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भारतीयता की ठेकेदारी

‘अचानक से सेकुलरवाद को खतरा बढ़ गया है।’ जब-जब कांग्रेस को अपनी कुर्सी खतरे में नजर आने लगती है, तो सेकुलरवाद को बचाने की गुहार लगनी शुरू हो जाती है। सोमवार को तमिलनाडु में एक जनसभा में राहुल गांधी ने कहा कि– ‘दिल्ली में ऐसी सरकार नहीं आनी चाहिए, जो हिन्दू को मुसलमान से लड़ाए।’ कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी तो इससे भी आगे चलीं गईं। उन्होंने तकरीबन तीन मिनट के अपने ‘राष्ट्र के नाम संदेशनुमा विज्ञापन’ में इस चुनाव को देश तोडऩे वालों और देश जोडऩे वालों के बीच की लड़ाई करार दिया। उन्होंने ‘भारतीयता और हिंदुस्तानियत’ को बचाने की अपील की।

मुझे इस पर आपत्ति नहीं है कि वह इन दोनों शब्दों को ठीक से बोल भी नहीं पायीं। हालांकि पिछले तकरीबन 10 साल से देश की ‘वास्तविक प्रधानमंत्री’ और सत्ता की कुंजी हाथ में रखने वाली होने के नाते देश उनसे यह अपेक्षा तो कर ही सकता है कि वह इसके नाम को ठीक तरीके से बोलें! उनकी उच्चारण संबंधी अशुद्धियों को तो अनदेखा किया जा सकता है, परंतु ‘भारतीयता की ठेकेदारी’ के उनके दावे को नजरअंदाज करना मुश्किल है। पिछले दस साल में यूपीए, खासकर कांग्रेस ने ऐसा क्या किया कि सिर्फ उसी को इस देश का रक्षक मान लिया जाए? और नरेंद्र मोदी ने इस दौरान ऐसा क्या किया, जिस कारण उन पर तोहमत लगाई जाए?

अब तक की सारी खबरों और संकेतों के मुताबिक कांग्रेस अब तक के सबसे खराब चुनावी प्रदर्शन की और बढ़ रही है। देश का तकरीबन हर तबका उससे नाराज नजर आ रहा है। बेहतर होता कि सोनिया गांधी इन संकेतों का गंभीरता से विश्लेषण करतीं, न कि विपक्ष पर ऐसे आरोप लगातीं, जो उनके पद और गरिमा के अनुरूप नहीं है। देश का जनमानस यूपीए से सिर्फ इसलिए नाराज नहीं है कि देश का राजकाज उसने चौपट कर दिया, अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया और भ्रष्टाचार की सारी सीमाओं को लांघ दिया।

देश इसलिए भी नाराज है कि यूपीए ने लगातार समाज को बांटने की कोशिश की, देश की सुरक्षा के साथ समझौता किया और राष्ट्र के दूरगामी हितों की चिंता नहीं की। प्रधानमंत्री के उस बयान को याद कीजिए कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। क्या यह बयान समाज में द्वेष बढ़ाने वाला नहीं है? सच्चर कमीशन और रंगनाथ आयोग का गठन क्या पूरे देश में विश्वास पैदा करने वाला कदम था? आतंकी घटनाओं के बाद सुरक्षा बलों पर भरोसा न करके उल्टे सीधे बयान देने वाले अपने शीर्ष नेताओं पर लगाम न कसके उन्होंने समाज को लगातार क्या संदेश दिया?

मुंबई में आतंकी हमलों के बाद हेमंत करकरे के बारे में दिग्विजय सिंह के बयान और दिल्ली में बाटला हाउस एनकाउंटर का जिस तरह से कई बड़े नेताओं द्वारा हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा बनाने की कोशिश करना क्या जिम्मेदारी का काम था? और तो और, इस सरकार ने तो भारतीय सेना को भी साम्प्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश की। आज सुरक्षा के मामले में देश के जो हालात हं क्या किसी से छिपे हुए हैं? नौसेना में एक के बाद एक हादसे हो रहे हैं। थल सेना में जितने विवाद पिछले दिनों में हुए, उतने तो पहले कभी नहीं हुए।

आंतरिक सुरक्षा के मामले में माओवादी हिंसा पर तो स्वयं सोनिया गांधी सरकार को पीछे धकेलती रही हैं। जब तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् ने माओवादी हिंसा के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश की थी, तो सोनिया ने खुद कांग्रेसजन के नाम खुला पत्र लिखकर माओवादियों की हिमायत की थी। तो फिर सोनिया गांधी किस हक से कह रहीं हैं कि अगर वह सत्ता से हट गईं, तो भारतीयता खतरे में पड़ जाएगी?

देश के कुल कितने राज्यों में आज कांग्रेस की सरकार है – महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल, असम, अरुणाचल, केरल और उत्तराखंड बस। तो क्या कहना चाहती है कांग्रेस? क्या बाकी देश में भारत और भारतीयता खतरे में है? क्या यह माना जाए कि भाजपा और उनके नेताओं की देश के प्रति प्रतिबद्धता को सोनिया गांधी की कांग्रेस ईमानदार नहीं मानतीं? सोचिए, तो कितना गंभीर आरोप है यह? होना तो यह चाहिए था कि भाजपा उनके इस बयान के खिलाफ उन्हें चुनाव आयोग में ले जाती और माफी मांगने को कहती।

मगर शायद मामले को बढ़ाकर भाजपा सोनिया को कोई भाव नहीं देना चाहती। कांग्रेस को चाहिए कि वह अपने गिरेबान में झांके, न कि दूसरों को भारतीयता और उनकी प्रतिबद्धता पर उपदेश दे।

उमेश उपाध्याय

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