतिहास में ये चुनाव सबसे अधिक शोरगुल वाले हैं। संसद के दोनों सदनों में ही गड़बड़ है। एनडीए, शीर्ष पर कमजोर प्रधानमंत्री, भ्रष्टाचार, निष्प्रभावी शासन और लकवाग्रस्त नीतियों को कोस रही है। ‘आप’ और भाजपा सहित सभी पार्टियां ‘परिवर्तन’ का मंत्र जप रही हैं। वर्तमान चुनावों में तीन दलों-आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अखिल भारतीय अपील कर रही हैं। भाजपा का संदेश है– ”सब का साथ, सब का विकास’’। (सब की भागीदारी, सब का विकास), जब कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र का नारा दिया है– ”आपकी आवाज, हमारा संकल्प’’।

प्रत्येक ने अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्र में भ्रष्टाचार और बढ़ती कीमतों से लडऩे का वादा किया है। सभी ने अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक-निजी भागीदारी को अनुलेखित किया है। उन्होंने ‘सब के लिए स्वास्थ्य’ का वादा किया है। इस संबंध में शब्द भी सभी के समान ही हैं: ‘क्वालिटी हैल्थकेयर’’। शिक्षा के लिए सभी के वादे समान हैं। ‘आप’ और बीजेपी ने ‘लाखों नौकरियों’’ का वादा किया है, कांग्रेस अधिक स्पष्ट है। कांग्रेस 100 मिलियन लोगों को नौकरियां देने का वादा कर रही है। सभी पार्टियां खाद्य सुरक्षा का वादा कर रही हैं। अन्तर केवल आर्थिक है। हर पार्टी अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के मामलों की चैम्पियन बन रही है। तीनों पार्टियां संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का समर्थन कर रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा और समानता देने का वादा भी सभी दलों ने किया है। आतंकवाद के विरूद्ध लड़ाई के लिए भाजपा और कांग्रेस ने इंटेलिजेंस सुधारने और राज्य एजेंसियों के बीच बेहतर सहयोग व तालमेल रखने पर जोर दिया है। ‘आप’ ने नागरिकों के असंतोष के मूल कारणों को दूर करने और कठोर कानूनों को मानवीय स्वरूप देने का वादा किया है।

सभी तीनों पार्टियों ने सरकारी नियन्त्रण को कम करने के वादे के साथ उद्योगपतियों और व्यापारियों का पक्ष लिया है। भाजपा के लिए सरकारी नियन्त्रण ‘टेक्स आतंकवाद’ है। ‘आप’ ने व्यापारियों के आगे ‘ईमानदार’ शब्द जोड़ा है और हां, ‘काला धन’ का सभी ने विरोध किया है।


बहुसंख्यकों का अल्पसंख्यकों द्वारा शोषण


माक्र्स और एंगेल्स ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ की प्रारम्भिक पंक्तियां हैं–   ‘यूरोप पर एक काली छाया का साया पड़ा है-कम्युनिज्म की काली छाया। पुराने यूरोप की सभी शक्तियां इस प्रेत छाया को दूर करने के लिए एक पवित्र गठबंधन में बंध गई हैं। इनमें पोप और जार, मेटरनिक और गुइजोट, फ्रेंच रेडिकल्स और जर्मन पुलिस जासूस शामिल हैं।’’

इसे भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य के एक राष्ट्रीय घोषणा पत्र में इस प्रकार से बदला जा सकता है: ”अनेक काली छायाओं का साया भारत पर पड़ा है– साम्प्रदायिकता की काली छाया, आन्तरिक संघर्ष और बाह्य धमकी, एक पंगु अर्थव्यवस्था और स्वच्छंद मुद्रास्फीति। भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों का ‘पवित्र गठबंधन’ देश के लिए भूख, बेघर किया जाना, निराशा और कुंठा ले आया है।’’

”कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ फरवरी 1848 में प्रकाशित हुआ। वह अब भी परिवर्तन लाने में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए आवश्यक गाइडबुक है। इस मेनिफेस्टो से कार्ल माक्र्स ने फ्रेड्रिक एंगेल्स की मदद से पहली बार पूंजीवाद के आवश्यक नियम और फीचर उत्पादन और एक्सचेंज को वर्ग आधारित सामाजिक प्रणाली के तौर पर दिखाया।

यह सच है कि पूंजीवाद ने 19वीं शताब्दी के मध्य से रूप बदल लिया है, लेकिन प्रणाली के तौर-तरीके वही हैं–   बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों का और अमीरों द्वारा गरीबों का शोषण। प्रत्येक पीढ़ी के शासन के विचार हमेशा उसके शासक वर्ग के रहे हैं।

पूंजीवाद के पिछले 150 सालों की बात छोड़ो, यह विवरण तो आज के संसार के लिए पूरा फिट बैठता है। इतिहास, जैसा कि हमने देखा, वर्गों को विशेष और विशिष्ट भूमिका प्रदान करता है। वर्ग सोसायटी में राजनीतिक वर्ग सबसे बाद का और सबसे अधिक विकसित वर्ग है, जो कामगार पुरूष और महिलाओं के शोषण पर आधारित सोसायटी है।

कम्युनिज्म उत्पादन के साधनों पर साझा मालिकानाहक रखने वाली ऐसी स्टेटलैस सोशल व्यवस्था बनाने का समाजवादी आन्दोलन था, जो वर्गविहीन, धनविहीन और स्टेटलैस सोशल व्यवस्था हो। माक्र्स द्वारा बताए गए कुछ बिन्दुओं पर विचार कर देखते हैं कि वे किस प्रकार आज भी प्रासंगिक हैं। भूमि पर किसी का निजी अधिकार नहीं। प्रोग्रेसिव टेक्सजेशन (आय का पुनर्वितरण, जिनके पास अधिक है, वे अनुपातिक रूप से अधिक दें, क्योंकि एक-समान टेक्स प्रणाली कम आय वालों के लिए सजा है।)

एक राष्ट्रीयकृत सेंट्रल बैंक जिसके पास धन के वितरण का एकाधिकार हो। उत्पादन, संचार और यातायात के साधन सरकार के अधीन हों। निशुल्क शिक्षा, बाल श्रम का उन्मूलन। श्रम के लिए समान जिम्मेदारी (उत्पादन में प्रत्येक का कुछ न कुछ योगदान)।

लेकिन भारत में आज ये योजनाएं किस प्रकार बन सकती हैं? आयकर प्रणाली प्रोग्रेसिव है। अधिक कमाने वाला अधिक दर से आयकर देता है। हमारे पास एक राष्ट्रीयकृत बैंक है, जिसके पास धन के वितरण और ब्याज निर्धारण का एकाधिकार है। उत्पादन के साधन अब सरकार के अधीन नहीं हैं, लेकिन 1980 से कोयला, स्टील और पॉवर जैसी इंडस्ट्रीज का निजीकरण कर दिया गया है। संचार व्यवस्था पर अब भी सरकारी नियन्त्रण है। डाक विभाग सरकार के अधिकार में है। सभी बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार है। उन्हें भी जिनके अभिभावक निजी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा दिलाने में सक्षम हैं। बाल श्रम का उन्मूलन किया जा चुका है।


भाजपा का घोषणा पत्र कुछ अन्तरों के साथ अलग है। यद्यपि यह परिवर्तन का चार्टर है, लेकिन पार्टी को इसमें बाबरी मस्जिद ढांचा गिराए गए स्थल पर राम मन्दिर निर्माण, संविधान की धारा 370 को समाप्त करने और समान नागरिक संहिता लाने और ‘गायों के संरक्षण और संवर्धन’ के मुद्दे मजबूरन शामिल करने पड़े। इन सभी मुद्दों को गैर-राजनीतिक मानते हुए ‘सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक के तहत शामिल किया गया है। कई अनेक पार्टियों ने दायरे से बाहर आकर आयकर, टोल टेक्स, रोड टेक्स माफ करने और शिक्षित युवकों को बेरोजगारी भत्ता देने का वादा भी किया है। इन पार्टियों को पता है कि एक बार परिणाम घोषित हो जाने के बाद उनके घोषणा पत्रों को जल्दी ही भुला दिया जाएगा।

ओडिशा में 15 साल से सत्ता पर काबिज बीजू जनता दल ने सभी के लिए पक्का घर बना कर देने का वादा किया है। सपनों के सौदागरों ने यह नहीं सोचा कि राज्य की खराब आर्थिक हालत में इस असम्भव कार्य को वे कैसे पूरा करेंगे। निकटस्थ आंध्र में लोकसत्ता पार्टी ने शराब की बिक्री का राष्ट्रीयकरण करने और बिक्री नियन्त्रित करने का वादा किया है। इस पार्टी ने शराब पीने वालों के परिवारों को पेंशन देने का भी वादा किया है। हैप्पी चियर्स!

डीएमके ने आरक्षण का विरोध करने की घोषणा करते हुए कहा है कि वह सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर पिछड़े घोषित परिवारों के लिए नौकरियां रद्द कर देगी। हालांकि पार्टी ने निजी क्षेत्र में जाति-आधारित आरक्षण की वकालत की थी। पार्टी ने प्रस्ताव किया है कि जिन राष्ट्रों में तमिल काफी संख्या में रहते हैं, उन राष्ट्रों में केवल तमिलियनों को ही भारतीय राजदूत बना कर भेजा जाएगा। तृणमूल कांग्रेस का वादा है कि कलाकारों और लोकप्रदर्शकों को भत्ता और चिकित्सा बीमा दिया जाएगा। इस पार्टी का यह भी वादा है कि राज्य में बड़ी संख्या में हो रहे मानवीय अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की सुनावाई के लिए अदालत का गठन किया जाएगा।


घोषणा पत्र को बनाना


आम धारणा है कि राजनीतिक पार्टियां अपना घोषणा पत्र बनाने में बहुत मेहनत करती हैं। मैं भी ओडिशा में भाजपा का घोषणा पत्र बनाने की प्रक्रिया में शामिल था। हमें एक ऐसा दस्तावेज तैयार करने के बारे में कहा गया था, जो राज्य के संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर के एजेंडे की जानकारी देता हो।

आरम्भिक विचार-विमर्श के दौर के बाद हम सार्वजनिक राय एकत्र करने की दिशा में आगे बढ़े। इस संदर्भ में चुने हुए कुछ लोगों का ग्रुप एनजीओ, सामाजिक संगठनों, अध्यापकों, पत्रकारों, छात्रों आदि से मिला।

बहुत जल्दी ही सुझाव मिलने लगे। अनेक दबाव समूहों से ज्ञापनों और अभ्यावेदनों की बाढ़ आ गई। पार्टी मुख्यालय पर मिलने आने वाले विभिन्न समूहों की रेंज देख कर मैं अति उत्साहित था। वरिष्ठ नागरिकों, महिला संगठनों, पूर्व सैनिकों, विकलांगों के संगठनों, व्यापारियों की यूनियनों, व्यवसायियों, बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों, जानवरों के कल्याण समूहों आदि से सुझावों और मांगों से युक्त पत्र मिलने लगे। राज्य में शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के सुझाव के संबंध में मिले पत्रों की संख्या देख कर हम आश्चर्यचकित थे। लोग चाहते थे कि ओडिशा पूर्ण नशा मुक्त राज्य बने। सेक्स वर्कर्स एसोसिएशन, एलजीबीटी ग्रुप, पटरी पर सामान बेचने वाले, कूड़ा बीनने वाले, दैनिक वेतनभोगी जैसे असंगठित ग्रुप भी अपने अधिकारों के लिए जागरूक थे।

हमें इनटेक (आईएनटीएसीएच) के ओडिशा चैप्टर से एक ज्ञापन मिला, जिसमें उसके राज्य संयोजक ने राज्य की विरासत और स्मारकों के संरक्षण और परिरक्षण के लिए विशेष कानून बनाने की मांग की थी। नेत्र बैंक ‘दृष्टि दान’ ने नेत्रों का दान अधिक लोकप्रिय बनाने के लिए कानून को सरल बनाने और नेत्र बैंक खोलने का अनुरोध किया था। डाक टिकट संग्रहकर्ताओं के संघ की पूर्वी भारत की शाखा चाहती थी कि ओडिशा की राजनीतिक पार्टियां सुनिश्चित करें कि ओडिशा की शख्सियतों पर अधिक डाक टिकट जारी किए जाएंगे। (ये सभी तीनों मांगें बीजेपी ओडिशा घोषणा पत्र में शामिल कर ली गईं।) पक्षी प्रेमी क्लब चाहता था कि प्रचलित ‘इंडियन रोलर’ के स्थान पर राज्य में ‘नीली टोपी वाले कबूतर’ (ब्ल्यू कैप्ड पिजन) को ‘राज्य-पक्षी’ घोषित किया जाए। इस सुझाव पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया जा सका।

एक प्रस्ताव, जिसे मैं पारित कराना चाहता था, वह था– राज्य की राजधानी भुवनेश्वर से बदल कर ऐसे स्थान पर बनाई जाए, जो राज्य के हृदय (केन्द्र) में स्थित हो। यह सुझाव अनेक वैध कारणों के साथ आया था, लेकिन उन्हें सूचीबद्ध करने के लिए पूरे नए परीक्षण की जरूरत थी। अन्त में, हमने एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया, जो राज्य में अन्य पार्टियों द्वारा बनाए गए घोषणा पत्रों से बहुत अलग नहीं था।


तमिलानाडु में बीजेपी की सहयोगी पार्टी, एमडीएमके ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में भारत के संघीय ढांचे पर बल देने के लिए देश का नाम बदल कर ‘युनाइटेड स्टेट्स ऑफ इंडिया’ करने की घोषणा की है। पार्टी ने लिट्टे से प्रतिबंध हटाने का भी वादा किया है। बिहार में जेडी (यू) ने अपने घोषणा पत्र में भारत में प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा के लिए कानून लाने का वादा किया है। यह मुम्बई में काम करने वाले लाखों बिहारियों के लिए थोड़ी खुशी की बात है। सीपीआई-एम ने भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते को संशोधित करने की बात कहते हुए कहा है कि भारतीय समुद्र के दिएगो गार्शिया में अमेरिकी सेना से परमाणु हथियार हटाने का प्रयास करेगी। अनुभवहीन तेलंगाना राष्ट्र समिति ने नए राज्य के गठन की खुशी में सरकारी कर्मचारियों को विशेष ‘तेलंगाना बढ़ोत्तरी’ देने की घोषणा की है। आम आदमी पार्टी के घोषणा पत्र में उसके मूलभूत मुद्दे– भ्रष्टाचार के उन्मूलन पर जोर दिया गया है। वह ‘खाद्य, कपड़ों और मनोरंजन’ के लिए जानवरों की गरिमा के लिए प्रतिबद्ध है। पार्टी युवाओं को राजनीति में आने का प्रोत्साहन देने के लिए मानना है कि चुनाव लडऩे की योग्य आयु 25 साल से घटा कर 21 साल करने के पक्ष में है। और हां, घोषणा पत्र में मीडिया को नियन्त्रित करने के प्रावधान भी रखे गए हैं। लाखों दलितों की मसीहा समझने वाली बहुजन समाज पार्टी ने अपना चुनाव घोषणा पत्र जारी ही नहीं किया। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने कहा है कि– ”हम घोषणा पत्र जारी नहीं करते, क्योंकि हम कभी पूरे न होने वाले खोखले दावे करने की बजाय लोगों के लिए वास्तविक विकास कार्य करने में विश्वास करते हैं।’’

तेलुगू देशम पार्टी के दिवंगत अध्यक्ष एन.टी. रामा राव अपनी पार्टी के घोषणा पत्र के केवल एकमात्र पैराग्राफ के आधार पर सत्ता में आए थे जिसमें रोटी, कपड़ा और मकान का वादा किया गया था।

क्या चुनाव घोषणा पत्र कोई महत्व रखता है? पढऩे में वे सब एक जैसे प्रतीत होते हैं। उनमें अन्तर केवल प्रस्तुती का होता है। यद्यपि इस बार विभिन्न पार्टियों के थिंक टैंक ने इस बात का ध्यान रखा कि घोषणा पत्र चुनावों के बाद उनके खिलाफ कैसे प्रयोग हो सकते हैं।

अन्य कारण यह भी रहा कि चुनाव आयोग ने चुनाव घोषणा पत्र को भी आदर्श आचार संहिता के दायरे में शामिल कर दिया। जुलाई 2013 में उच्चतम न्यायालय ने मुफ्त वस्तुएं बांटने की वैधता की सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग को परामर्श जारी किया था।

घोषणा पत्रों के अप्रासंगिक होने का एक कारण केन्द्र में 1996 से गठित होने वाली सरकारों की प्रकृति भी है। हर गठबंधन सरकार का गठन कम से कम आधा दर्जन राजनीतिक पार्टियों के समर्थन और उनकी भागीदारी से हुआ है। आम तौर पर गठबंधन में सबसे बड़ी सरकार का चुनाव घोषणा पत्र का पूरी तरह अवमूल्यन नहीं भी होता, तो भी उसका प्रभाव मन्द जरूर हो जाता है। पार्टियों का चुनाव पूर्व घोषणा पत्र का स्थान चुनाव बाद बनाया गया न्यूनतम साझा कार्यक्रम ले लेता है। 16मई 2014 के बाद बनने वाली अगली सरकार मिलीजुली पार्टियों की होगी, जिसमें 25 से अधिक पार्टियां शामिल हो सकती है। इससे पता लगता है कि राजनीतिक पार्टियां और मतदाता उदासीन हो गए हैं, यहां तक कि वे घोषणापत्र में किए गए वादों के बारे में संशयवादी हो गए हैं। केन्द्रीय वित्त मंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल में डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा था कि घोषणा पत्र कोई नहीं पढ़ता।

उत्कल संस्कृति विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलाधिपति डॉ. बिमलेन्दु मोहन्ती का दावा है कि– ”भारत में मतदाता घोषणापत्र के आधार पर वोट नहीं डालता और वे केवल मध्यम वर्ग, राजनीतिक पार्टियों और मीडिया के लिए होते हैं। भारतीय मतदाता धर्म, जाति और पंथ के आधार पर वोट करते हैं।’’ चुनावी घोषणापत्र विश्व के परिपक्व लोकतन्त्रों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वोटर और पार्टियां– दोनों ही घोषणा पत्रों को गंभीरता से लेते हैं। यूके में घोषणापत्र में जिन मुद्दों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई जाती है, उन्हें उच्च सदन में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसी प्रकार से अमेरिका में मतदाता घोषणा पत्रों के आधार पर उम्मीदवारों को तोलते हैं।

उत्कल विश्वविद्यालय में सोशयोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अनूप दास का कहना है कि– ”राजनीतिक चुनाव घोषणा पत्र आमतौर पर अवास्तविक दस्तावेज होता है। वे जल्दी में बनाए जाते हैं और वादों को पूरा करने के लिए उनमें बजट को ध्यान में नहीं रखा जाता। राजनीतिक पार्टियां ऐसे वादे करती जाती हैं जो सामान्यतौर पर संभव नहीं होते। जैसे लाखों नौकरियां और प्रत्येक के लिए पक्के घरों को निर्माण।’’

दुर्भाग्यवश, भारत में घोषणा पत्रों में किए गए वादों को पूरा करने पर अब भी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

आम विश्वास है कि सत्तारूढ़ पार्टी यदि घोषणा पत्र में किए गए वादों को पूरा करने में असफल रहती है, तो अगले चुनावों में उसे सत्ता से बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन यह अपर्याप्त है। पांच साल मुद्दों के घालमेल के लिए पर्याप्त होते हैं और जनता की याददाश्त बहुत कम होती है।

राजनीतिक पार्टियों को जवाबदेह बनाने का समय आ गया है। हमें लोकतान्त्रिक आदर्शों को निभाने की जरूरूत है। इस संबंध में राजनेताओं को सक्रिय भूमिका निभाने की जरूरत है। उन्हें घोषणा पत्र तैयार करते हुए सावधान रहना चाहिए, क्योंकि नए मतदाता अधिक जानकारी वाले निर्णय लेते हैं। जमीनी स्तर तक पहुंचा प्रिंट और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया यहां पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मतदान करने से पहले 50 प्रतिशत मतदाता घोषणा पत्र देखने और उसका विशलेषण करने में सफल हो जाता है।

अंत में कहा जा सकता है कि आम आदमी जो कुछ चाहता है, उसका निचोड़ चार पंक्तियों की प्रतिबद्धता है:

  • रोटी, कपड़ा और मकान।
  • बिजली, सड़क और पानी।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य।
  • सुरक्षा, न्याय और शान्ति।

अनिल धीर

 

 

 

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