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कोल ब्लॉक आवंटन घेरे में पीएमओ!

सरकार के पास पहले से ही भूवैज्ञानिक रिपोर्टों के साथ-साथ भंडार और कोयले की गुणवत्ता की सीमा के बारे में काफी सटीक आंकड़े उपलब्ध थे। सीएमपीडीआईएल ने विस्तृत अन्वेषण शुरू किया था। इसलीए मैंने सोचा की भूवैज्ञानिक रिपोर्टों को सभी संभावित बोलीदाताओं के लिए उपलब्ध करवाने से एक तर्कसंगत, उद्देश्यपूर्ण, न्यायसंगत और कोयला ब्लॉकों के आवंटन की पारदर्शी व्यवस्था तैयार की जा सकती है।

निजी क्षेत्र के ‘कैप्टिव यूज’ के लिए कोयला ब्लॉकों के आवंटन की प्रक्रिया कोयला सचिव की अध्यक्षता में एक जांच समिति के माध्यम से 1993 में शुरू हुई थी। लेकिन कैप्टिव माइनिंग के लिए उपलब्ध कोयला ब्लॉकों के बारे में जानकारी व्यापक रूप से प्रचारित नहीं की गई। ब्लॉक्स के बारे में भूगर्भीय रिपोट्र्स को गोपनीय रखा गया और आवेदकों के साथ इसको साझा नहीं किया गया। उन्हें यह सारी जानकारियां गुप्त रूप से सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआईएल), और कोल इंडिया की सहायक कंपनियों से प्राप्त करनी पड़ती थी। 1993 से 2002 के बीच में केवल 15 ब्लॉक्स निजी कंपनियों को आवंटित किए गए थे जो कि 1.5 प्रति साल के औसत पर था। ज्यादातर ब्लॉक्स के लिए आवेदकों की संख्या सीमित थी। जब तक एक आवेदक आवंटन के सारे माप-दडों को पूरा करता है तब तक जांचसमिति को उसे चुनने में शायद गंभीर समस्या नहीं आती। जैसे-जैसे आवेदकों की संख्या प्रति ब्लॉक बढ़ती गई वैसे-वैसे मंत्रालाय ने ब्लॉक्स को छोटे ब्लॉक्स में विभाजित कर दिया। यह सब भूवैज्ञानिक या भौगोलिक विशेषताओं की अनदेखी और कोयले के नुकसान को ध्यान में न रख कर किया जा रहा था।

जिस समय मैंने मंत्रालय में अपना प्रभार संभाला उस समय तक प्रत्येक ब्लॉक के लिए आवेदकों की संख्या मे काफी बढ़ोतरी हो गयी थी। हालांकि अभी भी यह संख्या एकल अंक में थी। मैंने पाया कि आवंटन के लिए कई आवेदक प्रत्येक ब्लॉक के लिए निर्धारित सारे मानदंडों को पूरा कर रहे थे। इसके कारण ऑब्जेक्टिव सिलेक्शन बहुत ही कठिन हो गया था। सभी योग्य आवेदकों को संतुष्ट करने के लिए ब्लॉक्स को छोटे-छोटे भागों में विभाजीत करना न तो व्यवहारिक और न ही वांछनीय था। और इसी दुविधा के कारण मैनें खुली बोली के बारे में सोचा जो इस समस्या का एक संभव समाधान हो सकता था। इससे न केवल व्यक्तिपरक निर्णय लेने को खत्म किया जा सकता था बल्कि राज्य के लिए अतिरिक्त राजस्व के मार्ग भी खोले जा सकते थे।

कोयला ब्लॉक के भूविज्ञान और कोयले की गुणवत्ता व्यापक रूप से भिन्न है। खनन की लागत में काफी उतार चढ़ाव देखे जा सकते हैं, यह लागत 300 रूपए प्रति टन अच्छी खुली खदान से 2,000 रुपए प्रति टन गहरी भूमिगत खदान तक जा सकते है। कोयले की गुणवत्ता ‘ए’ ग्रेड (एचवी 6200 किलो कैलोरी / टन) से ‘जी’ ग्रेड (एचवी 1300 किलो कैलोरी / टन) तक भिन्न-भिन्न हो सकती है। इसकी यूजफुल हीट वैल्यू (यूएचवी) के अलावा और भी अन्य विशेषताएं हैं जो इसके व्यवसायिक मूल्य तय करते है। विभिन्न ब्लॉकों में लागत और गुणवत्ता में भारी अन्तर होने के कारण आवंटन में पक्षपात और भ्रष्टाचार के लिए भारी गुंजाइश छोड़ दी थी। ऐसी जटिल स्थिति में जांच समिति द्वारा एक निष्पक्ष और वस्तुनिष्ठ निर्णय लेना असंभव था।

सरकार के पास पहले से ही भूवैज्ञानिक रिपोर्टों के साथ-साथ भंडार और कोयले की गुणवत्ता की सीमा के बारे में काफी सटीक जानकारी उपलब्ध थी। सीएमपीडीआईएल ने विस्तृत अन्वेषण शुरू किया था। इसलिए मैंने सोचा की भूवैज्ञानिक रिपोर्टों को सभी संभावित बोलीदाताओं के लिए उपलब्ध करवाने से एक तर्कसंगत, उद्देश्यपूर्ण और न्यायसंगत कोयला ब्लॉकों के आवंटन की पारदर्शी व्यवस्था तैयार की जा सकती है। इसके अलावा, अप्रत्याशित लाभ का हिस्सा दोहन से नीलामी विधि उन कंपनियों के लिए भी उचित होगी जो कोयला सी.आइ.ऐल या बाहर से आयात करती है।

प्रधानमंत्री द्वारा कोयला मंत्रालय का प्रभार संभालने से पहले ही मैनें एक चर्चा पत्र तैयार किया था और जून 2004 में एक ओपन हाउस चर्चा के लिए सभी हितधारकों को आमंत्रित किया था। इसमें कई उद्योग संघ जैसे कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सिआईआई), फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफआईसीसीआई), फेडरेशन ऑफ इंडियन मिनरल इंडस्ट्रीज (एफआईएमआई), एसोसिएटेड चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (एसोचैम) आदि शामिल हुए। मैंने इस क्षेत्र से सम्बन्धित भारत सरकार के मंत्रालयों और उन सभी कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया जिनके आवेदन कोयला मंत्रालय में लंबित थे। खुली बोली(ओपन बिडिंग) के बारे में कई सहभागी उत्साहित नहीं थे। उनका मुख्य तर्क यह था कि अगर कोयला ब्लॉकों की नीलामी होती है तो खनन किए जा रहे कोयले की लागत ऊपर जाएगी। यह तर्कहीन था। खुली नीलामी में आए सहभागी व्यवहार-कुशल व्यवसायी थे जिन्हें खाली मुनाफे से मतलब था। वे बिना विचारे ऊंची बोली नहीं लगाते। जिस कीमत पर सीआईएल पहले कोयला उपलब्ध कराती थी अब उस बोली की राशि पर स्वचालित रूप से नियंत्रण लग गया था। आजीवनकाल तक खदान की उत्पादन साझेदारी की व्यवस्था से तत्काल नकदी बहिर्वाह न हो यह सुनिश्चित हो जाता। और यह भी सुनिश्चित हो जाता की इससे परियोजना की लागत प्रभावित न हो। मुझे लगता है कि उद्योग जगत इस बात का विरोध इसलिए कर रहा था क्योंकि जो चीज अब तक मुफ्त थी उसके लिए पैसे क्यों दे। एक हद तक, यह पारदर्शिता के लिए कॉर्पोरेट भारत के बचने का एक प्रतिबिंब था। हितधारकों की बैठक में विरोध के बावजूद, मैंने एक नीति नोट तैयार किया और जुलाई के मध्य में राज्यमंत्री श्री दसारी नारायण राव को प्रस्तुत कर दिया।

जांच समिति के पास कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। यह एक प्रशासनिक आदेश से गठित की गई थी। जांच समिति से एक बोली प्रणाली (बिडिंग सिस्टम) में बदलाव को जांच समिति से एक प्रभारी और प्रशासनिक आदेश के माध्यम से कार्यान्वित किया जा सकता था। हालांकि, यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रस्तावित प्रणाली कानूनी आधार पर की जाए मैंने खुली बोली को लागू करने के लिए कानूनी ढांचे पर कानून विभाग की सलाह मांगी। इसके साथ ही मैंने सीएमपीडीआईएल को एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सलाहकार की सेवाओं के संलग्न द्वारा बोली दस्तावेजों और मूल्यांकन मापदंड तैयार करने के लिए दरख्वास्त की ताकि मंत्रीमंडल की मंजूरी के बाद जल्द ही बोली प्रक्रिया शुरु हो सके। प्रतियोगिता को अधिकतम करने के लिए कैप्टिव बोली के लिए उपलब्ध ब्लॉकों की सूची तैयार करके मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया और यह समाचारपत्रों मे विज्ञापनों के माध्यम से भी प्रकाशित किया गया। मुझे पूरा भरोसा था कि नईं प्रणाली कैलेंडर वर्ष के अंत से पहले शुरु हो जायेगी। मैंने प्रस्तावित परिवर्तनों की प्रक्रिया के लिए स्क्रीनिंग समिति की बैठकों को लंबित कर दिया।

श्री राव ने स्पष्टीकरण की मांग करते हुए फाइल को लौटा दिया। 30 जुलाई 2004 को, मैनें उनके प्रश्नों के उत्तर दिए और प्रधानमंत्री ने जिन्होंने कोयला मंत्रालय का भार संभाला था, उस फाइल को चिह्नित कर दिया।

ओपन बिडिंग पर प्रधानमंत्री की मंजूरी

20 अगस्त 2004 को प्रधानमंत्री ने ओपन बिडिंग द्वारा आवंटन के लिए मंजूरी दे दी। उनको इस पर एक कैबिनेट नोट चाहिए था। प्रधानमंत्री की मंजूरी के बाद हमें प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से एक नोट मिला जिसमें ओपन बिडिंग से होने वाली संभावी समस्याओं के बारे में लिखा था। प्रधानमंत्री कार्यालय से आए इस नोट से इतना तो समझ में आ गया था कि यह सारी चर्चा राज्यमंत्री द्वारा पीएमओ को अहस्ताक्षरित नोट पर आधारित थी। इसके साथ ही, बहुत से सांसदो ने बिडिंग सिस्टम के प्रस्तावित कदम का विरोध करने के लिए कई पत्र लिखे। इनमें से एक चिट्ठी श्री नवीन जिंदलजी की भी थी जिनकी कोयला खनन में काफी रूचि थी।

कोयला खदान राष्ट्रीयकरण एक्ट मे संशोधन पर कानून मंत्रालय के विचार

सितम्बर की शुरुआत में कानून मंत्रालय ने कोयला खदान राष्ट्रीयकरण एक्ट के सेक्शन 3 ए और सेक्शन 34 में संशोधन के अंतर्गत विचार प्राप्त हुए। कैबिनेट नोट को जमा करते समय पीएमओ द्वारा उठाई गई सभी शंकाओं का स्पष्टीकरण दे दिया था। मैंने यह सलाह भी दी कि जरूरी वैधानिक संशोधन के लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता था, जिससे बोली प्रणाली को लाने में जल्दी होती और साथ ही सारे आवेदन खुली बोली के माध्यम से निपटाए जा सकते थे।

राज्यमंत्री द्वारा प्रस्ताव को विफल करने की कोशिश

4 अक्टूबर को, प्रधानमंत्री को फाइल जमा करते समय, राज्यमंत्री ने निम्नलिखित टिप्पणी फाइल पर लिखी थी: इस बात पर सहमत होना बहुत मुश्किल है कि स्क्रीनिंग कमिटी एक पारदर्शी निर्णय निर्धारण की व्यवस्था नहीं कर सकती। एक नई व्यवस्था को लाने के लिए यह एकमात्र आधार नहीं हो सकता, वो भी तब जब इससे आधारभूत संरचनाओं के हित जुड़े हो। प्रतिस्पर्धी बोली के प्रस्ताव को नहीं माना जा सकता क्योंकि एक तो यह अगले कोयला ब्लॉक्स के आवंटन मे देरी करेगा, और दुसरा कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) संशोधन बिल जो कि ट्रेड यूनियन के विरोध कि वजह से राज्य सभा मे लटका पड़ा है। यह नोटिंग दो कारणों से महत्वपूर्ण है : पहला, प्रतिस्पर्धी बोली या कोयला ब्लॉक के आवंटन और कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) संशोधन बिल के राज्यसभा में लटके होने के बीच मे दुर-दुर तक कोई रिश्ता नहीं था। ट्रेड यूनियन का विरोध कोयला क्षेत्र को व्यवसायिक खनन के लिए खोलने को लेकर था न कि कोल ब्लॉक्स के आवंटन में खुली बोली को लेकर। राज्यमंत्री के भ्रम पैदा करने की कोशिश से निर्णय निर्धारण की प्रक्रिया में देरी हुई। दूसरे, शिबू सोरेन ने इस टिप्पणी का प्रयोग प्रधानमंत्री के खुली बोली की शुरुआत करने के आदेश को पलटने के लिए किया। मिस्टर राव के पैदा किए भ्रम कि वजह से पीएमओ मे एक बैठक हुई जंहा यह तय किया गया कि नीति में बदलाव प्रत्याशित होना चहिए। 28 जून 2004 तक जितने आवेदन प्राप्त हुए थे, जब खुली बोली का विचार जगजाहिर किया गया था, उन सब का अनुमोदन स्क्रीनिंग समिति ही करेगी। पीएमओ ने इस निर्देश के साथ कि कैबिनेट नोट को संशोधित किया जाये ताकि नीतियां प्रत्याशित हो सकें, फाइल लौटा दी। पीएमओ इस बात की तस्दीक भी चाहता था कि कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) संशोधन बिल के नए बोली प्रक्रिया पर क्या असर होगा। पीएमओ ने यह निर्देश भी दिया कि सी.एम.एन अधिनियम को संशोधित करने के लिए अध्यादेश लाने की जरुरत नहीं है। संसद के अगले सत्र में इसके लिए एक बिल लाया जा सकता था। मैंने जरुरी स्पस्टीकरण और संशोधनों के कैबिनेट नोट को राज्यमंत्री के पास दिसंबर अन्त में जमा कर दिया, और उन्होंने इसे तब तक फिर से कोयला मंत्री बन चुके शिबू सोरेन को भेज दिया।

प्रधानमंत्री को जानकारी

17 जनवरी 2005 को मैं प्रधानमंत्री से यह बताने के लिए मिला कि कोयला मंत्रालय की महत्वपूर्ण फाईल्स जानबूझ कर अटकाई जा रही थी। मैंने उन्हें व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने को कहा। इस बातचीत के दौरान एक महत्वपूर्ण मुद्दा उभर कर आया, वह था कैप्टिव कोल ब्लॉक्स में प्रतिस्पर्धामक बोली की शुरुआत। प्रधानमंत्री ने अपने प्रिंसिपल सचिव टी.के.नायर को बुलाया और उन्हें कोयला मंत्री से बात करने को कहा। उसी शाम मैंने नायर को एक नोट लिखा जिसमें मैंने उन्हें कैबिनेट नोट के त्वरित अनुमोदन करवाने की बात कही ताकि आने वाले बजट सत्र में जरुरी वैधानिक संशोधन किए जा सके।

सोरेन ने खुली बोली के प्रस्ताव को खत्म किया

प्रधानमंत्री के साथ अपनी मुलाकात में यह बताने के बावजूद की राव और सोरेन कितनी समस्याएं खड़ी कर रहे हैं, सोरेन ने 25 फरवरी 2005 को फाइल पर नोटिंग लिखी ‘ऐसा देखा गया है की स्पष्ट रूप से प्रधानमंत्री ने कोयला मंत्री की हैसियत से कैप्टिव खनन के लिए कोल ब्लॉक प्रतिस्पर्धी बोली प्रणाली के अंतर्गत आवंटन को मंजूरी दे दी है। हालांकि पेज 14 एन पर उप सचिव के.वी. प्रताप द्वारा लिखी प्रधानमंत्री की टिप्पणी के अवलोकन से ऐसा नहीं लगता कि इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है। बल्कि उन्होंने इस प्रस्ताव को कैबिनेट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है ताकि इस पर निर्णय लिया जा सके। मैंने इस मुद्दे का पूरा अध्य्यन किया है और कोयला मंत्री की हैसियत से मैं राज्यमंत्री के विचारों, जो उन्होंने 4 अक्टूबर 2004 को व्यक्त किए थे, से इत्तिफाक रखता हुं और इसलिए इस प्रस्ताव को आगे न बढ़ाय़ा जाए’ राव और सोरेन ने उन शक्तियों के साथ गठजोड़ कर लिया जो कोल ब्लॉक्स के आवंटन में पारदर्शिता लाने वाले प्रस्ताव को खत्म करने में लगे थे।

प्रस्ताव का पुन:निर्माण

झारखण्ड के मुख्यमंत्री बनने पर शिबू सोरेन ने 1 मार्च 2005 को कोयला मंत्री के पद से फिर इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री ने फिर से कोयला मंत्रालय का प्रभार ले लिया। मैंने प्रस्ताव को पुनर्जीवित करते हुए कैबिनेट नोट को प्रधानमंत्री के अनुमोदन के लिए 7 मार्च को जमा करते हुए, यह स्पष्ट किया कि सारे आवेदन 28 जून 2005 तक के हैं। मुझे जून 2005 तक निबटा दिया गया होता। अगर बोली प्रणाली की शुरुआत पर तुरंत निर्णय नहीं लिया जाता तो सरकार पर फिर से पुरानी व्यवस्था को बनाए रखने का दबाव आ जाता। प्रधानमंत्री ने 4 मार्च को कैबिनेट नोट को मंजूरी दे दी जिसके बाद उसे क्षेत्र से जुड़े मंत्रालयों और राज्य सरकारों के पास उनकी टिप्पणी के लिए भेजा गया। सारी टिप्पणियों के आने के बाद फाइनल नोट को प्रधानमंत्री के पास राज्यमंत्री के मार्फत 21 जून को फिर भेजा गया ताकि कैबिनेट उस पर विचार कर सके।

प्रस्ताव को पटरी से उतारने में सफल राज्यमंत्री प्रधानमंत्री को फाइल देते वक्त राज्यमंत्री ने निम्नलिखित टिप्पणी की : इस तरह के निर्णय से पहले कैबिनेट को इस मुद्दे के निहींतार्थ पर खासा ध्यान देना चाहिए साथ ही बिजली कपनियों में प्रतिस्पर्धी बोली में भाग लेने की अनिच्छा देखी जा रही है। खुली बोली का बिजली की कीमतों पर कोई असर नहीं होना था। इससे एक तरफ तो वो जिन्हें कोल ब्लॉक मिलेंगे, और दूसरे वो हैं जिन्हें सीआइएल से कोयले खरीदने पड़ेंगे, दोनों को एक दूसरे की बराबरी करने का मौका मिलेगा। इन सब पर हमने कितनी बार विस्तारपूर्वक चर्चा की थी। बार बार इन्हीं मुद्दों को उठाना बोली प्रक्रीया को जितना हो सके रोकने की साजिश नजर आती थी ताकि पुरानी प्रणाली को ही बरकरार रखा जा सके। दुर्भाग्यवश राज्यमंत्री इसमें सफल रहे।

प्रिंसिपल सचिव नायर ने 25 जुलाई को कोयला मिलने वाले सभी राज्यों के मुख्य सचिवों और भारत सरकार के उन सभी मंत्रालयों के सचिवों जिनका कोयला से सम्बन्ध था की बैठक बुलाई। इस बैठक में मैंने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावित बोली प्रणाली इस क्षेत्र में पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के लिए है। राज्यों और केंद्रीय मंत्रालयों की भूमिका में बदलाव का कोई विचार नहीं है। वो आवेदकों के तकनीकी आंकलन और सत्यता पर अपने विचार प्रकट करते रहेंगे। नीलामी से आने वाले राजस्व को एक खास कोश में डाला जएगा जिससे की कोयला खनन क्षेत्र मे सामाजिक और भौतिक संरचनाओं का विकास किया जा सकेगा। इससे स्थानीय समुदाय पर पडऩे वाले बुरे प्रभाव मे कमी आएगी। इसलिए राज्यों को इस प्रस्ताव का स्वागत करना चाहिए।

इस बैठक में यह निर्णय भी लिया गया कि राज्यों की चिन्ताओं को देखते हुए कैबिनेट नोट को फिर से संशोधित किया जाए। यह भी फैसला किया गया कि चूंकि कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) एक्ट के आने में वक्त लगेगा, कोयला मंत्रालय कैप्टिव खनन के लिए कोल ब्लॉक्स के आवंटन स्क्रीनिंग समिति के द्वारा ही करेगी जब तक प्रतिस्पर्धी बोली प्रणाली व्यवस्था में आ नहीं जाती।

इससे मैंने यह समझा कि कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं हैं जिससे इस प्रस्ताव पर काम हो सके और इस प्रसताव को ठंडे बस्ते मे डाल दिया गया। सीएमएन एक्ट के संशोधान के कानून मंत्रालय का विचार करके बिल तैयार किया जा चुका था। अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो महज एक अध्यादेश लाकर ये संशोधान किया जा सकता था।

खैर, जैसा पीएमओ चाहता था कैबिनेट नोट को राज्यों के विचारों के अनुसार फिर से संशोधित किया गया। राज्यमंत्री ने इस फाईल को दबा लिया, वो बस मेरे रिटायर होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कैबिनेट में इस मुद्दे पर निर्णय के अनुमोदन के लिए प्रधानमंत्री को फाईल देने के बजाय, राज्यमंत्री ने 12 जनवरी 2006 को ये फाईल इस टिप्पणी के साथ लौटा दी : पीएमओ का ऐसा विचार है कि सीएमएन एक्ट मे संशोधान के लिए बहुत वक्त लगेगा तो इसलिए कोयला मंत्रालय कैप्टिव कोल ब्लॉक्स के आवंटन अभी की व्यवस्था से ही चालू रख सकती है। 20 कोल और लिग्नाइट ब्लॉक्स पहले ही प्रास्तावित हैं। इसलिए इस मामले में जल्दबाजी की जरुरत नहीं है। जैसे ही मैंने मंत्रालय छोडा, इस मुद्दे की हवा निकाल दी गई। कोल ब्लॉक्स की बोली की प्रणाली को बाकी खनिजों की बोली की प्रक्रिया के साथ जोड़ दिया गया, खनिज और खदान (विकास और विनियम) में संशोधन कर के। अब यह संशोधन दूसरे मंत्रालय के अधीन आता था, जिससे यह तय कर दिया गया कि वर्तमान व्यवस्था अगले कुछ और सालों तक चलती रहे।

इन सब घटनाक्रमों से यह तो साफ हो गया कि न तो राजनीतिक व्यवस्था न ही उद्योग एक निष्पक्ष और पारदर्शी था। हर वो कोशिश की गई जिससे खुली बोली की शुरुआत तब तक न हो जब तक सारे अच्छे कोल ब्लॉक्स का आवंटन न हो जाए।

मैंने हर सम्भव कोशिश की कि स्क्रीनिंग समिति के तहत होने वाले आवंटनो में पारदर्शिता और न्याय-परक आवंटन हो सके। मंत्रालय की वेबसाइट और समाचारपत्रों के मध्यम से आवंटित होने वाले ब्लॉक्स का हमनें खूब प्रचार किया। हमनें सारे आवेदकों को भूगर्भीय जानकारियां काफी कम कीमतों पर उप्लब्ध करवाई ताकि वह आवेदन देने से पहले सम्पत्ति का अच्छे से मूल्यांकन कर सकें। सफल आवेदकों को ज्वाइंट वेंचर बानाने के लिए बढ़ावा दिया गया जिससे छोटे ग्राहकों के साथ बेईमानी ना हो और जितने ज्यादा योग्य आवेदक आ सकें उतना अच्छा हो। जहां ज्वाइंट वेंचर नहीं हो सकते थे, वहां ऐसी व्यवस्था की जाती कि एक बड़ा पार्टनर खनन करे और सहयोगियों को कोयला सप्लाई करें।

इन नीतिगत बदलावों की वजह से जितने योग्य आवेदक हो सकते थे उन्हें समाहित किया जा सका। खुली बोली के आभाव में यह सबसे बढिय़ा और निष्पक्ष विकल्प बनाया गया था।

पी. सी. परख

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