ब्रेकिंग न्यूज़ 

पूर्णमिदं

यज्ञ भावना पर आरूढ़ निरन्तर अपनी शक्ति, योग्यता, सोमथ्र्य, प्रतिभा का उपयोग समष्टि हित के लिए ही करें। समष्टि हित में व्यष्टिहित का रक्षण तो स्वत: सिद्ध है ही। इसके विपरीत धारणा का कारण तो मात्र नासमझी ही है। इसके अतिरिक्त शिक्षा, योग्यता, कर्म, पद, उपलब्धि के लिए भी अभिमान तो निरर्थक है। सारे संयोग भी तो प्रभु ही जुटाते हैं। धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्तियों में अपनी साधना, त्याग, पाण्डित्य, प्रवचन, सामथ्र्यादि को लेकर अभिमान दिखाई देता है। आदि शंकराचार्य विवेकचूड़ामणि में सावधान करते हैं-

वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान् कुर्वन्तु कर्मणि भजन्तु देवता: ।

आत्मैक्यबोधेन बिना विमुक्ति: न सिध्यते ब्रह्माशतान्तरेपि ।।

                (विवेकचूड़ामणि)

दूसरी ओर जीवन के अन्य कलापों में भी हीन भावना की आवश्यकता नहीं है। झुकना, सम्मान देना, अनुगृहीत होना, विनम्रता, हीन भावना नहीं है, सद्गण है। हीन भावना, निराशावादी दृष्टिकोण, नकारात्मक व्यक्तित्व, विघटनकारी हैं। एक बड़े से बड़े प्रतिष्ठित संस्थान में एक छोटे से छोटे क्लर्क और चपरासी की अपनी उपयोगिता और उत्तदायित्व है। कर्तव्य कर्म बड़ा हो या छोटा इसका महत्व नहीं है, महत्व है कर्मनिष्ठा और समर्पण का। स्वार्थपूर्ण खींचातानी, प्रमाद एवं आलस्य परिवार, समाज, राष्ट्र, संसार सभी जगह गड़बड़ी पैदा करते हैं। विवेकपूर्वक विश्लेषण से यही निष्कर्ष निकलता है कि सर्वागीण सामाजिक विकास और सुख शान्ति के लिए अपनी संकीर्ण दृष्टि तथा सीमित व्यक्तित्व को ‘असीम’ ‘एक’ में समाहित करना होगा। धर्म और आध्यात्मिक शास्त्र हमें इसी ओर प्रेरित करते हैं।

आत्मा-प्रबन्धन किए बिना कोई बाह्य प्रबन्धक प्रभावकारी नहीं होता। हर व्यवस्था दूषित हो जाती है। कल्याणकारी सिद्धान्तों तथा योजनाओं का यथोचित क्रियान्वन ही नहीं होता।

भेद दृष्टि उत्पन्न करने वाले मन को प्रशिक्षित करना होगा। एक ओरअपने को श्रेष्ठ मानना और दूसरे को हीन मानने की नासमझी छोडऩी है। दोनों ही एक ही जीवन तत्व की संस्कारानुसारी अभिव्यक्तियां हैं। अधिष्ठान पर त्रिगुणात्मक अध्यस्त रंगमंच देश (लोग) काल और कर्मनुसार, जैसा होना चाहिए वैसा ही है। कही अटकने भटकने की आवश्यकता नहीं है।

निर्मल, शान्त, समाहित मन में ही ‘एकमेवाद्वितीय’ सद्वस्तु का साक्षात्कार होने पर प्रातीतिक ‘अहं’ बाशित हो जाता है और तभी छोटे-बड़े, ऊंचे-नीचे सभी के लिए आत्मीयता, सम्मान, सर्वात्मभाव बन पड़ता है। सहज प्रेम सही समझ की परिणति है।

स्वामी सुबोधानन्द      

отзыв написатьгугл,

Leave a Reply

Your email address will not be published.