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आओ चले एक परिपक्व लोकतंत्र की ओर

मोदी की प्रचार शैली ही नहीं बल्कि मोटे तौर पर उनकी पार्टी की चुनावी प्रचार रणनीति भी देश के विकास के दायरे में रही है। शायद यही कारण है कि मतदाताओं को मोदी आज देश के विकास पुरूष के तौर पर नजर आते हैं। इसी का प्रभाव है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक रहे पिछड़े और दलित भी आज मोदी के साथ खड़े दिख रहे हैं।

देश में 24 अप्रैल को 12 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में कुल मिला कर 117 सीटों पर मतदान होने के साथ ही इन चुनावों का दो-तिहाई भाग पूरा हो गया है। नौ चरणों में हो रहे आजाद भारत के इतिहास के अब तक के सबसे विशाल आम चुनावों का यह छठा चरण था, जिसमें कुल 2076 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। देश में जब छठे चरण का मतदान अपने चरम पर था, उस वक्त ‘कमल रथ’ पर सवार भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी बाबा विश्वनाथ की नगरी और भगवान बुद्ध की उपदेश-स्थली वाराणसी में 108 बटुकों से आशीर्वाद ग्रहण कर अपना नामांकन पत्र भर रहे थे। एक दिन पहले अपने समर्थकों और विरोधियों के बीच आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी मोदी के मुकाबले अपना नामांकन पत्र भरा था। गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल मानी जाने वाली इस नगरी में हो रही राजनीतिक उठापटक पर अब सारे देश की निगाहें आ टिकी हैं। मोदी के विरोध में खड़े उम्मीदवारों और उनकी पार्टियों ने देश के प्रधानमंत्री पद के भाजपा के उम्मीदवार को हराने के लिए वाराणसी के मतदाताओं से पुरजोर अपील की है। यह अपील करने वालों में वामपंथ से प्रभावित लेखक, कलाकार, सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता भी शामिल हैं। वाराणसी के उम्मीदवार इस अपील को लेकर काफी परेशान हैं। इस अपील को मान कर वाराणसी का मतदाता 7 रेसकोर्स की दौड़ में अन्यों से काफी आगे चल रहे मोदी को काशी में हराना भी चाहे तो, उसकी दिक्कत है कि वह लोकसभा में वाराणसी का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार सौंपे किस को? क्योंकि मोदी को हराने वालों ने अपील में यह नहीं बताया कि मोदी को हरा कर आखिर वे किस को जिताना चाहते हैं। वाराणसी में मोदी के मुकाबले अपना भाग्य आजमाने वालों में केजरीवाल के अतिरिक्त मुख्यरूप से कांग्रेस के अजय राय, समाजवादी पार्टी के कैलाश चौरसिया, बहुजन समाज पार्टी के विजय जायसवाल आदि शामिल हैं। ये सब मोदी को हराना तो चाहते हैं, लेकिन उनकी यह चाहत वास्तविकता से दूर केवल उनकी कल्पनाओं का हिस्सा बनी दिखती है। सब अपने खेमों से ही मोदी विरोधी युद्ध का संचालन कर रहे हैं। हालांकि पिछली बार भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी से मात्र 18 हजार वोटों से हारने वाले मुख्तार अंसारी ने खेमेबंदी समाप्त करने की ओर पहल करते हुए मैदान से हटने की घोषणा की थी, लेकिन कौमी एकता दल के इस बाहुबली उम्मीदवार की यह कोशिश कुछ सिरे नहीं चढ़ सकी। कौमी एकता दल के सुप्रीमो अफजल अंसारी ने मोदी को हराने के लिए अन्य पार्टियों को चिठ्ठी लिखकर सब दलों का साझा उम्मीदवार खड़ा करने का अनुरोध किया था। लेकिन इन पार्टियों ने अफजल अंसारी के पत्र का जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझा। बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उनकी पार्टी ‘एकले चलो’ की रणनीति पर चलेगी। इन चुनावों में न तो वह किसी से समर्थन लेगी, न किसी को समर्थन देगी। वैसे वाराणसी की जनता में इस प्रकार की चर्चा भी है कि अन्य पार्टियों की हेकड़ी से उपजे रवैये से नाराज अंसारी अब मोदी के समर्थन में आ गए लगते हैं। सभी पार्टियां अपना सीधा मुकाबला मोदी से बता रही हैं और मोदी को हराने का आह्वान देते हुए अन्य पार्टियों को अपने पक्ष में खड़ा होने का निमन्त्रण दे रही हैं। समाजवादी पार्टी के कैलाश चौरसिया बाबा विश्वनाथ की नगरी में पानवालों के भरोसे खड़े दिख रहे हैं, तो कांग्रेस उम्मीदवार अजय राय स्थानीय होने का लाभ उठाना चाहते हैं। बहुजन समाज पार्टी के विजय जायसवाल पार्टी के वोट बैंक पर अपनी उम्मीदें टिकाए हैं।

नौ में से छह चरणों का मतदान सम्पन्न होने के बाद ये विशाल चुनावों का उत्सव अब समापन की ओर हैं। केवल तीन चरण ही बाकी हैं। अब तक के चुनावों ने देश के समक्ष चुनाव आयोग के अधिकारों को लेकर भी एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। यह सवाल है कि इन चुनावों में आरोप-प्रत्यारोपों के हमलों का जो सिलसिला चला और बयान जिस निम्नस्तर तक पहुंचे, उस पर दन्तहीन चुनाव आयोग की कार्यवाही कितनी पर्याप्त है। प्रचार-बयान देने में सावधानी बरतने के लिए चुनाव आयोग की लगातार नसीहतों और चेतावनियों के बावजूद यदि टीवी एंकर से नेता बनी आम आदमी पार्टी की शाजिया इल्मी का मुस्लिम समुदाय को साम्प्रदायिक बनने के लिए उकसाना, भाजपा के गिरिराज सिंह और शिवसेना के रामदास कदम के आपत्तिजनक बयान सचमुच चिन्ता जताते हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक शाजिया ने मुसलमान वोटरों को उकसाते हुए कहा कि वे अब तक के चुनावों में कुछ अधिक ही सेक्युलर हो रहे हैं। उन्हें थोड़ा ज्यादा कम्युनल होने की जरूरत है। नरेन्द्र मोदी के वैवाहिक स्टेटस जैसे विषयों को लेकर किए गए व्यक्तिगत हमलों का देश के सामने खड़ी चुनौतियों से जुड़े मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं था। इन चुनावों में मोदी की प्रचार शैली ही नहीं बल्कि मोटे तौर पर उनकी पार्टी की चुनावी प्रचार रणनीति भी देश के विकास के दायरे में रही है। शायद यही कारण है कि मतदाताओं को मोदी आज देश के विकास पुरूष के तौर पर नजर आते हैं। इसी का प्रभाव है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक रहे पिछड़े और दलित भी आज मोदी के साथ खड़े दिख रहे हैं। ऐसा नहीं कि मोदी ने अपने विपक्षियों पर हमला बोलने में कोई कोताही बरती हो, लेकिन उन्होंने अपने हमलों को कभी व्यक्तिगत नहीं बनने दिया और न ही साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण होने दिया। इसके बावजूद भाजपा और हिन्दुत्व खेमे के तत्वों ने ऐसे बयान दिए कि मोदी को खुद उन्हें संयम में रहने की अपील करनी पड़ी। इन चुनावों के अब तक के पूरे परिदृश्य पर नजर डालने के बाद इस बात की जरूरत महसूस की जानी चाहिए कि चुनाव आयोग को और दन्त मुहैया कराए जाएं, जिससे कि चुनावों का माहौल खराब करने वाले तत्वों पर अधिक सख्त कार्यवाही की जा सके। साथ ही राजनीतिक पार्टियों को भी खुद सोचना होगा कि परिपक्व लोकतन्त्र में उनकी अपनी जिम्मेदारियां क्या हैं। देश में लोकतन्त्र को अभी लंबा रास्ता तय करना है। इसे ध्यान में रखते हुए चुनावों में उठने वाले मुद्दे व्यक्तिगत हमले न होकर केवल देश के विकास और सरकार की नीतियों से जुडऩे वाले होने चाहिएं। सभी पार्टियों के कर्णधार खुद तो देश के सेक्युलर तानेबाने को नुकसान पहुंचाने से बचें ही, साथ ही ऐसे बयानों से ही नहीं, बल्कि ऐसे बयान देने वाले तत्वों से भी उनकी पार्टी को किनारा करने के रास्ते अख्तियार करने चाहिएं।

श्रीकान्त शर्मा

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