ब्रेकिंग न्यूज़ 

जो दिखता है, वही बिकता है!

हाल में बाजार में आई दो किताबों ने पूरे सप्ताह खूब सुर्खियां बटोरीं। इनमें से एक तो प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया प्रमुख संजय बारू की लिखी किताब है, जबकि दूसरी पुस्तक पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारिख द्वारा लिखी गई है। इन किताबों को खरीदने या फिर बुकस्टाल पर एक नजर डालने के लिए लोग दौड़ते-भागते नजर आए। इन किताबों का जायजा लेने के लिए बड़ी संख्या में लोगों ने ऑनलाइन ही छान लिया। उनकी उत्सुकता प्रतिष्ठित लोगों द्वारा एक-दूसरे पर छींटे उछालने का आनन्द लेने की भी थी। इतनी भागदौड़ के बाद लोगो को नाउम्मीदी ही हाथ लगी। इन किताबों के टाइटल और मीडिया की हेडलाइनों से ऐसा तो जरूर लगा कि इनमें राजनितिक उठा-पटक, गोपनीय विषयों की चर्चा होगी, पर इनमें ऐसे मुद्दे केवल छुए भर गए हैं। इनमें जो भी लिखा गया है, वह तो जनता सालों से जानती है। संजय बारू की ‘एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर : द मेकिंग एण्ड अनमैकिंग ऑफ मनमोहन सिंह’ और पी.सी. पारिख की ‘क्रूसेडर ऑर कॉन्सपिरेटर? कोलगेट एंड अदर ट्रूथ्स’ ने जैसे देश के राजनितिक परिदृश्य में एक भूचाल ला दिया। इन किताबों के बाजार में आने के समय पर भी भारी हंगामा हो रहा है। ये किताबें ऐसे समय में बाजार में आई हैं, जब देश में चुनावों की सरगर्मी अपने चरम पर है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने डॉ. मनमोहन सिंह के पूर्व मीडिया सलाहकार बारू की किताब को काल्पनिक और सच्चाई से परे बताया है। लेखक ने इसमें प्रधानमंत्री को सोनिया गांधी के हाथों का खिलौना बताया है। इस किताब ने विपक्षी पार्टियों को कांग्रेस पर निशाना साधने का अच्छा मौका दे दिया है। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा ने समय गवाएं बगैर कांग्रेस पर हमला बोल दिया। अडवाणी और अरुण जेटली जैसे भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस और मनमोहन सिंह पर यह कहते हुए धावा बोला कि यह किताब इस बात की तस्दीक करती है कि मनमोहन सिंह एक ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ हैं और सरकारी मामलों में सोनिया गांधी की ही चलती है। पार्टी ने अपनी जनसभाओं में इस मुद्दे को खूब उछाला और सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद की गरिमा घटाने का दोषी ठहराया।

ये किताबें संवैधानिक पदों के दुरूपयोग और उच्च पदों तक अपनी पहुंच बनाने और विश्वसनीयता हासिल करके उसे अपने आर्थिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश लगती है। बारूअपनी किताब को काफी संतुलित बताते हुए कहते हैं कि इसमें यूपीए सरकार की उपलब्धियां भी गिनाई गई हैं। साथ ही मीडिया पर सिर्फ आलोचनाओं पर ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगते हैं। अपनी किताब पर हुए विवाद को खारिज करते हुए वह कहते हैं कि इस किताब में ऐसा कुछ भी नहीं, जो जनता पहले से नहीं जानती हो। उन्होंने और इस के रिलीज के समय को लगे आरोपों को भी सिरे नकार दिया। उनका कहना था कि पुस्तक के बाजार में आने के समय का चुनावों से कुछ लेना-देना नहीं है।

बारूकी किताब से उठे गुब्बार की धूल अभी बैठी भी नहीं थी कि पूर्व कोयला सचिव पी.सी. परख ने यह कह कर हंगामा खड़ा कर दिया कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल में हुए कोयला घोटाले से बचा जा सकता था। बारू की किताब के सन्दर्भ में कहा जा सकता है कि उन्होंने 2009 में पीएमओ में वापसी न होने की भड़ास उन्होंने इस किताब से निकाली है। जबकि पारिख 36 साल की सरकारी सेवा से रिटायर हुए हैं और उन्हें अनेक सरकारों के साथ काम करने का अनुभव है।

पारिख के संस्मरण जहां प्रेरणादायक हैं, वहीं वे अवसाद भी पैदा करते हैं। इस किताब में कोयले की खुली नीलामी में अड़ंगा लगाने वाले कॉर्पोरेट जगत के लोगों और मंत्रियों के बारे में अनेक भयानक खुलासे किए गए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद धर्मेन्द्र प्रधान और झारखंड के भूतपूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन के साथ हुई घटनाएं विस्तारपूर्वक लिखी गई हैं। शासन तंत्र में फैली सड़ांध भी पुस्तक में दिखाई पड़ती है। झामुमो, तेलुगु देशम और तृणमूल कांग्रेस जैसी अन्य पार्टियों के संबंध में भी उम्मीद के अनुसार ही लिखा गया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय इन दोनों ही किताबों को खारिज नहीं कर सकता, क्योंकि इनमें इस बात का स्पष्ट खुलासा है कि भारत का सबसे बड़ा कार्यालय प्रधानमंत्री का दफ्तर और उस कार्यालय को दिशा देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कैसे सोचते और कार्य करते हैं। इन किताबों में भाजपा के कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर भी ऊंगली उठाए जाने के कारण भाजपा भी अपने ढंग से इनका इस्तेमाल नहीं कर सकती।

ये किताबें मनमोहन सिंह पर लिखे निबंध नहीं हैं। जहां जरूरत पड़ी है, केवल वहीं उनके बारे में लिखा गया है। उनकी शक्तियों और कमियों को जरूरत के हिसाब से ही बताया गया है। इस समय के हालात में ये किताबें देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान हैं। मनमोहन सिंह के कट्टर आलोचक भी मानते हैं कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत ईमानदारी के उच्चतम मानक स्थापित किए हैं, लेकिन इस सच्चाई से भी कोई इंकार नहीं कर सकता कि अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अपने मंत्रियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से आंखें मूंदें रखीं।

एक बात तो तय है। इन किताबों की वजह से पर्दाफाश करने वाली किताबों का सिलसिला चल पड़ेगा। सत्ता के गलियारों में बैठे नौकरशाह अपने संस्मरण लिखने को प्रेरित होंगे। एम. ओ. मथाई की 1978 में आई किताब ”नेहरू युग के संस्मरण’’ ने नेहरू परिवार की चूलें हिला दी थी। आने वाले दिनों में ऐसी और किताबें आएंगी, जो एक जागरूक प्रजातंत्र के लिए और अच्छा ही होगा।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

Long taillenovo ноутбуки купить

Newer Post

Leave a Reply

Your email address will not be published.