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मोदी – द गेम चेन्जर

मोदी हमेशा से ही चर्चित शख्सियत रहे हैं। लोकसभा के 2014 के चुनावों में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित होने से भी पहले, और गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर तिकड़ी जमाने से भी पहले, यहां तक कि गुजरात के मुख्यमंत्री पद की पहली बार जिम्मेदारी संभालने से भी पहले, भाजपा में गुजरात मामलों के प्रभारी होने से पहले वह चर्चा में रहे हैं। गुजरात दंगों के लिए विपक्ष ने उन पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं चूका, तो विकास में गुजरात को देश का नंबर वन राज्य बना कर वह खुद ही विपक्ष की ईष्र्या के केन्द्र बन गए। लेकिन आम भारतीय मोदी में खुद का अक्स देखता है। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की यदाकदा की गई टिप्पणियां भी अपनों की दबी हुई ईष्र्या के संकेत देती हैं। राजनीति में मोदी को या तो पसन्द किया जा सकता है, या नापसन्द, लेकिन उन्हें नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। शख्सियत के तौर पर उन्हें जानने के बाद भी बीच का कोई रास्ता नहीं बचता है। आप उनके प्रशंसक हो सकते हैं, या फिर उनके आलोचक, लेकिन उनकी ओर से आंखें बंद नहीं कर सकते। अन्य कई कारणों में शायद यह भी एक कारण रहा होगा कि मोदी पर पिछले कुछ अर्से में अनेक पुस्तकें लिखी गईं हैं। इन पुस्तकों में वितस्ता पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित सुदेश वर्मा की ‘नरेन्द्र मोदी-द गेम चेंजर’ मुख्य रूप से चर्चा का विषय बनी है। चाय विक्रेता से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की यात्रा में मोदी के संघर्ष, दृढ़ संकल्प, प्रतिबद्धता, समर्पण आदि का जीवन्त वर्णन है। अंग्रेजी में लिखी गई इस पुस्तक के लेखक वरिष्ठ पत्रकार सुदेश वर्मा ने पुस्तक लेखन के संबंध में ‘उदय इंडिया’ से बातचीत के दौरान बताया – ”पुस्तक की सामग्री गुजरात के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी और उनके निकटस्थ लोगों से लिए गए अनेक साक्षात्कारों पर आधारित है, इसलिए पुस्तक में मोदी के संबंध में प्रकाशित जानकारी बहुत अधिक प्रामाणिक है।’’ 400 से अधिक पृष्ठों वाली इस पुस्तक में मोदी के उन अनेक अनछुए पहलुओं को भी उद्घटित किया गया है, जिनसे मोदी, आज के मोदी बन पाए हैं। पुस्तक बताती है कि किस प्रकार मोदी अपने निर्णयों से ‘विकास-पुरूष’ की छवि में छोटे सरदार बन कर उभरे और किस प्रकार उन्होंने आम आदमी का सशक्तिकरण किया। प्रिंट से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में निर्णायक भूमिका में पहुंचे सुदेश वर्मा की यह पुस्तक मोदी के उस दर्द को भी बयां करती है, जो मोदी ने ऐसे अपराध के लिए जो उन्होंने किया ही नहीं, अपने आलोचकों के जहर में डूबे कंटीले तारों के शाब्दिक-चाबुक खाते रहे हैं। मोदी के चरित्र के विभिन्न रंगों का समावेश करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की विख्यात शख्सियतों के विचार भी बड़ी खूबसूरती से लेखक ने पुस्तक में उद्धृत किए हैं। वरिष्ठ पत्रकार एम.जे. अकबर का यह कथन कि ‘वास्तव में किसी नेता को मीडिया की नकारात्मकता को हरा कर जनता के विचारों में इतना ऊंचा चढ़ते हुए मैंने नहीं देखा। आधुनिक भारत के इतिहास में किसी को इतनी नकारात्मक प्रेस नहीं मिली है।’ पुस्तक में उद्धृत विख्यात फिल्मकार सलीम खान का यह कथन समाज और राजनीति को आइना दिखाने के लिए काफी लगते हैं कि ‘क्या हमने आजादी के बाद से अन्य किसी ऐसे मुख्यमंत्री को याद रखा है, जिसके कार्यकाल में दंगे हुए? 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों की बात क्यों नहीं करते?’ जमियत उलेमा-ए-हिन्द के मौलाना महमूद मदनी का यह कथन भी पुस्तक में शामिल है कि ‘अन्य राज्यों की तुलना में मुसलमान गुजरात में अधिक प्रसन्न हैं।’

उदय इंडिया ब्यूरो

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